डाॅ. अम्बेडकर ने भारत के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए, खासकर गैरबराबरी वाले समाज में उत्पीड़ित समुदायों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भारत के संविधान का निर्माण किया. उन्होंने जोर दिया कि भारत को वास्तविक लोकतंत्र बनाने के लिए काफी प्रयासों की जरूरत होगी, जिसमें वास्तविक बराबरी हो. इन प्रयासों में ‘संवैधानिक नैतिकता’ समाज के ‘निर्देशक सिद्धांत’ का काम करेगी.

डाॅ. अम्बेडकर ने लोगों को गोलबंद करके मनुस्मृति का दहन किया, जो कि दलित और महिला विरोधी नियमों का मुख्य स्रोत है, जिनसे आज भी समाज संचालित होता है.

इसके विपरीत आरएसएस चाहता था कि भारत का संविधान मनुस्मृति पर आधारित हो. आरएसएस महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिये जाने के भी खिलाफ था.

  • भारत के संविधान का मसविदा तैयार करने और उसे स्वीकार करने के दौरान आरएसएस चाहता था कि उनके सपनों के ‘हिन्दू राष्ट्र’ का संविधान ‘मनुस्मृति’ पर आधारित हो. भगवा गिरोह के ‘वीर’ सावरकर ने लिखा -

“भारत के संविधान के बारे में सबसे बुरी बात तो यह है कि इसमें कुछ भी भारतीय नहीं है... वेदों के बाद मनुस्मृति हमारे हिन्दू राष्ट्र के लिए सर्वाधिक पूजनीय है, जो प्राचीन काल से ही हमारे रीति रिवाज, संस्कृति, विचार व कर्म का आधार बनी हुई है. इस ग्रंथ ने सदियों से हमारी आध्यात्मिक व पारलौकिक उन्नति का पथ प्रशस्त किया है. यहां तक कि आज भी करोड़ों भारतीय अपने जीवन और व्यवहार में मनुस्मृति की मान्यताओं का अनुपालन कर रहे हैं। मनुस्मृति हिन्दू लाॅ है.”

(वुमेन इन मनुस्मृति, सावरकर समग्र, वाल्यूम 4, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 416)

  • धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान के 26 नवंबर 1949 को अंगीकार होने के बाद आरएसएस के अंग्रेजी के मुखपत्र आॅर्गनाइजर ने 30 नवंबर 1949 को अपने संपादकीय में लिखा कि --

“लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के विशिष्ट संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है. मनु ने जो कानून बनाया, वह यूनानी और फारसी दार्शनिकों से बहुत पहले बनाया. मनुस्मृति में स्पष्टतः वर्णित वह कानून व्यवस्था, आज की तारीख़ में दुनियाभर के लिए विशेष आदर का विषय है क्योंकि उसमें स्वाभाविक आज्ञापालन और निश्चितता बोध के गोपनीय सूत्र हैं. लेकिन हमारे संवैधानिक विशेषज्ञों का ध्यान उधार नहीं गया.”

जब वे दावा कर रहे थे कि मनुस्मृति पूरी दुनिया में सम्मानित है, तो वे किसकी तरफ इशारा कर रहे थे? इस बात का खुलासा अम्बेडकर ने ही किया जिन्होंने अपने लेखन के जरिये मनुस्मृति के उन विचारधारात्मक सूत्रों को उजागर कर दिया था जिन्होंने जर्मन दार्शनिक नीत्शे को प्रेरित किया और नीत्शे ने हिटलर को प्रेरित किया. फिर आरएसएस के नेता हिटलर और मुसोलिनी से प्रेरित हुए.

  • यहां तक कि जब हमारा धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान लागू हो गया तब भी आरएसएस भारत के संविधान के खिलाफ दुष्प्रचार करता रहा. आरएसएस भारत के संविधान के प्रति कितना वफादार है यह गोलवलकर के इस वक्तव्य से समझा जा सकता हैः
    “हमारा संविधान पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों से ली गई अलग-अलग धाराओं का पुलिंदा भर है. इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे हम अपना कह सकें. क्या इसमें हमारे राष्ट्रीय मिशन और हमारे जीवन के केन्द्रीय तत्व के बारे में एक भी शब्द है? नहीं!”

