(पार्टी स्कूलों के लिए तैयार की गई एक लोकप्रिय भूमिका, लिबरेशन, जून 1990)

पिछले 7-8 वर्षों से केंद्रीय कमेटी पार्टी में अध्ययन करने की आदत डालने और पार्टी स्कूल की पद्धति को पार्टी की संस्थाओं का अभिन्न अंग बना देने का प्रयत्न करती रही है. केंद्रीय पार्टी स्कूलों में कार्यकर्ताओं के चुनिंदा बैच भर्ती किए गए और राज्य कमेटी व अन्य कमेटियों ने भी अपने-अपने स्तर पर स्कूल संचालित किए. यह उम्मीद की गई थी कि ये उपाय न सिर्फ समूची पार्टी की जानकारी व समझ के स्तर के उन्नत करेंगे, अपितु पार्टी कतारों में नियमित अध्ययन करने की आदत भी डाल देंगे. हम इस लक्ष्य को कहां तक पूरा कर सके? यह मानने में किसी को कोई उज्र नहीं होनी चाहिए कि हमें इस दिशा में बहुत थोड़ी सफलता मिली है. कुछ कामरेडों ने अपनी पढ़ाई जरूर जारी रखी है, मगर ऐसा मुख्यतः खुद उनकी अपनी प्रवृत्तियां के चलते हुआ है, बाकी कामरेड अपनी पुरानी स्थिति में लौट चुके हैं.

अब मार्क्सवाद के कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं, जिन्हें आप मार्क्सवाद का ककहरा कह सकते हैं और अगर आप उन्हें नहीं जानते तब तो आप अनपढ़ मार्क्सवादियों की श्रेणी में रखे जाने योग्य हैं. मैं समझता हूं कि पार्टी में ऐसे लोगों की तादाद काफी ज्यादा है. फिर, जिन्हें साक्षर मार्क्सवादी कहा जा सकता है उनमें से भी अधिकांश ने बमुश्किल प्राथमिक दर्जा पास किया है. हमारे अधिकांश वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भी मार्क्सवादी शिक्षा के विश्वविद्यालय में प्रवेश कर गए हैं ऐसा दावा नहीं कर सकते हैं.

यह अत्यंत दुखद स्थिति है और इससे यही झलकता है कि हमारे अधिकांश अच्छे कामरेड या तो अंधों की तरह काम कर रहे हैं अथवा सनकियों की तरह. अगर आप आंख-कान मूंदकर काम करते हैं, यानी वफादरी के साथ नारों को रट लेते हैं और ऊपर से आने वाली हिदायतों का हरफ-ब-हरफ पालन करते हैं तो आपके सामने उन नारों और हिदायतों की आत्मा को खो देने का खतरा रहता है और आप कभी रचनात्मक व्यवहार विकसित नही कर सकते हैं. और अगर आप अपनी सनक के मारे काम करते है तो आप यकीनी तौर पर एक दिन पार्टी के विचारों, पार्टी की योजनाओं और पार्टी के लाइन के खिलाफ खड़े हो जाएंगे. दोनों ही स्थितियां पार्टि और जनता के लिए एक जैसी नुकसानदेह हैं.

कुछ लोगों को मैंने यह महसूस करके बड़ा प्रसन्न होते देखा है कि उनकी गतिविधियों का मुख्य क्षेत्र मोर्चा संगठन है और वहां उन्हें मार्क्सवाद का अध्ययन करने की कोई आवश्यकता नहीं है. एकाध अपवादों को न गिना जाए तो मुझे ऐसा नहीं लगता कि आजकल आईपीएफ के नेता और कार्यकर्ता मार्क्सवाद का अध्ययन करने पर कोई ध्यान देते हैं. बहुतों का तो स्तर भी नीचे गिर गया है. इसके नेताओं और कार्यकर्ताओं के एक हिस्से के अंदर हाल में गैर क्रांतिकारी व्यवहार पनपने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है. ये कामरेड यह समझ पाने में असफल रहे कि इस मोर्चे की संपूर्ण धारणा, कार्यक्रम और कार्यनीति मार्क्सवाद-लेनिनवाद से ही, हमारी ठोस स्थितियों में उसके ठोस प्रयोग से ही, उत्पन्न हुई है. सर्वाधिक विकसित और क्रांतिकारी वर्ग को अपना उद्देश्य सफल करने के लिए समूचे समाज का नेता अवश्य प्रतीत होना चाहिए. कम्युनिस्टों को पूंजीपति वर्ग के साथ प्रतिद्वंद्विता करनी होगी और अंततः उसे समाज के स्वाभाविक नेता बनना होगा. संयुक्त मोर्चा, चाहे जिस रूप में और जिस विशेष मंजिल में बने, मूलतः वह यह लक्ष्य पाने का कम्युनिस्ट पार्टी का माध्यम भर है. लिहाजा, संयुक्त मोर्चा की रणनीति और कार्यनीति अर्थात् सर्वाधिक विकसित वर्ग के उद्देश्यों और नारों को जनता के सभी वर्गों के उद्देश्यों और नारों में तब्दील कर देने की क्षमता मार्क्सवादी सिद्धांत और व्यवहार का अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है. कम्युनिस्ट लोग जो कि इस मोर्चे के केंद्र और रीढ़ का काम करते हैं, अगर अनपढ़ मार्क्सवादी रहे तो उनके अंदर यह क्षमता नहीं पैदा हो सकती है.

बड़ी मात्रा में नई शक्तियां मोर्चे और पार्टी में शामिल हो रही हैं. वे मार्क्सवादी अर्थ में केवल अनपढ़ ही नहीं, अपितु उनमें से बहुतेरी तो सीपीआई, सीपीएम आदि से आ रही हैं और वहां उन्होंने नकारात्मक शिक्षा ही पाई है.

