खेती और किसानी को बरबाद करने वाले तीन कानून

मोदी सरकार महामारी और लॉकडाउन के बीच सितम्बर 2020 में तीन नये कृषि कानून ले आई.

  1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020 (दि एसेन्शियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) एक्ट, 2020) - इसके तहत अनाज, दालें, आलू, प्याज, तिलहन और खाद्य तेल जैसी जीवन के लिए जरूरी वस्तुओं की जमाखोरी करने पर लगी कानूनी पाबंदी को हटा लिया गया है. अब मुनाफाखोर कितनी भी जमाखोरी करें उसे कानूनी माना जायेगा!
  2. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, 2020 (दि फारमर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कामर्स (प्रोमोशन एंड फेसीलिटेशन) एक्ट, 2020) - इस कानून के जरिए एपीएमसी मण्डियों में किसान के उत्पादों का व्यापार/बिक्री अब जरूरी नहीं रह गयी. एपीएमसी के बाहर होने वाले कृषि उत्पादों के व्यापार पर राज्य सरकारें किसी तरह की मार्केट फीस, टैक्स या लेवी आदि भी नहीं ले सकतीं.
  3. कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020 (दि फारमर्स (एम्पॉवरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट आन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट, 2020) - इस कानून के माध्यम से किसानों और कम्पनियों/कॉरपोरेशनों के बीच कॉन्ट्रेक्ट यानी ठेका के आधार पर ‘कान्ट्रेक्ट फार्मिंग’ को कानूनी ढांचा दिया गया है. इस कानून में किसान की फसल/उत्पाद की कीमत तय करने का कोई प्रावधान नहीं है.

इन कानूनों का विरोध क्यों हो रहा है?

पूरे देश में किसान और आम नागरिक इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं. क्योंकि इनके माध्यम से किसानों और आम जनता को एक नये ‘‘कम्पनी राज’’ के हवाले कर दिया गया है. अन्तर सिर्फ इतना है कि पहले वाला कम्पनी राज अंग्रेजों का था, इन कानूनों के बाद जो कम्पनी राज बनेगा वह अडानी-अम्बानी-डब्लू.टी.ओ. (WTO) का होगा.

किसानों का कहना है कि ये कानूनः

  • भारत में खेती-किसानी का चेहरा बिगाड़ देंगे. किसान पूरी तरह से प्राइवेट कम्पनियों और कॉरपोरेशनों की दया पर रहने को मजबूर कर दिये जायेंगे, और कृषि के मामले में सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं रहेगी. इस प्रकार एक नये कम्पनी राज की स्थापना हो जायेगी.
  • ऐसे कानून जो किसान और किसानी का हुलिया बदल कर रख दें, उन्हें इतनी जल्दबाजी में, संसद में बगैर किसी भौतिक मतविभाजन के, और देश के किसान संगठनों से बिना सलाह लिए कोविड-19 की महामारी के बीच क्यों पास कराया गया? अगर प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें तो उन्होंने ‘‘आपदा में अवसर’’ खोज लिया और महामारी की आड़ में लोकतंत्र की हत्या कर किसान विरोधी कानूनों को देश के किसानों के ऊपर थोप दिया.
  • ये कानून एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य और एपीएमसी यानी मण्डियों के वर्तमान ढांचे को तहस नहस कर देंगे और आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की जमाखोरी की छूट देकर कृषि बाजार पर पूंजीपतियों का पूर्ण नियंत्रण और एकाधिकार बना देंगे. किसान तो इस बात के लिए संघर्ष कर रहे थे कि उन्हें C2+50 के फॉर्मूले के अनुसार लागत मूल्य के डेढ़ गुना की दर से न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाय, उनके सभी कृषि उत्पादों की सरकारी खरीद हो, और एपीएमसी व्यवस्था को किसानों के हित में और उत्तम बनाया जाय. लेकिन मोदी सरकार ने उल्टा कर दिया. सरकार ने एमएसपी पर कृषि उत्पादों की खरीद करने से हाथ पीछे खींच लिए और मण्डियों की व्यवस्था को जड़ से ही समाप्त करने का रास्ता खोल दिया.
  • इन तीन किसान विरोधी कानूनों के माध्यम से मोदी सरकार ने देश के संघीय ढांचे को भी कमजोर कर दिया है और अब राज्य सरकारें किसानों की रक्षा करने के अपने दायित्व को पूरा नहीं कर सकतीं.
  • ये तीनों कानून इतने सख्त हैं कि किसान अपनी खेती और जमीनों से ही अंततः बेदखल हो जायेंगे और फिर कृषि व्यापार में लगी बड़ी बड़ी कम्पनियों के गुलामों की तरह काम करना पड़ेगा.

भारत में कम्पनी राज थोपा जा रहा है. ऐसा कम्पनी राज कि अगर केन्द्र या राज्य सरकार का कोई अधिकारी किसानों के साथ नाइन्साफी या कोई गलत काम करता है तो उसके खिलाफ कोई भी नागरिक अदालत में नहीं जा सकता. ऐसा प्रावधान इन कानूनों में किया गया है. अगर कोई सरकारी अधिकारी भ्रष्ट है एवं वह किसानों व आम जनता के हितों के विरुद्ध किसी निजी कम्पनी को फायदा पहुंचाता है, तब भी आपके पास अदालत में न्याय मांगने के लिए जाने का हक नहीं होगा. उस अधिकारी को केवल इतना कहना होगा कि वह तो इस कृषि कानूनों को ‘पूरी नेकनीयती से’ लागू करने की कोशिश कर रहा था! दसअसल सरकार की मंशा कम्पनियों और सरकार के बीच मौजूद भ्रष्ट गठजोड़ को संरक्षण देने और आगे बढ़ाने की है.

ddd

================================================================================================

तीन कृषि कानूनों के माध्यम से आम नागरिकों पर आपातकाल थोपा जा रहा है

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, 2020 - जो एपीएमसी मण्डियों को समाप्त करने के उद्देश्य से बनाया गया है - अर्थात यह ‘एपीएमसी विनाश कानून’ है - की धारा 13 के अनुसार :

‘‘13- इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या किए गए आदेशों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के सम्बन्ध में कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी।’’

और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020 जो कृषि को प्राइवेट कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग में देने के लिए बनाया गया है, की धारा 19 में लिखा है किः

‘‘19- किसी सिविल न्यायालय को, किसी ऐसे विवाद के संबंध में, जिसका विनिश्चय करने के लिए उपखंड प्राधिकारी या अपील प्राधिकारी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन सशक्त है, कोई भी वाद या कार्यवाहियां ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी और इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों द्वारा या उनके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई के संबंध में किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई व्यादेश मंजूर नहीं किया जाएगा।’’

सीधे-सीधे कहें तो इन कानूनी प्रावधानों का असल मतलब है किसानों के हितों की अनदेखी कर कम्पनियों के स्वार्थ पूरा करने वाले भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों को इस बात का संरक्षण दिया जाना कि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही नहीं की जायेगी. जनता के हितों की रक्षा करने की बजाय इन कानूनों में किसानों, किसान संगठनों और आम नागरिकों पर रोक लगाई गयी है कि वे कम्पनियों के एजेण्ट बन कर काम करने वाले ऐसे सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की मांग नहीं कर सकते.

================================================================================================

एमएसपी से किसे फायदा होता है?

क्या केवल पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान ही इसका लाभ ले पाते हैं?

फूड कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (एफ.सी.आई.) के राज्यवार अनाज खरीद के आंकड़े और नेशनल सेम्पल सर्वे के 2012-13 के आंकड़ों के अनुसार एक अलग ही तस्वीर सामने आती है. एफ.सी.आई. के अनुसार डिसेन्ट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेण्ट स्कीम (DCP) के तहत वर्ष 2012-13 से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बाहर के राज्यों से 25-35 प्रतिशत धान एवं गेहॅूं की खरीद की जा रही है.

एक अध्ययन के अनुसार ‘‘धान खरीद के मामले में छत्तीसगढ़ और ओडिशा सबसे आगे हैं. इन दो राज्यों से देश की कुल सरकारी धान खरीद का 10 प्रतिशत आता है. जबकि मध्यप्रदेश में डिसेन्ट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेण्ट को बड़े पैमाने पर लागू किया गया है और गेहॅूं की कुल खरीद का लगभग 20 प्रतिशत वहीं से आता है. साल 2020-21 में मध्यप्रदेश गेहॅूं की सरकारी खरीद के मामले में पंजाब से आगे रहा. धान की सरकारी खरीद व्यवस्था (प्रोक्योरमेण्ट) में आने वाले खेतिहर परिवारों में 9% पंजाब से, 7% हरियाणा से, 11% ओडिशा से, और 33% छत्तीसगढ़ से आते हैं. जबकि गेहॅूं की सरकारी खरीद में 33% मध्यप्रदेश से आते हैं, वहीं पंजाब से 22% और हरियाणा से 18% खेतिहर परिवार हैं.

न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद क्या बड़े किसानों के लिए है?

क्या इन कानूनों का विरोध केवल पंजाब और हरियाणा के बड़े-बड़े किसान ही कर रहे हैं?

सच तो यह है कि सरकारी खरीद का लाभ उठाने वालों में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या मंझोले और बड़े किसानों से कहीं बहुत ज्यादा है. अखिल भारतीय स्तर पर सरकार को धान बेचने वाले किसानों में मात्र 1% बड़े किसान हैं जिनके पास 10 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन है. 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाले छोटे और सीमांत किसानों का प्रतिशत इनमें 70% है और बाकी के मंझोले किसान (2-10 हेक्टेयर वाले) 29% हैं.

गेहूं की सरकारी खरीद में बड़े किसान केवल 3% हैं, जबकि आधे से ज्यादा (56%) तो छोटे और सीमांत किसान ही हैं.

पंजाब और हरियाणा में भी छोटे व सीमांत किसानों की संख्या कम नहीं है. जहां क्रमशः 38% और 58% छोटे व सीमांत किसानों का धान सरकारी खरीद में जाता है. डिसेन्ट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेण्ट स्कीम (DCP) को अपनाने वाले राज्यों में राज्य की सरकारी खरीद एजेन्सियों को फसल उत्पाद बेचने वालों की बहुसंख्या छोटे व सीमांत किसानों की है. उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में ऐसे किसानों में 70-80 प्रतिशत छोटे व सीमांत किसान हैं. इसी प्रकार मध्यप्रदेश में गेहॅूं बेचने वाले लगभग आधे (45%) किसान छोटे व सीमांत किसान हैं.

जैसा कि इन आंकड़ों से साफ हो जाता है कि एमएसपी, एपीएमसी मण्डियां और सरकारी खरीद की ठोस व्यवस्था न रहने से भारी संख्या में, और सभी राज्यों में, छोटे व सीमांत किसानों का भारी नुकसान होगा. फिर, कॉरपोरेटों के हक में कांन्ट्रेक्ट खेती की ओर जाने से भारत के ज्यादातर किसानों को भारी क्षति उठानी पड़ेगी. बड़े किसानों की अपेक्षा छोटे और सीमांत किसानों के लिए तो खुले बाजार में दैत्याकार कृषि कम्पनियों व कॉरपोरेटों से टक्कर लेना बहुत मुश्किल होगा.

इसीलिए हम देख रहे हैं कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, या बिहार के भी किसान आज दिल्ली के बॉर्डर पर आन्दोलन में शामिल होने के लिए आ रहे हैं. यह सरकार का सफेद झूठ है कि पंजाब से बाहर के किसान इन तीन किसान विरोधी कानूनों का समर्थन कर रहे हैं. पूरे भारत में इन कानूनों के खिलाफ सभी किसान एकजुट हैं.

hhh

सरकार का दावा है कि एमएसपी और सरकारी खरीद तो जारी रहेगी - फिर इतना हल्ला क्यों हो रहा है?

कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के लिए जो कानून लाया गया है [ कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020 ] उसमें फसल की कीमतों को एमएसपी या सरकारी खरीद रेट से जोड़ने का प्रावधान नहीं बनाया गया है. इस कानून की धारा 5(ख) के अनुसार केवल ‘‘विनिर्दिष्ट एपीएमसी यार्ड या इलेक्ट्रॉनिक व्यापार और संव्यवहार प्लेटफार्म या किसी अन्य उपयुक्त बैंचमार्क कीमतों में विद्यमान कीमतों से’’ जोड़ने की बात कही गई है. अर्थात खुले बाजार में मौजूद कीमतों के अनुसार ही किसान की फसल का मूल्य तय होगा, और कौन नहीं जानता कि खुले बाजार पर नियंत्रण तो बड़े पूंजीशाहों का ही होता है! जबकि किसान तो वर्षों से स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुरूप सी2+50 फॉर्मूले पर फसल की लागत से डेढ़ गुना एमएसपी की मांग कर रहे थे.

मोदी सरकार लगातार साल-दर-साल कृषि उत्पादों की सरकारी खरीद की कुल मात्रा एवं खरीद केन्द्रों की संख्या में कमी करती जा रही है और अनाज का भण्डारण व वितरण करने वाली संस्था एफ.सी.आई. (फूड कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया) के बजट में कटौती कर उसे घाटे में डाल रही है. इससे सरकार की मंशा स्पष्ट हो जाती है कि आगे जाकर देश के किसानों और उनकी खेती को निजी कम्पनियों और खुले बाजार के रहम पर छोड़ दिया जायेगा.

साफ है कि सरकार और प्रधानमंत्री एमएसपी और सरकारी खरीद चालू रहने का दावा कर खुलेआम देश को गुमराह कर रहे हैं.

क्या नये कानून किसानों को आजादी देते हैं कि वे चुन सकें कि अपनी फसल किसे बेचनी है. इस तरह एपीएमसी का एकाधिकार टूटेगा? क्या बाजार में कम्पटीशन बढ़ेगा फलस्वरूप किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकेंगे?

यह सच नहीं है.

सरकार का दावा है कि नये कानूनों के कारण किसानों को एपीएमसी नियंत्रित बाजार के बाहर एमएसपी से ज्यादा मूल्य मिल सकता है. और अगर ऐसा नहीं होता तो किसान अपनी फसल एपीएमसी की मण्डी में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं.

दावा गलत है. नीचे दिये गये बिन्दुओं को ध्यान से पढ़ियेः

  • जो फसलें सरकारी खरीद की सूची में नहीं आतीं वे तो पहले से ही खुले बाजार में बेची जाती हैं, और उन्हें आम तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी कम मूल्य मिल पाता है.
  • शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश के केवल 6% किसानों का उत्पाद ही सरकारी खरीद में जा पाता है . इसका मतलब हुआ कि 94% किसान तो पहले से ही अपनी फसल को खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं. तब फिर ‘बाजार चुनने की आजादी’, ‘कम्पटीशन’ या ‘एपीएमसी का एकाधिकार (मोनोपॉली)’ जैसे जुमले क्यों उछाले जा रहे हैं? ताकि जनता को गुमराह किया सके.
  • केवल 36% ट्रेडिंग (कृषि उपज का व्यापार) सरकारी मण्डियों में होती है, बाकी की फसल खुले बाजार में पहले से ही जा रही है जहां किसानों की बारगेनिंग पॉवर (मोल-तोल की क्षमता) बिल्कुल नहीं होती. तो चुनने की आजादी का क्या मतलब रह जाता है? ऊपर से ‘‘प्राइवेट मण्डियों में कम्पनियां अपने नियम खुद बनाती हैं, खासकर क्वालिटी चेक करने के बारे में. वहां खरीदार एक ही कम्पनी होती है अतः माल की नीलामी नहीं होती (जैसा कि एपीएमसी में होता है). निजी मण्डी/बाजार के नियम बदलवाने की क्षमता किसान में नहीं होती, और न ही व्यापारी के खिलाफ शिकायत करने का वहां कोई विकल्प रहता है. जबकि सरकारी मण्डी में किसान सामूहिक रूप में संगठित हो सकते हैं और जरूरत होने पर अधिकारियों से जवाबदेही की मांग कर सकते हैं. कम्पनियां तो अपने शेयर होल्डरों के प्रति जवाबदेह होंगी, किसानों के प्रति बिल्कुल नहीं .’’
  • सरकार 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है. लेकिन तय एमएसपी पर एपीएमसी मण्डी में सरकारी खरीद केवल धान और गेहॅूं की होती है (कुछ कपास, सोयाबीन, दालें, सरसों आदि की भी). इन 23 फसलों का बाजार मूल्य आमतौर पर एमएसपी से काफी कम मिलता है. इनमें जिन फसलों की सरकारी खरीद नहीं की जाती उन्हें कम कीमत पर खुले बाजार में बेचने के अलावा और कुछ भी चुनने की आजादी किसान के पास है ही नहीं, और न आगे होगी. मक्का का एमएसपी रु. 1850 प्रति कुंटल घोषित है, लेकिन किसान के पास उसे रु. 800 से 1000 प्रति कुंटल तक खुले बाजार में बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.
  • भारत में कहीं भी किसानों ने यह मांग नहीं की है कि वे अपने उत्पाद को एपीएमसी मण्डी के बाहर बेचने की ‘आजादी’ चाहते हैं (वैसे यह विकल्प तो उनके पास आज भी है)! किसान तो चाहते हैं कि उनकी फसल का सौ फीसदी एपीएमसी में जाये और वहां एमएसपी पर बिके.
  • खुला बाजार, खुली लूट का अड्डा है. इसीलिए किसान चाहते हैं कि सभी फसलों की लागत के डेढ़ गुना दाम (जमीन का लीज रेण्ट सहित) लगा कर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद हो. लेकिन यह सरकार तो एपीएमसी मण्डियों के जरिए जो थोड़ा बहुत एमएसपी मिल रहा है उसे भी खत्म करना चाहती है.
  • भारत में 80 प्रतिशत से ज्यादा किसान 2 हेक्टेयर के कम जमीन के मालिक हैं. इन छोटे किसानों के पास इतनी सुविधा नहीं होती कि वे सरकारी खरीद न होने की हालत में अपनी फसल को स्टोर करने या उसके ट्रांसपोर्ट करने लायक ढांचा खड़ा कर सकें. उन पर फसल को जल्द से जल्द बेचने का दबाव होता है ताकि वह खुले में बरबाद न हो जाये. ऊपर से कर्ज की रकम चुकानी होती है. अगली फसल के लिए लागत सामग्री तत्काल जुटानी होती है. ऐसी तंगी में निकटतम मण्डी में जाकर फसल बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता. अगर मण्डियां और एमएसपी की व्यवस्था खत्म कर दी गई तो अपने गांव में ही किसी बड़ी कम्पनी के एजेण्ट को सस्ते में फसल की आपदा बिक्री करनी पड़ेगी. कॉरपोरेटों को फसल बेचने की ऐसी ‘आजादी’ किसे चाहिए? ये तीनों कृषि कानून किसानों को पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए बनाये गये हैं, अतः इनका विरोध तो होना ही है.

संक्षेप में कहें तो कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, 2020 दरअसल ‘एपीएमसी विनाश कानून’ है, जो अंततः मण्डी व्यवस्था को पूरी तरह खतम कर देगा और किसानों के पास कोई सुरक्षा तंत्र (सेफटी नेट) नहीं बचेगा. आज घोषित मूल्य पर सरकारी खरीद का प्रावधान है, इन कानूनों के बाद घोषित से कम मूल्य पर कम्पनियों को आपदा बिक्री करने के अलावा किसान के पास और कोई रास्ता नहीं बचेगा.

fff

 

एपीएमसी मण्डियों के बारे में तो ढेर सारी शिकायतें रहती हैं.
नये कानूनों में बिचौलियों से छुटकारा मिल जायेगा?

किसान चाहते हैं कि एपीएमसी मण्डियां उनके प्रति और ज्यादा जवाबदेह व बेहतर बनें, वे उन्हें खत्म तो बिल्कुल नहीं होने देना चाहते.

कृषि में व्यापारियों, दलालों, बिचौलियों आदि का असर खतम करने के उद्देश्य से 70 के दशक में देश में सार्वजनिक मण्डियां बनाने के लिए ‘एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी (एपीएमसी) कानून’ बनाया गया था. लेकिन समय से साथ व सरकारी ढिलाई के चलते इनमें मुट्ठी भर आढ़तियों का प्रभुत्व बनता चला गया और कई जगह तो हालत ऐसे हो गये कि वित्त, व्यापार, प्रसंस्करण और परिवहन समेत कृषि व्यापार के सभी पहलुओं पर उनका प्रभुत्व बन गया. जाहिर है कि मण्डी व्यवस्था को सुधारने व बेहतर बनाने की जरूरत है ताकि किसानों के प्रति उनकी जवाबदेही बढ़े, न कि मण्डियों को ही समाप्त कर दिया जाये.

अगर छोटे व्यापारी, आढ़तिये या बिचौलियों में बनी बनाई व्यवस्था को बिगाड़ने की इतनी क्षमता है, तब जरा कल्पना करिये कि विशालकाय कम्पनियां इस क्षेत्र में आकर क्या-क्या नहीं करेंगी?

कॉरपोरेट खेती से बिचौलिए खत्म नहीं होंगे. बल्कि बड़ी कम्पनियों के आने का मतलब बड़े बिचौलिए आ गये! और इन बहुत बड़े बिचौलियों को किसानों तक पहुंचने के लिए छोटे बिचौलियों की भी जरूरत होगी. जोकि एपीएमसी मण्डियों के मौजूदा आढ़तियों से बेहतर और कौन हो सकता है.

एपीएमसी की मण्डी व्यवस्था में हजार खामियां हो सकती हैं - और किसान उन्हें ठीक करने की लगातार मांग भी करते रहे हैं. लेकिन नये कानूनों का मकसद कुछ और है. ये कानून एक ऐसी व्यवस्था को खत्म करने के लिए लाये गये हैं जिसमें किसानों को भी कुछ फायदा मिलता था, और मौजूदा व्यवस्था की जगह ऐसा तंत्र बनाया जा रहा है जिसमें केवल बड़ी कम्पनियों को फायदा होगा.

इन कानूनों में एक नहीं, पांच जगह बिचौलियों का प्रावधान बनाया गया है. पुराने वाले बिचौलिए कहीं नहीं जायेंगे बल्कि वे नये नामों से इन नयी जगहों को भरेंगेः

  • कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून ख्कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020, की धारा 2(छ) में फार्म एग्रीमेण्ट की परिभाषा में लिखा है कि “कृषि करार“ से किसी भी कृषि उत्पाद की किसी पूर्व अवधारित क्वालिटी के उत्पादन या उगाने से पहले किसी कृषक और किसी प्रायोजक के बीच, या किसी कृषक, किसी प्रायोजक और किसी तीसरे पक्षकार के बीच किया गया कोई लिखित करार अभिप्रेत है”. इसमें ‘तीसरा पक्षकार’ (थर्ड पार्टी) और कोई नहीं एक बिचौलिया है.
  • इसी कानून की धारा 3(1)(ब) में लिखा है कि ‘‘परंतु ऐसी कृषि सेवाएं प्रदान करने के लिए किसी भी विधिक अपेक्षा की अनुपालना का उत्तरदायित्व, यथास्थिति, प्रायोजक या कृषि सेवा प्रदाता (फार्म सर्विस प्रोवाइडर) का होगा’’. यहां ‘‘कृषि सेवा प्रदाता’’ (फार्म सर्विस प्रोवाइडर) एक बिचौलिया है.
  • कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून की धारा 4(4) कहती है कि स्वीकार्य क्वालिटी, श्रेणी और मानकों को सुनिश्चित करने के लिए ‘‘तृतीय पक्षकार अर्हित पारखियों द्वारा मॉनीटर और प्रमाणित किया जाएगा’’. इसमें ‘तृतीय पक्षकार अर्हित पारखी’ (थर्ड पार्टी क्वालीफाइड एसेयर) एक और बिचौलिया है.
  • इस कानून की धारा 10 में ‘‘संकलक या कृषि सेवा प्रदाता’’ (एग्रीगेटर या फार्म सर्विस प्रोवाइडर) का प्रावधान बनाया गया है. “संकलक“ से ‘‘ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके अंतर्गत कृषक उत्पादक संगठन भी है, जो किसी कृषक या कृषकों के किसी समूह और किसी प्रायोजक के बीच मध्यवर्ती के रूप में कार्य करता है और कृषक तथा प्रायोजक दोनों को संकलन से संबंधित सेवाएं प्रदान करता है’’. यहां संकलक नाम से इस बिचौलिए को तीन काम दिये गये हैंः- वह छोटे किसानों की जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के लिए एक साथ करेगा, खेती में कम्पनियों की सेवायें सुनिश्चित करायेगा, और कम्पनियों को फसल उत्पाद की बिक्री करवायेगा.
  • कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून की धारा 2(ङ) और कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, 2020 (एपीएमसी विनाश कानून) की धारा 2(ब) में ‘किसान’ की परिभाषा में ‘कृषि उत्पादक संगठन’ को भी शामिल किया गया है. कृषि उत्पादक संगठन (एफपीओ) तो समर्थ और धनी किसान ही बना पायेंगे और फिर वे स्पान्सर कम्पनियों के बिचौलिए बन कर रह जायेंगे. हालांकि एफपीओ की मूल अवधारणा है कि व्यापारियों से मोल-भाव करने की दिशा में वे किसानों के स्वयंसेवी समूहों के रूप में काम करेंगे. लेकिन सच्चाई यही है कि ऐसे एफपीओ आज के सूदखोरों, बैंक दलालों, आढ़तियों और व्यापारिक एजेण्टों की जगह ले लेंगे. गरीब किसानों को इनसे बचाने के प्रावधान इन कानूनों में कहीं नहीं है.
  • कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, 2020 की धारा 5(1) में स्पष्ट रूप से प्राइवेट मण्डियों के मालिक और मैनेजमेण्ट तथा एफपीओ के बीच संबन्ध स्पष्ट है कि एफपीओ ‘किसान के उत्पाद के व्यापार के लिए इलेक्ट्रोनिक ट्रेडिंग व ट्रांजेक्शन की पद्धति’ विकसित व संचालित करेंगे.

कुल मिला कर देखें तो ये कानून बिचौलियों से छुटकारा नहीं दिला रहे, बल्कि बिचौलियों के और बड़े जाल में किसानों को फंसा रहे हैं. ये नये बिचौलिए ज्यादा खतरनाक हैं. पुराने वाले आढ़तियों का किसानों के साथ कम से कम ऐसा संम्बध विकसित हो गया है कि मुसीबत में किसान उनसे मदद व बगैर लिखा-पढ़ी के तत्काल ब्याज मुक्त कर्ज आदि भी ले लेते हैं. अब यह भी नहीं रहेगा. ऐसे में आर्थिक संकट आने पर किसान के पास जमीन बेचने या खेती छोड़ने के अलावा और क्या बचेगा?