(गोलवलकर, बंच आॅफ थाॅट्स, साहित्य सिंधु, 1996, पृ. 238)

  • अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल लिखा, जिसका मकसद हिन्दू पर्सनल लाॅ में सुधार करना और महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार व अन्य अधिकारों की गारंटी करना. आरएसएस हिन्दू कोड बिल विरोधी कमेटी का हिस्सा था. गोलवलकर ने घोषणा की कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलने से पुरुषों के लिए ‘भारी मनोवैज्ञानिक संकट’ खड़ा हो जाएगा जो ‘मानसिक रोग व अवसाद’ का कारण बनेगा.

(पाॅला बचेटा, जेंडर इन द हिन्दू नेशन: आरएसएस वुमेन एज़ आइडियोलाॅग्स, पृ. 124)

 

“11 दिसंबर 1949 को आरएसएस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली की जिसमें एक के बाद एक वक्ता ने हिन्दू कोड बिल का विरोध किया. एक ने तो इसे “हिन्दू समाज पर एटम बम” कहा... अगले दिन आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने असेम्बली भवन पर जुलूस निकाला और ‘हिन्दू कोड बिल मुर्दाबाद’ के नारे लगाये... प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री और डाॅ. अम्बेडकर के पुतले जलाये.”

(रामचंद्र गुहा, ‘भागवत्स 'अम्बेडकर’, इंडियन एक्सप्रेस, दिसंबर 10, 2015)

 

जाति और संविधान के बारे में भाजपा के मन की बात

बारंबार भाजपा और संघ नेताओं ने ऐसे बयानात दिये हैं जिनसे जाति और वंचित जातियों के संवैधानिक अधिकारों के बारे में उनके असली रुख का पता चलता है।

ब्राह्मण महासभा में दलितों के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ उत्तरप्रदेश भाजपा महिला मोर्चा की नेता मधु मिश्रा ने जैसे शब्दों का प्रयोग किया वे भाजपा और संघ की दलित-विरोधी, संविधान-विरोधी विचारधारा को सामने लाते हैं-- “आज तुम्हारे सर पर बैठकर, संविधान के सहारे जो राज कर रहे हैं, याद करो, वो कभी तुम्हारे जूते साफ करते थे, आज तुम्हारे हुजूर हो गए हैं. क्यों? हम बंट गए हैं, हम विभाजित हो गए हैं. मेरे छोटे भाई सतीश गौतम (अलीगढ़ से भाजपा के प्रत्याशी जो ब्राह्मण हैं) को शायद आज से चालीस साल बाद का भारत दिख रहा है कि तुम्हारे बच्चे कहीं फिर से गुलाम न हो जाएँ, कहीं फिर हुजूर न कहने लगें उन्हें, जिन्हें तुम अपने बराबर में बिठाना पसंद नहीं करते. उठो, जागो, जब तक अपने अधिकार ले न लो, तब तक सतीश गौतम की तर्ज पर युद्ध करते रहो.”

काफी हो-हल्ले और दबाव के बाद भाजपा को मधु मिश्रा को निलंबित करना पड़ा. संघ और भाजपा नेता अक्सरहाँ जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं. जनवरी 2016 में वरिष्ठ भाजपा नेता और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने फरमाया कि अंबेडकर ने “जाति आधारित आरक्षण पर पुनर्विचार” का समर्थन किया था और कहा था कि हमने “इस दिशा में कुछ नहीं किया”. अगस्त 2015 में रायपुर में संघ नेता एमजी वैद्य ने यह दावा करते हुए कि ‘जातियाँ अब निरर्थक हो गई हैं’, जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने की बात कही. संघ ने अभी हाल ही में ‘सामाजिक न्याय पर प्रस्ताव’ स्वीकार किया, जिसमें प्रच्छन्न रूप से सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण की पुष्टि की गई है. पर उन्होंने इसमें एक शर्त जोड़ दी है कि “समृद्ध तबकों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहये”. अभी उनको यह स्पष्ट करना बाकी ही है की ‘समृद्ध तबकों’ से उनका आशय क्या है? क्या वे यह कह रहे हैं की जाटों को आरक्षण नहीं मांगना चाहिए? या वे अनुसूचित जाति/जनजाति के ‘मलाईदार तबके’ की ओर इशारा कर रहे हैं?