कुछ ही दिन हुए मैं एक कामरेड से मिला था. उन्होंने अपना सारा साजो-सामान बांध-बूंध लिया था, जिसमें किताबों से ठसाठस भरे दो बस्ते भी थे और वे पार्टी छोड़ देने के लिए – उनके ही शब्दों में अध्ययन करने के उद्देश्य से पार्टी से अनिश्चितकालीन छुट्टी पर जाने के लिए पूरी तरह आमादा थे. वे एक नौजवान, संभावनामय और अच्छे व्यावहारिक कार्यकर्ता थे. वे यह महसूस करके बड़े दुखी थे कि पार्टी में अध्ययन करने का उचित माहौल नहीं है. उन्होंने यह भी महसूस किया था कि पार्टी अंध व्यवहार को बढ़ावा दे रही है और चूंकि ढेर सारे जलिट सवालों का सैद्धांतिक तौर पर समाधान नहीं हुआ है इसलिए मौजूदा सफलताएं पानी का बुलबुला साबित हो सकती हैं और आगे चलकर हमें बंद गली में अपना सिर दीवालों से टकराना पड़ सकता है.

मैंने उनसे तर्क करने की और उन्हें पार्टी के अंदर ही बने रहने के लिए राजी करने की कोशिश की. मगर वे एक बुद्धिमान सख्स थे और दूसरे लोग क्या-क्या तर्क पेश करेंगे इसका पूर्वानुमान लगाकर उन्होंने अपना प्रति तर्क पहले से ही तैयार कर रखा था. लिहाजा, मैं उन्हें राजी नहीं कर सका. वैसे भी उन कामरेडो को, जो पार्टी से हट जाने की राह पर कदम बढ़ा चुके हैं, समझा पाने में सफलता का मेरा रिकार्ड सर्वदा खराब रहा है. यह तो एक अलग ही कहानी है.

यकीनन, इन कामरेडों की बुनियादी स्थिति गलत है. उनकी महत्वाकांक्षा अकादमीशियन बनने की है, पार्टी सिद्धांतकार बनने की नहीं. मैं अकादमीशियनों द्वारा निभाई जानेवाली अति महत्वपूर्ण भूमिका को किसी भी तरह कम करके नहीं आंकता. सच कहा जाए तो उनके जरिए किए जा रहे उपयोगी अनुमंडल कार्य के बगैर, विचारों के उस द्वंद्व के बगौर जो पहले अतिवार्यतः अकादमीशियानों की दुनिया में ही जन्मते हैं, वस्तुतः क्रांतिकारी सिद्धांत का निर्माण करना असंभव है. फिर भी अकादमीशियनों की अपनी एक लक्ष्मण रेखा होती है, उनके निष्कर्षों में स्पष्टता या जोर का अभाव रहता है और वे अक्सर भ्रमपूर्ण और गलत होते हैं. कार्यदिशा सूत्रबद्ध करने की जवाबदेही क्रांतिकारी सिद्धांतकारों और सर्वहारा के राजनीतिक नेताओं की होती है. पूंजीपति वर्ग सिद्धांतकारों और ‘व्यावहारिक कर्मियों’ के बीच विभाजन बर्दश्त कर सकता है. मगर सर्वहारा के नेता मार्क्स, लेनिन, माओ इत्यादि रहे हैं जो एक ही साथ दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनीतिक नेता सब कुछ थे, सबके सम्मिश्रण थे.

हमारे पार्टी इतिहास में ऐसे व्यक्तियों और ग्रुपों के उदाहरण मिलते हैं, जिन्होंने सिद्धांत और व्यवहार के बीच यांत्रिक विभाजन किया था. उनके विचार से “सही” राजनीतिक लाइन जानने के लिए सबसे पहले एक लंबे अरसे तक केवल अध्ययन किया जाना चाहिए और तब “सही” व्यवहार का दौर शुरू होगा. इतिहास ने ठीक ही साबित किया है कि वे सब के सब वर्षों के अध्ययन के बावजूद किसी ठौर-ठिकाने पर नहीं पहुंचे, उल्टे, शुरू में वे जितने दिग्भ्रमित थे उसकी तुलना में अंत में उनका भ्रम और अधिक बढ़ गया. क्रांतिकारी सिद्धांत केवल वे ही विकसित कर सकते हैं जो व्यवहार की कड़ी धूप में पसीना बहा रहे हों और उसे केवल अपनी गलतियों और असफलताओं से ही सीखा जा सकता है. क्या इसका यह मतलब है कि पार्टी छोड़कर चले जाने वाले उक्त कामरेड ने जो कुछ कहा था, वह सब का सब गलत था और इसके लिए उन्हें केवल खरीखोटी ही सुनाई जानी चाहिए? मुझे ऐसा नहीं लगता है. मेरे विचार से उनका यह कहना बिलकुल ठीक था कि ढेर सारे जटिल सवालों का सैद्धांतिक समाधान जरूरी है और अगर उनपर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया तो आगे चलकर हमे किसी अंधी गली में अपना सिर चारों ओर दीवालों से टकराना पड़ सकता है. उन्होंने अध्ययन के अनुकूल माहौल के अभाव की जो बात कही वह सचमुच हमारी एक कमजोर नस को पकड़ना था.

अगर आप यह मानते हैं कि सचमुच पार्टी की वैसी ही अवस्था है जैसी कि ऊपर बतलाई गई है तो आप तमाम पार्टी सदस्य मार्क्सवाद का कखग सिखलाने के लिए केंद्रीय कमेटी के जन-शिक्षा अभियान का हार्दिक तौर पर जरूर स्वागत करेंगे.

शुरूआत में ही एक सवाल पूछा जा सकता है और वह पूछना पूरी तरह उचित भी है कि जब समाजवाद समूची दुनिया में संकट से घिर चुका है और खुद मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं उस वक्त मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों का अध्ययन करने पर आपके द्वारा जोर दिया जाना क्या परंपरावाद को ही खाद-पानी देना नहीं है?

बेशक, आम तौर पर समाजवाद का संकट और खासकर पूर्वी यूरोप की घटनाएं हर दृष्टिकोण से सुसंगत व्याख्या की मांग करती है – विश्व शक्ति संतुलन में परवर्तन, यूरोप में समग्रतः कार्यरत शक्तिशाली सामाजिक-आर्थिक कारक, सोवियत पेरेस्त्रोइका की भूमिका, कम्युनिस्ट पार्टीयों द्वारा की गई गलतियां आदि-आदि के दृष्टिकोण से.