इस सन्दर्भ में किसान ठीक ही कह रहे हैं कि किसान और बाजार के बीच के काम करने वाले को ‘बिचौलिया’ नहीं बल्कि ‘सर्विस प्रोवायडर’ कहा जाना चाहिए. इन्हें हटाने की जरूरत नहीं है बल्कि पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और किसान के प्रति जवाबदेह बनाने की जरूरत है ताकि कोई भी ताकत बाजार को अपने पक्ष में तोड़-मरोड़ न सके.

प्रधानमंत्री मोदी भाषण दे रहे हैं कि जब केरल में एपीएमसी मण्डियां अभी तक नहीं बनायी गईं, तब अन्य राज्यों के लिए एपीएमसी का मुद्दा क्यों उछाला जा रहा है?

प्रधानमंत्री सफेद झूठ का कारोबार कर रहे हैं. यह बड़े शर्म की बात है. सच्चाई जानने के लिए नीचे की लाइनों पर गौर करेंः

  • केरल में एपीएमसी कानून इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि वहां कृषि में 82% हिस्सा उन व्यावसायिक व प्लाण्टेशन फसलों का है जो सरकारी एमएसपी घोषित होने वाली 23 फसलों में नहीं आतीं. इनमें नारियल, काजू, रबर, चाय, कॉफी, एवं काली मिर्च, लौंग, जायफल, इलायची, दालचीनी जैसे मसाले आदि आते हैं.
  • केरल में धान, फल व सब्जी आदि की फसलों का इतना उत्पादन नहीं होता कि उनके लिए अलग से एपीएमसी कानून के तहत एक थोक मण्डी की जरूरत पड़े. लेकिन वहां पर राज्य सरकार द्वारा इन फसलों के लिए भी नियम जारी किये जाते हैं.
  • केरल में धान का सरकारी खरीद मूल्य रु. 2748 प्रति कुंटल है, जोकि केन्द्र सरकार की एमएसपी से रु. 900 ज्यादा है.
  • व्यवसायिक फसलों की अलग मार्केटिंग प्रणाली होती हैं जो भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तहत बने कमोडिटी बोर्डों द्वारा प्रायोजित की जाती है. जैसे रबर बोर्ड, मसाला बोर्ड, कॉफी बोर्ड, टी बोर्ड, कोकोनट डेवलपमेण्ट बोर्ड आदि. ऐसी फसलों की नीलामी और मार्केटिंग की अलग व्यवस्था है.

तब प्रधानमंत्री क्यों जानबूझ कर झूठ फैला कर जनता को गुमराह कर रहे हैं? क्योंकि वे जानते हैं कि इन कृषि कानूनों के बचाव में बोलने के लिए सच से काम नहीं बनेगा, झूठ का सहारा ही एकमात्र रास्ता है.

jjj

 

क्या यह सही है कि बिहार में एपीएमसी कानून समाप्त करने के बाद वहां कृषि की विकास दर बढ़ गई?

बिहार में एपीएमसी कानून को 2006 में समाप्त कर दिया गया था.

नवउदारवादी टिप्पणीकार शेखर गुप्ता का मानना है कि एपीएमसी कानून समाप्त होने से बिहार में कृषि विकास दर इतनी ज्यादा बढ़ गई कि पंजाब भी पीछे रह गया. वैसे बिहार के लोग तो खुद ही जानते हैं कि 2006 के बाद से उन्होंने कृषि विकास कितना देख लिया है!

आइये कुछ ऐसे तथ्यों और आंकड़ों पर नजर डालें जिन्हें किसान विरोधी कानूनों के पक्ष में बोलने वाले आपको नहीं बतायेंगेः

  • 2011-12 से लेकर आज तक बिहार की सालाना कृषि विकास दर माइनस (-)1 प्रतिशत है, और पंजाब में यह (+)1 प्रतिशत है. बिहार में इस दौरान कृषि में ग्रॉस स्टेट वैल्यू ऐडेड (जी.एस.वी.ए.) घट गया है, जबकि पंजाब में यह लगातार बढ़ रहा है. हां, साल 2006-07 और 2011-12 के बीच बिहार का जी.एस.वी.ए. 4.8 प्रतिशत रहा था और इसी दौरान पंजाब में यह 1 प्रतिशत था. लेकिन यह आंकड़ा एक छोटी समय अवधि का है और पूरी तस्वीर नहीं दिखाता.
  • जो भी हो, अगर मान भी लें कि बिहार में कृषि का विकास हुआ है, तो सरकारी आंकड़ेबाजों को यह भी बताना पड़ेगा कि क्यों इस दौरान बिहार के किसानों की आय नहीं बढ़ी. क्यों बिहार के किसानों का स्थान आज खेती में आय के मामले में सबसे नीचे आता है?
  • अगर बिहार के किसानों का हाल इतना अच्छा होता तो वे हर साल अपनी धान की उपज को तस्करी के जरिए पंजाब की एपीएमसी मण्डियों में क्यों भिजवाते हैं? बताया जाता है कि करीब दस लाख टन चावल बिहार से पंजाब की मण्डियों में चोरी से भेजा जाता है. क्योंकि बिहार में खुले बाजार में धान का मूल्य एमएसपी से काफी कम होता है .  

बिहार का अनुभव मोदी सरकार और उसके समर्थकों द्वारा इन कानूनों के बचाव में फैलाये जा रहे झूठ की पोल खोल देता है.

बिहार में एपीएमसी कानून खत्म कर देने के बाद भी नये कृषि बाजार बनाने और पहले से मौजूद सुविधाओं को और सुदृढ़ करने की दिशा में निजी पूंजी निवेश हुआ ही नहीं, फलस्वरूप कृषि बाजार की सघनता 2006 के बाद घट गयी. ऊपर से बिहार में अनाज की सरकारी खरीद पहले भी कम थी, अब और घट गई. आज वहां के किसान पूरी तरह से व्यापारियों की दया पर निर्भर हैं जो मनमाने तरीके से अनाज खरीद का मूल्य काफी कम दर पर तय करते हैं. फसल के कम खरीद मूल्य के पीछे संस्थागत व्यवस्था का अभाव और अपर्याप्त बाजार सुविधायें एक बहुत बड़ा कारण है.

बिहार में अब धान एवं गेहूं की एमएसपी मूल्य पर खरीद की जिम्मेदारी पी.ए.सी.एस. (प्राइमरी एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसाइटीज) की है, परन्तु वास्तविकता यह है कि ऐसी खरीद बस नाममात्र की ही की जाती है. वहां के किसान बताते हैं कि फसल का उचित मूल्य न मिलना बिहार में कृषि विकास दर बढ़ाने की दिशा में बहुत बड़ी बाधा है .

एपीएमसी व्यवस्था समाप्त करने और उसकी जगह पी.ए.सी.एस. (प्राइमरी एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसाइटीज) ले आने के 14 साल बाद बिहार में आज तक कृषि के आधारभूत ढांचा के विकास हेतु निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश एक स्वप्न भर है. और फसल का उचित मूल्य हासिल कर पाना तो और भी दूर का सपना बन चुका है.

एन.सी.ए.ई.आर. की रिपोर्ट के अनुसार :

  • बिहार में एपीएमसी खत्म करने बाद वहां खाद्यान्न के मूल्यों में अस्थिरता बढ़ गई है.
  • वहां किसानों को निजी गोदामों में अपने फसलोत्पाद रखने के लिए ज्यादा मूल्य चुकाना पड़ता है.
  • बिहार में धान, गेहूं, मक्का, मसूर, चना, सरसों, केला आदि समेत 90 प्रतिशत से ज्यादा फसल उत्पाद व्यापारी और कमीशन एजेण्ट सस्ते में गांव से ही खरीद ले जाते हैं.
  • वहां किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता है. फसल कटाई के बाद किसानों को तत्काल नकद धन की जरूरत होती है जिसके लिए उन्हें अपनी फसल व्यापारियों को मजबूरी में सस्ते में बेचना पड़ता है. वहां गांव के पास सरकारी कृषि बाजार तो होता नहीं है.
  • अगर किसान अपना उत्पाद दूर की किसी मण्डी में ले भी जाते हैं तो वहां उन्हें कमीशन एजेण्ट को रिश्वत देनी होती है.
  • संसाधन के अभाव में किसान अपनी फसल को घर में स्टोर करके नहीं रख सकते, वह बरबाद हो जायेगी. इसीलिए किसान अपना उत्पाद कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होते हैं.

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के सुविख्यात प्रोफेसर सुखपाल सिंह ने 2015 में ही चेतावनी दी थी कि ‘‘बिहार जैसे राज्यों के लिए जहां छोटे एवं सीमांत किसानों की संख्या 90 प्रतिशत से ऊपर है, एपीएमसी मण्डियां बहुत महत्वपूर्ण हैं. चूंकि छोटे किसानों तक न तो बड़े खरीदार और न ही कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग वाली कम्पनियां पहुंचती है, ऐसी मण्डियां ही उनका एकमात्र सहारा हैं. ... कृषि बाजारों में सुधार के नाम पर पूरी मण्डी व्यवस्था को ही समाप्त करने की जरूरत नहीं है. संस्थाओं को खत्म करना बहुत आसान है, असली चुनौती उन्हें बनाने में है. कृषि क्षेत्र और किसान समुदाय को इसके गम्भीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे .’’  

क्या कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग में किसान को ज्यादा दाम और उपभोक्ताओं को सस्ता अनाज मिलेगा?

बिल्कुल नहीं. कम्पनियां उपभोक्ता सामग्रियों की जमाखोरी करेंगी और बाजार पर उनका एकाधिकार कायम हो जायेगा. वे शुरूआत में बाजार पर प्रभुत्व बनाने के लिए और एपीएमसी तथा एमएसपी व्यवस्था को नाकारा बना देने के लिए हो सकता है कि किसानों को उपज का अधिक मूल्य दें. एक बार जब एपीएमसी और एमएसपी व्यवस्था चरमरा कर खत्म हो जायेगी, तब उन कम्पनियों के लिए एमएसपी से ज्यादा दाम लगाने की कोई बाध्यता नहीं रहेगी, तब वे सस्ता खरीदेंगे और मंहगा बेचेंगे. इससे किसान और आम उपभोक्ता दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ेगा.

कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के साथ समस्या यह है कि “किसानों की तुलना में सत्ता संतुलन धन्नासेठों के पक्ष में ही होता है. चाहे वह कॉन्ट्रेक्ट की शर्तें तय करने की बात हो, या उसे लागू करने का मामला हो. और तो और, बड़ी कम्पनियां कुछ खास फसलों में ही निवेश करती हैं जोकि शहरी और वैश्विक मांग के हिसाब से होगा. हमारे देश में पहले से ही कमजोर फसलों की विविधता को और भी क्षति पहुंचेगी” .

भारत के किसान बहुत पहले ही कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग को आजमा चुके हैं और कटु अनुभवों के आधार पर उसे खारिज कर चुके हैं. नब्बे के दशक की शुरूआत में पंजाब में पेप्सी फूड्स द्वारा टमाटर, और मिर्च की खेती के साथ कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग की शुरूआत हुई. उस दशक का अंत आते आते इस प्रयोग के पैरोकार और उसमें शामिल भारतीय किसान यूनियन, अकाली दल, पंजाब एग्रो इण्डस्ट्रीज कॉरपोरेशन और वोल्टास आदि का कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग से पूरी तरह मोहभंग हो चुका था .

dddd

किसानों का पेप्सी के साथ कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग का अनुभव कैसा रहा?

   • 1997 तक पेप्सी कम्पनी किसानों से टमाटर और मिर्ची की फसल खरीदती थी, फिर उसने अपनी टमाटर की फैक्ट्री हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड को बेच दी और अब सिर्फ कुछ दर्जन किसानों के साथ ही काम करती है.
    • नब्बे के दशक के अंत में पेप्सी ने आलू की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग शुरू की. पर अब उसके द्वारा आलू की खरीद का मात्र 10% हिस्सा कॉन्ट्रेक्ट उत्पादकों से आता है.

  •  पंजाब में पेप्सी को 7 बॉटलिंग प्लांट लगाने थे पर अंततः उसने केवल एक प्लांट की लगाया.
  •  पेप्सी के साथ कॉन्ट्रेक्ट में जो किसान बंधे हैं उन्होंने पाया कि कम्पनी द्वारा दिये गये बीजों की सप्लाई अपर्याप्त है.
  •  किसानों ने यह भी पाया कि कम्पनी द्वारा थोपे गये कीटनाशक मंहगे और घटिया गुणवत्ता वाले थे.
  •  हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड के मामले में कॉन्ट्रेक्ट किसानों ने बताया कि उनके पास लगाने के लिए पर्याप्त पौध मौजूद थी फिर भी कम्पनी ने गैर-कॉन्ट्रेक्ट वाले किसानों को भी पौध बेची. बाद में कम्पनी ने कॉन्ट्रेक्ट में गये किसानों की फसल लेने से मना कर दिया.

ये हैं कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग से पीड़ित किसानों के कुछ बयानः

दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के संघर्ष में तरन तारन से आये 68 वर्षीय किसान सज्जन सिंह ने ‘न्यूजक्लिक’ के रिपोर्टर को बताया कि “मेरे जैसे छोटे किसानों के लिए कॉरपोरेटों के साथ कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग करना सम्भव नहीं है ... क्योंकि एक-दो साल तो कॉरपोरेट अच्छी कीमत देते हैं, उसके बाद बाजार पर कन्ट्रोल बना लेने के बाद वे कीमतें अपने हिसाब से तय करने लगते हैं.”

पंजाब के ही एक गांव से आये कंवलजीत सिंह ने ‘इण्डिया टूडे’ को बताया कि उन्होंने 6 साल तक कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग की और लगातार समस्याओं से जूझते रहे. कभी बीज खराब मिलता था, तो कभी रखरखाव में समस्या रहती थी, लेकिन कम्पनी कभी भी जवाबदेही नहीं लेती थी. अगर नये कानून के हिसाब से गेहूं और धान की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग भी शुरू हो गई तो किसानों की दिक्कतें और बढ़ जायेंगी क्योंकि वे कॉरपोरेटों के दबाव और शोषण के आगे टिक नहीं पायेंगे.

जब सरकार मण्डी टैक्स नहीं लेगी तो किसान और कम्पनी दोनों का फायदा है?

एपीएमसी विनाश कानून की धारा 6 में लिखा है कि ‘बाजार शुल्क/ टैक्स या लेवी नहीं ली जायेगी’ जबकि एपीएमसी एक्ट या राज्यों के अन्य कानूनों के हिसाब से यह लिया जाता है. लेकिन इस कानून की धारा 5(1) के अनुसार “इलैक्ट्रानिक व्यापारिक और संव्यवहार प्लेटफार्म स्थापित और प्रचालित करने वाला व्यक्ति, व्यापार की रीति, फीस ... जैसी उचित व्यापार पद्धतियों और ऐसे अन्य विषयों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार करेगा और उनका क्रियान्वयन करेगा”. इसका अर्थ हुआ कि मण्डी या बाजार की फीस तो जरूर होगी परन्तु उसका निर्धारण सरकार नहीं करेगी! इतना ही नहीं, किसानों के लिए तो बाजार शुल्क रहेगा, और कम्पनियों का तो टैक्स आमतौर पर माफ कर दिया जाता है.

कृषि -- व्यपार के लिए अडानी द्वारा मोदी राज में बनाई गई कम्पनियां

ccc

 

नये कानूनों से किसे फायदा होगा?

मोदी सरकार बनने के बाद से 2014 और 2018 के बीच मोदी के दोस्त पूंजीपति गौतम अडानी ने करीब 20 कृषि व्यापार कम्पनियां स्थापित कर ली हैं. उससे पहले अडानी के पास ऐसी मात्र 2 कम्पनियां ही थीं. साल 2019 में ही अडानी ने 9 नई कृषि व्यापार कम्पनियां खड़ी कर लीं.

कृषि बाजारों के डिरेगुलेशन से अडानी जैसों की कम्पनियों को फायदा पहुंचेगा इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है.

अगर नये कृषि कानूनों में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी भी हो जाय तो?

यदि सरकार इन कानूनों को रहने दे और साथ में एमएसपी पर खरीद की गारंटी का कानूनी अधिकार भी दे दे, जैसा कि किसान पहले से ही मांग कर रहे थे, तब आप क्या कहेंगे?

यह मंजूर नहीं. क्योंकि जब तक नये कानूनों के माध्यम से आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की जमाखोरी होती रहेगी और एपीएमसी मण्डियों को कमजोर करने वाला कानून भी रहेगा, तब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानूनी अधिकार केवल कागजी जुमला ही बना रहेगा.

क्यों? यह आप श्रम कानूनों के उदाहरण से समझ सकते हैं जिनमें न्यूनतम मजदूरी कानूनी प्रावधान है लेकिन उसे लागू नहीं किया जाता. सरकार की प्राथमिकता निजीकरण करने और ठेका प्रथा मजबूत बनाने की है, इसलिए श्रम कानून मात्र कागजी कानून बन कर रह गये हैं. यही हाल न्यूनतम समर्थन मूल्य (डैच्) का होगा अगर एपीएमसी मण्डियां और सरकारी खरीद दोनों की व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया गया.

जब सरकार का हाथ सर पर है तो कम्पनियां एमएसपी गारंटी कानून बन जाने पर भी किसानों की बांह मरोड़ कर उन्हें कम कीमत पर अनाज बेचने को मजबूर कर ही देंगी. उदाहरण के लिए, कम्पनियां मनमाने क्वालिटी मानदण्ड बना कर किसान की फसल को खरीदने से मना कर सकती हैं. एक बार अफ्रीका में वालमार्ट ने ऐसा ही किया था. किसानों से सेव के बाग लगवा लिए, फिर उन बागों की जगह पर नई वैरायटी के सेव के पेड़ लगाने के लिए कह दिया क्योंकि सेवों के ट्रांसपोर्ट में कम्पनी द्वारा इस्तेमाल होने वाले ट्रकों का नाप बदल गया था. गुजरात में पेप्सिको के खिलाफ किसानों की शिकायतें अक्सर आती रहती हैं कि उनकी आलू की फसल को कम्पनी यह कह कर खारिज कर देती है कि उनके आलू 40-45 मि.मी. से छोटे आकार के हैं . अगर किसी किसान की फसल को खारिज कर दिया जाय तो वह हताशा में सस्ते दाम पर भी बिक्री के लिए राजी हो जायेगा.

इन तीन नये कानूनों के रहते यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी का एक चौथा कानून भी बना दिया जाय तो वह केवल एक बेअसर मीठी गोली की तरह होगा जो मूल बीमारी को दूर नहीं कर सकती. फसल की कुल लागत से डेढ़ गुना की दर से एमएसपी मिलने का कानूनी प्रावधान जरूरी है - लेकिन इन तीनों नये कानूनों को रद्द करके ही उसे हासिल किया जा सकेगा.

देश की खाद्य सुरक्षा और गरीबों की राशन वितरण प्रणाली पर इन कानूनों का क्या असर होगा?

सरकार का दावा है कि देश की खाद्य सुरक्षा और गरीबों की राशन वितरण प्रणाली पर इन कानूनों का कोई असर नहीं पड़ेगा. क्या यह सच है?

एसेन्शियल कमोडिटीज अमेण्डमेण्ट एक्ट कम्पनियों को मनमाफिक मात्रा में खाद्यान्न एवं अन्य वस्तुओं की जमाखोरी करने की छूट देता है. इसका सीधा मतलब है कि खाद्य सामग्री की कीमतों, जमाखोरी की सीमा और काला बाजारी पर अब कोई कन्ट्रोल नहीं रहेगा. बाजार पूरी तरह से बड़े कॉरपोरेशनों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियंत्रण में आ जायेगा. इसका यह भी मतलब है कि पीडीएस योजना से लाभ उठाने वालों को अब डाइरेक्ट कैश ट्रान्सफर योजना में ले आया जायेगा. खाद्य सुरक्षा में डाइरेक्ट कैश ट्रान्सफर का लगातार विरोध हो रहा है, फिर भी अब पीडीएस से लाभ उठाने वाले गरीबों को सीधे खुले बाजार से खाद्यान्न खरीदने को मजबूर किया जायेगा.

इस कानून में साफ साफ लिखा है कि यह पीडीएस और टारगेटेड पीडीएस योजनाओं में ‘फिलहाल लागू नहीं किया जायेगा’. यहां ‘फिलहाल’ शब्द का चयन खतरे की घंटी का काम करता है - इसमें इस बात का इशारा है कि राशन (पीडीएस) व्यवस्था भी ‘फिलहाल’ के लिए ही है.

देश के गरीब किसानों की फसल की उचित मूल्य पर खरीद की गारंटी और आम गरीबों को सस्ता राशन उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से 1964 में संसद में एक कानून पारित कर 1965 में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (एफ.सी.आई.) की स्थापना की गई थी. यह सरकारी कॉरपोरेशन आज भी भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा इंजन है. मोदी सरकार निजी पूंजीपतियों के हितों को साधने के लिए एफसीआई को बरबाद करने पर तुली हुई है. इन तीन कानूनों ने तो एफसीआई का डेथ वारण्ट ही लिख दिया है.

  • पांच साल पहले, 22 जनवरी 2015 को मोदी सरकार ने एफसीआई को ‘पुर्नगठित’ करने के लिए एक हाई लेवल कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें एफसीआई का निजीकरण करने, गरीबों की जनवितरण प्रणाली का कवरेज घटाने और खाद्य राशन वितरण की जगह डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर करने की सिफारिशें की गई थीं. इसके एक साल बाद ही एफसीआई के निजीकरण की प्रक्रिया को शुरू करने की दिशा में ‘प्राईवेट ऐन्टरप्रिन्योर गारंटी स्कीम’ (च्म्ळ ैबीमउम) लायी गई जिसके तहत अडानी की कृषि व्यापार कम्पनियों को खाद्यान्न के निजी गोदाम (ग्रेन साइलोज) बनाने की अनुमति दे दी गई. इतना ही नहीं, एफसीआई से कह दिया गया कि वह अडानी के निजी ग्रेन साइलोज का खाद्यान्न 10 साल तक खरीदने की गारंटी दे, बिना यह चिन्ता किये कि उनमें अनाज कितना रहेगा.
  • इन पांच सालों के दौरान मोदी सरकार की कारगुजारियों के चलते एफसीआई पर 2.65 लाख करोड़ रु. का कर्जा चढ़ गया है क्योंकि सरकार ने बजट में फूड सब्सिडी हेतु जरूरी पर्याप्त फण्ड एफसीआई के लिए जारी नहीं किये. इस कारण एफसीआई को बैंकों और नेशनल स्माल सेविंग्स फण्ड से पैसा उधार लेना पड़ा. एफसीआई पर इतना कर्ज चढ़ा दिया गया है कि अब मोदी सरकार घाटा दिखा कर आसानी से इसे बंद करने अथवा, यह भी सम्भव है, अपने क्रोनी पूंजीपतियों के हाथों सस्ते में बेचने की बात भी कर सकती है?

सरकारी दावा है कि किसानों की जमीनें सुरक्षित रहेंगी?

सरकार दावा कर रही है कि किसानों की जमीनों पर कॉरपोरेट कम्पनियों से कोई खतरा नहीं है. अतः किसानों को जरा भी डरने की जरूरत नहीं है.

जबकि आन्दोलनरत किसानों का कहना है कि नये कृषि कानूनों के कारण बड़ी कम्पनियां उनकी जमीनों पर भी कब्ज़ा कर लेंगी .

सरकार और शासक पार्टी भाजपा किसानों से सफेद झूठ बोल रहे हैं.

अगर फसल बरबाद होने के कारण किसान कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग में कम्पनी की तय शर्तों को पूरा नहीं कर पाया तब क्या होगा?

कहने को तो कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून की धारा 15 में लिख दिया गया है कि ‘किसान की कृषि भूमि से’ बकाया की कोई वसूली नहीं होगी. लेकिन इसी कानून की धारा 9 क्या कहती है? धारा 9 में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग एग्रीमेण्ट को बीमा की रकम या कर्ज से जोड़ दिया गया है. इसका सीधा मतलब हुआ कि किसान की जमीन को गिरवी रख कर किसी वित्तीय सेवा प्रदाता से कर्जा लिया जा सकता है और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में हो सकता है कि जमीन की जब्ती हो या बेचनी पड़े.

कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग एग्रीमेण्ट में कम्पनी से बीज व अन्य लागत सामग्री खरीदनी पड़ती है, इसके लिए किसान कर्ज लेता है. फसल बर्बाद होने पर भी कम्पनी को लागत सामग्री का पेमेण्ट करना ही पड़ेगा जिसके लिए किसान के पास जमीन गिरवी रखने के अलावा और क्या रास्ता होगा? यह भी हो सकता है कि कम्पनी किसान की फसल को कम गुणवत्ता का बता कर नहीं खरीदे, फिर भी लागत सामग्री का पेमेण्ट करना ही होगा. घाटा होने की हालत में किसान के पास जमीन बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा. तब पूरी सम्भावना है कि कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग वाली कम्पनी ही जमीन खरीदने के लिए सबसे पहले आगे आये.

फसल बीमा की व्यवस्था पहले से ही बड़ी कम्पनियों के हाथ में दे दी गई है और किसानों को फसल नष्ट होने की स्थिति में समुचित मुआवजा नहीं मिल पाता है. इसके पीछे कारण यह है कि भारत में फसल बीमा की पूरी प्रणाली डब्लू.टी.ओ. के “एग्रीमेण्ट ऑन एग्रीकल्चर” (AoA) के हिसाब से बनायी जा चुकी है जिसमें बीमा क्षेत्र के बड़े कॉरपोरेट किसानों के हितों से खिलवाड़ कर अकूत मुनाफा कमा रहे हैं.

ggg

 

क्या विकास के लिए निजीकरण जरूरी है?
किसानों को तो पहले से ही इतनी सब्सिडी मिलती है. सरकार को कृषि सब्सिडी और सरकारी नियंत्रण बंद नहीं कर देने चाहिए?

भारत में विशाल आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है फिर भी 2011-12 और 2017-18 के बीच कृषि क्षेत्र में सरकार का निवेश कुल जीडीपी का 0.3% से 0.4% के बीच रहा है. इसकी तुलना में बड़े-बड़े धन्नासेठों की कॉरपोरेट कम्पनियों के लिए इसी दौरान टैक्स छूट व अन्य छूटें देने में जीडीपी का 6% खर्च हुआ. इसके अलावा उन्हें कर्ज माफी, सस्ते में जमीनें, पानी व अन्य प्राकृतिक संसाधन आदि अलग से दिये गये हैं. देश के टैक्स-पेयर्स को मांग करनी चाहिए कि उनके द्वारा चुकाये गये टैक्सों की रकम का इस्तेमाल किसानों के लाभ के लिए किया जाय, बड़ी कम्पनियों को देने के लिए नहीं.

