कम्युनिस्ट घोषणापत्र का एक नया पोलिश संस्करण निकालना आवश्यक हो गया है. यह तथ्य नाना प्रकार के विचारों को जन्म देता है.

सबसे पहले यह उल्लेखनीय है कि इधर घोषणापत्र यूरोपीय महाद्वीप में बड़े पैमाने के उद्योग का एक तरह से सूचक बन गया है. किसी देश में बड़े पैमाने का उद्योग जितना विकसित होता है, उस देश के मजदूरों में संपत्तिधारी वर्गों के खिलाफ अपनी वर्गीय स्थिति को जानने की मांग बढ़ती जाती है. इस तरह किसी भी देश की अपनी भाषा में घोषणापत्र के छपने की तादाद से उस देश में मजदूर आंदोलन की स्थिति को ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने के उद्योग के विकास की मात्रा को भी मापा जा सकता है.

इसलिए नया पोलिश संस्करण पोलिश उद्योग की निश्चित प्रगति की ओर इंगित करता है. इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि दस साल पहले प्रकाशित संस्करण के बाद वस्तुतः यह प्रगति हुई है. रूसी पोलैंड, कांग्रेसीय पोलैंड कांग्रसीय पोलैंड – यह पोलैंड के उस भाग का नाम था जो 1814-1815 में वियेना कांग्रेस के निर्णयानुसार पोलिश राज्य के नाम से रूस के हिस्से में आ गया. रूसी साम्राज्य का बहुत बड़ा औद्योगिक क्षेत्र बन गया है. बड़े पैमाने पर रूसी उद्योग जहां यत्र-तत्र बिखरा हुआ है – एक हिस्सा फिनलैंड की खाड़ी के आस-पास, दूसरा मध्य भाग में (मास्को तथा ब्लादीमिर में), तीसरा – काला सागर और अजो़व सागर के तटवर्ती क्षेत्रों तथा अन्य और स्थानों में – वहां पोलिश उद्योग को अपेक्षाकृत छोटे इलाके में ठूंस दिया गया है. और वह इस तरह के संकेन्द्रण के लाभ तथा हानि दोनों भोग रहा है. रूसी उद्योगपतियों ने लाभों को उस समय स्वीकारा जब उन्होंने पोलों को रूसी बनाने की उत्कट इच्छा के बावजूद पोलैंड के विरुद्ध संरक्षण टैरिफों की मांग की. हानि – पोलिश उद्योगपतियों तथा रूसी सरकार के लिए – पोलिश मजदूरों के बीच समाजवादी विचारों के द्रुत प्रसार तथा घोषणापत्र की बढ़ती हुई मांग में प्रत्यक्ष है.

परंतु पोलिश उद्योग की यह तीव्र प्रगति, जो रूस के औद्योगिक विकास की रफ्तार से बढ़कर है, पोलिश जनता की अनन्त जीवनी शक्ति तथा उनके आसन्न राष्ट्रीय पुनरुत्थान की नई गारंटी भी है. और एक स्वतंत्र, मजबूत पोलैंड के पुनरुत्थान का मामला केवल पोलों से नहीं, हम सबसे सरोकार रखता है. यूरोपीय राष्ट्रों का ईमानदारी भरा अंतराष्ट्रीय सहयोग तभी संभव है, जब इनमें से हर राष्ट्र अपने घर में पूर्णतः स्वायत्तशासी हो. 1848 की क्रांति ने – जिसने सर्वहारा के योद्धाओं से, सर्वहारा के ही झंडे तले, केवल पूंजीपति वर्ग का काम करवा लिया – उसी ने अपनी वसीयत के लिखने वालों, लूई बोनापार्तलूई बोनापार्त यानी नेपोलियन तृतीय (1808-1873) नेपोलियन प्रथम का भतीजा था. वह 1848 की क्रांति की व्यर्थता के बाद फ्रांस के द्वितीय जनतंत्र का राष्ट्रपति (1848-1851) रहा. उसके बाद उसने फ्रांसीसी सम्राट की उपाधि धारण कर ली और जनतंत्र को साम्राज्य में बदल दिया. वह 1870 तक सम्राट रहा. और बिस्मार्कबिस्मार्क (1815-1898) प्रशा के राजनेता और जमींदारों व बड़े पूंजीपतियों के प्रतिनिधि थे. उन्होंने आग और तलवार के जरिए 1871 में प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण करने में सफलता पाई. 1871 से 1890 तक जर्मन साम्राज्य के चांसलर रहे. के लिए इटली, जर्मनी तथा हंगरी के लिए भी आजादी हासिल की. मगर पोलैंड को, जिसका 1792 से क्रांति के लिए किया जाने वाला कार्य इन तीनों के कुल कार्य से अधिक था, उस समय जब उसे 1863 में दस गुनी अधिक रूसी शक्ति के सामने शिकस्त खानी पड़ी, तो उसे सिर्फ अपने ही संसाधनों के सहारे छोड़ दिया गया. अभिजात वर्ग न तो पोलिश स्वतंत्रता को बरकरार रख सका, और न वह उसे फिर से हासिल कर सका. पूंजीपति वर्ग के लिए यह स्वतंत्रता कम से कम ऐसी तो है ही, जिसके प्रति वह उदासीन रह सकता है. फिर भी यूरोपीय राष्ट्रों के सामंजस्यपूर्ण सहयोग के लिए स्वतंत्रता आवश्यक है. उसे केवल तरुण पोलिश सर्वहारा वर्ग हासिल कर सकता है, और उसके ही हाथों वह सुरक्षित भी है. बात यह है कि यूरोप के बाकी सभी मजदूरों के लिए पोलैंड की स्वतंत्रता उतनी ही आवश्यक है, जितनी स्वयं पोलिश मजदूरों के लिए.

10 फरवरी 1892: फ्रेडरिक एंगेल्स