मगर मुझे लगता है कि अभी वे इन समस्याओं के सबसे मूलभूत कारण को छू तक नहीं रहे हैं. पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्टों को धक्का लगने के बाद कई लोगों को लगा कि परिस्थिति सोशलिस्टों के पक्ष में, “सर्वहारा की तानाशाही” के विरुद्ध “जनवादी उसूलों पर चलनेवाले समाजवाद” के पक्ष में मुड़ेगी, क्योंकि वे यूरोप में कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. मगर ऐसा नहीं हुआ और तमाम भूतपूर्व कम्युनिस्टों द्वारा सामाजिक-जनवादियों के रूप में अपने को सुधार लेने और पुनर्गठित करने के सारे प्रयत्न परिस्थिति को संभालने में असफल साबित हुए. मध्य-दक्षिण राजनीतिक गठजोड़ों का उभार, चर्च की बढ़ती भूमिका और पूंजीवाद की ओर वापस लौटने का आह्वान – पूर्वी यूरोप में तो अभी यही सब हो रहा है. अतः ठोस यथार्थ यही है कि पूर्वी यूरोप के विभिन्न देशों में तमाम किस्मों का समाजवाद असफल ही रहा तथा जनवादी क्रांति, जनता के जनतंत्र, सर्वहारा के शासन ने पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग के राजनीतिक शासन की वापसी का मार्ग ही प्रशस्त किया है. इस पहेली का हल केवल मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों द्वारा प्रतिपादित इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा ही प्रदान कर सकती है. मार्क्स ने कहा था, “सर्वहारा अगर पूंजीपति वर्ग के राजनीतिक शासन को नष्ट कर देता है तो यह केवल एक अस्थायी विजय होगी, वह खुद पूंजीवादी क्रांति की सेवा करनेवाला एक तत्व मात्र रहेगा, जैसा कि 1794 में हुआ और ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक इतिहास चक्र में, उसकी “गति” में, परिपक्व भौतिक परिस्थितियों का निर्माण नहीं हो जाता, जो पूंजीवादी शासन को निर्णायक रूप से उखाड़ फेंकने के लिए आवश्यक है. इसलिए फ्रांस में आतंक का राज्य अपने शक्तिशाली आघातों से फ्रांस की धरती से केवल समांतवाद के अवशेषों को चुन-चुनकर नष्ट कर सका. चिंताग्रस्त और आगापीछा करते रहनेवाला पूंजीपति वर्ग इस कार्य को दशकों में भी पूरा नहीं कर पाता. जनता की खूनी कार्यवाहियों ने इस प्रकार केवल उसके (पूंजीवाद के) लिए पथ प्रशस्त किया है. इसी प्रकार अगर पूंजीपति वर्ग के शासन की आर्थिक परिस्थितियां पहले से ही परिपक्व नहीं होतीं तो निरंकुश राजतंत्र का पतन भी अस्थाई ही साबित हुआ होता. मनुष्य नई दुनिया का निर्माण धरती की कृपा से प्राप्त फलों से नहीं करता है, जैसा कि छिछला आध्यात्मवाद मानता है, बल्कि पतन की ओर जाती सभ्यता के ऐतिहासिक अवदानों से करता है. उन्हें अपने विकासक्रम में नए समाज की भौतिक स्थितियों को खुद विकसित करने से शुरू करना चाहिए और कोई भी दिमागी कसरत अथवा इच्छा उन्हें अपने इस भविष्य से मुक्त नहीं हो सकती है.” (डाई मोरेलिसिरेंडे क्रिटिक ... 1847) इसके अतिरिक्त, उदारवादी पूंजीवादी और मार्क्सवादी प्रचार-माध्यमों में ढेर सारे विश्लेषण प्रकाशित हो रहे हैं उन्होंने मार्क्सवाद को इतना अधिक विकृत बना दिया है कि मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों को तरोताजा बनाना हमारे लिए आवश्यक बन गया है. उदाहरण के लिए, मैं ईपीडब्ल्यू में एक अकादमीशियन का, जो इस पत्रिका के नियमित लेखक रहे हैं, पूर्वी यूरोप की घटनाओं पर एक विश्लेषणात्मक लेख पढ़ रहा था. उन्होंने अंततः यह निष्कर्ष निकाला है कि कम्युनिस्ट लोग जनता के मन-मस्तिष्क पर धर्म के शक्तिशाली प्रभाव को समझने में असफल रहे और उसका समुचित इस्तेमाल न कर सके. अपने इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए वे स्वतंत्रता संघर्ष में धर्म का लोकप्रिय इस्तेमाल करने के गांधी के तरीके की वाहवाही करने पर उतर आए और उन्होंने कम्युनिस्टों को सलाह दी कि वे इससे सबक लें, आर्थात्, धरम से तालमेल बिठाने का तरीका सीखें.

मार्क्सवाद के विखंडित और शॉर्टकट अध्ययन के कारणवश कई लोग सोचते हैं कि मार्क्स धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने में असफल रहे और उन्होंने उसे “जनता के लिए अफीम” की संज्ञा देकर यूं ही खारिज कर दिया है. दरअसल मार्क्स ने धर्म का पूर्णतः सुस्पष्ट चित्र पेश किया है. ठहरिए, मुझे उनका ही वक्तव्य रखने दीजिए. “धर्म इस विश्व का आम सिद्धांत है, उसका विश्वकोषीय निचोड़ है, उसका लोकप्रिय शैली का तर्क है, उसका आत्मिक सम्मान है, उसकी उमंग है, उसका नैतिक विधि-निषेध है, उसकी भव्य प्रियोक्ति है, दिलासा देने और सफाई पेश करने का उसका आम आधार है ...”

“धर्म उत्पीड़ित मुनष्य की आह है, हृदयहीन विश्व की भावना और आत्मारहित परिस्थिति की आत्मा है, वह जनता के लिए अफीम है.” (मार्क्स-एंगेल्स पत्राचार).

क्या भौतिकवादी चिंतन के समूचे इतिहास में कभी किसी भौतिकवादी ने धर्म के बारे में इतना सुस्पष्ट चित्र पेश किया था? निम्न पूंजीवादी क्रांतिकारी अपने फैशनेबल रुख के चलते धर्म को सहज ढंग से खारिज कर देते हैं. हाल ही में मैंने जनमत में एक कविता पढ़ी जिसमें धर्म का विश्लेषण भोंड़े से भोंड़े रूप में किया गया है और मुझे लगता है कि हमारे कई कामरेड इस पर तालियां पीटेंगे.