खेती में किसानों का मुनाफा बहुत कम होता है. 2012-13 में भारत में एक किसान परिवार की औसत आमदनी रु. 6,427 प्रति माह थी. ऐसे में उन्हें अडानी और अम्बानी जैसे पूंजीपतियों - जिन्हें सरकार ने एकाधिकार जमाने वाली नीतियां और सरकारी संरक्षण भेंट में दे रखा है - के साथ खुले बाजार की प्रतिद्वंदिता में उतरने के लिए कहा जा रहा है!

अडानी और अम्बानी इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी को छुप कर पैसा देते हैं. बदले में भाजपा की सरकार किसानों की आजीविका और गरीबों की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगा कर इनकी कम्पनियों का मुनाफा बढ़ाने वाली नीतियां बना रही है.

===============================================================================================

भारत के किसानों पर चौतरफा हमला

जब किसान विरोधी कानूनों का विरोध चल रहा है, तब भी मोदी सरकार विभिन्न तरीकों से भारत के किसानों पर हमला जारी रखे हुए है. सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आयात शुल्क में रियायत देकर उनके अतिरिक्त विदेशी कृषि उत्पादों को भारत में लाने दे रही है. ऐसे उत्पाद जो हमारे देश में भी पैदा होते हैं और उनके आयात से भारतीय किसानों के बाजार व आय पर नकारात्मक असर होगा. जब किसान दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे, इसी बीच सरकार ने आयात शुल्क में 15% रियायत देकर रु. 3,200 प्रति कुंटल की दर से 5 लाख टन मक्का के आयात का आदेश दे दिया. जबकि भारत में एमएसपी पर यही सरकार अपने किसानों से मक्का रु. 1,850 प्रति कुंटल की दर पर खरीद रही है. हालात इतने खराब हैं कि बिहार में तो किसान अपनी मक्का की उपज को रु. 500 प्रति कुंटल पर बेचने को मजबूर हैं.

अमेरिका में ट्रम्प की सरकार वहां के कृषि क्षेत्र को 4,600 करोड़ डॉलर की सब्सिडी देती है. यह राशि वहां की समग्र कृषि आमदनी के लगभग 40% के बराबर है. वहां सब्सिडी सीधे कृषि क्षेत्र से जुड़ी कम्पनीयों व बैंकों के खाते में दी गईं. जितनी बड़ी कम्पनी उतनी ज्यादा सब्सिडी.

भारत की सरकार सब्सिडी क्यों नहीं बढ़ा सकती? और ऐसी फसलों के आयात पर रोक क्यों नहीं लगाती जिनका उत्पादन भारत में भी होता है? ऐसा कई मौकों पर यूरोपियन यूनियन के देशों ने किया है और तब डब्लू.टी.ओ. ने उनसे कुछ नहीं कहा और न ही नीतियों में बदलाव के लिए उन देशों पर कोई दबाव बनाया!

=================================================================================================

इन कृषि कानूनों का तात्कालिक असर क्या रहा है?

इन तीन कृषि कानूनों के पारित होने के तुरन्त बाद से ही उनके खतरनाक परिणाम आने शुरू हो गये हैं. कई राज्यों की मण्डियों में धान का खरीद मूल्य एमएसपी से काफी नीचे चला गया. उत्तर प्रदेश की मण्डियों में 47% धान की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर बिकी. वहीं गुजरात में 83%, कर्नाटका में 63% और तेलंगाना में 60% धान की फसल एमएसपी से कम पर बिकी. छत्तीसगढ़ धान का बहुत बड़ा उत्पादक राज्य है जहां इस वर्ष कम से कम 4.4 लाख टन धान एमएसपी के नीचे की दरों पर बिका.

लेकिन सरकारी प्रोपेगैण्डा तो उल्टे आंकड़े दिखा रहा है! सरकार का कहना है कि इस साल खरीफ की फसल खरीद ‘बिल्कुल ठीक तरह से’ चली है और पिछले साल से 22.5% ज्यादा धान खरीद की गई है. यह कैसे सम्भव हुआ? इसका जवाब है कि प्राईवेट व्यापारी किसानों से कम दाम पर फसल खरीद कर रहे हैं और फिर उसे एफसीआई अथवा अन्य सरकारी एजेन्सियों को एमएसपी के रेट पर बेच रहे हैं. किसानों को कम कीमत मिल रही है और सरकार व्यापारियों को एमएसपी पर भुगतान कर रही है . कॉरपोरेट-परस्ती इसी को कहते हैं.

ggar

 

जब ये कानून किसान विरोधी हैं तब मोदी सरकार उन्हें लागू कराने के लिए क्यों अड़ी हुई है?
कांग्रेस भी तो अपने राज में इसी तरह के कानून बनाना चाहती थी? अब कांग्रेस इनका विरोध क्यों कर रही है?

मोदी सरकार अमेरिकी प्रभुत्व वाले विश्व व्यापार संगठन (डब्लू.टी.ओ.) के दबाव में भारत की कृषि में ढांचागत बदलाव कर रही है. यही काम मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार भी कर रही थी. देश के किसान डब्लू.टी.ओ. के दबाव में नीतियां बनाने का विरोध कांग्रेस के राज में भी कर रहे थे और आज मोदीराज में भी कर रहे हैं. किसान आन्दोलन को इससे कोई मतलब नहीं कि पहले इन्हीं नीतियों का कांग्रेस समर्थन कर रही थी या नहीं. किसानों को तो अपने जीवन और अस्तित्व की लड़ाई लड़नी है. सभी पर्टियों को, चाहे वे शासन में हों या विपक्ष में, किसानों की मांगों को मान लेना चाहिए. आज विपक्ष की पार्टी के रूप में इन कानूनों को वापस लेने की मांग कर कांग्रेस कम से कम यह काम तो कर रही है. भाजपा को भी यही करना चाहिए था.

भारत सरकार हमेशा ही यह दावा करती रही है कि वह डब्लू.टी.ओ. में देश के किसानों के हितों की रक्षा कर रही है. सार्वजनिक रूप से तो यही कहा जाता है लेकिन पीछे के दरवाजे से सरकार डब्लू.टी.ओ. के आगे आत्मसमर्पण करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही. मोदी सरकार द्वारा लाये गये तीनों कृषि कानून भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालने की डब्लू.टी.ओ. की साजिश का हिस्सा हैं ताकि बड़े कॉरपोरेटों का मुनाफा बढ़ सके.

दो साल पहले 2018 में मंदसौर में किसानों पर चलाई गई गोलियों के विरोध में देश के किसान सम्पूर्ण कर्ज माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी लागू करने की मांगों के साथ सड़कों पर आ गये. उस समय अमेरिका ने भारत का यह कह कर विरोध किया कि हमारे यहां ज्यादा सब्सिडी दी जा रही है, जो कि डब्लू.टी.ओ. द्वारा थोपी गयी सीमा, कुल उत्पादन का अधिकतम 10% से अधिक है. जबकि सच्चाई यह है कि अमेरिका में प्रति किसान सालाना सब्सिडी 61,286 डॉलर मिलती है और भारत में यह राशि मात्र 282 डॉलर ही है. अमेरिका दबाव बना रहा है कि भारत अपने किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं व धान आदि खरीदना बंद करे. इससे अमेरिकी कम्पनियों को भारतीय बाजार में अपना अनाज बेचने का मौका मिलेगा. अमेरिका और आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे अन्य कई ताकतवर पूंजीवादी देश चाहते हैं कि भारत मण्डियों में एमएसपी पर सरकारी खरीद की गारंटी देना बंद करे और गरीबों के राशन की गारंटी करने वाली जनवितरण प्रणाली को भी खत्म कर दे. इसीलिए डब्लू.टी.ओ. भारत में कृषि सब्सिडी और पीडीएस राशन दोनों की जगह डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर देने के लिए दबाव बना रहा है. डब्लू.टी.ओ. का यह भी दबाव है कि भारत की सरकार कृषि के आधारभूत ढांचे के विकास में निवेश न करे और उसकी जगह कॉरपोरेट सेक्टर की फसल बीमा कम्पनियों को कृषि क्षेत्र में खेलने का पूरा मौका दे.

ऊपर से तो सरकार जनता को लगातार झूठे आश्वासन दे रही है, लेकिन अन्दरखाने वह डब्लू.टी.ओ. के हिसाब से कृषि नीतियों और कानूनी ढांचे में बदलाव कर रही है. इसकी तैयारियां बहुत पहले से चल रही हैं. 2019 में संसदीय चुनाव से पहले स्व. अरुण जेटली ने संकेत दिया था कि भारत की कृषि नीतियों को डब्लू.टी.ओ. के अनुरूप बदलने की दिशा में सब्सिडी की जगह कैश ट्रांसफर स्कीम को लाया जायेगा. तब एक सरकारी अधिकारी ने कहा था कि “डाइरेक्ट इनकम ट्रांसफर के वायदे की तार्किक परिणति कृषि सब्सिडी और अनाज की सरकारी खरीद को खत्म करने में होनी है, क्योंकि यह डब्लू.टी.ओ. के नियमों के अनुरूप नहीं है और उत्पाद मूल्य के 10% सब्सिडी की सीमा को हम जल्द ही पार कर जायेंगे जोकि भारी चिन्ता का विषय है.”

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), सरकारी गल्ला खरीद, एपीएमसी मण्डियां और जनवितरण प्रणाली को इन तीन कृषि कानूनों के जरिए एक साथ खत्म करके और कृषि को कॉरपोरेटों के हवाले करके हमारी सरकार वास्तव में डब्लू.टी.ओ. की इच्छा पूरी कर रही है.

देश के किसान ऐसा न होने देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यह लड़ाई केवल उनके अधिकारों के लिए ही नहीं है वरन् यह भारत की सम्प्रभुता, आजादी और खाद्य सुरक्षा को बचाने की लड़ाई है.

भारत की कृषि और किसानों पर कॉरपोरेट नियंत्रण कितना बन चुका है?

नब्बे के दशक से ही भारत की सरकारें कृषि और किसानों पर कॉरपोरेट शिकंजा मजबूत बनाने के लिए काम कर रही हैं.

  • आज भारत की कृषि में लगने वाले 70% से ज्यादा बीज, खाद, कीटनाशक आदि की सप्लाई के बाजार पर केवल चार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्ज़ा है : बायर-मॉन्सेटो (Bayer-Monsanto), केमचाइना-सिनजेन्टा (ChemChina-Syngenta), डाउ-ड्यूपॉन्ट (DOW-Dupont) और बीएएसएफ (BASF).
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एग्रोकेमिकल्स, फार्म मशीनरी, कृषि उत्पाद प्रसंस्करण, कमोडिटी ट्रेडिंग और खुदरा सुपरमार्केट आदि के उत्पादन व व्यापार पर मात्र चार दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशनों का नियंत्रण है - ए.डी.एम. (ADM), बन्ज (Bunge), कारगिल (Cargill) और लुई ड्रेफस (Louis Dreyfus).
  • डाउ उसी यूनियन कार्बाइड का नया नाम है जिसने 1984 में भोपाल गैस जनसंहार किया था और बगैर कोई जिम्मेदारी लिए साफ बच कर भाग गई थी. इन दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशनों का सरकारें कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, भोपाल गैस जनसंहार इसका एक छोटा सा उदाहरण है. आज भारत की सरकार अपने किसानों को बचाने की बजाय, उन्हें इन हत्यारी कॉरपोरेशनों के हवाले करने जा रही है.
  • कृषि और खाद्य उत्पादन के कॉरपोरेटीकरण से आज पशुओं के फैक्ट्री फार्म बनने लगे हैं. अध्ययन बताते हैं कि इनके कारण दुनियां में नई बीमारियों और कोविड-19 जैसी महामारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया है.
  • आज हमारे देश में कृषि और ग्रामीण भूमि पर कॉरपोरेट कब्ज़ा और किसानों का विस्थापन एक राष्ट्रीय परिघटना बन चुका है.
  • मोदी सरकार ने किसानों को लाभ पहुंचाने के नाम पर ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ शुरू कराई है, इससे केवल और केवल बीमा कम्पनियां और भ्रष्ट लोगों को ही फायदा पहुंचा है. किसानों को कुछ नहीं मिल सका. पिछले दो सालों में बीमा कम्पनियों ने इस योजना के तहत कुल रु. 15,795 करोड़ का मुनाफा बनाया. जबकि एक आरटीआई कार्यकर्ता की पहल पर पता चला कि इन्हीं दो सालों में इन कम्पनियों ने रु. 2,800 करोड़ के किसानों के क्लेम का भुगतान करने से मना कर दिया. इस योजना में मोदी सरकार ने कुल 18 कम्पनियों को लाइसेन्स दे रखा है, जिनमें 13 ने तो अकूत मुनाफा बटोरा.
  • भारत के किसान चारों तरफ से बरबाद हो रहे हैं. वे कर्ज में फंसे हुए है, यहां तक कि बड़ी संख्या में आत्महत्यायें कर रहे हैं. 2019 में हर रोज कृषि पर निर्भर 28 लोगों ने मजबूरी में आत्महत्यायें कीं. जबकि इस आंकड़े में उन महिला, दलित व आदिवासी किसानों की संख्या शामिल नहीं है जिन्हें किसान के रूप में मान्यता ही नहीं दी गई.

भारत के किसान केवल इन तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की लड़ाई ही नहीं लड़ रहे. पिछले तीन दशकों में थोड़ा-थोड़ा करके सरकार ने कम्पनियों के पक्ष में बहुत से नीतिगत बदलाव कर दिये हैं, जो किसानों की बरबादी का कारण बन गये हैं. लेकिन इन तीन कानूनों के माध्यम से सरकार ने किसानों के ऊपर निस्संदेह अब तक का सबसे बड़ा और बर्बर हमला किया है. जब किसान इन कानूनों को रद्द कराने के संघर्ष को जीत लेंगे तब भी डब्लू.टी.ओ. निर्देशित व कॉरपोरेट परस्त नीतियों को सम्पूर्ण रूप में खारिज कराने के लिए उनका संघर्ष जारी रहेगा.

आज सम्पूर्ण देश को कृषि क्षेत्र में भारी पैमाने पर सरकारी निवेश के जरिए किसान हितों की रक्षा करने वाली कृषि नीतियों को लाने की मांग पर किसानों के संघर्ष में साथ देने की जरूरत है.

===============

बहकाए-भटकाए लोग
कहाँ-कहाँ से आए लोग
दिल्ली की बेरहम दीवारें,
दरवाजे खड़काए लोग

अच्छे दिन का घना अंधेरा
है किसान का ये संजोग
इनकी खेती, इनकी मेहनत
साहेब-शाह लगावें भोग

जिन फसलों से पेट भरें हम
उनकी कीमत गिरे धड़ाम
सेठों की बस रहे चकाचक
और बचे ना कोई काम
इसी रास्ते मुल्क हांकने
आया है अबकी कानून
चौपट खेती-बाड़ी करना
चाहे पड़े बहाना खून
अंगरेजों का लाल बहादुर
नाम सभी का लेता है,
इसको नक्सल, उसको चीनी
तमगा सबको देता है

इसी जुगत में लगे हैं तब से
सभी मीडिया और मिनिस्टर
गाँवों के गबरू पर मारें
पानी की बौछारें कसकर

सुना है मोदी जी की खातिर
बनने को है नया महल
नए इंडिया की गोदी में
खूब है कीचड़, खूब कमल

आर-पार की हुई लड़ाई
कमर बांध के आए लोग
खूब डटे हैं सर्दी में भी
जुमलों से झल्लाए लोग

- इण्टरनेट से मिली एक कविता.

===================

--END--

1947: निर्णायक मोड़ के पीछे, सरकारी इतिहास के मिथकों के परे

एक जुलाई 1997 को हांगकांग की धरती पर एक बार फिर चीन का झंडा लहराया. एशिया में ब्रिटिश उपनिवेश की शांतिपूर्ण, रक्तपातहीन समाप्ति का मनोरम दृश्य दुनिया भर के लोगों ने टेलीविजन पर देखा क्या आज से 50 साल पहले भारत इतने ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में आजाद हुआ था? क्या यह वैसा अहिंसा, रक्तपातहीन चमत्कार था, जैसा इतिहास की किताबों में पाया जाता है?

यह सच है कि सरकारी प्रचारकों ने बड़ी मेहनत से यह मिथक पैदा किया है कि दुनिया के किसी भी देश की तुलना में भारत की आजादी अहिंसा के रास्ते से मिली जीतों में सबसे बड़ी जीत है. लेकिन तथ्य यह है कि दुनिया के किसी भी देश में हुई हिंसक क्रांति ने शायद ही उतनी बड़ी कीमत अदा की हो जितनी हमें अपनी टुकड़ों में बटी आजादी की खातिर चुकानी पड़ी है. साम्प्रदायिक दंगों में हजारों-हजार की जीवन-हानि और अन्ततः भारत का विभाजन अहिंसा के मिथक के चरम पाखण्ड का सबसे ज्वलंत सबूत है. विभाजन की इस क्रूर और कायरतापूर्ण वारदात में लाखों मर्द, औरत और बच्चे मारे गये और उनसे भी कहीं ज्यादा लोग अपने घरों और पूरे कालखंड से उखड़ गये. स्वाधीनता संग्राम के हमारे महान शहीदों ने ऐसी शर्मनाक “उपलब्धि” के लिये तो अपनी जान की बाजी लगाई नहीं थी.

भारत की आजादी के लिये संघर्ष की पुराण-गाथा में सिर्फ हिंसा-अहिंसा के बीच बहम नहीं है. सरकारी प्रचार तो दुनिया के इस सबसे बड़े उपनिवेश की हलचल को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक-के-बाद-एक होने वाले सत्रों का विवरण भर बना देता है और दिखाता है कि कैसे गांधी ने अपनी जादुई छड़ी से करोड़ों असहाय भारतवासियों को अज्ञान के अंधकार से निकाला. हमें बताया जाता है कि तीन दशकों में इन तीन बड़े अभियानों – असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन के जरिये “राष्ट्रपिता” ने अपने बच्चों को ब्रिटिश मालिकों से धीरे-धीरे सत्ता अपने हाथ में लेने को तैयार किया.

आम आदमी, मजदूर और किसान को अगर इस भारत की आजादी की कहानी में कहीं जगह मिलती है, तो महज संख्या के बतौर, बिना चेहरे वाले गुमनाम लोगों की संख्या के बतौर. जैसे लाखों की तादाद गांधी और उनकी कांग्रेस के आह्वान पर चल रहे हों. कई बार ऐसा भी हुआ कि वे अपने लिए तय की गई हद को लांघ भी गए, और उनकी इन “हरकतों” ने गांधी को उनकी भर्त्सना करने पर विवश कर दिया. लेकिन उन्हें अपनी लड़ाई अपनी दृष्टि, अपनी गतिशीलता और अपनी पहलकदमी से लड़ते, अपने भविष्य का फैसला खुद करने की कोशिश करते कभी नहीं दिखाया गया.

इस प्रकार मेहनतकश जनता को न सिर्फ वर्तमान में उनके हक से वंचित किया जा रहा है, बल्कि अतीत में भी उनकी भूमिका को नकारा जा रहा है. उनको उनके अपने अतीत से ही काट देने की कोशिश हो रही है, और इस तरह उन्हें स्थायी शरणार्थी बनाकर इतिहास के हाशिए पर धकेल देने की कोशिश हो रही है. इसलिये यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सरकारी इतिहास की बेड़ियों को तोड़कर अपनी शानदार विरासत का पुनरुद्धार किया जाय. उस विरासत को जो आज भी हमारे अस्तित्व को आलोकित कर रही है और हमारी अस्मिता का न्यायोचित गौरव हम में भर देती है.

तब से अब तक : इतिहास जिन्दा है

इतिहास के सवाल पर हमारी लड़ाई कोई अन्धी लड़ाई नहीं, यह एक बड़े पैमाने की जंग का हिस्सा है. वह जंग जो एक  बेहतर वर्तमान और न्यायपूर्ण भविष्य के लिये समर्पित है. कम्युनिस्ट घोषणापत्र ने इसे डेढ़ सौ साल पहले ही घोषित किया था कि हम “वर्तमान के आन्दोलन में भविष्य के आन्दोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं.”

1947 भारत में साम्राज्यवादी प्रभुत्व के अन्त का प्रतीक नहीं है. इसने सिर्फ सन्दर्भ में परिवर्तन ला दिया है और साम्राज्यवाद ने अपना स्वरूप व तरीके बदल दिए हैं. अब भारत और तीसरी दुनिया के रूप में जाने जाने वाले अधिकांश अन्य देश साम्राज्यवाद के एक नए आक्रमण का सामना कर रहे हैं जो उदारीकरण और वैश्वीकरण के नए ब्रांड में सामने आ रहा है. यह तर्क अवश्य पेश किया जा सकता है कि बदली हुई विश्व परिस्थिति में किसी साम्राज्यवादी शक्ति के लिये भारत को फिर से उपनिवेश बना लेना सम्भव नहीं है. मगर जहां अर्थनीति में जनता की प्राथमिक आवश्यकताओं को रोजाना पैरों तले रौंदा जा रहा हो, जहां राष्ट्र की आर्थिक संप्रभुता और उसके सम्मान पर काले बादल मंडरा रहे हों, क्या हमें फिर से उपनिवेश न बनने की इस “गारण्टी” से कोई सुकून मिल सकता है?

1947 पूजीपति वर्ग को गद्दारी और उसके दिवालियेपन की घिनौनी दास्तान का भी अन्त नहीं है. उस समय केवल उसके एक नए अध्याय की शुरुआत हुई थी, और पचास साल बीत जाने पर उस गद्दारी के चिन्ह अब चारों ओर नजर आ रहे हैं.

देखिए, भारतीय पूंजीपति वर्ग और उनके वफादार राजनीतिक प्रतिनिधि कितनी धृष्टता के साथ हमारी मर्यादा और हमारे अहम राष्ट्रीय हितों का सौदा कर रहे हैं. कितने तीखे जहर के साथ 90 के दशक में साम्प्रदायिक फासीवाद फिर से सिर उठा रहा है. कितनी बेशर्मी से इन षड्यन्त्रकारियों और घोटालेबाजों ने हमारे बहुप्रचारित संसदीय जनतन्त्र पर कब्जा जमा लिया है, और हमारी बहुसंख्यक विशाल जनता अपने ही घर में जमीन और आजादी के बिना, रोटी और रोजगार के बिना आफत की मार झेल रही है.

फिर भी इन सब चीजों के बारे में अफसोस जाहिर करने और शिकायत करते रहने से कोड काम नहीं चलने वाला कोई मसीहा तो आकर इन समस्याओं के पहाड़ को नहीं गिराने वाला. हमे खुद ही यह काम करना होगा.

देश की आजादी की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर हम अपने स्वतंत्रता आन्दोलन के महानायकों और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं और अपने पूर्वजो - मजदुरों, किसानों और अन्य प्रगतिशील देशभक्त भारतीयों की बहादुरी व बलिदान को गर्व से याद कर रहे हैं, तब हम साथ-ही-साथ अपने वर्तमान और भविष्य का क्रांतिकारी कायापलट करने के महान उद्देश्य के प्रति एक बार फिर खुद को समर्पित कर रहे हैं.

किसानों और आदिवासियों के विद्रोह

18वीं शताब्दी में किसानों और आदिवासियों के विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध की दो प्रमुख धाराएं है जो अक्सर परस्पर मिलती दिखती हैं. मानवशास्त्री कैथलीन गॉग ने ब्रिटिश काल में हुए कोई 77 किसान विद्रोहों की सूची तैयार की है.

बंगाल और बिहार के काफी बड़े इलाके में 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में भड़का सन्यासी विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ उल्लेखनीय किसान विद्रोहों की एक प्रारम्भिक मिसाल था. 1793 में भूमि का स्थायी बंदोबस्त लागू होने के साथ ही दक्षिण भारत में भी तमिलनाडु के दक्षिणी इलाकों में किसान विद्रोह शुरू हो गया. वीरपंदया कट्टाबोम्मन के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह का मूलकेन्द्र था तिरुनेलवेलि के नजदीक पलायनकोट्टै. कट्टाबोम्मन ने अंगरेजों के टैक्स वसूलने के अधिकार पर ही सवाल खड़े किए : “आसमान हमें पानी और धरती अनाज देती है. फिर हम तुम्हें टैक्स क्यों दें?” बंगाल में तीतू मीर और उनके किसान साथियों के नेतृत्व में 1830 के दशक के शुरुआती वर्षों में हुए वहाबी विद्रोह में धार्मिक सुधार और किसान बगावत के पहलू मिले हैं. 1857 में आजादी की पहली लड़ाई की पूर्ववेला में बिहार-बंगाल सीमान्त के बीरभूम-राजमहल-भागलपुर क्षेत्र में पुलिस, जमींदार, साहूकार और कोर्ट के अधिकारियों के खिलाफ संथालों का विद्रोह फूट पड़ा. इस शानदार विद्रोह के दो किंवदती नायक सिद्धू और कान्हू को और इसके करीब सत्तर साल पहले भागलपुर में हुए संथाल विद्रोह के पहले दौर के नायक बाबा तिलका मांझी को आज भी पूर्वी भारत में आम जनता द्वारा श्रद्धा से याद किया जाता है.

एक अमिट धब्बा

यह उन्नीसवीं सदी की किसी सभ्य फौज के लिये सचमुच बेहद शर्मनाक है : ब्रिटिश फौज ने जिस कदर अमानवीय अत्याचार किया, किसी अन्य फौज ने अगर उसका दसवां हिस्सा भी किया होता तो ब्रिटिश प्रेस ने खफा होकर उसकी इज्जत उतार ली होती. लेकिन चूंकि ये ब्रिटिश फौज की ही करतूतें हैं, इसलिये हमें बहलाया जा रहा है कि युद्ध में तो ऐसी चीजें आम तौर पर होती ही रहती हैं ... दरअसल, यूरोप और अमरीका में कोई भी फौज ब्रिटिश फौज जैसी निष्ठुर नहीं है. लूटमार, हिंसा कत्लेआम, ऐसी चीजें जो अन्य तमाम जगहों पर कड़ाई से और पूरी तरह निषिद्ध हो चुकी है, ब्रिटिश सैनिक का परम्परागत विशेषाधिकार, उसका निहित अधिकार बन चुकी है... बारह दिन और बारह रात तक लखनऊ में कोई ब्रिटिश फौज नहीं थी -- वह केवल उपद्रवी, शराबी पाशविक गुण्डों की  भीड़ थी जो उन सिपाहियों की तुलना में, जिन्हें वहां से खदेड़ा जा चुका था, कहीं ज्यादा उपद्रवी, हिंस्र और लालची डकैतों के जत्थों में तब्दील हो चुकी थी. 1858 में लखनऊ को लूटमार ब्रिटिश सेना के इतिहास में हमेशा के लिये एक अमिट भब्बा बन चुका है.