संघ से संबंधित संगठन अमरीका में मांग कर रहे हैं कि अमरीकी पाठ्यपुस्तकों में लिखी गई भारत में जाति आधारित भेदभाव की चर्चा को पाठ हटाया जाय. इंग्लैंड में संघ संबंधित संगठन इंग्लैंड के जातीय भेदभाव के विरुद्ध बने कानून के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं। इंग्लैंड के पिछले संसदीय चुनाव में भारतीय प्रवासी बहुल हैरो ईस्ट प्रांत से कंजरवेटिव पार्टी के उम्मीदवार ने अपने प्रचार के दौरान इस विधेयक को उलट देने के लिए खास वादा करते हुए आश्वासन दिया कि वह ‘धार्मिक समुदायों के साथ काम करेगा’. और संघ से जुड़े संगठन ने पर्चे निकाल कर अपील की कि लोग कंजरवेटिव पार्टी का समर्थन करें और जातीय भेदभाव-विरोधी विधेयक को उलट देने के लिए कैमरन को वोट दें.

बिहार भाजपा नेता और मोदी सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने रणवीर सेना के मुखिया ब्रहमेश्वर सिंह को ‘बिहार का गांधी’ कहा। रणवीर सेना के मुखिया कुख्यात ब्रहमेश्वर को ‘बिहार के दलितों का हत्यारा’ नाम से जाना जाता है. उसकी रणवीर सेना ने दलित और वंचित जातियों की, महिलाओं और बच्चों तक की, 90 के दशक में नरसंहार किए थे.

फरीदाबाद में दलित बच्चे को जला दिये जाने से बचा न पाने की हरियाणा सरकार की असफलता पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मोदी सरकार के कैबिनेट मंत्री वीके सिंह ने फरमाया “अगर कोई कुत्तों पर पत्थर फेंकें, तो क्या सरकार उसके लिए जिम्मेदार है?”

बंडारू दत्तात्रोय, वीके सिंह, स्मृति ईरानी और वेंकैया नायडू ने रोहित वेमुला को ‘देशद्रोही’ बताया. यह साफ है कि इन मंत्रियों की नजर में अम्बेडकरवादी सामाजिक-राजनीतिक काम ‘देशद्रोह’ है. भाजपा के मंत्रियों ने कहा कि रोहित ने दलित होने का झूठा दावा किया. रोहित के पिता ने जब यह जाना कि रोहित की माँ दलित हैं, तो उसने अपने बच्चों और पत्नी को छोड़ दिया था. तब भी भाजपा जोर देकर मनवाना चाहती है कि रोहित की पहचान अपनी साहसी दलित माँ से नहीं बल्कि अपने दलित-विरोधी पिता से जोड़ी जायेगी. जबकि कानून और संविधन की नजर में ऐसे मामले में दलित मां की संतान को दलित ही माना जायेगा.

“हमारे शास्त्रों के हिसाब से गौ का जीवन बहुमूल्य है”-- 2002 में झज्झर में गोकशी के आरोपी पाँच दलित युवकों की विश्व हिन्दू परिषद द्वारा की गई हत्या के बाद इसका बचाव करते हुए इस संगठन के नेता आचार्य गिरिराज किशोर के यही बोल थे. आज भाजपा ‘गोकशी’ करने वाले मुसलमानों के खिलाफ दलितों को अपने घृणा अभियान में साझेदारी के लिए कह रही है. सच्चाई तो यह है कि संघ गिरोह ‘गोकशी’ के नाम पर दलितों और मुसलमानों दोनों पर भीड़ द्वारा हमला और हत्या आयोजित करवाता है. उच्च जातियों की हिन्दू महिलाओं के साथ प्रेम विवाह करने वाले दलित और मुसलमान पुरुषों पर संघ गिरोह फर्जी बलात्कार के मामले भी दर्ज करवाता है, और इन स्त्रियों को तब तक पिटवाता और उत्पीड़ित करवाता है जब तक वे अपने पति या प्रेमी के खिलाफ झूठी गवाही न दे दें।