कविता में आपको यह छूट मिल सकती है, किंतु अगर वह सिद्धांत में घुस गया तो बड़ा नुकसानदेह साबित होगा.

धर्म उल्टी विश्व चेतना है, जो मनुष्य के प्राकृतिक अस्तित्व के निषेध और प्रकृति के मानवीय अस्तित्व के निषेध पर आधारित है. मार्क्स ने कहा है, “एक बार जब मनुष्य और प्रकृति की सारवस्तु, प्राकृतिक जीवन के रूप में मनुष्य और एक मानवीय यथार्थ के रूप में प्रकृति, व्यावहारिक जीवन में, इन्द्रियग्राह्य अनुभव में स्पष्ट हो जाती है तो व्यवहार में एक पराए जीव की, मनुष्य और प्रकृति से बाहर के किसी जीव की तलाश (एक ऐसी तलाश जो मनुष्य और प्रकृति की अयथार्थता की स्वीकृति है) असंभव बन जाती है. अनीश्वरवाद भगवान के अस्तित्व से इनकार के तौर पर अब सार्थक नहीं रहता क्योंकि अनीश्वरवाद भगवान के अस्तित्व से इनकार करता है और इस इनकार के जरिए मनुष्य के अस्तित्व का दावा करना चाहता है. समाजवाद को इतने चक्करदार तरीके की जरूरत नहीं रहती है. वह वास्तविक अस्तित्व के रूप में मानव और प्रकृति की सैद्धांतिक और व्यावहारिक इन्द्रियग्राह्य अवधारणाओं से शुरू करता है, वह मनुष्य की सकारात्मक आत्मचेतना है. अब वह धर्म के निषेध के जरिए प्राप्त आत्म चेतना नहीं रह गई है, ठीक वैसे ही जैसे कि मनुष्य का यथार्थ जीवन सकारात्मक है. अब वह निजी संपत्ति के निषेध (साम्यवाद) के जरिए प्राप्त नहीं है. साम्यवाद निषेध के निषेध का दौर है और परिणामतः वह ऐतिहासिक विकास की अगली मंजिल के लिए मनुष्य की मुक्ति और पुनर्वास में एक यथार्थ और आवश्यक कारक है. साम्यवाद निकट भविष्य का आवश्यक रूप और सक्रिय उसूल है, लेकिन यह खुद मानव विकास का लक्ष्य अथवा मानव समाज का अंतिम रूप नहीं है.” (आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां)

धर्म को खारिज करना और उसके विरुद्ध अनीश्वरवादियों की नकारात्मक शैली में संघर्ष चलाना गलत है. इसी प्रकार, समाज के आधुनिक समाजवादी रूपांतरण के लिए उसका इस्तेमाल करने की सारी बाते बकवास हैं. पूर्वी यूरोपियन समाजवाद जनता को जीवन की अनिश्चयता से उबारने मे असफल रहा, उन्हें अपने भाग्य का निर्माता खुद होने की चेतना से लैस नहीं कर सका और इसके बदले एक उत्पीड़क व्यवस्था में पतित हो गया. चर्च के अब तक मौजूद असर और शायद उसके पुनरुत्थान का यही मूल कारण है.

मैं यह नहीं कहता कि जरूरत केवल मार्क्सवाद की मूलभूत धारणाओं की सहायता से पूर्वी यूरोप की घटनाओं का विश्लेषण करने भर की है और इन तमाम वर्षों के अनुभव से सीखकर खुद मार्क्सवाद को समृद्ध बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है. मैं तो यह कहना चाहता हूं कि ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में अक्सर ऐसा होता है कि मानवजाति अपने प्रारंभिक क्रांतिकारी चिंतन के मूलभूत सिद्धांतों की पुनः खोज करती है और तब उनमें सुधार करती है. मुझे यकीन है कि समाजवादी चिंतन जल्दी ही पुनर्जागरण के एक नए दौर से गुजरेगा और वह निस्संदेह मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों के पुनरुद्धार पर आधारित होगा.

जब हम मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों की बात कहते हैं तो इसका मतलब चंद किताबों को पढ़ना और कुछ मुख्य सूत्रों को रट जाना नहीं समझना चाहिए. अध्ययन के प्रति अपने रुख का निर्धारण सबसे महत्वपूर्ण सवाल है और इसी पर हमारे समूची अभियान की सफलता-असफलता निर्भर करती है.

मैंने देखा है कि कुछ लोगों के पास चंद सवालों पर अपने खुद के विचार हैं और वे मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन महज अपने उन विचारों को परिपुष्ट करने के लिए करते हैं. शायद किसी विचार के समर्थन में उपयुक्त उद्धरण सर्वदा की ढूंढ़े जा सकते हैं. हम मार्क्सवाद की चर्चा तो अपनी कार्यवाहियों के मार्गदर्शक के रूप में करते हैं, लेकिन असल में उसे अपने विचारों और अपनी कार्यवाहियों की दुम बना देते हैं. मुझे लगता है अध्ययन करते समय हमें अपने स्वाभाविक, स्वतःस्फूर्त विचारों के आमतौर पर प्रकृति में निम्न-पूंजीवादी होने के परिप्रेक्ष से शुरू करना चाहिए. ऐसा इसलिए कि पूंजीवादी निम्न-पूंजीबादी विचार समाज में हावी हैं, और हमारा विश्व दृष्टिकोण, मजदूर कामरेडों के विचारों समेत, उनसे बड़ी गहराई से प्रभावित रहेगा ही. मार्क्सवाद का अध्ययन स्वयं अपने ही विरुद्ध, मानसिक संघर्ष की एक प्रक्रिया के जरिए करना चाहिए तथा अपने खुद के विश्व-दृष्टिकोण का रूपांतरण करने के लिए सचेत प्रयत्न के बतौर करना चाहिए. माओ ने चीन के संबंध में कहा था कि कई कामरेड ऐसे हैं जो पार्टी में संगठनात्मक रूप से शामिल हुए हैं, विचारधारात्मक तौर पर नहीं. हमारे मामले में तो मैं इसे और अधिक सच पाता हूं. हमारे कई कामरेड ऐसे हैं जिनका शरीर कम्युनिस्ट पार्टी में है और जिनकी आत्मा क्रांति के प्रति समर्पित है, लेकिन उनका दिमाग उदारवादी-पूंजीवादी विचारजगत की सीमाओं में ही निवास करता है.