- 1857 में भारत में बिटिश सेना की भूमिका पर एंगेल्स

 

हाल के शोध कार्यों और अध्ययन से यह स्थापित हो गया है कि 1857 में आजादी की पहली लड़ाई भी अन्तर्वस्तु में काफी हद तक किसान विद्रोह ही थी. ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने यह लड़ाई जीत ली और भारत पर राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से उनका कब्जा मजबूत हुआ. इसके बावजूद देश के बड़े हिस्से में किसानों और आदिवासियों के विद्रोह की आग सुलगती रही. केरल के मालाबार इलाके में 1836 और 1919 के बीच 28 बार मोपला विद्रोह भड़का. सतही तौर पर मजहबी बगावत दिखने पर भी दरअसल यह सवर्ण हिंदू जमींदारों और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ मुसलमान बटाईदारों और भूमिहीन मजदूरों का विद्रोह था. ब्रिटिश मालिकों द्वारा नील की जबरिया खेती कराने के खिलाफ 1860 के दशक में बंगाल के किसानों का नील विद्रोह हुआ.

पूरी 19वीं सदी में आंध्र के गोदावरी एजेंसी क्षेत्र में विद्रोह भड़कते रहे. ब्रिटिश संरक्षण प्राप्त मनसबदारों ने इन क्षेत्र में लगान बढ़ाने की कोशिश की तो उसके खिलाफ मार्च 1879 में लगभग 5,000 वर्गमील इलाके में भारी बगावत शुरू हो गई. मद्रास इन्फैंट्री की छ: रेजिमेंटों को झोंककर 1880 में जाकर इस पर काबू पाया जा सका. 19वीं और 20वीं सदी के संधिकाल में रांची के दक्षिणी इलाके में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान (भारी उथल-पुथल) छिड़ गया. इस ऐतिहासिक विद्रोह की वजह यह थी कि आदिवासी परंपरागत खुंटकट्टी (जमीन पर सामुदायिक स्वामित्व) अधिकारों की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए. वे बाहरी जमींदारी की बैठ-बेगारी करने को तैयार नहीं थे.

यह सच है कि किसानों और आदिवासियों के ये शुरुआती विद्रोह स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर पर हुए और इनका कोई देशव्यापी स्वरूप नहीं बन पाया. यह भी सच है कि इन विद्रोहों के पीछे आजाद और लोकतांत्रिक आधुनिक भारत बनाने का कोई बड़ा सपना या सचेत सिद्धान्त नहीं था. इन विद्रोहों की जड़ें ग्रामीण जनता की बदहाली -- लगातार अकाल जैसी स्थिति, घनघोर सामाजिक उत्पीड़न, सामंती जुल्म और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के संरक्षण में गांवों में पल रहे शक्तिशाली गठजोड़ द्वारा मचाई गई लूट खसोट में थी. इसलिए स्वाभाविक ही है कि इन आंदोलनों में धार्मिक परम्पराएं, आदिवासी रिवाज और जाति, इलाकाई और आदिम अस्मिता के कई पहलू जुड़े रहे. इसके बावजूद इन विद्रोहों में कोई ऐसी संजीदा और दमदार बात जरूर है, जो उसे बाद के वर्षों में व्यापारिक तबकों और उभरते मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के बड़े हिस्सों की सांठगांठ की राजनीति और नपे-तुले विरोध से अलग करती है.

भारतीय मजदूर वर्ग का उदय

भारतीय मजदूर वर्ग के आगमन की पहली आहट 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में सुनाई पड़ी 1853 में रेलवे के आने की वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में कपड़ा और जूट मिलें, कोयला खदानें और चाय बागान जैसे उद्योग कायम हुए और लगभग उसी समय से दमन-उत्पीड़न की स्थितियों के खिलाफ मजदूरों का संगठित होना तथा विद्रोह करना भी शुरु हो गया. 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में कहारों और सिर पर मैला ढोने वाले सरीखे असंगठित गैर-औद्योगिक श्रमिकों की हड़तालें हुईं.

स्वाभाविक है कि ट्रेड यूनियनों के गठन में पूर्व मानवतावादी नागरिकों द्वारा बनाए गए कल्याणकारी संगठन सक्रिय हुए. जिस दौर में श्रमिक वर्ग का उदय हो रहा हो और ट्रेड यूनियनों तथा फैक्ट्री कानून या श्रम कानूनों की कोई परंपरा न हो तब विभिन्न प्रकार के संगठनों और उनकी मांगों की प्रकृति के बारे में अंतर कर पाना वाकई कठिन था. लेकिन चूंकि ज्यादातर मिल मालिक गोरे थे और नस्लवाद औपनिवेशिक व्यवस्था के कारण अपमान और नफरत का माहौल था, लिहाजा मजदूरों को संगठित करने या उनकी मांगों को उठाने के मामूली-से-मामूली प्रयास भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए.

स्वदेशी: मजदूर वर्ग के आंदोलन का पहला उभार

मजदूर वर्ग के आंदोलन का पहला उभार बंगाल के विभाजन और उसके बाद शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन के दौरान देखने को मिला. कर्जन ने 19 जुलाई, 1905 को बंगाल के विभाजन की घोषणा की. देश के एक प्रमुख संवेदनशील राज्य में अंगरेजों की बांटो और राज करो की नीति का यह प्रयोग मानो अन्ततः 1947 में हुए देश के विभाजन का ही पूर्वाभास था. बंगाल के विभाजन का न सिर्फ बंगाल बल्कि सुदूर महाराष्ट्र तक में तीखा विरोध हुआ. यह लोकप्रिय राष्ट्रवादी भावनाओं के जोर पकड़ने का ठोस संकेत था.

लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल (बहुचर्चित लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति) के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कथित गरमपंथी खेमे ने एक ओर ब्रिटिश माल के बहिष्कार और दूसरी ओर स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए लोगों का आहवान किया. स्वदेशी का नारा देने वाले ज्यादातर नेताओं ने जनता को गोलबंद करने के लिए धार्मिक और पुनरुत्थानवादी प्रतीकों का सहारा लिया. तिलक ने गणेश और शिवाजी उत्सव मनाने की परंपरा शुरू की. इसी दौरान क्रांतिकारी उग्रवादियों का भी जोर बढ़ने लगा. खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने 30 अप्रैल, 1908 को मुजफ्फरपुर में कुख्यात ब्रिटिश मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर बम से हमला किया. धार्मिक पुनरुत्थानवाद और क्रांतिकारी आतंकवाद के इस सम्मिश्रण के अलावा स्वदेशी आन्दोलन में मजदूर वर्ग का जुड़ाव भी निस्संदेह रूप से प्रबल था.

कलकत्ते में शोक

भारत में ब्रिटिश प्रशासन के इतिहास में कल एक सर्वाधिक स्मरणीय दिन था. वह दिन जब बंगाल के विभाजन की योजना लागू हुई. ... कलकत्ते के तमाम नर-नारियों ने, चाहे वे किसी भी राष्ट्रीयता, सामाजिक स्थिति या धर्म के क्यों न हों इसे शोक दिवस के बतौर मनाया. भोर से दोपहर तक बागबाजार से लेकर हावड़ा तक गंगा के किनारे एक अभूतपूर्व दृश्य था. लग रहा था कि मानवता का समुद्र उमड़ पड़ा है. कलकत्ते की सड़कों और गलियों का दृश्य अद्भुत था और शायद किसी भी भारतीय शहर में पहले ऐसा नहीं देखा गया था. तमाम मिलें बन्द थी और मजदूर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे. बस केवल “वन्दे मातरम” की गूंज सुनाई पड़ रही थी.

- अमृत बाजार पत्रिका का 17 अक्टूबर 1905

 

सरकारी छापाखानों में हड़ताल के दौरान 21 अक्तूबर 1905 को सही मायने में पहली ट्रेड यूनियन -- प्रिंटर्स यूनियन का गठन हुआ. जुलाई-सितंबर, 1906 के दौरान ईस्ट इंडियन रेलवे के बंगाल खंड के मजदूरों की कई हड़ताले हुईं. 27 अगस्त को जमालपुर रेलवे वर्कशॉप में मजदूरों का विशाल शक्ति प्रदर्शन हुआ. 1907 में मई और दिसंबर महीनों के बीच रेल  हड़तालों का सिलसिला व्यापक और तीखा होता गया. इसका असर आसनसोल, मुगलसराय, इलाहाबाद, कानपुर और अम्बाला तक पहुंच गया. बंगाल की जूट मिलों में भी 1905 से 1907 के बीच कई हड़तालें हुईं. मद्रास प्रांत के तूतीकोरिन में स्थित विदेशी स्वामित्व वाली कोरल कॉटन मिल के मजदूरों ने मार्च, 1908 में कामयाब हड़ताल की. कोरल मिल के मजदूरों पर दमन के खिलाफ न सिर्फ पालिका-कर्मियों, सफाई-कर्मचारियों और ठेला-चालकों ने हड़ताल की बल्कि लोगों ने तिरुनेलवेली में नगरपालिका कार्यालयों, अदालतों और थानों पर भी हमले किए.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वदेशी के दौर में मजदूर वर्ग एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा. आजादी और लोकतंत्र की मांग को लेकर छात्रों और किसानों के साथ मजदूर भी सड़कों पर उतरे. थोड़े ही समय में सड़कों पर जुझारू संघर्ष की बात आम हो गयी. मई 1907 के पहले हफ्ते में रावलपिंडी वर्कशॉप के 3,000 मजदूरों ने दूसरी फैक्ट्रियों के मजदूरों के साथ मिल कर “पंजाबी” नाम की पत्रिका के संपादक को दंडित किए जाने के खिलाफ विशाल प्रदर्शन किया. आस-पास के गांव वालों ने भी उस उग्र रैली में हिस्सा लिया और अंगरेजों से जुड़ी अमूमन तमाम चीजें उनके हमलों का शिकार बनीं.

लेनिन ने भारतीय मजदूरों में आई राजनीतिक जागृति का स्वागत किया:

इसी दौरान, हालांकि 1905 की रूसी क्रांति नाकाम हो चुकी थी, इससे इससे अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन को आम राजनीतिक हड़ताल के रुप में एक नया हथियार मिला. बिपिन चंद्र पाल की गिरफ्तारी पर कलकत्ता की पत्रिका ‘नव शक्ति’ ने 14 सितंबर, 1907 के अपने अंक में लिखाः “रूस के मजदूरों ने दुनिया को बताया है कि दमन के दौर में असरदार तरीके से प्रतिरोध कैसे किया जाता है -- क्या भारतीय मजदूर उनसे सबक नहीं सीखेंगे?”

यह शुभेच्छा बंबई में जल्द ही साकार हुई. 24 जून, 1908 को तिलक की गिरफ्तारी से न सिर्फ बंबई बल्कि नागपुर और शोलापुर जैसे औद्योगिक केन्द्रों में भी आंदोलन शुरू हो गया. एक ओर तिलक के खिलाफ अदालती कार्रवाई चल रही थी, वहीं दूसरी ओर मजदूर वर्ग पुलिस और सेना से टकरा रहा था. सड़कों पर हो रहे ऐसे ही संघर्षों के दौरान 18 जुलाई को कई मजदूरों की जानें गईं और सैकड़ों जख्मी हुए. अगले दिन करीब 60 मिलों के लगभग 65,000 मजदूरों ने हड़ताल कर दी. बंबई के गोदी मजदूर भी 21 जुलाई को आंदोलन में उतर पड़े. 22 जुलाई को तिलक को छह साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई. विरोधस्वरूप हड़ताली मजदूरों ने छः दिनों के लिए बंबई को युद्धक्षेत्र में तब्दील कर दिया.

गांधी के निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत

स्वदेशी आंदोलन के कारण कांग्रेस फौरी तौर पर नरम और गरम दलों के बीच बंट गई थी. लेकिन इससे अलग बंगाल में क्रांतिकारी उग्रवाद का काफी फैलाव हो चुका था. इस दौरान युगान्तर और अनुशीलन  नाम के दो कांतिकारी केंद्र बन गए और 1911 में बंगाल के बंटवारे का फैसला वापस लिए जाने के बावजूद बंगाल के आतंकवादियों की शक्ति और लोकप्रियता बढ़ती गई. इस आंदोलन के शीर्ष नेता बाघा जतीन सितंबर 1915में उड़ीसा तट पर बालासोर के पास पुलिस के साथ संघर्ष में वीरतापूर्वक शहीद हो गए.

कांतिकारी आतंकवाद की लहर विदेशों, खासकर ब्रिटिश कोलंबिया और अमेरिका में बसे भारतीयों तक पहुंची और उनमें भी खासकर सिखों के बीच उसने जड़ जमा ली. सैन फ्रांसिस्को में 1913 में बहुचर्चित गदर आंदोलन शुरू हुआ. बंगाल के प्रारंभिक क्रांतिकारियों के हिंदूवादी तेवर के विपरीत गदर आंदोलन के लोग 1857 की हिंदू-मुस्लिम एकता की विरासत की बात करते थे. कई उग्रवादी और गदर आंदोलन के लोग आगे चलकर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता बने.

gandhi
       एक व्यंगचित्रकार की नजर में रौलट ऐक्ट, बांम्बे क्रॉनिकाल, 9-01-1919

पहला विश्व युद्ध छिड़ने के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत में दमन तेज कर दिया. इस दौरान लोगों के बुनियादी अधिकार भी छीन लिए गये. युद्ध खत्म होने के बाद अंगरेजों ने रॉलेट एक्ट लगाकर लोगों को अधिकारों से आगे भी वंचित रखना चाहा. युद्ध की वजह से बहुसंख्यक भारतीय जनता तंगहाल हुई, वहीं कारोबारी तबके के लिए यह मुनाफा कमाने का स्वर्णिम अवसर साबित हुआ. कुल मिलाकर, विश्व युद्ध के बाद की स्थितियां व्यापक जनांदोलन के लिए उपयुक्त थी.

सरकारी इतिहास में इस उभार को रॉलेट सत्याग्रह का नाम दिया गया है, और इसे भारतीय जनता पर गांधी के जादुई असर की पहली मिसाल के बतौर चिन्हित किया जाता है. गांधी 1907 से 1914 के बीच दक्षिण अफ्रीका में अपनी मुहिम के दौरान निष्क्रिय प्रतिरोध या सत्याग्रह का सिद्धान्त गढ़ चुके थे. लौटने के बाद उन्होंने बिहार के चंपारण और गुजरात के खेड़ा में चल रहे लोकप्रिय किसान आंदोलनों से प्रत्यक्ष अनुभव भी हासिल किया. इधर राजस्थान में भी 1913 में बिजोलिया में सीताराम दास और 1916 में क्रांतिकारी रह चुके भूप सिंह उर्फ विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में किसान आंदोलन हुए. “टैक्स नहीं, मालगुजारी नहीं” के नारे इन्हीं किसान आंदोलनों के दौरान स्वतःस्फूर्त रूप से उभरे.

औपचारिक रूप से गांधी के नेतृत्व में आंदोलन एक रविवार (30 मार्च 1919) को एक दिन की हड़ताल से शुरू हुआ. गांधी द्वारा इस मुहिम की धार कुंद करने और उसे बार-बार रोके जाने के बावजूद यह अभियान व्यापक असहयोग आंदोलन में तब्दील हो गया. नवम्बर 1921 से फरवरी 1922 के बीच जब यह आंदोलन अपने शिखर पर था तभी 5 फरवरी 1922 को उत्तरप्रदेश में गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में उग्र किसानों ने 22 पुलिस वालों को मार दिया. इस पर गांधी ने 11 फरवरी 1922 को एकतरफा तौर पर अचानक आंदोलन वापस ले लिया. ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं ने भी इसका विरोध किया. लेकिन इस घटना के बाद चौरी-चौरा के किसानों पर बर्बर जुल्म ढाए जाने के खिलाफ अमूमन कोई प्रतिवाद नहीं हुआ. चौरी-चौरा कांड के 225 अभियुक्तों में से पहले तो 172 को मौत की सजा सुनाई गयी. बाद में 19 को फांसी पर लटका दिया गया और बाकियों को काला पानी की सजा हुई. आज भी मारे गए पुलिस वालों के लिये तो एक स्मारक चौरी-चौरा में है, लेकिन फांसी पर लटकाए गए किसानों की स्मृति में कोई स्मारक नहीं बना.

बर्बर दमन और मजदूर-किसान आन्दोलनों का उभार

प्रथम विश्व युद्ध के बाद आए व्यापक जन उभार को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने दमन के जोर पर कुंद करने की भरसक कोशिश की. इस दौरान उत्पीड़न की सबसे बर्बर घटना 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जालियांवाला बाग नरसंहार के रूप में सामने आई. इस नरसंहार को अंजाम देने वाले कुख्यात जनरल डायर ने इसे सही ठहराते हुए तर्क दिया कि “वे लोगों को सबक सिखाना चाहते थे.” उन्हें तो अफसोस इस बात का था कि अगर उनकी टुकड़ी के पास और गोलियां होतीं तो वे और ज्यादा लोगों को मार पाते. सरकार द्वारा ढाए जा रहे निर्मम अत्याचार और गांधीवादी ढुलमुलपन के बीच भी अगर भारतीय जनता ब्रिटिश प्रशासन को “सबक सिखाने” में कामयाब रही तो इसका श्रेय मजदूर वर्ग की जोरदार पहल और किसानों के व्यापक असंतोष व आन्दोलनों को जाता है.

kishan movenent leaders
   विजय सिंह पथिक,                        मोतीलाल तेजावत,                      बाबा रामचंद्र

इस दौर के प्रभावशाली किसान आंदोलनों में उत्तर प्रदेश में अवध के तालुकेदारों द्वारा मनमानी लगान वसूली और उनके जुल्मों के खिलाफ हुआ किसान आंदोलन गौरतलब है. इस आंदोलन का प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर, और फैजाबाद जिलों में मजबूत आधार था. एक समय फीजी में बंधुआ मजदूर रहे बाबा रामचंद्र इसके नेता थे. उन्होंने किसान एकता के नारों को रामायण के दोहों से जोड़ा और लेनिन को किसानों का प्रिय नेता भी बताया. राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में मोतीलाल तेजावत ने भीलों का दमदार आंदोलन छेड़ा. अगस्त 1921 में केरल का मालाबार क्षेत्र एक बार फिर मोपला विद्रोह से हिल उठा. 1920 के दशक के शुरूआती वर्षों में पंजाब के जाट सिख किसानों ने अकालियों के नेतृत्व में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन छेड़ा. इस आंदोलन का लक्ष्य सिख धर्म स्थलों को अंगरेजों के पिट्ठू भ्रष्ट महंतों के कब्जे से मुक्त कराना था. महाराष्ट्र के सतारा जिले में 1919 से 1921 के यीच सत्यशोधक नाना पाटील के नेतृत्व में जमींदारों और महाजनों के खिलाफ प्रभावशाली किसान आंदोलन हुआ. पाटील आगे चलकर राज्य के लोकप्रिय कम्युनिस्ट नेता के रूप में उभरे.

जल्लाद का बयान

मैने गोलियां चलवाई और तब तक चलवाई जब तक समूची भीड़ बिखर नहीं गयी, और मैं सोचता हूं कि यदि अपनी कार्रवाई को जायज ठहराना हो तो अपना कर्तव्य निभाने के लिये जिस किस्म का नैतिक दबाव और बड़े पैमाने का असर मुझे इस गोलीकांड के जरिए डालना था उसकी अपेक्षा तो न्यूनतम गोलियां चलवाई. अगर मेरे पास और बड़ा सैन्यदल होता तो और भी ज्यादा लोग मारे जाते. मेरा उद्देश्य सिर्फ भीड़ को तितर-बितर करना नहीं था बल्कि सैनिक दृष्टि से सिर्फ वहां मौजूद लोगों पर ही नहीं, समूचे पंजाब के लोगों पर काफी जोरदार नैतिक असर डालना था. अनावश्यक कठोरता का तो सवाल ही नहीं उठता. ...

- जनरल डायर की जनरल स्टाफ डिवीजन को भेजी गई रिपोर्ट, 25-8-1979

 

टैगोर ने प्रतिवाद में नाइट की पदवी वापस की

अभागे लोगों को जो जरूरत से ज्यादा कठोर सजा दी गई और जिस अन्दाज में दी गई, हमें यकीन है कि वह सभ्य सरकारों के इतिहास में बेमिसाल है... मैं अपने देश के लिए कम-से-कम जो कर सकता हूं वह है कि अपने करोड़ों देशवासियों की ओर से ... प्रतिवाद का इजहार करूं. ... अब समय आ गया है कि सम्मान के तमगे अपमान के संदर्भ में अप्रासंगिक होकर बेइन्ताहा शर्मसार हो गए हैं और मैं चाहता हूँ कि तमाम विशिष्टताओं से स्वयं को वंचित कर लूं, अपने उन देशवासियों की पांत में खड़ा हो जाऊं जो अपनी तथाकथित तुच्छता के कारण पशुवत् अपमान सहने के लिये मजबूर है.

– वायसराय के नाम रवीन्द्रनाथ टैगोर का पत्र, 31-5-1919

 

इन किसान आंदोलनों के साथ-साथ देश भर में मजबूत हड़तालों की लहर चल रही थी. नीचे 1923 के एक प्रकाशन में दिए गए आंकड़ों (जिसे सुमित सरकार ने अपनी किताब ‘आधुनिक भारत’ में उद्धरित किया है) पर एक नजर डालने से हड़ताल की उस लहर के असर का अंदाज मिलता है :

hindi table

मजदूर संगठन ने अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण किया

मजदूर वर्ग के इस जबर्दस्त उभार के दौरान ही भारतीय मजदूरों के पहले अखिल भारतीय संगठन का जन्म हुआ. 31 अक्तूबर 1920 को बंबई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (ऐटक) का गठन हुआ. ऐटक के गठन के पीछे एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत तिलक थे, लेकिन संगठन बनने से तीन महीने पहले अगस्त 1920 को उनका निधन हो गया.

ऐटक के उद्घाटन सत्र में सर्वहारा की नई पहचान और तेवर के सभी संकेत थे, लेकिन यह कांग्रेस के संवैधानिक सुधार के चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हो पाया था. अपने अध्यक्षीय भाषण में लाला लाजपत राय ने पूंजीवाद और “उसकी जुड़वा संतानों सैन्यवाद और साम्राज्यवाद” पर लगाम लगाने में संगठित मजदूरों की भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने “मजदूरों को संगठित करने और उनमें वर्ग-चेतना लाने” की बात का भी समर्थन किया लेकिन ब्रिटिश सरकार के संबंध में उन्होंने कहा कि “मजदूरों को न तो उनका समर्थन करना चाहिए न विरोध.”

ऐटक के पहले महासचिव दीवान चमन लाल ने इस मौके पर जारी किए गए “भारतीय मजदूरों के घोषणापत्र” में “भारत के मजदूरों” का आह्वान किया कि वे “अपने देश के भाग्य विधाता के रूप में अपने अधिकारों को हासिल करें.” घोषणापत्र में मजदूरों से कहा गया कि उन्हें राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा होना ही चाहिए और “सभी कमजोरियों पर जीत हासिल करते हुए सत्ता और स्वतंत्रता के रास्ते पर बढ़ना चाहिए.” वही ऐटक के उपाध्यक्ष जोसफ बपतिस्ता ने “साझेदारी के उच्च आदर्शों का बखान” करते हुए इस बात पर जोर दिया कि मिल मालिक और मजदूर “साझीदार और सहकर्मी हैं, न कि श्रम के क्रेता और विक्रेता.”

bombey cranical
      बॉम्बे क्रानिकल, 4 नवम्बर 1920

 

ऐटक का दूसरा सम्मेलन बिहार में धनबाद जिले की झरिया कोयला नगरी में 30 नवम्बर से 2 दिसम्बर 1921 तक चला. (बीसीसीएल के अंधाधुंध और त्रुटिपूर्ण कोयला खनन के कारण मजदूर वर्ग के इस ऐतिहासिक केंद्र का अस्तित्व अब खतरे में पड़ चुका है. इसी शहर में 1928 को हुए ऐटक के नवें सम्मेलन में भारत को समाजवादी गणतंत्र बनाने का संकल्प लिया गया था). दूसरे सम्मेलन में भारतीय श्रमिकों और आम जनता के लक्ष्य के बारे में कहीं ज्यादा जोर देकर बातें रखी गई. सम्मेलन में ऐलान किया गया “समय आ गया है कि जनता की स्वरान्ज हासिल हो.” झरिया अधिवेशन एक अभूतपूर्व घटना थी. मजदूरों के इस अभूतपूर्व शक्ति प्रदर्शन में करीब 50,000 लोग शरीक हुए. उनमें से ज्यादातर लोग आस-पास के कोयला खनिक या दूसरे उद्योगों के मजदूर और उनके परिजन थे.

मजदूर वर्ग और ऐटक के प्रति गांधी का उपेक्षा भावः

कुछ हलकों में गांधी को भारतीय मजदूर आंदोलन का भी जनक माना जाता है. यह सच से बिल्कुल उलट है. 1918 में ही गांधी का अहमदाबाद में मजदूर वर्ग से साबका जरूर पड़ा था, लेकिन वे वहां मजदूरों को ट्रेड यूनियन में संगठित करने नहीं गये थे. अपने मित्र और कई कपड़ा मिलों के मालिक अंबालाल साराभाई और दूसरे मिल मालिकों के कहने पर उन्होंने वहां ‘प्लेग बोनस’ को लेकर चल रहे विवाद में हस्तक्षेप किया और 35 फीसदी वेतन वृद्धि के लिए मध्यस्थता की. वहां मिल-मालिक 20 फीसदी वेतन वृद्धि करना चाहते थे जबकि मजदूर 50 फीसदी वेतन वृद्धि की मांग कर रहे थे. 20 के दशक के बाद वाले वर्षों में जब देश भर के कपड़ा मजदूर वेतन बढ़ाने की मांग पर आंदोलन कर रहे थे तब गांधी ने अहमदाबाद के मजदूरों से अपील की कि मंदी के इस दौर में उन्हें अपने मालिकों को परेशान नहीं करना चाहिए. उनकी सलाह थी “वफादार नौकर वेतन लिए बगैर भी मालिक की सेवा करता है.”