मैं कुछ उदाहरणों का वर्णन करते हुए इसे स्पष्ट करूंगा.

मैंने कई कामरेडों को पाया है कि वे पूंजीवादी प्रचार के झांसे में आ गए हैं आर उन्होंने सरकार की इस या उस घोषणा के प्रति भ्रम पालना शुरू कर दिया है, जैसे कि गरीबी दूर करने आदि की घोषणाओं के बारे में उदारवादी लोग प्रचार करते रहे हैं कि यह केवल इच्छा का प्रश्न है, सुधार की राजनीतिक इच्छा का प्रश्न है, इत्यादि.

आइए, हम देखें कि इस सवाल पर मार्क्सवाद का क्या रुख है?

मार्क्स ने कहा था, “एक समय कन्वेंशन को गरीबी उन्मूलन का आदेश जारी करने की हिम्मत हुई, निस्संदेह ‘फौरन’ नहीं, ... बल्कि जनसुरक्षा कमेटी को आवश्यक योजनाएं व प्रस्ताव तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपने का बाद ... कन्वेंशन के इस अध्यादेश का नतीजा क्या निकला? केवल यही कि दुनिया में एक और अध्यादेश बन गया और एक साल बाद कन्वेंशन को भुखमरों ने घेर लिया.”

“तथापि कन्वेंशन महत्तम राजनीतिक ऊर्जा, शक्ति और समझ का प्रतिनिधि था.”

“दुनिया की कोई भी सरकार गरीबी के बारे में, पहले अपने अफसरों से सलाह-मशविरा किए बगैर, तत्काल कोई कानून बनाने में कभी समर्थ नहीं हुई है. ... अगर गरीबी से राज्यों का कोई मतलब रहा भी है तो वह केवल प्रशासकीय और खैराती उपायों के स्तर तक ही रहा है अथवा इस स्तर के नीचे ही रह गया है.”

“राज्य क्या किसी अन्य तरीके से काम कर सकता है? राज्य सामाजिक खामियों के कारण की तलाश खुद राज्य और सामाजिक संस्थाओं के अंदर कभी नहीं करेगा! ... जहां राजनीतिक पार्टियों का अस्तित्व होता है, वहां हर पार्टी इन बुराइयों का स्रोत इस तथ्य में खोजती है कि राज्य की बागडोर उसके बदले विरोधी पार्टी के हाथों में है, यहां तक कि परिवर्तनवादी और क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ भी बुराई की जड़ राज्य की प्रकृति में नहीं, अपितु राज्य के किसी विशेष स्वरूप में तलाशते हैं, जिसके बदले में वे किसी दूसरे स्वरूप के राज्य की स्थापना करना चाहते हैं.”

“राज्य और समाज का ढांचा, राजनीति के दृष्टिकोण से दो भिन्न वस्तुएं नहीं है. राज्य समाज का ढांचा है. राज्य जहां तक सामाजिक बुराइयों के अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह उनका श्रेय प्राकृतिक नियमों को देता है जिनके विरुद्ध मनुष्य की कोई सत्ता काम नहीं आ सकती, अथवा निजी जीवन को देता है जो कि राज्य से स्वतंत्र है अथवा प्रशासनिक कंपनियों को जो कि उसके मातहत है. इस प्रकार इंगलैंड में गरीबी की व्याख्या हमेशा प्राकृतिक नियम के द्वारा की गई है जिसके अनुसार आबादी हमेशा जीविकोपार्जन के उपलब्ध साधनों से बढ़ जाती है. एक अन्य नजरिये से, इंगलैंड गरीबी की व्याख्या गरीबों के बुरे मनोभाव के नतीजे के रूप में करता है, ठीक वैसे ही जैसे कि प्रशा का राजा उसकी व्याख्या अमीरों के गैर-इसाई मनोभाव के तौर पर करता है, और जैसे कि कन्वेंशन उसकी व्याख्या संपत्ति मालिकों के संदेहास्पद, प्रतिक्रांतिकारी दृष्टिकोण के तौर पर करता है. लिहाजा, इंगलैंड गरीबों पर जुर्माने कसता है, प्रशा का राजा अमीरों को झिड़कियां देता है और कन्वेंशन संपत्ति मालिकों का सिर कलम करता है.”

“आखिरी सहारे के तौर पर प्रत्येक राज्य इसका कारण प्रशासन के आकस्मिक अथवा इच्छाकृत पहलुओं में तलाशता है. लिहाजा, इन बुराइयों को दूर करने के लिए वह प्रशासनिक सुधार चाहता है. ऐसा क्यों? केवल इसलिए कि प्रशासन खुद राज्य की संगठनात्मक गतिविधि है.”

“एक ओर प्रशासन के उद्देश्यों और सद्भावनाओं और दूसरी ओर उसके साधनों और स्रोतों के बीच का अंतर्विरोधराज्य खुद अपने-आपको मिटाए बगैर हल नहीं कर सकता, क्योंकि वह खुद इसी अंतर्विरोधपर जिंदा है. राज्य का निर्माण सार्वजनिक और निजी जीवन के बीच के अंतरविरोध, आम और खास हितों के बीच के अंतर्विरोधपर ही किया गया है. अतः प्रशासन को अपने-आपको औपचारिक और नकारात्मक गतिविधियों के एक दायरे में कैद रखना पड़ता है, क्योंकि जहां नागरिक जीवन और उसका कार्य प्रारंभ होता है, वहीं उसकी सत्ता खत्म हो जाती है. नागरिक समाज के जीवन और निजी संपत्ति, व्यापार और उद्योग के, तथा नागरिक समाज के विभिन्न ग्रुपों द्वारा एक दूसरे का शोषण करने के असामाजिक चरित्र के नतीजों के सामने नपुंसकता का प्रदर्शन प्रशासन का प्राकृतिक नियम है.” (आर्थिक नोट बुक)