उन्होंने ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त दिया और मजदूरों से कहा कि मालिकों को वे ट्रस्टी मानें और बातचीत के जरिये ही सभी विवादों का निबटारा करें. उन्होंने कपड़ा मजदूरों का जो संघ बनाया, उसका नाम इसी सोच के तहत ‘मजूर महाजन’ रखा. उनके साबरमती आश्रम के लिए अहमदाबाद के मिल मालिकों ने दिल खोलकर चंदा दिया. वही आश्रम के निर्माण का ज्यादातर कार्य हड़ताली मजदूरों को जुटाकर कराया गया.

सच तो यह है कि गांधी अपने अभियानों की योजना में भी अहमदाबाद के मजदूरों को ज्यादा अहमियत नहीं देते थे और न ही उन्होंने किसानों के पक्ष में मजदूरों को गोलबन्द करने की कोई खास कोशिश की. इसके बावजूद अहमदाबाद के मजदूरों ने एक-एक आना चंदा जुटाकर सूरत जिले के बारदोली में आंदोलनकारी किसानों के लिए 1,300 रुपये जुटाए. जलियांवाला बाग नरसंहार से चन्द दिनों पहले जब ब्रिटिश शासकों ने गांधी को दिल्ली या पंजाब में घुसने न देने का आदेश जारी किया, तो अहमदाबाद में हिंसक आंदोलन फूट पड़ा. 11और 12 अप्रैल 1919 के दो दिनों तक अहमदाबाद पर एक हद तक शहर के कपड़ा मजदूरों का कब्जा रहा. 51 सरकारी इमारतें फूंक दी गई और पास के शहर वीरमगाम में रेलवे स्टेशन और थाने में आग लगा दी गई. ब्रिटिश प्रशासन ने वहां मार्शल लॉ लागू कर दिया. सरकारी सूत्रों के मुताबिक सैनिक कार्रवाई में 28 जानें गई और 123 जख्मी हुए. अपने ही गढ़ अहमदाबाद में भड़के हिंसक आंदोलन से घबराए गांधी ने इसे अपनी “भयानक गलती” माना और तुरंत सत्याग्रह वापस ले लिया.

गांधी ने कभी-कभी दूसरे औद्योगिक केंद्रों में भी ट्रस्टीशिप और सौहार्दपूर्ण समझौते के अहमदाबाद मॉडल की तर्ज पर मजदूरों को संगठित करने की बात की. लेकिन शायद वे भांप गए थे कि ऐसी कोशिशों को नाकाम हो होना था, अतः उन्होंने कभी ऐसे प्रयोग पर जोर नहीं दिया. दरअसल उन्होंने ऐटक के गठन या उसके मार्गदर्शन के लिए कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शायद गांधी ही ऐसे अपवाद थे जिन्होंने उस प्रारम्भिक दौर में भी खुद को ऐटक से बिल्कुल अलग रखा था जब ट्रेड यूनियन आन्दोलन में कम्युनिस्ट कोई खास ताकत नहीं बन सके थे. शायद उनकी यह उपेक्षा इस आशंका से उभरी थी कि अखिल भारतीय पैमाने पर मजदूर वर्ग के संगठित हो जाने से कांग्रेस के नेतृत्व में बने सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों और वैचारिक प्रवृत्तियों के गठबंधन में मौजूद गांधीवादी संतुलन बिगड़ जायेगा.

मजदूर आन्दोलन कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर बढ़ा

मजदूर वर्ग के सभी बड़े केंद्रों में 1920 के दशक में राजनीतिक सक्रियता तेजी से बढ़ी. मजदूर आंदोलनों के नक्शे में नए-नए राज्य जुड़े. मई 1921 में असम के चाय बागानों में, खासकर सुरमा घाटी के चारगोला में मजदूरों का एक जबर्दस्त उभार नजर आया जिसके फलस्वरूप लगभग 8,000 मजदूर घाटी से बाहर चले गए. दरंग और शिवसागर जिले के चाय बगानों से भी दिसम्बर 1921 में छिटपुट संघर्षों की खबरें आती रही. बंबई, कलकत्ता और मद्रास के मजदूरों ने प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन के खिलाफ 17 नवंबर 1921 में हुई देशव्यापी हड़ताल को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके पहले ही मद्रास के बकिंघम ऐंड कर्नाटक मिल्स में जुलाई से अक्टूबर तक चार महीने की हड़ताल चल चुकी थी. इस हड़ताल के खिलाफ पुलिस कार्रवाईयों में सात मजदूरों की जानें गई. मई 1923 को मद्रास के बुजुर्ग वकील और मजदूर नेता सिंगारवेलु चेट्टियार ने मद्रास समुद्र तट पर भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर मई दिवस समारोह आयोजित किया. गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को बीच-बीच में रोकते जाना सिंगारवेलु को अपसंद था. वे आगे चलकर देश के शुरुआती कम्युनिस्ट नेताओं में से एक बने. अप्रैल से लेकर जून 1925 तक उत्तरी रेलवे में बड़ी हड़ताल हुई. बंबई में थोड़ी-थोड़ी अवधि के बाद कपड़ा मिलों में हड़तालें होती रहीं.

इसी दौरान भारतीय मजदूर वर्ग आंदोलन में कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रवेश होता है. भारतीय प्रवासियों के साथ ही देश के अंदर भी कम्युनिस्ट समूह काम करने लगे. 26 दिसंबर1925 को देश में सक्रिय विभिन्न कम्यूनिस्ट समूहों के लोग कानपुर में जुटे और औपचारिक तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ. 1920 के दशक में कम्युनिस्ट लोग कांग्रेस के अलावा मजदूर-किसान पार्टी जैसे संगठनों के जरिये काम करते रहे. ऐसी पार्टियां बंगाल, बम्बई, पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में काफी सक्रिय और लोकप्रिय हुई. पंजाब में इस पार्टी का नाम किरती किसान पार्टी था, जिसका गठन अमृतसर के जलियांवाला बाग में, वहां हुए जघन्य नरसंहार की नवीं बरसी पर हुआ.

मजदूरों ने कहा ‘संपूर्ण आजादी चाहिए’

m singervelu
एम सिंगारवेलु

मजदूर वर्ग के आंदोलन की बढ़ती लहर पर काबू पाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1926में एक ऐसा ट्रेड यूनियन ऐक्ट लागू किया जिसके जरिये मजदूर आन्दोलनों पर काफी पाबंदियां लगा दी गई. मसलन सभी अपंजीकृत ट्रेड यूनियनों को एक तरह से अवैध करार दिया गया और यूनियनों पर राजनीतिक उद्देश्य के लिए चंदा इकट्ठा करने पर रोक लगा दी गई. विडबना यह है कि इसके ठीक उलट ब्रिटेन में ट्रेड यूनियनें ही लेबर पार्टी का आधार थी और देश की राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. लेकिन यह प्रतिक्रियावादी और पाखंडी कानून भी मजदूर आंदोलनों के उमड़ते ज्वार को रोक नहीं पाया.

बंबई के 20,000 मजदूरों ने सिर्फ गोरे सदस्यों वाले साइमन कमीशन के खिलाफ फरवरी 1928 में सड़कों पर मोर्चा निकाला. 1928 में लिलुआ रेल वर्कशॉप के मजदूरों ने जनवरी से जुलाई तक एक बड़े किस्म का संघर्ष चलाया. 18 अप्रैल से सितम्बर 1928 तक टिस्को के मजदूर एक लम्बी हड़ताल पर रहे. अप्रैल से अक्तूबर 1928 तक बंबई में एक बार फिर कपड़ा मजदूरों की बड़ी लम्बी हड़ताल चली. जुलाई 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे में थोड़े समय के लिए लेकिन जोरदार हड़ताल हुई. इसके नेता सिंगारवेलु और मुकंदलाल सरकार को कैद की सजा हुई जबकि एक हड़ताली मजदूर पेरुमल को काला पानी भेज दिया गया. मजदूर वर्ग का सबसे शानदार हस्तक्षेप कलकत्ते में रहा, जब दिसंबर 1928 को बंगाल की मजदूर किसान पार्टी के नेतृत्व में हजारों मजदूर कांग्रेस अधिवेशन में प्रवेश कर दो घंटे तक पंडाल में जमे रहे और उन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग का प्रस्ताव पारित किया.

अल्लूरि सीताराम राजू से भगत सिंह तक : ईकलाब जिन्दाबाद

आंध्र प्रदेश में 1920 के दशक के प्रारंभ में किसान छापामार युद्ध का एक बेहतरीन मिसाल देखने को मिली. अगस्त 1922 से मई 1924 तक अल्लूरि सीताराम राजू और सैकड़ों आदिवासी किसान छापामार योद्धाओं ने गोदावरी एजेंसी क्षेत्र के करीब 2500 वर्ग मील पहाड़ी क्षेत्र में ब्रिटिश राज को प्रभावी चुनौती दी. सटीक हमलों और थानों पर कारगर छापामारी में सिद्धहस्त होने के कारण राजू को नाखुश अंग्रेज भी दमदार छापामार रणनीतिज्ञ मानते थे. इस विद्रोह को दबाने के लिए मद्रास सरकार ने 15 लाख रुपये खर्च किए और मालावार स्पेशल पुलिस और असम रायफल्स को अभियान में लगाया. राजू को आखिरकार तालाब में नहाते वक्त पकड़ लिया गया. ब्रिटिश प्रशासन ने भारी जुलम ढाने के बाद 6 मई 1924 को इस महान योद्धा को गोली मार दी. संयोगवश भारत की आजादी की 50 वीं वर्षगांठ पर ही इस महान किसान क्रांतिकारी की जन्म शतवार्षिकी है.

alluri
        अल्लूरि सीताराम राजु

एक ओर जहां अल्लूरि सीताराम राजू आजादी के लिए ग्रामीण गरीबों द्वारा जुझारू हथियारबंद संघर्ष चलाने के साहस व क्षमता का प्रतीक बने, वही भगत सिंह ने कहीं ज्यादा सार्थक एक ऐसी आजादी की उम्मीदें जगाई जो हमें नसीब हो सकती थी. सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में अपने साथियों की एक मीटिंग में उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एच.एस.आर.ए.) का गठन किया. अपनी शुरुआती कार्रवाई में एच.एस.आर.ए. ने दिसंबर 1928 में लाहौर में पुलिस अधिकारी सैंडर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय पर हुए जानलेवा हमले का बदला लिया. 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के खिलाफ हुए एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस की लाठियों से लाजपत राय गंभीर रूप से जख्मी हुए और 17 नवंबर को उन्होंने दम तोड़ दिया. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को विधान सभा में बम फेंका. उस समय विधान सभा में मजदूर विरोधी ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल और एक अन्य विधेयक पर चर्चा चल रही थी, जिसमें ब्रिटिश कम्युनिस्टों और भारतीय स्वतंत्रता के दूसरे समर्थकों के भारत आने पर रोक लगाने का प्रावधान था.

एच.एस.आर.ए. के झंडे तले इन चुनिंदा आतंकवादी कार्रवाइयों के अलावा भगत सिंह और उनके साथियों ने खुलेआम काम करने वाले एक संगठन नौजवान भारत सभा का भी गठन किया. जेल में फांसी का इंतजार करते हुए भगत सिंह ने मार्क्सवाद का सिलसिलेवार ढंग से अध्ययन किया और “मैं नास्तिक क्यों हूं” समेत कई महत्वपूर्ण लेख लिखे. भगत सिंह के क्रांतिकारी आतंकवादी से मार्क्सवादी में रूपान्तरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि यह बदलाव महज विचारधारा के धरातल पर नहीं था बल्कि भारतीय समाज का गहन विश्लेषण करके उसके रूपान्तरण के लिये एक संपूर्ण क्रांतिकारी कार्यक्रम तैयार करने के तमाम लक्षण भी इस प्रक्रिया में दिखाई पड़े थे.

अगाध देशभक्ति, दृढ़ निश्चय, क्रांतिकारी वीरता और जबर्दस्त नेतृत्व क्षमता से लैस भगत सिंह में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का क्रांतिकारी ध्रुव बनने और गांधी-नेहरू के राजनीतिक वर्चस्व को जानदार चुनौती देने की क्षमता मौजूद थी. कांग्रेस ने इस महान क्रांतिकारी की जान बचाने के लिए महज नाम मात्र की कोशिश की, लेकिन जनता के दिलों में निर्विवाद रूप से भगत सिंह और उनके साथी चन्द्रशेखर आजाद का नाम भारत की आजादी की लड़ाई के दो महानतम किवदंती नायकों के बतौर सुरक्षित है. चन्द्रशेखर आजाद ने कई बार ब्रिटिश पुलिस को झांसा दिया मगर अन्ततः इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस के साथ हुई एक अचानक मुठभेड़ में उन्होंने शहीदों की मौत धारण की. भगत सिंह का नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ इन्साफ, आजादी और लोकतंत्र के लिए भारत में चलने वाले हर संघर्ष का युद्धघोष बन गया है.

इन्कलाब जिन्दाबाद

बहरों को सुनाने के लिये ऊंची आवाज की जरूरत होती है. ऐसे ही एक अवसर पर फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियें द्वारा कहे गए इन अमर शब्दों के साथ हम अपनी इस कार्रवाई को दृढ़ता से जायज ठहराते हैं.

पिछले दस वर्षों के अपमानजनक इतिहास को दोहराए बिना ... हम बार-बार यही देखते हैं कि जब साइमन कमीशन से चन्द और छोटे-मोटे सुधारों की उम्मीद लगाए लोग अपेक्षित लाभ के बंटवारे पर झगड़ रहे हैं, तो सरकार हम पर पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल जैसे नए-नए दमनकारी कानून लाद रही है, जबकि प्रेस सेडिशन बिल अगले सत्र के लिए सुरक्षित रखा गया है. खुले तौरपर काम कर रहे मजदूर नेताओं की निर्विचार गिरफ्तारी साफ दिखा रही है कि हवा का रुख किस ओर है. इन अत्यंत उत्तेजक स्थितियों में हिंदुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी ने पूरी संजीदगी के साथ अपनी जिम्मेवारी को मुकम्मिल तौर पर समझते हुए अपने सेनादल को इस खास कार्रवाई को अंजाम देने का निर्देश दिया है जिससे इस अपमानजनक प्रहसन को बन्द किया जा सके. ...

जन प्रतिनिधि अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में वापस लौटें और जनसमुदाय को आसन्न क्रांति के लिये तैयार करें, और सरकार को भी यह बता दिया जाय कि असहाय भारतीय जनता की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के खिलाफ प्रतिवाद करते हुए तथा लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या का विरोध करते हुए हम इतिहास द्वारा बार-बार दोहराए गए इस सबक पर जोर देना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति को तो मार देना आसान है मगर इससे उस व्यक्ति के विचारों की आप हत्या नहीं कर सकते. बड़े-बड़े साम्राज्यवाद ढह चुके हैं, किन्तु विचार जीवित रहे हैं. ... बूर्बों राजवंशियों और जारों का पतन हो गया, जबकि इन्कलाब का कारवां विजयपूर्वक उनके सिरों के ऊपर से गुजर गया ... इन्कलाब जिन्दावाद !

(8-4-1929 को लेजिस्लेटिव असेम्बली पर बम फेंकते समय भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा जारी किए गए पर्चें से संक्षिप्त अंश.)

lahore
टाइमस ऑफ इंडिया, 9 अप्रैल, 1929

लाहौर अदालत में लेनिन दिवस

आज लाहौर षड़यंत्र केस की कार्रवाई शुरू होने से पहले अदालत में घुसते वक्त सभी अठारह आरोपी, जिन्होंने अपने गलों में लाल रूमाल बांधे हुए थे, “इकलाब जिन्दाबाद”, “कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल जिन्दाबाद”, “लेनिन अमर रहे”, “सर्वहारा जिन्दाबाद” और “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” के नारे लगाते हुए कठघरों में अपनी जगह पर पहुंचे.

भगत सिंह ने मेजिस्ट्रेट को सूचित किया कि वह और उनके साथ के अन्य आरोपी लेनिन दिवस मना रहे हैं. भगत सिंह ने उनसे अनुरोध किया कि वे अपने खर्च पर मास्को में तीसरे इन्टरनेशनल के अध्यक्ष के पास निम्नलिखित सन्देश भिजवा दें: लेनिन दिवस के उपलक्ष्य पर हम कामरेड लेनिन के उद्देश्य के विजयपूर्ण अभियान के प्रति बिरादराना अभिनन्दन व्यक्त करते हैं. हम सोवियत रूस द्वारा किये जा रहे महान प्रयोग की पूर्ण सफलता की कामना करते हैं. हम विश्व क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ जुड़ने की आकांक्षा व्यक्त करते हैं. श्रमिक सैन्यदल की विजय हो. पूंजीपतियों का नाश हो. साम्राज्यवाद मुर्दाबाद.

- हिन्दुस्तान टाइम्स, 26 जनवरी 1930

 

मेरठ ‘षड्यंत्र’ और सविनय अवज्ञा आन्दोलन

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया गया. उसी दौरान 31 कम्युनिस्ट नेता और संगठक मेरठ षड्यंत्र कांड नाम का एक झूठा मुकदमा झेल रहे थे. गिरफ्तार किए गये नेताओं में ब्रिटेन के तीन कम्युनिस्ट -- बेंजामिन फ्रांसिस ब्रेडले, फिलिप स्प्रैट और लेस्टर हचिंसन भी शामिल थे. भारतीय मजदूर वर्ग को संगठित करने के सांझा मिशन में भारतीय कामरेडों के साथ ये कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे. कम्युनिस्टों ने भारत में ब्रिटिश राज के असली रूप को उजागर करने और क्रांति तथा आजादी के कम्युनिस्ट लक्ष्य को प्रचारित करने के लिए इस मुकदमे की सुनवाई का बखूबी इस्तेमाल किया. इस मुकदमे का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ और ब्रिटिश ट्रेड यूनियनों तथा अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन के दबाव में हाईकोर्ट को निचली अदालतों द्वारा दी गयी लंबी कैद की सजाओं में कटौती करनी पड़ी.

meroth
बॉम्बे क्रानिकल, 21 मार्च 1929

 

इसी दौरान राजनीतिक जन-आंदोलन का दूसरा बड़ा गांधीवादी प्रयोग सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था. कांग्रेस के अंदर पूर्ण स्वराज के लिए निर्णायक संघर्ष छेड़ने का दबाव बढ़ रहा था. गांधी ने 31 जनवरी 1930 को ब्रिटिश शासकों को 11-सूत्री अल्टीमेटम दिया. इस मांग पत्र में पूर्ण आजादी की बात तो दूर, भारत के लिए स्वतंत्र उपनिवेश के दर्जे (डोमिनियन स्टैटस) की मांग को भी शामिल नहीं किया गया. गांधी ने इन 11 मांगों को इस आधार पर जायज ठहराया कि इससे आंदोलन का विस्तार होगा और समाज के विभिन्न तबके उसमें शामिल होंगे. उनमें से पांच तो आम लोकतांत्रिक मांगे थी. (हां. उनमें गांधीवादी रुझान जरूर मौजूद था) : सैनिक खर्च और सिविल सेवा के वेतनों में 50 फीसदी कटौती, पूर्ण शराबबंदी, तमाम राजनीतिक बंदियों की रिहाई, सीआईडी में सुधार और हथियारों के लाइसेन्स पर जन-नियंत्रण कायम करने के लिए आर्म्स ऐक्ट में संशोधन. तीन मांगें खास तौर पर भारतीय पूंजीपतियों के हितों से संबंधित थीं : रुपया-पौंड स्टर्लिंग विनिमय दर को घटाना, भारतीय कपड़ा उद्योग का संरक्षण और तटीय नौ-परिवहन में भारतीयों के लिए आरक्षण. बाकी दो मांगें भूस्वामी किसानों के लिए थीं : लगान की दर में 50 फीसदी कटौती और नमक कर तथा नमक बनाने पर सरकार के एकाधिकार की समाप्ति. इस मांग पत्र में अगर कोई चीज सिरे से गायब थी तो वह थी मजदूरों और गांवों के भूमिहीनों के हित में कोई मांग.

शोलापुर कम्यून व चटगांव शस्त्रागार पर हमला

औद्योगिक मजदूरों और गांवों के भूमिहीनों के प्रति इस खास किस्म के गांधीवादी उपेक्षाभाव के बावजूद इन वर्गों के लोगों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में जमकर हिस्सा लिया. गांधी ने अपने आश्रम के 71 अनुयाइयों के साथ 12 मार्च से 6 अप्रैल तक बहुचर्चित डांडी मार्च सम्पन्न किया. नमक जैसा सीधा-सादा मुद्दा जनता की गोलबंदी का सशक्त आधार साबित हुआ और शीघ्र ही यह आन्दोलन देश भर में फैल गया. अप्रैल के मध्य में नेहरू की गिरफ्तारी के खिलाफ कलकत्ते के पास बजबज में पुलिस और जनता के बीच झड़पें हुईं. बंगाल के जूट मिल मजदूरों का जोश उन दिनों उफान पर था. महज एक साल पहले एक उन्होंने एक बेहद कामयाब हड़ताल के जरिये प्रति हफ्ते काम के घंटे 54 से बढ़ाकर 60 करने की मिल मालिकों की कोशिश को करारी शिकस्त दी थी. कलकत्ते के यातायात कर्मियों ने भी एक जूझारु आन्दोलन छेड़ा. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के पेशावर में भी बड़ा जन-उभार आया. 23 अप्रैल 1930 को खान अब्दुल गफ्फार खां (सीमान्त गांधी) और दूसरे नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ पेशावर में 10 दिनों तक बलवा जारी रहा और आखिरकार 4 मई को मार्शल लॉ लगा दिया गया. चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल रेजिमेन्ट की टुकड़ी ने शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया. इस घटना ने लड़ाकू जनता और सशस्त्र फौजों के बीच एक नई एकता की राह खोल दी. कराची के बंदरगाह कर्मी और मद्रास के चूलै मिल के कर्मचारी भी आन्दोलन में उतर आए थे.

सूर्य सेन की अपील

क्रांति के अजीज सिपाहियो,

भारत में क्रांति के जिम्मेवारी इण्डियन रिपब्लिकन आर्मी के कन्धों पर आ पड़ी है.

हम चटगांव की क्रांतिकारियों को अपने राष्ट्र की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये क्रांति के देशभक्तिपूर्ण उद्देश्य की ओर कूच करने का सम्मान हासिल हुआ है.

मैं, इण्डियन रिपब्लिकन आर्मी की चटगांव शाखा का अध्यक्ष सूर्य सेन घोषणा करता हूँ कि रिपब्लिकन आर्मी की चटगांव में मौजूद परिषद अपने-आपको निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा करने के लिए अस्थायी क्रांतिकारी सरकार के बतौर संगठित करती है.

1. आज हासिल विजय की रक्षा करना और उसे कायम रखना;
2. राष्ट्रीय मुक्ति के लिये सशस्त्र संघर्ष को तीव्र करना और उसका विस्तार करना;
3. अपने अन्दर मौजूद दुश्मन एजेंटों का दमन करना;
4. अपराधियों और लुटेरों पर अंकुश लगाना;
5. यह अस्थायी क्रांतिकारी सरकार बाद में जैसा निर्णय ले उसके अनुसार कार्रवाई करना.

यह अस्थायी क्रांतिकारी सरकार चटगांव के तमाम सच्चे सपूतों और सुपुत्रियों से पूर्ण आनुगत्व, वफादारी और सक्रिय सहयोग की आशा करती है और उसकी मांग करती है.
हमारे पवित्र मुक्तियुद्ध की विजय में पूर्ण विश्वास के साथ,
ब्रिटिश लुटेरों के प्रति कोई दया नहीं! गद्दारों और लुटेरों का नाश हो !
अस्थायी क्रांतिकारी सरकार जिन्दाबाद !

--10 अप्रैल 1930 को चटगांव की सशस्त्र कार्रवाई के पहले दौर के बाद सूर्य सेन द्वारा जारी की गई अपील

surya sen

 

4 मई को गांधी की गिरफ्तारी के बाद इस उभार का चरम बिन्दु शोलापुर में देखने को मिला. वहां की तमाम कपड़ा मिलों के मजदूर 7 मई से हड़ताल पर चले गए. 16 मई को मार्शल लॉ लगाए जाने के पहले तक पूरा शहर एक तरह से मजदूरों के कब्जे में रहा. शराब की दुकाने फूंक दी गई और पुलिस चौकियों, अदालतों, पालिका भवनों और रेलवे स्टेशनों पर हमले हुए. शहर में एक किस्म की समानान्तर सरकार चली और पूरे देश में यह ‘शोलापुर के कम्यून’ के नाम से मशहूर हुआ.

इस बीच बंगाल में क्रांतिकारी आतंकवाद नई ऊंचाइयां छू रहा था. “मास्टर-दा” सूर्यसेन के नेतृत्व में चटगांव के क्रांतिकारियों के एक जत्ये ने स्थानीय शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया. उन्होंने इण्डियन रिपब्लिकन आर्मी के नाम से स्वाधीनता की घोषणा भी जारी कर दी. चटगांव के क्रांतिकारियों में प्रीतिलता वाद्देदार और कल्पना दत्त सरीखी क्रांतिकारी युवतियों की भूमिका महत्वपूर्ण थीं. 8 दिसम्बर 1930 को विनय, बादल और दिनेश की मशहूर त्रिमूर्ति ने कलकत्ते की रायटर्स बिल्डिंग मुख्यालय पर हल्ला बोल दिया.

गोलमेज सम्मेलन से प्रान्तीय सरकारों तक

सविनय अवज्ञा आन्दोलन को देश भर में व्यापक समर्थन मिला. इसी बीच ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने नई संवैधानिक व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा शुरू की. लंदन में जनवरी 1931 में हुए पहले गोलमेज सम्मेलन का गांधी और कांग्रेस ने बहिष्कार किया. गांधी ने देश को भरोसा दिलाया कि लक्ष्य हासिल होने तक आन्दोलन चलता रहेगा. लेकिन अपने ही कहे से पीछे हटने में गांधी को देर नहीं लगी. 5 जनवरी 1931 को गांधी ने वायसराय इर्विन के साथ लगभग पहले गोलमेज सम्मेलन की ही शर्तों पर एक समझौते पर दस्तखत कर दिये.