कुछ ही दिन हुए मैं एक कामरेड के साथ चर्चा कर रहा था जो महसूस करते थे कि समाज के वर्गों में विभाजन, वर्ग संघर्ष की अवधारणा निराधार लगती है. फिर मार्क्स ने सर्वहारा नेतृत्व आदि की बात कही है, मगर आप देखते हैं कि मजदूर सबसे ज्यादा अनुदार नजर आते हैं और अपने आर्थिक हितों से आगे कुछ नहीं देखते. ये कामरेड समाज को वर्गों में विभाजित करने का और वर्ग संघर्ष का आविष्कार करने का श्रेय मार्क्स को देने के मामले में गलती पर हैं. मार्क्स ने खुद कहा है, “आधुनिक समाज में वर्गों के अस्तित्व का आविष्कार करने अथवा उनके बीच होनेवाले संघर्ष का पता लगाने का कोई श्रेय मुझे नहीं है. मुझसे बहुत पहले पूंजीवादी इतिहासकारों ने वर्गों के बीच होनेवाले इस संघर्ष के ऐतिहासिक विकास का वर्णन किया था और पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों ने वर्गों की आर्थिक चीर-फाड़ भी की थी.” (वेडमेयर के नाम मार्क्स की चिच्ठी, मार्च 1852).

दरअसल, मार्क्स को उस वर्ग का पता लगाने का श्रेय है जो अंततः खुद अपने समेत तमाम वर्गों को निर्मूल कर देगा. वह वर्ग सर्वहारा है जो इन उद्देश्यों को पूरा करने की वस्तुगत स्थिति में रहनेवाला एकमात्र वर्ग है. मार्क्स ने आगे कहा है, “अगर समाजवादी लेखक इस विश्वव्यापी ऐतिहासिक भूमिका का श्रेय सर्वहारा को देते हैं तो ऐसा हरगिज इसलिए नहीं ... कि वे सर्वहारा को भगवान समझते हैं. इसके विपरीत, पूर्णतः विकसित सर्वहारा से प्रत्येक मानवीय वस्तु ले ली जाती है यहां तक कि मानवता की पहचान भी ... जानने की बात यह नहीं है कि किसी खास घड़ी में  कोई खास सर्वहारा अथवा यहां तक कि सम्पूर्ण सर्वहारा अपने उद्देश्यों के बारे में क्या समझ रखता है. जानने का सवाल तो यह है कि सर्वहारा क्या है और अपनी प्रकृति के अनुसार इसे क्या ऐतिहासिक भूमिका निभानी होगी.” (पवित्र परिवार)

मैंने पाया कि एक कामरेड जिनकी पार्टी व क्रांति के प्रति निष्ठा और ईमानदारी पर संदेह नहीं किया जा सकता है, “शांतिपूर्ण और सभ्य” साम्राज्यवाद की गोर्बाचेनव परिकल्पना से बुरी तरह प्रभावित हैं. ये कामरेड यह नहीं समझ सके कि वे तीसरी दुनिया के एक देश के निवासी हैं, एक ऐसे देश के निवासी हैं जिसका राष्ट्र के रूप में वाह्य अंतर्विरोधसाम्राज्यवाद के साथ है. ऐसा कोई भी सिद्धांत, जो इस अंतर्विरोधको घटाने की वकालत करता है – साम्राज्यवाद के विरुद्ध विकासशील देशों के संघर्ष का पैनापन कम करने की वकालत करता है – हमारे राष्ट्रीय हित के लिए नुकसानदेह है. तीसरी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों, विभिन्न लोकप्रिय आंदोलनों और बहुतेरे राष्ट्रीय नेताओं ने आखिर गोर्बाचेव के नए चिंतन की हां में हां मिलाने से इनकार क्यों कर दिया? क्योंकि वे अपने राष्ट्रीय हितों के सचेत प्रतिनिधि हैं. निस्संदेह, ये कामरेड उदार पूंजीवादी प्रचार के फंदे में फंस गए हैं और वे साम्राज्यवाद व भारतीय राष्ट्र के बीच के अंतर्विरोधके, जो कि हमारे पार्टी कार्यक्रम का एक स्तंभ है, जागरूक प्रतिनिधि नहीं हैं. मैंने कई कामरेडों को पाया कि वे एजीपी और तेलुगु देशम जैसी पार्टियों के तथा शरद जोशी और टिकैत जैसे आंदोलनों के जन-चरित्र के झांसे में आ गए और उन्होंने यहां तक कि उन पार्टियों और आंदोलनों में शामिल हो जाने की अथवा उनके कार्यक्रमों की नकल करने की वकालत की. वे उनकी गिरफ्त में मौजूद जनसमुदाय को और उनके जुझारू रूपों को देखते हैं, मगर उन पार्टियों और आंदोलनों की वर्ग प्रकृति और लक्ष्य के बारे में सब कुछ भूल जाते हैं. यह सचमुच बड़ी विड़ंबना है कि समूचे भारत के वामपंथी और प्रगतिशील हिस्से जहां बिहार के हमारे आंदोलन में एक नई आशा का दर्शन करते हैं, प्रथमतः इसलिए कि यह ग्रामीण क्षेत्र के सर्वाधिक उत्पीड़ित और सर्वाधिक क्रांतिकारी वर्गों पर आधारित है, और क्योंकि इसके जनचरित्र और जुझारूपन को सचेत ढंग से क्रांतिकारी जनवाद के निश्चित राजनीतिक लक्ष्य की दिशा में मोड़ रखा गया है, वहीं हमारे अपने कामरेडों का एक हिस्सा हमारे अपने आंदोलन की खिल्ली उड़ाता है तथा पराए वर्गों के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों के बारे में भ्रम फैलाता है, जबकि ये आंदोलन गैर-पार्टी, अराजनीतिक अराजकतावाद की पैरवी करते हैं अथवा व्यवस्था में केवल चंद आंशिक व राजनीतिक सुधारों की वकालत करते हैं.