इतिहासपरक अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है कि मुख्यतः शान्तिपूर्ण मोलतोल और संवैधानिक भागीदारी के लिए भारतीय पूंजीपति वर्ग द्वारा डाले जा रहे दबाव की वजह से ही गांधी ने यह समझौता किया था. गांधी अक्टूबर 1931 में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शरीक हुए. लेकिन जब उसका कोई नतीजा न निकला तो गांधी ने जनवरी 1932 में सचिनय अवज्ञा आन्दोलन के दूसरे दौर का आह्वान किया. लेकिन प्रशासन चौकस था. सभी प्रमुख लेता गिरफ्तार कर लिए गए और जबर्दस्त दमन चला. 1932 के उत्तरार्ध में गांधी ने अपने कदम पुनः वापस खीच लिए और हरिजन कल्याण पर जोर देना शुरू किया. हालांकि इस बदली हुई प्राथमिकता की वजह से वे अंग्रेजों द्वारा “अछूतों” को एक अलग निर्वाचक मंडल बना देने के प्रयास को विफल कर पाए. इस मुद्दे पर उन्होंने आमरण अनशन शुरू कर दिया और अन्ततः सवर्ण तथा “अछूत” नेताओं के बीच समझौता कराने में कामयाब हुए. इस  समझौते को पूना पैक्ट नाम से जाना जाता है. इस सन्धि के तहत मतदाताओं का सवर्ण और “अछूत” के बीच बटवारा नहीं हुआ. बदले में “अछूतों” के लिए सीटें रिजर्व कर दी गई जो अंग्रेजों द्वारा पहले किए गए वादे से कुछ ज्यादा थी.

gandhi_0
एक भारतीय व्यंगचित्रकार की नजर में गांधी-हर्विन समझौता, 1931

गांधी के अचानक उमड़े हरिजन प्रेम से इस महत्वपूर्ण सामाजिक आधार में कांग्रेस की धाक जम गई जो हाल के दिनों तक कायम रही. लेकिन इस मोर्चे पर उनका काम समाज सुधार और मानवतावादी कार्यों तक ही सीमित रहा. उन्होंने वर्ण व्यवस्था पर कोई चोट नहीं की और न ही तथाकथित अछूतों और निचली जातियों के बुनियादी सामाजिक-आर्थिक हितों पर कोई ध्यान दिया. गांधी एक ओर हरिजन कल्याण का कार्य करते रहे और दूसरी ओर समाज को पीछे धकेलने वाली वर्णाश्रम व्यवस्था के पक्षधर बने रहे. इस मुद्दे पर अम्बेडकर का उनसे तीखा विरोध था. महाराष्ट्र में इससे पहले ही ज्योतिबा फुले और पण्डिता रामाबाई द्वारा छेड़ा गया समाज सुधार आन्दोलन कहीं ज्यादा प्रगतिशील था. दक्षिण भारत में भी छुआछूत के खिलाफ आन्दोलन काफी रैडिकल तेवर के साथ कहीं ऊंचे एजेण्डे की ओर बढ़ा. तमिलनाडु में “पेरियार” ई.वी. रामास्वामी नायकर के “सेल्फ रेस्पेक्ट” (स्वाभिमान) आन्दोलन में खुलकर ब्राह्मणवाद की भर्त्सना की गई. परियार ने सोवियत संघ की प्रशंसा की और अपनी पत्रिका “कुडी अरासु” (गणराज्य) में सिंगारवेलु चेट्टियार के नास्तिक और समाजवादी लेखन को जगह दी. पड़ोसी राज्य केरल में श्री नारायण गुरू के नेतृत्व में एड़वा समुदाय के लिए मन्दिर प्रवेश का अधिकार मांगने से आगे बढ़कर व्यापक समाज सुधार के आन्दोलन की दिशा में चल पड़ा.

इस बीच कांग्रेस जन-आन्दोलनों के बजाय चुनाव और प्रान्तीय सरकारों में हिस्सेदारी पर जोर देने लगी. यह भारतीय पूंजीपति वर्ग के जड़ जमाने का दौर था. 1929-32 की भारी मंदी भारतीय पूंजीपतियों के लिए संकट के साथ-साथ एक बेहतर मौका भी ले आई. व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में पुराने औपनिवेशिक बन्धन ढीले पड़े. कपड़ों के मुकाबले गैर-पारंपरिक वस्तुओं का आयात बढ़ा. ब्रिटिश कम्पनियों द्वारा विभिन्न उद्योगों की शाखा इकाइयां खोलने से देश का औद्योगिक नक्शा बम्बई-अहमदाबाद क्षेत्र से आगे बढ़कर बंगाल और दक्षिण भारत तक फैल गया. नवजात भारतीय पूंजीपति वर्ग की इच्छा थी कि कांग्रेस आन्दोलन का रास्ता छोड़कर सरकार में हिस्सा ले, ताकि नए सरकारों का पूरा लाभ मिल सके.

ब्रिटिश संसद ने अगस्त 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट पारित किया. हालांकि इस कानून में कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन और गोलमेज सम्मेलनों के दौरान उठाई गई न्यूनतम मांगों को भी पूरा नहीं किया गया था. इसके बावजूद उसने नए कानून के आधार पर 1937 में हुए चुनावों में हिस्सा लिया. कांग्रेस को 11 में से 5 प्रांतों (मद्रास, बिहार, उड़ीसा, केन्द्रीय प्रान्त और संयुक्त प्रांत) में पूर्ण बहुमत मिला. हालांकि बम्बई, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में और आखिरकार असम में भी उसे सरकार बनाने में कामयाबी मिली.

प्रांतों में कांग्रेसी शासनः पूत के पांव पालने में

प्रांत में 27 महीने के कांग्रेसी शासन से स्पष्ट संकेत मिलने लगे कि उसके नेतृत्व वाले सामाजिक गठबंधन का चरित्र कितना अनुदारवादी है. इधर ऐटक और अखिल भारतीय किसान सभा (लखनऊ में अप्रैल 1936 को स्वामी सजहानन्द सरस्वती की अध्यक्षता में गठित) के अलावा कांग्रेस महासमिति के अधिवेशनों और बिहार तथा संयुक्त प्रांत की प्रदेश कांग्रेस समितियों में मजदूरों और किसानों के हित में कई लोकतांत्रिक मांगें पहले ही सूत्रबद्ध हो चुकी थी. मिसाल के तौर पर अप्रैल 1936 के किसान घोषणापत्र में जमींदारी उन्मूलन, 500रु. से अधिक की कृषि आमदनी पर क्रमवद्ध टैक्स, कर्जमाफी, लगान में 50 फीसदी की कटौती, सभी काश्तकारों को जमीन का मालिकाना हक, बेगार की समाप्ति और वनों पर आदिवासियों को उनके पारंपरिक अधिकारों की वापसी जैसी मांगे पेश की गई थी. लेकिन कांग्रेस की प्रान्तीय सरकारों ने इस दिशा में कोई भी महत्वपूर्ण कदम उठाने से इन्कार कर दिया. विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के कृषि सम्बंधी विधेयकों की मुख्य खासियत ही यह थी कि उनमें “जमीदारों को खास कोई तकलीफ न हो” इसका पूरा खयाल रखा गया था.

congress power
अखिल भारतीय किसान सभा के स्थापना सम्मेलन में (लखनऊ, 1936)
स्वामी सदजानन्द सरस्वती व अन्य नेतागण

जमीदारों द्वारा सितम्बर 1937 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ने से बिहार सरकार के प्रस्तावित काश्तकारी विधेयक को काफी नरम बना दिया गया. तीन ही महीने के अन्दर मौलाना आजाद और राजेन्द्र प्रसाद ने पटना में जमीदारों के साथ गुप्त सन्धि कर ली. वैसे संयुक्त प्रांत के अवध क्षेत्र में वैधानिक काश्तकारों को पुश्तैनी दखलकार का दर्जा मिल गया. बिहार में बकाश्त भूमि से बेदखल कर दिए गए दखलकार रैयत को आंशिक तौर पर फिर पुराना दर्जा मिला. बम्बई में चरागाह शुल्क समाप्त कर दिया गया तथा मद्रास में उसमें कटौती कर दी गई.

कांग्रेस ने ये सीमित कृषि सुधार भी जबर्दस्त किसान आन्दोलन के दबाव में किए. बिहार में तो कांग्रेस मंत्रिमंडल के तहत विधान सभा के पहले सत्र में ही किसान प्रदर्शनकारी सदन के अन्दर चले आए और उन्होंने कुर्सियां घेर ली. सहजानन्द सरस्वती का वामपंथ की ओर झुकाव बढ़ता गया और ‘डंडा हमारा जिन्दाबाद’ जैसे नारों के माध्यम से उन्होंने उग्र आन्दोलन की वकालत की. किसान सभा ने अक्टूबर 1937 में लाल झण्डे को अपने बैनर के तौर पर स्वीकार किया. मई 1937 में कुमिल्ला अधिवेशन में किसान सभा ने गांधीवादी वर्ग समन्वय की नीति को खारिज कर दिया और कृषि क्रांति को अपना लक्ष्य घोषित कर दिया. अप्रैल 1939 में गया अधिवेशन में भूमिहीन मजदूरों के साथ एकता का आह्वान किया गया.

कांग्रेस की प्रान्तीय सरकारों की यह विश्वासघाती भूमिका मजदूर मोर्चे पर और भी स्पष्ट रूप में सामने आई. बंगाल में तो कांग्रेस कार्यसमिति ने मार्च से मई 1937 तक हड़ताल पर रहे जूट मिल मजदूरों के साथ एकजुटता प्रदर्शित की और दमनकारी नीतियों के लिए फजलुल हक की गैर-कांग्रेसी सरकार की निन्दा की. लेकिन दूसरे प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें ऐसी ही नीतियों पर खुल कर अमल करती रहीं. असम में ब्रिटिश स्वामित्व वाली असम ऑयल कम्पनी में 1939 में हुई हड़ताल के दौरान एन. सी. बड़दोलोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने हड़ताल को कुचलने के लिये युद्धकाल के डिफेन्स ऑफ इण्डिया कानूनों का खुलकर इस्तेमाल होने दिया और बम्बई में कांग्रेसी सरकार ने नवम्बर 1938 में आनन-फानन में बाम्बे ट्रेड्स डिस्प्यूट्स ऐक्ट पारित कर दिया जो 1929 के कानून की अपेक्षा बदतर था. इसमें समझौता वार्ता को अनिवार्य बना दिया गया. इस तरह लगभग हर किस्म की हड़ताल को गैर-कानूनी बना दिया गया और गैर-कानूनी हड़तालों के लिए 3 महीने की जगह 6 महीने की कैद का प्रावधान कर दिया गया. बम्बई के गवर्नर ने इस ऐक्ट को “काबिले तारीफ” कहा. वहीं नेहरू को यह ऐक्ट “कुल मिलाकर ... अच्छा” लगा. अहमदाबाद के गांधीवादी मजदूर नेताओं के अलावा पूरे ट्रेड यूनियन आन्दोलन ने इस काले कानून का विरोध किया. 6 नवम्बर को बम्बई में 80,000 मजदूरों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया. इसे एस. ए. डांगे, इंदुलाल याज्ञिक और अम्बेडकर ने सम्बोधित किया. दूसरे दिन पूरे पात में आम हड़ताल रही.

दूसरा विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आन्दोलन

काफी समय से दूसरे विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी और आखिरकार 1939 के अन्त में यह भड़क उठा. वायसरॉय ने 3 सितम्बर 1939 को भारत को प्रान्तीय सरकारों और नेताओं की राय लिए बिना ब्रिटेन द्वारा जर्मनी के खिलाफ युद्ध घोषणा में भारत को भी जोड़ दिया. कोई विकल्प न देख कर कांग्रेस की 8 प्रांतीय सरकारों ने 29-30 अक्टूबर को इस्तीफा दे दिया.

विश्व युद्ध में भारत को झोंके जाने के खिलाफ जन भावनाओं के बावजूद कांग्रेस युद्ध के खिलाफ जोरदार अभियान चलाने के पक्ष में नहीं थी. रामगढ़ में मार्च 1940 को हुए अधिवेशन में कांग्रेस ने कहा कि “संगठन जब पर्याप्त मजबूत हो जायेगा तो सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ा जायेगा”. आखिरकार अक्टूबर 1940 में गांदी व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू करने पर राजी हुए. 17 अक्टूबर को विनोबा भावे जेल जाने वाले पहले सत्याग्रही थे. इसके बाद 31 अक्टूबर को नेहरू की बारी आई. इस आन्दोलन में कांग्रेस के नेताओं को युद्ध-विरोधी भाषण देकर व्यक्तिगत तौर पर गिरफ्तार होना था. गांधी के अब तक के आन्दोलनों में यह सबसे लचर और अनाकर्षक साबित हुआ.

1934 से ही प्रतिबंधित चल रही कम्युनिस्ट पार्टी ने ब्रिटेन द्वारा भारत को युद्ध में घसीटने के फैसले का विरोध किया. उस समय पार्टी ऐटक और किसान सभा सरीखे जन संगठनों और 30 के दशक में बनी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के झण्डे तले सक्रिय थी. युद्ध के खिलाफ सांझा वाम प्रतिरोध खड़ा करने के लिये सीपीआई ने अपनी पहल पर लेफ्ट कन्सॉलिडेशन कमेटी (वाम एकता कमेटी) बनाई. सुभाष चन्द्र बोस के संयोजकत्व में बनाई गई इस समिति में शामिल प्रमुख नेताओं में जयप्रकाश नारायण, पी.सी. जोशी, मानवेन्द्र नाथ राय, स्वामी सहजानन्द, एन.जी. रंगा आदि थे.

लेकिन 22 जून 1941 को सोवियत संघ पर जर्मनी की चढ़ाई के बाद समीकरणों में भारी बदलाव आया और विभिन्न राजनीतिक धाराओं के परस्पर-विरोधी नजरिये सामने आने लगे. वाम एकता कमेटी बिखर गई. सोवियत संघ की रक्षा और फासीवाद को परास्त करना कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्य कार्यभार बन गया. कांग्रेस के अन्दर नेहरू समर्थक खेमे को भी कमोबेश यही राय थी. दूसरी ओर सुभाष बोस ने भारत की ब्रिटिश सरकार को ठिकाने लगाने के लिये जर्मनी-जापान धुरी के साथ हाथ मिलाने की वकालत की. गांधी ने आश्चर्यजनक रूप से इस मोड़ पर काफी उग्र तेवर अख्तियार कर लिया.

गांधी की पहल पर कांग्रेस कार्यसमिति ने 8 अगस्त 1942 को मशहूर ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया और “बड़े-से-बड़े पैमाने पर अहिंसक जन आन्दोलन” छेड़ने का आह्वान किया. कांग्रेस नेतृत्व की तत्काल गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए ही यह बात जोड़ दी गई कि “आजादी चाहने वाले हर भारतीय को खुद ही अपना मार्गदर्शक बनना होगा”. गांधी ने इस मौके पर चर्चित “करो या मरो” का नारा दिया और इस भाषण में यहां तक कहा कि “अगर आम हड़ताल की नौबत आ भी गई तो मैं पीछे नहीं हटूंगा”. नेहरू ने सत्र में कहा, “गांधी जी की धारणा है कि युद्ध में जापान और जर्मनी की जीत होगी. यही धारणा अचेत रूप से अनके फैसलों को निर्धारित कर रही है”.

तमाम कांग्रेसी नेताओं को 9 अगस्त की सुबह गिरफ्तार कर दूसरी जगहों में ले जाया गया. अंग्रेजों ने भारी दमन चक्र चलाया और प्रतिरोध में सारे देश में हिंसक संघर्ष शुरू हो गया. इससे जाहिर है कि आखिरकार जिस घटना को महान “भारत छोड़ो आन्दोलन” के बतौर जाना जाता है, वह मुख्यतः एक स्वतःस्फूर्त विस्फोट था, जिसका नेतृत्व कुछेक इलाकों में भूमिगत समाजवादी नेताओं ने तथा स्थानीय स्तर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने संभाल रखा था. लगातार हड़तालों से बम्बई और कलकत्ता हिल उठे. दिल्ली में हड़ताली मजदूरों ने पुलिस से लोहा लिया और पटना में 11 अगस्त को सचिवालय के पास भारी झड़प के बाद दो दिनों के लिए शहर में अंग्रेजी राज का नियंत्रण समाप्त सा हो गया. टिस्को के मजदूरों ने राष्ट्रीय सरकार बनने तक काम पर जाने से मना कर दिया. 20 अगस्त से 13 दिनों तक टाटा स्टील में कामकाज ठप रहा. अहमदाबाद के कपड़ा मजदूरों ने साढ़े तीन महीने लम्बी हड़ताल की. मद्रास में पुलिस फायरिंग में बी एण्ड सी मिल्स के 11 मजदूर शहीद हो गए.

bharat chodo
1942 भारत छोड़ो आन्दोलन

भारत छोड़ो आन्दोलन के दूसरे चरण में गतिविधियों का केन्द्र बने गांव. बड़ी संख्या में छात्रों ने गांवों की ओर रुख किया. बड़े पैमाने पर टेलीफोन और तार की लाइनों को काट दिया गया और शक्तिशाली किसान आन्दोलन के ज्वार के बीच कई जगहों पर “राष्ट्रीय सरकार” का गठन हुआ. इनमें बंगाल के मेदिनीपुर जिले का तमलूक, महाराष्ट्र में सतारा और उड़ीसा में तालचर प्रमुख हैं. सरकारी आंकड़ों से भी उस आन्दोलन की व्यापकता और तीव्रता का अन्दाजा लगाया जा सकता है. 1943 के अन्त तक 91,836 लोग गिरफ्तार किए जा चुके थे. पुलिस और सेना की फायरिंग में 1,060 लोग मारे गए, विद्रोह को दबाने के क्रम में 63 पुलिस कर्मियों की जानें गई और 216 पुलिसकर्मी आन्दोलनकारियों के साथ मिल गए, जिनमें लगभग सभी बिहार से थे. 208 पुलिस चौकियों, 332 रेलवे स्टेशनों, 945 डाकघरों को नष्ट या बुरी तरह तहस-नहस कर दिया गया. बम विस्फोट की 664 घटनाएं हुईं जिनमें अधिकतर बम्बई में ही थी.

यहां यह स्वीकार करना जरूरी है कि जहां गांधी ने लोगों की बेचैनी का सही अन्दाजा लगाया और उसे प्रतिबिम्बित किया, वहीं कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति जन भावनाओं से बिल्कुल कटी हुई थी. जुलाई 1942 में पार्टी पर पाबन्दी हटा ली गई और मई 1943 में पार्टी का पहला महाधिवेशन (कांग्रेस) हुआ. लेकिन युद्धकाल की स्थितियों का पार्टी पर इतना जबर्दस्त असर था कि पहला महाधिवेशन पार्टी को कारगर हस्तक्षेप के लिए तैयार न कर सका. मजदूर मोर्चे पर कम्युनिस्टों ने तमाम हड़तालों का विरोध किया. कामरेड बी. टी. रणदिवे ने महाधिवेशन में “उत्पादन पर रिपोर्ट” प्रस्तुत की. इस रिपोर्ट में औपनिवेशिक भारत को मानो समाजवादी सोवियत संघ समझ लिया गया और यहां तक कि भारतीय मजदूर वर्ग की भूमिका को पंगु बना देने वाला यह बेतुका सिद्धान्त पेश किया गया : “मजदूरों की देशभक्ति और हमारे प्रचार से उनके बीच यह भावना पैदा होनी चाहिए कि राष्ट्र ने उन पर उत्पादन करने का पवित्र कार्यभार सौंपा है, और तमाम बाधाओं के बावजूद इस विश्वास को निभा कर ही वे काम की स्थितियों में बेहतरी और वेतन भत्ते में बढ़ोत्तरी के लिये राष्ट्र से अपील कर सकते हैं, और ऐसा करके ही वे राष्ट्र के साथ एकरूप हो सकते हैं”.

उथल-पुथल भरे चौथे दशक की शान और शर्म

भारत छोड़ो आन्दोलन कांग्रेस का आखिरी जन आन्दोलन था. फासीवाद की हार के साथ ही दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ. नई स्थिति में ब्रिटिश उपनिवेशवाद काफी कमजोर पड़ चुका था. भारत छोड़ो आन्दोलन जैसे जन उभार का दुहराव रोकने और भारत में अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा के उद्देश्य से अंग्रेजों ने तुरंत ही सत्ता के हस्तांतरण के लिए बातचीत की प्रक्रिया शुरू कर दी. भारतीय पूंजीपति भी जल्द-से-जल्द सत्ता हथियाना चाहते थे क्योंकि उन्हें डर था कि इसमें जितनी देर होगी, आजाद भारत के शक्ति संतुलन में मजदूर वर्ग और कम्युनिस्टों का कद उतना ही ऊंचा हो आयेगा. ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और उनके भावी भारतीय उत्तराधिकारियों के लिये क्रांति एक वास्तविक खतरा बन चुकी थी.

bengal
                 बंगाल में अकाल, जैनुल अवेदिन का समकालीन लेखांकन

लेकिन पंजाब और बंगाल के आम मुस्लिमों के बीच कांग्रेस काफी समय से अलग-थलग पड़ चुकी थी. दूसरी ओर बातचीत के कई दौर के जरिये मुस्लिम लीग अपनी स्थिति मजबूत कर चुकी थी और यकीनन फूट डालो और राज करो की नीति में निपुण अंग्रेज शासकों से उन्हें बढ़ावा भी मिला था. इस तरह सत्ता के हस्तांतरण के लिए चल रही बातचीत की तार्किक परिणति अनिवार्यतः मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान के निर्माण की ओर बढ़ चली. कांग्रेस के हर नेता को अहसास था कि देश का विभाजन तय है. यह अजीव विडम्बना रही कि “कांग्रेस के डिक्टेटर” के बतौर मशहूर गांधी, जनता को जगाने और नियंत्रित करने की जादुई क्षमता के लिए मशहूर गांधी, इतिहास के इस निर्मम मोड़ पर विरोध में बस अकेले-के-अकेले रह गए.

विभाजन को टालने का एकमात्र उपाय शायद यह था कि पूरी चर्चा की धारा को मोड़ दिया जाता और शक्ति संतुलन को बदल दिया जाता. ऐतिहासिक दृष्टि से यह असंभव नहीं था और कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए सिलसिलेवार जन उभारों से वाकई यह उम्मीद बंधी थी. 1942 की भूल के कारण हुए अलगाव के बाद कम्युनिस्टों ने जल्द ही बड़े पैमाने पर आन्दोलनात्मक कार्यवाहियां शुरू कर दी. 1943 के भयंकर अकाल के दौरान कम्युनिस्ट पूरी लगन और निष्ठा के साथ राहत कार्यो में जुटे रहे. राहत कार्यों और बाद के आन्दोलनों में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों की संस्था भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की भूमिका शानदार रही.

साम्प्रदायिक तनाव के माहौल में जब लगभग तमाम जमे-जमाए नेता सत्ता में अपने हिस्से के लिए गिद्ध-दृष्टि जमाए थे तब लाल झण्डा थामे मेहनतकश अवाम ही साम्प्रदायिक सौहार्द तथा धर्मनिरपेक्षता, निस्वार्थ बलिदान और साम्राज्यवाद-विरोधी प्रगतिशील राष्ट्रवाद के उसूलों को बुलन्द किये हुए थी.

आई.एन.ए. मामले की सुनवाई और बम्बई का नौसेना विद्रोह

INA case
आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेडिमेंट की प्रशिक्षण लेती महिलाएं,
इनसेट में रेडिमेंट की कमाण्डर कैप्टन लक्षमी स्वामीनाथन

दूसरे विश्व युद्ध के अन्तिम चरण में 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने जापानी नियन्त्रण वाले सिंगापुर से “दिल्ली चलो” का मशहूर नारा दिया. उन्होंने आजाद हिन्द सरकार और इण्डियन नेशनल आर्मी (आई.एन.ए.) की स्थापना की घोषणा की. जापान द्वारा कैदी बनाए गए 60,000 भारतीय युद्ध बन्दियों में से लगभग 20,000 को गोलबन्द करके आई.एन.ए. की स्थापना हुई. 1944 में मार्च और जून महीने के बीच आई.एन.ए. की टुकड़ियां जापानी फौज के साथ इम्फाल तक पहुंची. लेकिन यह अभियान सैनिक दृष्टि से असफल रहा, हालांकि आम भारतीय जन-मानस पर इसका जबर्दस्त असर पड़ा.

ब्रिटिश शासकों ने नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आई.एन.ए. के बन्दियों की सार्वजनिक सुनवाई शुरू की. कलकत्ता में इसका जोरदार विरोध शुरू हुआ. 20 नवम्बर को कलकत्ता के छात्रों ने आई.एन.ए. के बन्दियों को रिहाई की मांग पर रात भर प्रदर्शन किया. इस दौरान पुलिस फायरिंग में दो छात्र शहीद हुए. हजारों टैक्सी ड्राइवर और ट्राम तथा नगर-निगम के कर्मचारी छात्रों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर सड़क पर उतर पड़े. 22-23 नवम्बर को कलकत्ता की सड़कों पर झड़पें होती रहीं. इस दौरान पुलिस की गोलियों से 33 लोगों की मुत्यु हुई. आई.एन.ए. के अब्दुल रशीद को सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाए जाने के विरोध में कलकत्ता में 11 से 13 फरवरी तक विरोध प्रदर्शन होते रहे. तीन दिनों तक सड़कों पर चले प्रदर्शन में 84 लोग मारे गए और 300 जख्मी हुए.

national herald
नेशनल हेराल्ड, 23 फरवरी, 1946 (ऊपर), बाएं नेशलन हेराल्ड, 22 फरवरी 1946

 

इधर कलकत्ते में आई.एन.ए. के बन्दियों की रिहाई के लिये आन्दोलन उभार पर था, उधर बम्बई में बहादुर नौसैनिकों ने विद्रोह शुरू कर दिया. इस विद्रोह का सिलसिला 1905 की रूसी क्रांति के दौरान काला सागर नौसैनिक बेड़े में हुए विद्रोह से काफी मिलता-जुलता है. उस विद्रोह पर रूसी फिल्मकार सर्गेई आइजेन्स्टीन ने बैटलशिप पोटेम्किन नामक सदाबहार क्लासिक फिल्म बनाई. भारत में हुए नौसैनिक विद्रोह पर कोई फिल्म तो नहीं बनी, पर नाटककार उत्पल दत्त ने साठ के दशक में रचित अपने प्रेरणादायक नाटक कल्लोल में महान नौसैनिक विद्रोहियों को श्रद्धांजलि दी है.

bombey tlawar
बम्बई के विद्रोही नौसैनिक सिग्नालिंग स्कूल 'तलवार' की ओर कूच करते हुए

‘तलवार’ नामक सिग्नलिंग स्कूल के नाविकों ने खराब भोजन और नस्लवादी आधार पर अपमान के खिलाफ 18 फरवरी 1946 को भूख हड़ताल कर दी. हड़ताल जल्द ही समुद्रतट पर स्थित कैंसल और फोर्ट बैरक में तथा बम्बई के 22 जहाजों में फैल गई. हड़ताली नौसैनिकों ने जहाजों पर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी के झण्डे लहरा दिए. नौसेना केन्द्रीय हड़ताल समिति ने बेहतर भोजन और गोरे व भारतीय नौसैनिकों के लिए समान वेतन की मांग के साथ ही आई.एन.ए. और दूसरे राज-बन्दियों की रिहाई तथा इण्डोनेशिया में भारतीय सैनिकों की वापसी जैसी मांगे भी जोड़ दी.