इनमें से कुछ कामरेडों ने जनता सरकार का समर्थन करने की पैरवी की. वे तो चाहते थे कि हम सरकार में भी शामिल हो जाएं. वे जनता सरकार के जनवादी आडंबर से और ग्रामीण क्षेत्र पर उसके जोर देने आदि से बड़ी गहराई से प्रभावित थे. वे महसूस करते थे कि सामंती अवशेष आदि के विरुद्ध संघर्ष जनता दल की तरह की सरकार के जरिए भलीभांति पूरे किए जा सकते हैं और हमारे लिए केवल एक दबाव डालनेवाले ग्रुप की भूमिका निभाना ही यथेष्ट है. यह सिद्धांत यहीं नहीं रुका और उसने अपने अगले तार्किक विकास में ग्रामीण गरीबों और उनके जुझारू जनआंदोलनों पर हमारे द्वारा जोर डाले जाने पर भी सवाल खड़ा किया. यह सिद्धांत खुद कम्युनिस्ट पार्टी के निषेध पर, और शांतिपूर्ण संसदीय रास्ते पर आगे बढ़ने वाले तथा मूलतः जनता दल और सामाजिक जनवादी ढांचे की वकालत करने पर जाकर खत्म हुआ. वे नक्सलबाड़ी आंदोलन का मजाक उड़ाने की हद तक आगे बढ़ गये और उन्होंने वामपंथ की स्वतंत्र दावेदारी और क्रांतिकारी जनवाद के विचारों की खिल्ली उड़ाई.

वस्तुतः ये कामरेड मार्क्सवादी वर्ग रुख को सख्ती के साथ पकड़ पाने में असफल रहे. कम्युनिस्ट पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों में केवल ग्रामीण गरीबों पर आधारित हो सकती है और मध्यम किसानों को जीतने का प्रयत्न कर सकती है. जनता दल सरकार आदि के बारे में हमारा रुख केवल इसी वर्ग स्थिति से तय किया जाना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्र में जनता दल के सामाजिक आधार का नेतृत्व मूलतः कुलकों के हाथों में है और ग्रामीण गरीबों के साथ उनका तीखा अंतर्विरोधहै. दरअसल, ग्रामीण भारत में यही मुख्य विकासमान अंतर्विरोधहै. चूंकि हम ग्रामीण गरीबों पर आधारित हैं और चूंकि हम प्राथमिक तौर पर उनके ही हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए जनता दल सरकार के साथ हमारा संबंध प्राथमिक तौर पर संघर्ष का ही हो सकता है. अब यह सच है कि मध्यम किसान भी इस कुलक खेमे का अनुसरण करते हैं और इसी कारण वे जनता दल जैसी पार्टियों के आधार बने हुए हैं. चूंकि हमें इस मध्यम किसान वर्ग को जीतना है, उनको धीरे-धीरे कुलकों की गिरफ्त से हटाना है और ग्रामीण गरीबों के संश्रयकारियों में बदल देना है, इसलिए हमें जनता दल के साथ किसी न किसी प्रकार के समागम में जाना ही होगा; और उसके चलते उनके साथ हमारा संबंध एकता और संघर्ष का एक जटिल मामला बन जाता है, जहां संघर्ष निस्संदेह मुख्य भूमिका निभाता है. वर्ग स्तर की उन वस्तुगत सच्चाइयों को हमने जनता दल के साथ अपने राजनीतिक संबंध में, उसकी सरकार के प्रति अपने रुख में, प्रतिबिंबित करने का प्रयत्न किया है. चूंकि सीपीआई और सीपीएम ग्रामीण गरीबों और उभरते कुलक खेमे के बीच के अंतर्विरोधसे इनकार करते हैं अथवा उसे कम करके आंकते हैं, जो कि उनके द्वारा हमारे आंदोलन को मजदूरों और ‘किसानों’ के बीच का संघर्ष बतलाकर निंदा करने में सर्वाधिक सुस्पष्ट रूप से प्रदर्शित होता है – इसलिए वे ग्रामीण क्षेत्र में वर्ग शांति की वकालत करते हैं और कुलक खेमे के साथ मेलजोल कायम करते हैं. जनता दल सरकार, तेलुगु देशम सरकार और डीएमके सरकार को उनके द्वारा दिया गया बिना शर्त समर्थन उनके वर्ग रुख के साथ पूरी तरह मेल खाता है. आमतौर पर कहा जाए तो मौजूदा वस्तुगत परिस्थितियों में मध्यम किसान कुलक खेमे का अनुसरण कर रहा है और वह या तो मध्यवर्ती राजनीतिक पार्टियों के पीछे अथवा टिकैत और शरद जोशी जैसे अपने “स्वाभाविक नेताओं” के पीछे गोलबंद हो रहा है. इसलिए वामपंथ की ओर उनका झुकना कुलकों के साथ उनके अंतर्विरोधके तीखा होने पर निर्भर करता है. बिहार के हाल के अनुभव यह दिखलाते हैं कि हम एक हद तक अपना आधार मध्यम किसानों के कुछ हिस्सों के बीच फैलाने में सफल हुए हैं. इस संबंध में हमारे लिए अपनी नीतियों और रुख में सुधार कर लेना निस्संदेह जरूरी है. लेकिन यह समूची प्रक्रिया धीमी प्रक्रिया ही होगी और हमें अपने प्रत्यक्ष प्रयत्न के साथ-साथ जहां कहीं संभव हो, यत्र-तत्र उभरने वाले किसान संगठनों के साथ संयुक्त मोर्चा कार्यवाहियों का सहारा लेना होगा. अगर मार्क्सवादी वर्ग रुख और जमीनी सच्चाई से मुहं मोड़ लिया गया और तेज एवं शार्टकट प्रक्रिया के हित में अगर कोई कम्युनिस्ट टिकैत अथवा शरद जोशी की नकल करने की महज खामखयाली करता रहा, तो मुझे डर है कि वह न केवल अपने इस प्रयत्न में बुरी तरह मुंह की खाएगा, बल्कि इक प्रक्रिया में वह ग्रामीण गरीबों के बीच अपना सामाजिक आधार भी गंवा बैठेगा. राजनीतिक तौर पर भी वह पूंजीवादी और सामाजिक जनवादी पार्टियों का दुमछल्ला बन जाएगा. कुछ लोग जो ऐसी ही लाइनों की वकालत करते हुए हमारी पार्टी से बाहर चले गए, वे इस हद तक पतित हो भी चुके हैं.

ऐसे तमाम कामरेड, हम जिन वर्गहितों का पक्षापोषण करते हैं, उसके जागरूक प्रतिनिधि के बतौर विकसित होने में असफल रहे हैं और वे उदार पूंजीपतियों और सामाजिक जनवादियों के धोखाधड़ी भरे प्रचार के शिकार बन गए हैं.