कैसल बैरक में 21 फरवरी को नौसैनिकों ने घेराबंदी तोड़ने की कोशिश की तो लड़ाई छिड़ गई. 22 फरवरी तक देश के सभी नौसैनिक अड्डों में हड़ताल फैल चुकी थी. इसमें 78 जहाज, 20 तटीय ठिकाने और 20,000 नौसैनिक शामिल थे.

 

1945 strike
   1945 की एक हड़ताल में इन्दोर की जनरल मिल में
     पिकेटिंग करती मजजूरिनें

अरुणा आसफ अली और अच्युत पटवर्धन जैसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं के समर्थन से सीपीआई की बम्बई इकाई ने 22 फरवरी को आम हड़ताल का आह्वान किया. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के विरोध के बावजूद 30,000 मजदूरों ने काम बन्द कर दिया. लगभग सभी मिलें ठप हो गईं और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सड़कों पर हुई झड़पों में 228 लोग मारे गए और 1046 जख्मी हुए. इस मोड़ पर वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने यदि हस्तक्षेप किया भी तो महज विद्रोह को दबाने के लिए. 23 फरवरी को पटेल ने नौसैनिकों को यह आश्वासन देकर हथियार डालने पर राजी करा लिया, कि उनकी मांगें मान ली जायेंगी और विद्रोह करने के लिए किसी को सजा नहीं दी जायेगी. लेकिन इस वादे को जल्द ही भुला दिया गया. पटेल ने कहा कि “सेना में अनुशासन के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता.” नेहरू ने “हिंसा के अंधाधुंध विस्फोट” पर काबू पाने की जरूरत बताई और गांधी ने नौसैनिकों की निन्दा करते हुए कहा कि उन्होंने “भारत के लिये एक खराब और अशोभनीय मिसाल कायम कर दी है.”

जुलाई 1946 में मजदूर वर्ग की पहल

postal strike
नेशनल हेराल्ड, 2 अगस्त 1946 (ऊपर) दाएं नेशनल हेराल्ड, 12 जुलाई 1946

1946 में मजदूर वर्ग के आन्दोलन और किसान विद्रोह ने तमाम पिछले रिकार्ड तोड़ दिए. इस साल हड़तालों की उमड़ी लहर में 19.41,948 मजदूर शरीक हुए और काम ठप होने की 1,629 घटनाएं हुई. सरकारी कर्मचारियों के भी खुलकर संघर्ष में उतरने से हड़तालों का स्वरूप देशव्यापी होता चला गया. इस मायने में डाक-तार कर्मचारियों की जुलाई में हुई हड़ताल उल्लेखनीय है. पोस्टमैन लोअर ग्रेड स्टाफ यूनियन ने 11 जुलाई 1946 से हड़ताल कर दी. ऑल इण्डिया टेलीग्राफ यूनियन भी उसमें शामिल हो गई. 21 जुलाई तक बंगाल और असम के डाक-तार कर्मियों ने भी काम बंद कर दिया. इस हड़ताल के समर्थन में बम्बई में 22 जुलाई और मद्रास में 23 जुलाई को औद्योगिक हड़ताल हुई. 29 जुलाई को बंगाल और असम में आम हड़तालें आयोजित हुई.

kolkata workers
       कलकत्ता में नवम्बर क्रांति में मजदूरों का प्रदर्शन 1946

उसी दिन कलकत्ता की सड़कों पर जन-समुद्र उमड़ पड़ा. इतनी भारी स्वतःस्फूर्त जन-गोलबंदी उसके बाद फिर शायद बिरले ही कभी हुई हो. इस रैली में यह विश्वास व्यक्त किया गया कि “इस हड़ताल से देश के मजदूर आन्दोलन में एकता और लड़ाकू चेतना का नया अध्याय शुरू हो गया है”. हड़तालों की यह लहर 1947 में भी जारी रही. कलकत्ता के ट्राम मजदूरों ने 85 दिनों तक हड़ताल की. कानपुर, कोयम्बटूर और कराची जैसे शहर भी मजदूर वर्ग की कार्रवाई के महत्वपूर्ण केन्द्र के बतौर उभरे थे.

यह सोचकर भी अफसोस होता है कि वही कलकत्ता शहर 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग की सीधी कार्रवाई की घोषणा के बाद साम्प्रदायिक हिंसा की आग में धू-धू कर जल उठा. प्रतिद्वन्द्वी गुण्डा गिरोहों ने खुलकर कत्लेआम किया. 19 अगस्त तक कलकत्ते में 4,000 लोग मारे गए और 10,000 जख्मी हुए. भारत में साम्प्रदायिक नरसंहारों में जैसा कि बाद में भी हमेशा होता रहा, उन दिनों कलकत्ते में मारे गए लोगों में हिंदुओं से ज्यादा मुसलमान थे. पटेल ने क्रिप्स को लिखा, “कलकते में हिंदुओं का पलड़ा भारी रहा. लेकिन यह कोई संतोष की बात नहीं कही जा सकती”.

तेभागा, पुन्नाप्रा-वायलार, तेलेंगाना ...

कम्युनिस्टों के नेतृत्व में होने वाले किसान आन्दोलन का भी यह स्वर्णिम दौर था. कलकत्ते में साम्प्रदायिक कल्लेआम के तुरंत बाद किसान सभा की बंगाल इकाई ने बटाईदारों के लिये फसल के दो-तिहाई हिस्से की मांग पर सितम्बर 1946 में लोकप्रिय तेभागा विद्रोह छेड़ दिया. उत्तरी बंगाल इस जुझारू किसान उभार का केन्द्र बना. उत्तरी बंगाल में दिनाजपुर जिले के ठाकुरगांव सब-डिवीजन में और पास के जलपाईगुड़ी, रंगपुर और मालदा जिलों के अलावा यह आन्दोलन बंगाल के अन्य भागों मैमनसिंह (किशोरगंज), मेदिनीपुर (महिषादल, सुताहाटा और नंदीग्राम) तथा 24 परगना (काकद्वीप) में भी व्यापक रूप से फैल गया.

केरल के त्रावणकोर-कोचीन इलाके में कम्युनिस्टों ने नारियल के रेशों की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों, मछुआरों, ताड़ी उतारने वालों और खेत मजदूरों के बीच मजबूत आधार तैयार कर लिया था. 1946 में इस रियासत के शासकों ने यहां अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने का इरादा जताया. इस पर कम्युनिस्टों ने कहा कि वे अमरीकी मॉडल को अरब सागर में फेंक देंगे. अलेप्पी क्षेत्र में कम्युनिस्टों पर जमकर जुल्म ढाए गए. इस पृष्ठभूमि में अलेप्पी-शेरतलाई इलाके में 22 अक्तूबर को राजनीतिक हड़ताल शुरू हुई और 24 अक्टूबर को पुन्नाप्रा थाने पर हमला किया गया, जिसमें आंशिक सफलता मिली. 25 अक्टूबर को इलाके में सैनिक शासन लागू कर दिया गया और सेना ने शेरतलाई के पास वायलार में स्वयंसेवकों के मुख्यालय में भारी खून-खराबे के बाद प्रवेश किया. थोड़े ही समय तक चले पुन्नाप्रा-वायलार विद्रोह में कम-से-कम 800 लोग मारे गए.

जहां पुन्नाप्रा-वायलार महज अल्प अवधि के लिये ही चल सका था, वहीं आंध्र प्रदेश के तेलंगाना में जुलाई 1946 से अक्टूबर 1951 तक विद्रोह टिका रहा. कम्युनिस्ट नेतृत्व में हुए दीर्घकालीन किसान छापामार युद्ध का यह एक आदर्श उदाहरण है. यह विद्रोह 4 जुलाई 1946 को तेलंगाना के सबसे बड़े और क्रूर जमींदारों के लठैतों द्वारा नालगोंडा जिले के जंगाव तालुक में ग्रामीण क्रांतिकारी डोड्डी कुमारैया की हत्या के बाद शुरू हुआ. कुमारैया एक गरीब धोबिन की जमीन को बचाने की कोशिश कर रहे थे. किसान प्रतिरोध की लपटों ने जल्द ही नालगोंडा के जंगाव, सुर्यपेट और हज़रनगर तालुकों के अलावा पास के वारंगल और खम्मम जिलों को भी अपनी चपेट में ले लिया.

बर्बर दमन का मुकाबला करने के लिये 1947 के प्रारंभ से ही हथियारबंद छापामार दस्तों का गठन होने लगा. अगस्त 1947 से सितम्बर 1948 तक यह विद्रोह चरम ऊंचाई पर जा पहुंचा था. इन दिनों विद्रोह का असर 16,000 वर्गमील इलाके में फैले 3,000 गांवों के तीस लाख से भी ज्यादा लोगों तक पहुंचा. ग्राम रक्षा दलों में 10,000 से ज्यादा स्वयंसेवक थे जबकि हथियारबंद दस्तों में 2,000 से ज्यादा स्थायी सैनिक थे. तेभागा की तरह तेलंगाना में भी महिलाओं की शानदार भागीदारी रही जो इस आन्दोलन के समय प्रभाव का एक उल्लेखनीय पहल था. तेलंगाना विद्रोह के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक पी सुन्दरैय्या ने खासकर मुक्त क्षेत्रों में इस आन्दोलन के गहरे और बहुआयामी असर के बारे में लिखा है. इनमें बुनियादी भूमि सुधारों पर अमल और ग्रामीण गरीबों की बेहतरी से लेकर महिलाओं की हालत सुधारने के लिए किए गए कार्य तथा अन्य प्रगतिशिल सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार शामिल है. लेकिन तेलंगाना की सबसे बड़ी उपलब्धि थी उसका महान क्रांतिकारी आवेग. यह भारत में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट रणनीति का पहला प्रमुख और व्यापक प्रयोग था.

अनुभूति 1946

sukanta bhattacharya
सुकान्त भट्टाचार्य

विद्रोह आज, विद्रोह चहुंओर
लिखूं मैं उनका रोजनामचा
न देखे किसी ने कभी इतने विद्रोह
दसों दिशाओं में बगावत की लहरें
आओ सब स्वप्नलोक से उतर
सुना? सुना क्या उनका उद्दाम कलरव?
हड़तालें लिखतीं नया इतिहास
खून में उकेरा मुखपृष्ठ
रहे जो अवहेलित, पददलित
देखो उनके जोश का उफान
खड़ा मैं उन्हीं की कतारों के पीछे
जिऊंगा, मरुंगा भी मैं उनके ही साथ
सो, लिखता जाता मैं रोजनामचा
विद्रोह आज, क्रांति चहुंओर.

- सुकांत भट्टाचार्य
(1926-1947)

 

तेलंगाना ने 1947 में हुए सत्ता के हस्तांतरण के असली चेहरे को उजागर कर दिया, जबकि उत्पीड़ित किसान समुदाय सम्पूर्ण भूमि सुधार और सामंतवाद के खात्मे के लिये लड़ रहा था, जिसे पूरा किये बगैर भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में सच्ची आजादी आ ही नहीं सकती. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबंदी लगा दी और  तेलंगाना विद्रोह को कुचलने के लिये सितम्बर 1948 में फौज भेज दी. एक अनुमान के अनुसार तेलंगाना के विद्रोह में कम-से-कम 4,000 कम्युनिस्ट कार्यकर्ता व किसान योद्धा मारे गए. 10,000 पर पाशविक जुल्म ढाया गया जिनमें से बहुतों की बाद में मौत हो गई, और कम-से-कम 50,000 किसान जनता को निर्मम यातनाएं दी गई.

देश को साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित होने देने के बाद आधुनिक भारत के “लौह पुरुष” सरदार पटेल ने विभाजित भारत के एकीकरण का जिम्मा संभाला. रियासतों में चल रहे जन आन्दोलनों और पुन्नाप्रा-वायलार तथा तेलंगाना जैसे विद्रोहों से 600 देशी रियासतों की बुनियाद हिल चुकी थी. पटेल ने अपने राज से “बेदखल” हो गए राजाओं और नवाबों को मोटी रकम का प्रिवीपर्स (privy purses) देकर देश के एकीकरण का कार्य पूरा किया. रजवाड़ों के कई सदस्यों को सत्ता के बंटवारे में हिस्सा दिया गया और उनमें से कई राज्यपाल, मंत्री, राजदूत आदि बनाए गए.

आज का भारत : सामने खड़ा चुनौतियों का पहाड़

अगर स्वाधीनता संग्राम से व्यापक जनता की कोई आर्थिक आकांक्षा रही हो तो उसके प्रमुख स्तम्भ यकीनन कृषि सुधार, तेज गति से औद्योगिकीकरण और मेहनतकश जनता के लिये रोजी-रोटी का सुनिश्चित अधिकार ही था. आजादी के बाद के पहले दो दशकों में सरकार ने मोटा मुआवजा देकर जमींदारी उन्मूलन पर एक हद तक अमल किया और उसके साथ-साथ काश्तकारी व हदबन्दी कानूनों की एक श्रृंखला लागू की. इसके साथ ही भारतीय पूंजीपति के विकास की राह खोलने के लिये एक किस्म के राजकीय पूंजीवादी नीति पर सक्रियतापूर्वक अमल किया गया, पर इस पूंजीपति वर्ग ने साम्राज्यवाद से जुड़ी अपनी नाल कभी नहीं काटी, पर आज उन सीमित भूमि सुधारों को भी समाप्त किया जा रहा है और उद्योगों को भारतीय एकाधिकारी पूंजीपतियों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भेंट चढ़ाया जा रहा है. दूसरी ओर रोजगार की गारंटी करोड़ों भारतीयों के लिये एक ऐसा सपना बन कर रह गई है जिसे आंखों में संजोये कई लोग भूख से मर जाते हैं तो कुछ आत्महत्या कर लेते हैं.

जहां तक धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र का सवाल है, जो हमारे संविधान के दो बहुप्रचारित बुनियादी उसूल हैं, तो इस ‘रथयात्रा’ की शुरूआत ही हुई थी बड़े पैमाने की साम्प्रदायिक मारकाट और प्रणालीबद्ध ढंग से कम्युनिस्ट-विरोधी राज्य दमन के साथ और आजादी के स्वर्ण जयन्ती वर्ष में वह रथ आज किस मुकाम पर आ पहुंचा है यह दुनिया की नजरों के  सामने है. पचास के दशक में सर्वप्रथम चुनाव के जरिये सत्ता में आई कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली सरकार को उलटने से लेकर नक्सलबाड़ी उभार के बाद सीपीआई(एमएल) के नेतृत्व में चलने वाले आन्दोलन के खिलाफ राज्य द्वारा छेड़ा गया युद्ध, आन्तरिक इमर्जेन्सी के उन्नीस महीनों के दौरान फैलाया गया मुकम्मल आतंक, राजधानी तथा अन्य कई शहरों में हुए 1984 के सिख-विराधी दंगे, राज्य के संरक्षण में हुआ अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उसके बाद चले मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक कत्लेआम का दौर चन्द ऐसे मील-पत्थर हैं जिन्हें हम न तो कभी भूल सकते हैं और न हमें भूलना चाहिए.

और अन्त में सवाल यह है कि राष्ट्रवाद की पताका बुलन्द करने और देशों की बिरादरी में भारत को उसका खोया महत्वपूर्ण स्थान वापस दिलाने के दावे का हस्र क्या हुआ? हमारे शासक वर्गों के हाथों राष्ट्रवाद या सरकारी जुबान में “राष्ट्रीय एकता और अखण्डता” के नारे का स्मरण तभी किया जाता है जब भारत सरकार या तो पाकिस्तान अथवा चीन के साथ जंग करती है जैसा कि हमने पिछले पांच दशकों में चार बार किया है, या फिर वह उत्तर-पूर्व, कश्मीर या पंजाब में स्वदेशवासियों के खिलाफ युद्ध छेड़ती है. करीब एक करोड़ जनसंख्या और हजारों वर्षों का समृद्ध इतिहास होने के बावजूद अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर हम बस छुटभैये बन कर रह गए हैं.

अब इस स्वांग को संघ परिवार द्वारा चारों ओर से घिरी कांग्रेस के हाथों से राष्ट्रवाद फटे-पुराने झण्डे को चुराने के जरिये पूरा किया जा रहा है. यह किसी से छुपा नहीं कि स्वाधीनता आन्दोलन में केसरिया ब्रिगेड की एकमात्र भूमिका थी भारतीय पूंजीपतियों तथा जमीदारों की वफादारी से खिदमत करना तथा साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के जरिये ‘फूट डालो और राज करो’ की साम्राज्यवादी साजिशों की तामील करना और कभी-कभी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पक्के एजेंटों और मुखबिरों के बतौर काम करना.

और अगर राष्ट्रीय जागरण की गांधीवादी परियोजना की कोई नैतिक धुरी थी भी, तो सैकड़ों घोटाले आज उसे कितनी निर्ममता से नोच कर चिथड़े-चिथड़े कर चुके हैं. अगर भारतीय संसदीय लोकतंत्र के स्वर्ग में किसी किस्म के फूल खिल रहे हैं तो वे घोटाले के ही फूल हैं.

पूंजीवादी गद्दारी और दीवालियेपन की इसी पृष्ठभूमि में मजदूर वर्ग को मैदान में उतरना होगा और अपना दावा पेश करना होगा. यह स्पष्ट है कि मेहनतकश जनता की बहादुराना भूमिका और अतुलनीय बलिदान के बावजूद स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व पूंजीपतियों और जमीदारों के रूढ़िवादी संश्रय के हाथों बना रह गया, और स्वतंत्रता के नाम पर उसने दरअसल साम्राज्यवाद से ही समझौता कर लिया. अब लगता है कि राष्ट्रीय आन्दोलन की यात्रा अपनी तार्किक परिणाति के बतौर अन्धी गली में जा पहुंची है. कल जो देशप्रेम का दिखावा कर रहे थे, आज वे पक्के गद्दार और विश्वासघाती बन गए हैं.

जाहिर है कि इस प्रक्रिया को रोकना और उलटना समय की मांग है, और इसके लिये सष्टतः जरूरी है कि मजदूर वर्ग नेतृत्व अपने हाथ में ले और मजदूर-किसान को केन्द्र में रखकर बने एक सम्पूर्ण भिन्न किस्म के सामाजिक संश्रय की बरतरी कायम हो. आज भारत के लिये जरूरत है दूसरी आजादी की लड़ाई की, ऐसी लड़ाई जिसमें मजदूर वर्ग और उसके सच्चे मित्र हमारे महान नायकों और शहीदों के खून से रंगे लाल झण्डे को बुलन्द करते हुए राष्ट्र की अगली कतार में मार्च करें. आजादी के लिये भारतीय जनता के महान संघर्ष की गौरवमय परम्परा हमें इस दिशा में प्रेरित करे ! हम अपने पूर्वजों की उपलब्धियों और असफलताओं से सबक लें और परिस्थिति की मांग पूरा करने को उठ खड़े हो !

इन्कलाब जिन्दाबाद!

bhagat singh and others


भारत की आजादी की लड़ाई :
दूसरा पहलू


लेखक:
दीपंकर भट्टाचार्य
सीपीआई(एमएल)

 

प्रथम प्रकाशित:
अगस्त 1997


मुद्रित:
एस बी प्रिन्टर्स, दरियागंज, दिल्ली 110002


अंग्रेजी तथ्य अन्य भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध


साभार:
तथ्यत्माक विवरण और चित्रों के लिये हम निम्नलिखित स्रोतों के आभारी हैं.
1. मॉर्डन इंडिया (1885-19470), सुमित सरकार (मैकमिलन इंडिया)
2. भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन, खण्ड 1 (1917-1939), सीपीआई(एमएल) (लिबरेशन)
3. इंडियाज स्ट्रागल फॉर इंडिपेंडेन्स, विजुअल्स एंड डाक्युमेन्ट्स, एनसीईआरटी
4. इंडिया फाइट्स कोलोनियलिज्म, सर्वजीत जोहल, लॉनडेक, लंदन

call_freedom
मुक्ति का आह्वान : तेलंगाना में सांस्कृतिक कार्यक्रम (बड़कथा) पेश करती महिलाएं, 1944, तस्वीर : सुनील जाना

मोदी राज के तीन वर्ष बाद अम्बेडकर का पुनर्पाठ

- दीपंकर भट्टाचार्य

‘प्रतीकों को हथियाने’ के अभियान के अंग के बतौर भाजपा हिंदुत्व की सेवा में अम्बेडकर पर कब्जा जमाने के लिये बेहद उतावली है. बताया जा रहा है कि अम्बेडकर जातियों के परे एक सशक्त राष्ट्र के पक्ष में खड़े थे और इसी लक्ष्य को भाजपा हिंदुओं के एकीकरण के जरिये हासिल करना चाहती है. अम्बेडकर दलितों के सशक्तीकरण के पक्ष में खड़े थे, और भाजपा के प्रचारकों ने रामनाथ कोविन्द के चुनाव को इस लक्ष्य के प्रति भाजपा की प्रतिबद्धता के सबसे बड़े प्रमाण के बतौर पेश करना शुरू कर दिया है. अम्बेडकर भारतीय गणतंत्र के संविधान के मुख्य निर्माता थे, और भाजपा के लिये यही बात अम्बेडकर को ‘आधुनिक मनु’ बनाती है! अम्बेडकर के प्रतिवाद की अंतिम कार्यवाही थी उनका बौद्ध धर्म को अपनाने का फैसला और इस कार्यवाही का भी आरएसएस के धर्मान्तरण के अभियान में इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है. संघ के लिये बौद्ध धर्म हिंदू धर्म का ही एक विस्तार है और इसीलिये अब ‘घर वापसी’ के रणनीतिकारों के लिये मुसलमानों एवं ईसाइयों का बौद्ध धर्म में धर्मांतरण प्लान-बी या दूसरा विकल्प बनता जा रहा है.

फिर भी अम्बेडकर ही वह व्यक्ति हैं जो संघ-भाजपा की साजिश की सबसे सशक्त आलोचना पेश करते हैं और जिन्होंने वास्तव में हमें उस ‘विपत्ति’ के बारे में सावधान कर दिया था जिसे हम वर्तमान में झेल रहे हैं. दुर्भाग्यवश, पिछले कुछेक वर्षों में भारत की जाति व्यवस्था के बारे में अम्बेडकर की तीखी आलोचना और स्वतंत्र भारत के मूल पाठ संविधान की संरचना को घेरे हुए अंतर्निहित तनावों और अंतर्विरोधों के बारे में उनकी अंतरदृष्टि संपन्न टिप्पणी को सुनियोजित ढंग से पृष्ठभूमि में ढकेल दिया गया है. उनको महज एक और दलित प्रतीक के बतौर, या फिर संविधान का मसौदा बनाने वाली कमेटी की अध्यक्षता करने वाले विद्वान अधि वक्ता के बतौर सीमित कर दिया गया है. महज पहचान की राजनीति के प्रतीक के बतौर, जिनसे उनकी आमूलचूल परिवर्तन की अंतर्दृष्टि को हर लिया गया हो, अम्बेडकर का यह अवैचारिकीकरण, अम्बेडकर का यह सीमांकन या पुन:रचना ही अम्बेडकर को संघ द्वारा हस्तगत करने के शैतानी प्रयासों के सामने कमजोर शिकार बना देती है. अतः वर्तमान शासन की तानाशाही भरी साजिशों का पर्दाफाश करते एवं उनको चुनौती देते हुए लोकतंत्र के हर रक्षक को अनिवार्यतः जाति, राष्ट्र, संविधान और लोकतंत्र के बारे में अम्बेडकर की आमूलचूल परिवर्तन की अंतर्दृष्टि को बुलंद करना और उसका पूरा इस्तेमाल करना होगा.

भारतीय शासक वर्गों की सर्वप्रमुख पार्टी के बतौर भाजपा का उत्थान और हिंदुत्व का आक्रमण अभूतपूर्व रूप से चौतरफा तीखा होने के साथ-साथ समूचे समाज और राजप्रणाली में जोरदार खलबली महसूस की जा रही है. मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ दलित भी अपने-आपको हिंदुत्व के आक्रमण का शिकार महसूस कर रहे हैं. यह है कि भाजपा भी दलितों को लुभाने और मुस्लिमों के खिलाफ उन्हें खड़ा करने की जीतोड़ कोशिश कर रही है. एक ओर दलितों का उत्पीड़न तथा दूसरी ओर दलित पहचान को हिंदुत्व के आक्रामक एजेंडा का दुमछल्ला बनाने की कोशिश -- इन दोनों का तालमेल भारत में दलित राजनीति के लिये एक नया चुनौतीपूर्ण मोड़ बन गया है.

उपनिवेशोत्तर भारत में मुख्यधारा की दलित राजनीति, जो अपनी अग्रगति के लिये मुख्य औजार के बतौर आरक्षण पर निर्भर रहने का आदी हो गई थी, वह इस मोड़ का सामना करने के लिये कत्तई प्रस्तुत नहीं थी. जहां दलितों के एक छोटे से हिस्से को आरक्षण की प्रणाली से लाभ पहुंचा था, वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का एक बड़ा हिस्सा जमींदारी विलोप तथा हरित क्रांति के परिणामस्वरूप कृषि की उत्पादकता में वृद्धि से लाभान्वित हुआ था. स्वाधीनता के शुरूआती कुछेक दशकों के दौरान जाति एवं वर्ग दोनों लिहाज से शक्ति संतुलन उल्लेखनीय हद तक बदल चुका था, जिसमें मुख्य रूप से पिछले जमाने के सवर्ण सामंती जमींदारों के साथ-साथ मध्यवर्ती जातियों के बीच एक सशक्त धनी किसान अथवा कुलक वर्ग का उत्थान हुआ और साथ ही व्यापारियों एवं पूंजीपतियों के उत्थान ने पिछले दौर के घरेलू पूंजी के संकीर्ण आधार के सामने चुनौती खड़ी कर दी. जिस समय अन्य पिछड़ा वर्गों के लिये आरक्षण पर मंडल आयोग की सिफारिशों को अंततः लागू किया गया, उसके पहले ही ओबीसी सत्ता समूह भारत के विशाल भागों में वर्चस्वशाली सामाजिक शक्ति के बतौर उभर चुके थे. मंडल आयोग के आने से विभिन्न क्षेत्रों में, सर्वाधिक उल्लेखनीय तौर पर प्रान्तीय सरकारों और पंचायती राज संस्थाओं में, इस शक्ति को मजबूत करने में केवल मदद ही मिली.