हमारी पार्टी में एक महिला कामरेड थीं. वे महिलाओं के सवाल पर काफी सक्रिय, काफी संभावनामय और ईमानदार कामरेड थीं और हम उन्हें एक महिला नेता के रूप में विकसित करना चाहते थे. मगर विचारजगत में उनका आधा वक्त प्रेम की आजादी की समस्याओं पर चर्चा करने में ही जाया हो जाता था. उन्होंने नारीवाद के चरम रूप की वकालत करने वाले निम्न-पूंजीवादी महिला संगठनों के साथ गाढ़ी दोस्ती कायम कर ली. हमने उनके सामने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि ये तमाम नारीवादी महिला आंदोलन मुट्ठी भर अल्पसंख्यक महिलाओं के आंदोलन हैं तथा जनवादी आंदोलन के अंदर महिलाओं को झोंककर वे वस्तुगत तौर पर फूटपरस्त भूमिका ही निभा रहे हैं. हमने उन्हें बतलाया कि जब हजारों मेहनतकश महिलाएं जोश-खरोश के साथ और सक्रियतापूर्वक हमारी पार्टी के नेतृत्व में चल रहे जनवादी आंदोलन की मुख्य धारा में शामिल होती हैं तो यह स्वतः इस बात का सबूत है कि महिला मुक्ति का सवाल हमारे आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू है और हमारा आंदोलन इसके बदले में महिलाओं पर मुक्तिकारी प्रभाव डाल रहा है. जब बिहार में 50000 की रैली में एक तिहाई से अधिक महिलाएं शामिल होती हैं तो कहने की जरूरत नहीं रह जाती है कि जन-आधारित महिला आंदोलन की बुनियाद को व्यापक जनवादी आंदोलन के अंतर्गत ही तलाशना चाहिए. हां, यह छानबीन करने की जरूर आवश्यकता है कि यह आंदोलन निचले स्तर पर महिला हितों को ठीक किस प्रकार प्रतिबिंबित और उनका ठीक किस प्रकार प्रतिनिधित्व करता है, तथा वह महिलाओं पर किस प्रकार मुक्तिकारी प्रभाव डाल रहा है. आपको इसका अनुसंधान करना चाहिए तथा एक स्वायत्त महिला संगठन विकसित करना चाहिए. “स्वायत्तता” खुद यह स्पष्ट करती है कि आपकी स्वतंत्रता सापेक्ष है और उसका उपभोग आंदोलन के अभिन्न अंग के रूप में ही किया जाना चाहिए. चरम नारीवादी लोग इसके बदले “स्वायत्त महिला आंदोलन” को व्यापक जनवादी आंदोलन के विरुद्ध खड़ा कर देते हैं. हमने संबंधित महिला कमारेड के सामने यह स्पष्ट किया और उन्हें सलाह दी कि वे कुछ समय के लिए उनके दहकते नारीवाद से दूर रहें क्योंकि इससे महिलाओं से उनका अलगाव पैदा होगा तथा इसके बजाय वे महिलाओं की चेतना के स्तर और उनके संगठन की स्थिति को दिमाग में रखते हुए कदम-ब-कदम आगे बढ़ें. क्या यही तमाम कम्युनिस्टों का आम व्यवहार नहीं है? जनसमुदाय से कटने पर हमारे ऊपर आफतों का पहाड़ टूट पड़ता है. जनसमुदाय के साथ-साथ आगे बढ़ने के लिए, चेतना के उनके स्तर को कदम-ब-कदम ऊंचा उठाने के लिए, क्या हम समाज की ऐसी विभिन्न संस्थाओं के साथ तालमेल कायम नहीं करते हैं जिन्हें अंतिम विश्लेषण में हम तोड़ देना चाहते हैं? चुनावों में भागीदारी भी क्या एक तालमेल कायम करना ही नहीं है? तथापि, हमारी सारी व्याख्याएं निरर्थक साबित हुई और मामला इस मोड़ पर जा पहुंचा कि हमें उन महिला कमारेड को पार्टी से निकाल बाहर करना पड़ा, क्योंकि उनके चरम नारीवादी विचार कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवाद-लेनिनवाद से पूरी तरह असंगत थे.

मैंने अध्ययन के महत्व की चर्चा की, मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों के अध्ययन पर जोर दिया और अध्ययन के प्रति सही रुख को रखा. यह दिखलाने के लिए मैंने कतिपय उदाहरण भी रखे कि कैसे कुछ ईमानदार और सच्चे कार्यकर्ता मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोध में खड़े हो गए, क्योंकि उन्होंने अध्ययन की उपेक्षा की थी और अपने विश्व दृष्टिकोण को बदलने से कत्तई इनकार कर दिया था.

यह रूपांतरण एक लंबी खिंचने वाली प्रक्रिया है. इसलिए अध्ययन को अवश्य ही नियमित मामला बना देना चाहिए. अन्यथा, वैसा फिर हो सकता है जैसा कि उन कमारेडों के साथ हुआ. गलत विचार इकट्ठे होते गए और अंततः उनके लिए अपने-आपको रूपांतरित कर पाना असंभव हो गया.
मेरे एक सहकर्मी ने ठीक ही बतलाया है कि उच्च विचार हमेशा सादा जीवन से और, मैं इसमें जोड़ना चाहूंगा, नम्रता से जुड़ा रहता है.

मुझे उम्मीद है कि उन व्यावहारिक कार्यकर्ताओं को जो काम का दबाव होने के बहाने अक्सर अध्ययन करने से जी चुराते हैं उन नकारात्मक शिक्षकों से सबक सीखना चाहिए. मौजूदा शिक्षा अभियान में हमने शिक्षण का लोकप्रिय तरीका अपनाने की कोशिश की है. वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने विभिन्न विषयों पर लोकप्रिय निबंधों की एक श्रृंखला तैयार की है. हमारी केंद्रीय कमेटी की योजना है कि आपकी सलाह और आलोचनाएं प्राप्त होने के बाद उन निबंधों का एक संशोधित संस्करण स्थाई अध्ययन सामग्री के बतौर प्रकाशित किया जाए.