अगड़ी जातियों के प्रारम्भिक प्रतिघात, जिसे संघ ब्रिगेड द्वारा बड़े पैमाने पर भड़काया गया था और जिसका नेतृत्व भी उन्होंने किया था, के खिलाफ अधिकांश दलितों ने नई ओबीसी शक्ति का ही समर्थन किया. मगर जल्द ही दलित आकांक्षाओं और अधिकारों को हासिल करने की तलाश ने उनको सरजमीन पर आक्रामक ओबीसी शक्ति के खिलाफ खड़ा पाया. उत्तर प्रदेश में मायावती को मुलायम सिंह यादव की सपा से नाता तोड़ना पड़ा, तो बिहार में राम विलास पासवान को लालू प्रसाद के वर्चस्व की छत्रछाया में ही अपने लिये अलग स्थान हासिल करने की कोशिश करनी पड़ी. ओबीसी शक्ति के वर्चस्व का मुकाबला करने के क्रम में मुख्यधारा के अधिकांश दलित नेता भाजपा की ओर झुक गये जिसने तब तक मंडल के मुखौटे की आड़ में अपनी ब्राह्मणवादी विचारधारा को छिपाना शुरू कर दिया था और ‘गठजोड़ धर्म’ पर अमल करने के वादे पर संत्रयकारियों को अपने साथ जोड़ लिया था. हमने देखा कि गुजरात के जनसंहार के बाद मोदी के पक्ष में प्रचार अभियान के लिये मायावती वहां गई और उत्तर प्रदेश में उन्होंने भाजपा के साथ सत्ता की भागीदारी की, जबकि कई दलित नेता भाजपा में न सही तो एनडीए में शामिल हो गये. यह प्रवृत्ति 2014 के चुनाव के दौरान और उसके बाद भी जारी रही, जब उदित राज भाजपा में शामिल हुए, राम विलास पासवान फिर से एनडीए में जा घुसे और बिहार के कामचलाऊ मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी भाजपा से हाथ मिलाने के लिये नीतीश कुमार के खिलाफ विद्रोह कर दिया.

बसपा ने “वोट हमारा, राज तुम्हारा -- नहीं चलेगा, नहीं चलेगा” का सही नारा दिया था, मगर उसने “राज” को बदलने की चुनौती का बहुत ही सरलीकृत उपाय पेश किया : “वोट से लेंगे पीएम-सीएम -- आरक्षण से एसपी-डीएम”. सत्ता के ढांचे की तह में मौजूद आर्थिक शोषण का सवाल, उत्पादन और सम्पत्ति सम्बंधों के सवाल बिल्कुल अनछुए छोड़ दिये गये. भूमि सुधार के एजेंडा का परित्याग, और उसे पूरा न किये जाने के चलते ग्रामीण भारत में मौजूद दलितों की विशाल बहुसंख्या, जो मुख्यतः भूमिहीन मजदूर हैं, की आर्थिक स्थितियों में ठहराव आने और यहां तक कि उनके बदतर होने के सवाल को बसपा के विमर्श में कोई जगह नहीं मिली. फिर भी बसपा को चुनावी रंगमंच पर उत्कृष्ट सफलता मिली और मायावती चार-चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और ऐसा लगा था कि मुख्यधारा की दलित राजनीति के लिये इतना काफी है.

आज बसपा की चुनावी असफलताओं एवं दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में नये सिरे से आई तेजी ने दलितों के अंदर विकल्प की तलाश और अम्बेडकर के पुनर्पाठ की चाहत को जगा दिया है. रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के खिलाफ आम छात्रों और खासकर वामपंथी छात्र आंदोलन की गर्मजोशी भरी प्रतिक्रिया ने इस प्रक्रिया को गति प्रदान की है. हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) एवं जेएनयू के छात्रों ने “जस्टिस फॉर रोहित” अभियान का नेतृत्व किया और राजद्रोह के आरोप लगाकर एवं पुलिस दमन के सहारे इस अभियान का दमन करने की मोदी सरकार की कोशिशों को उलटे मुंह की खानी पड़ी. दूसरा मोड़ था ऊना -- दादरी से लेकर लातेहार तक इसी बीच संघ के नेतृत्व में गौरक्षक गिरोहों द्वारा हिंसा की कई घटनाएं हो चुकी थीं, मगर ऊना ने सशक्त प्रतिवाद को जन्म दिया और तुरंत मुसलमान भी इसमें शामिल हो गये. दलित-मुस्लिम एकता की इस स्वागतयोग्य सम्भावना के साथ साथ ऊना ने दलित-वामपंथ के बीच सहयोग की रोमांचक वैचारिक-राजनीतिक सम्भावना को भी पेश किया. सहारनपुर कांड ने भीम आर्मी को सामने ला खड़ा किया, और संघ परिवार की हिंसक परियोजना के खिलाफ जुझारू प्रतिरोध खड़ा करने की जरूरत अत्यंत विस्तृत पैमाने पर महसूस की जा रही है.

ऊना के प्रतिरोध ने पेशों के “आरक्षण” की जाति-आधारित व्यवस्था को ठुकरा दिया है, जिसके आदेशानुसार दलितों को मैला ढोने से लेकर मरे हुए पशुओं के शव उठाने जैसे तमाम किस्म के अधम कार्यों को अंजाम देना पड़ता है, जबकि साथ ही में इस आंदोलन ने आर्थिक विकास के वैकल्पिक मार्ग की कुंजी के बतौर भूमि के पुनर्वितरण पर पूरा जोर दिया है. ऐसा करके इस प्रतिरोध ने अम्बेडकर की आमूलचूल परिवर्तन वाली आर्थिक अंतर्दृष्टि को पुनर्जाग्रत किया है, जिसे अम्बेडकर ने इंडिपेंडेन्ट लेबर पार्टी के दौर में बिल्कुल स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया था, जब उन्होंने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को ऐसे जुड़वां दुश्मनों के बतौर चिन्हित किया था जिन्हें उत्पीड़ितों के लिये सच्चा लोकतंत्र कायम करने के लिये अवश्य ही पराजित करना होगा, और दलित आंदोलन में वामपंथ की ओर झुकाव बढ़ने तथा उसके साथ ही कम्युनिस्टों द्वारा वर्गीय राजनीति के वास्तविक व्यवहार में दलितों की दावेदारी को क्रांतिकारी सम्भावना को तहेदिल से स्वीकार करने के आधार पर ही दलित आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन परस्पर नजदीक आ सकते हैं, परस्पर सहयोग कर सकते हैं और यहां तक कि दलित मुक्ति एवं सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में एकरूप हो जा सकते हैं.


‘श्रेणीबद्ध असमानता’ के रूप में जातिप्रथा और अम्बेडकर की जाति के विनाश की आमूल परिवर्तनकारी अंतर्दृष्टि और रणनीति

अम्बेडकर इस बात को स्पष्ट रूप से कहते थे कि दलितों की मुक्ति खुद जाति के विनाश में -- किसी किस्म के संगतिपूर्ण समायोजन अथवा सुधार की पैरवी के विपरीत, जाति के सम्पूर्ण विनाश में -- निहित है. इस आमूल परिवर्तन की पैरवी करते वक्त अम्बेडकर को किसी अन्य से नहीं बल्कि सबसे प्रभावशाली नेता और स्वाधीनता आंदोलन की गोलबंदी के केन्द्र गांधी से लोहा लेना पड़ा था. अम्बेडकर ने जाति को श्रम-विभाजन अथवा “वर्णाश्रम” के बतौर देखने के विचार को खारिज किया था और जाति की परिभाषा श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था के रूप में दी थी. अपने-आपमें श्रम-विभाजन का विचार सामाजिक गतिशीलता का विरोधी नहीं होता, लेकिन जाति सामाजिक गतिशीलता को खारिज करती है और चाहती है कि समाज उसको ईश्वर के विधान से बनी व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर ले. ईश्वरीय विधान से बनी अलंघनीय श्रेणीबद्ध सामाजिक विभाजन की यह धारणा ही जाति को सम्पूर्ण रूप से प्रतिगामी बना देती है, और अम्बेडकर के मन में इसमें सुधार करने का कोई भ्रम नहीं था.

जाति के विनाश का आह्वान अम्बेडकर को भारत के हर अन्य सामाजिक सुधारक अथवा सामाजिक टिप्पणीकार से अलग खड़ा कर देता है. और अम्बेडकर अपने बाद के वर्षों में मार्क्स से चाहे जितना दूर हटे हों, दलित मुक्ति के अंतिम लक्ष्य के बतौर जाति के विनाश का विचार अंतर्वस्तु के बतौर उन्हें मार्क्स के साथ ला खड़ा करता है, क्योंकि मार्क्स ने सर्वहारा की मुक्ति के लिये इसी किस्म की दिशा की पैरवी की थी. ठीक जैसे मार्क्स की रचनाओं में सर्वहारा किसी वर्ग समाज में अपनी अंतिम मुक्ति के बारे में सोच नहीं सकता, वैसे ही अम्बेडकर के दलित जातियों में बटे समाज में चैन से नहीं रह सकते. दलितों की मुक्ति के लिये जाति का सिर से पैर तक विनाश करना ही होगा.

चूंकि जाति ने अपनी वैधता समूचे श्रेणीक्रम को ईश्वरीय विधान मानने की अवधारणा से हासिल की है, इसीलिये अम्बेडकर ने इस तथाकथित ईश्वरीय परिकल्पना को सम्पूर्ण रूप से खारिज करने पर सर्वाधिक जोर दिया था. ब्राह्मणवाद अथवा मनुवादी सिद्धांत का यह निर्णायक विरोध ही अम्बेडकर के सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन का निर्धारक तत्व बना रहा. लेकिन अम्बेडकर के मन में यह बात भी स्पष्ट थी कि ब्राह्मणवाद ने तत्कालीन सम्पत्ति सम्बंधों एवं सत्ता के ढांचे को वैधता प्रदान की थी और दूसरी ओर इन चीजों ने ब्राह्मणवाद का पक्षपोषण किया था, इसीलिये जाति का विनाश करने के लिये सिर्फ ब्राह्मणवाद को खारिज करने से ही काम नहीं चलेगा, बल्कि मौजूदा सत्ता के ढांचे पर भी जीत हासिल करनी होगी. अम्बेडकर द्वारा 1930 के दशक में स्थापित इंडिपेन्डेंट लेबर पार्टी ने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों को नई पार्टी के जुड़वां दुश्मन बताया था. निजी सम्पत्ति का विलोप और भूमि का राष्ट्रीयकरण अम्बेडकर के आर्थिक दर्शन के केन्द्रीय तत्व थे, और हालांकि जिस संविधान को भारत ने अंतत: ग्रहण किया, वह इतनी दूर तक नहीं जा सका, पर अम्बेडकर ने कभी भी सामाजिक न्याय के लिये लड़ाई में अत्यधिक असमतापूर्ण भूमि सम्बंधों एवं सम्पत्ति एवं आय के असमान वितरण के खिलाफ लड़ाई के महत्व को कम करके नहीं आंका,

अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था पर गांधी के साथ अपने वाद-विवाद में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही है. वर्णाश्रम अथवा श्रम-विभाजन के गांधीवादी सिद्धांत को खारिज करते हुए उन्होंने बताया कि “... जाति व्यवस्था केवल श्रम-विभाजन नहीं है, यह श्रमिकों का विभाजन है. सभ्य समाज को निस्संदेह रूप से श्रम विभाजन की आवश्यकता होती है. लेकिन किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का इस तरह से जकड़नभरे खांचों में अप्राकृतिक रूप से विभाजन नहीं पाया जाता. जाति व्यवस्था सिर्फ श्रमिकों का विभाजन ही नहीं, जो श्रम-विभाजन से बिल्कुल भिन्न है -- यह एक श्रेणीक्रम है जिसमें श्रमिकों के विभिन्न विभाजनों को एक के ऊपर एक रखकर श्रेणीक्रम में बांधा गया है (बी.आर. अम्बेडकर, जाति का विनाश). इसलिये अम्बेडकर ने सुझाया कि जाति व्यवस्था का मुकाबला करने की कुंजी है सभी जातियों के मजदूरों को एकताबद्ध करना.

यह हमें वर्ग और जाति की परस्पर अंतःक्रिया का एक महत्वपूर्ण सूत्र प्रदान करता है -- वर्ग को जाति की संस्था के जरिये चलाये जा रहे उत्पीड़न और भेदभाव के यथार्थ को स्वीकार करना होगा और उस पर जीत हासिल करनी होगी. इस किस्म की सामाजिक संवेदनशीलता के साथ समझे जाने और बुलंद किये जाने से जाति गोलबंदी और गतिशीलता की ऐसी सचेत सामाजिक इकाई बन जाती है जो उस जकड़बंदी और ठहराव को चुनौती दे सकती है और उसे तोड़ सकती है जो जाति के श्रेणीबद्ध और पीढ़ीक्रम से चले आ रहे मकड़जाल के इर्दगिर्द घनीभूत हुए हैं. मगर वर्ग संघर्ष के विरोधी और यहां तक कि वर्ग संघर्ष के कई पैरवीकारों ने भी वर्ग संघर्ष को केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित रखने की कोशिश की है, जिसने वर्ग संघर्ष की उसी पुरानी घिसी-पिटी समझ को पुख्ता किया है जिसके चलते वे भारत में जाति-आधारित सामाजिक उत्पीड़न और अन्याय के यथार्थ के प्रति उदासीन रहते हैं.

अम्बेडकर जाति के अंतर्विवाह के ढांचे को भी बार-बार चिन्हित करते हैं. इसलिये अम्बेडकर ने सामूहिक भोज अथवा पूजा-स्थलों में सार्वजनिक प्रवेश की कदाचित की जाने वाली समावेशी घटनाओं से कहीं ज्यादा जोर अंतर्जातीय विवाहों जैसे जाति की सीमाओं का ज्यादा कारगर ढंग से निषेध करने के तरीकों पर दिया है. फिर भी, जाति की सीमाओं का इस किस्म का “अतिक्रमण” तभी नियमित रूप से हो सकता है जब ज्यादा सामाजिक गतिशीलता और स्वाधीनता हासिल हो जाय, खासकर जब महिलाओं को प्रेम और शादी के सवालों समेत अपनी जिंदगी के बारे में तमाम फैसले लेने की आजादी मिल जाये. दूसरे शब्दों में, ठोक जैसे जातिगत जकड़बंदी और पितृसता एक दूसरे को पुख्ता करती हैं, वैसे ही एक का कमजोर होना दूसरे को भी कमजोर करेगा. अतः लैंगिक न्याय के लिये लड़ाई को जाति के विनाश के लिये लड़ाई के एक प्रमुख कार्यभार के रूप में देखना होगा.

ब्राह्मणवादी विचारधारा को खारिज करना, सामंतवाद और पूंजीवाद की सत्ता के ढांचों का प्रतिरोध करना, वर्ग एकता कायम करने का प्रयास करना और लैंगिक न्याय तथा पुरुष-वर्चस्व से महिलाओं की आजादी के लिये संकल्पबद्ध लड़ाई करना -- ये सभी कार्यभार जाति के विनाश की अम्बेडकर अंतर्दृष्टि और रणनीति के अभिन्न अंग हैं. मगर वास्तविक व्यवहार में सामाजिक न्याय की मुख्यधारा की राजनीति का उदय हुआ जाति-आधारित आरक्षण और जाति-आधारित सोशल इंजीनियरिंग या चुनावी समीकरणों के जोड़-तोड़ से, और उसके ही इर्द-गिर्द वह घूमती रही, और जाति के विनाश के वैचारिक जोर को वस्तुतः प्रष्ठभूमि में निर्वासित कर दिया गया है.

इसने एक ऐसी किस्म की पहचान की राजनीति को जन्म दिया है जो ब्राह्मणवादी विचारधारा के वर्चस्व के साथ पूर्णत: सामंजस्यपूर्ण है. सचमुच, हमने बिहार में भाजपा को जद(यू) के साथ संश्रय में सोशल इंजीनियरिंग की कला में महारत हासिल करते और फिर इसे विभिन्न अन्य राज्यों में, खासकर उत्तर प्रदेश में बड़े करीने से इस्तेमाल करते देखा, और आज हम उस प्रहसन की स्थिति को साकार होते देख रहे हैं जहां सबसे आक्रामक किस्म के कारपोरेट नियंत्रण के साथ ब्राह्मणवादी या मनुवादी विचारधारा के सबसे भयावह पुनर्जागरण के सम्मिश्रण का नेतृत्व पिछड़ी जाति से आया एक प्रधानमंत्री कर रहा है, जिसे अब एक दलित राष्ट्रपति की सरपरस्ती भी हासिल हो जायेगी.

संविधान और अम्बेडकर की भविष्यदर्शी चेतावनी : संविधान का क्षय, नायक-पूजा और बढ़ती असमानता

अम्बेडकर को सभी लोग भारतीय संविधान का जनक मानते हैं. उन्होंने आधुनिक भारत की एक लोकतांत्रिक रूपरेखा को जन्म देने के लिये पश्चिमी लोकतंत्रों के संवैधानिक साहित्य का व्यापक सर्वेक्षण किया था और अतीत में भारत में सामूहिक क्रियाकलापों का, सबसे उल्लेखनीय रूप से बौद्ध संघों के आचार-व्यवहार का गहराई से अध्ययन किया था. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अम्बेडकर ने हमें संविधान को चारों ओर से घेरे हुए अंतर्विरोधों के बारे में एक समझ दी है. जिस दिन संविधान को औपचारिक रूप से ग्रहण किया गया, उस दिन अम्बेडकर ने इस ऐतिहासिक अवसर पर लोकतंत्र की प्रशंसा के गीत गाते हुए उत्सव नहीं मनाया बल्कि इसके विपरीत, इस मौके का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने हमें उन अंतविरोधों के बारे में चेतावनी दी जो वास्तविकता में भारत में लोकतंत्र की संवैधानिक बुनियाद को ही खतरे में डाल सकते हैं.

25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में दिये गये अपने अंतिम ऐतिहासिक भाषण में अम्बेडकर ने विभिन्न आलोचनाओं के जवाब में मसौदा कमेटी और संविधान का पक्ष लेते हुए अपने वक्तव्य की शुरूआत की थी, मगर उसका अंत उन्होंने भारत में लोकतंत्र के भविष्य के बारे में, लोकतंत्र को इसी रूप में बरकरार रखते हुए भी वास्तव में तानाशाही को जन्म देने के खतरे के बारे में अत्यंत जोरदार शब्दों में और खुले तौर पर चेतावनी देते हुए किया था. उस भाषण में तीन मुख्य चेतावनियां दी गई हैं : (1) क्या राज्य और जनता संविधान के आधार पर अपने क्रियाकलाप करेंगे, या फिर अराजकता हावी हो जायेगी; (2) क्या भारत नायक-पूजा की प्रथा का मुकाबला करने में समर्थ होगा, जो लोकतंत्र के पतन और तानाशाही के उदय का सबसे प्रामाणिक नुस्खा है; और (3) क्या स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के तीन सिद्धांतों -- जो संविधान के मूलाधार हैं -- को व्यवहार में बुलंद किया जायेगा या फिर बढ़ती असमानता और उसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता और बंधुत्व को नकारने से राजनीतिक लोकतंत्र की आधारशिला का ही विध्वंस हो जायेगा. आज ये तीनों चेतावनियां पहले के किसी भी वक्त की तुलना में ज्यादा आवश्यक लग रही हैं.

हम एक ऐसी सरकार का सामना कर रहे हैं जो आदतन संसदीय लोकतंत्र की संस्थाओं का उल्लंघन करते हुए काम करना पसंद करती है (इसका सिर्फ एक उदाहरण लें, तो संसद में उठाई गई आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आधार को अनिवार्य बनाने के खिलाफ पारित आदेश का उल्लंघन करते हुए जनता पर आधार कार्ड थोपना है), हमारे सामने ऐसी परिस्थिति आन खड़ी है जहां अनगिनत आपराधिक मुकदमों के आरोपी को मुख्यमंत्री बना दिया जाता है और वही तय करने लगता है कि देश का कानून उसके खिलाफ मुकदमा लड़ेगा कि नहीं, और अब हमें ऐसे सत्ता-संरक्षित गिरोहों का सामना करना पड़ रहा है जो सड़कों पर और यहां तक कि रेलगाड़ी में नागरिकों की पीट-पीटकर हत्या करने लगे हैं.

अम्बेडकर ने उम्मीद की थी कि अगर सभी पार्टियों को आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये संवैधानिक उपाय अपनाने की गारंटीशुदा छूट मिल जायेगी तो आंदोलन से निपटने या झगड़े सुलझाने (उन्होंने इस संदर्भ में नागरिक अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसी सुविख्यात गांधीवादी तरकीबों का जिक्र तक किया था) के असंवैधानिक तरीके गैर-जरूरी हो जायेंगे. मगर चाहे कश्मीर और उत्तर-पूर्व में ऐतिहासिक रूप से अनसुलझे विवादों को निपटाने का मामला हो या फिर कृषि संकट और मेहनतकश जनता के लिये सम्मानजनक आजीविका या फिर जातिगत एवं लैंगिक उत्पीड़न तथा साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को न्याय देने के मुद्दे हों, राजसत्ता ने सुनियोजित ढंग से संवैधानिक उपायों का दमन किया है और कानून से परे जाकर दमन को बढ़ावा दिया है.

अम्बेडकर ने जो दूसरी चेतावनी दी थी उसका स्रोत या जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा लोकतंत्र कायम रखने के इच्छुक सभी लोगों को सावधान करने के लिये दी गई हिदायत कि वे “अपनी स्वतंत्रताओं को किसी महान व्यक्ति के कदमों तले सुपुर्द न कर दें, या उन पर भरोसा करके उनको ऐसी शक्तियां न दे दें कि वह उनकी संस्थाओं का विध्वंस करने में सक्षम हो जायं”. अम्बेडकर ने हमें याद दिलाया था कि यह चेतावनी “किसी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में कहीं ज्यादा जरूरी है, क्योंकि भारत में भक्ति या जिसे कहा जा सकता है धर्मनिष्ठा या नायक-पूजा का पंथ, वह राजनीति में इतनी ज्यादा मात्रा में अपनी भूमिका निभाता है, जितनी दुनिया के किसी भी देश की राजनीति में नहीं निभाई जातो.”

अम्बेडकर के अनुसार “धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का रास्ता हो सकती है”, लेकिन राजनीति के क्षेत्र में उन्होंने सही तौर पर हमें चेतावनी दी थी कि “भक्ति या नायक-पूजा पतन का और अंततः तानाशाही में पहुंच जाने का रास्ता है.” हमने देखा कि किस तरह इस नायक-पूजा ने भारत में 1970 के दशक के मध्य में इमरजेन्सी की शक्ल में आपदा ला दी थी, जब एक चाटुकार कांग्रेस अध्यक्ष ने इंदिरा गांधी को भारत के समतुल्य बताया था और आज वही पूजा प्रथा एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के इर्द-गिर्द खतरनाक ढंग से पनप रही है. मोदी-पूजा केवल वैचारिक विरोधियों अथवा राजनीतिक विपक्ष के खिलाफ ही निर्देशित नहीं है, उसका लक्ष्य हर ऐसा भाजपा नेता है (चाहे वह आडवाणी हो या राजनाथ सिंह) जो अधिकृत कथानक से रत्ती भर भी भिन्न ध्वनि करता प्रतीत हो सकता हो.

अम्बेडकर ने जिस तीसरी चीज पर जोर दिया था वह है “महज राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट न हो जाना” बल्कि राजनीतिक लोकतंत्र को “सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना .... जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के उसूल बनाता हो”. अम्बेडकर ने हमें चेतावनी दी थी कि “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के ये तीन उसूल मिलकर इस मायने में एक त्रिमूर्ति का निर्माण करते हैं कि इन्हें एक-दूसरे से अलग करना लोकतंत्र के मूल उद्देश्य को ही शिकस्त देना है.” अम्बेडकर ने बहुत स्पष्ट ढंग से यह बात उठाई थी कि “हमें इस तथ्य को स्वीकार करना शुरू करना होगा कि भारतीय समाज में दो चीजें बिल्कुल गैरहाजिर हैं. इनमें से एक है समानता. सामाजिक धरातल पर हम भारत में एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जो श्रेणीबद्ध असमानता के उसूल पर आधारित है, जिसका अर्थ होता है कुछ लोगों को ऊपर उठाना और कुछ अन्य को नीचे गिराना. आर्थिक धरातल पर हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जिसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जिनके पास अकूत सम्पत्ति है और वे भी हैं जो अत्यंत दरिद्रता में गुजर बसर कर रहे हैं.” कुल मिलाकर इसका परिणाम था एक ओर औपचारिक राजनीतिक समानता और दूसरी ओर विशाल सामाजिक एवं आर्थिक असमानता के बीच बुनियादी जद्दोजहद.

अम्बेडकर ने असमानता को संवैधानिक लोकतंत्र के भविष्य के सामने एक प्रमुख संभावित खतरे के रूप में बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में चिन्हित किया है : “हम कितने दिनों तक अपने सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में समानता लाने से इन्कार करते रहेंगे? अगर हम लम्बे अरसे तक समानता को नकारते रहेंगे तो हम ऐसा करके केवल अपने लोकतंत्र को खतरे में डालेंगे. हमें जितना जल्द संभव हो इस अंतविरोध को समाप्त करना होगा अन्यथा जो लोग असमानता से पीड़ित हैं ये राजनीतिक लोकतंत्र के उस ढांचे के परखचे उड़ा देंगे जिसकी रचना करने में इस सविधान सभा ने इतनी मेहनत की है.” जिस जमाने में अम्बेडकर इन पंक्तियों को लिख रहे थे उस दौर में जो आर्थिक असमानता गहराई में जड़े जमाये बैठी थी वह अब नव उदारवादी राजनीति के हाल के वर्षों में तेजी से बढ़कर आसमान छू रही है. 2014 से लेकर 2016 के बीच की अवधि में भारत की आबादी के शीर्षस्थ 1प्रतिशत लोगों की सम्पत्ति में लगभग 10 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और यह सकल राष्ट्रीय सम्पत्ति के 60 प्रतिशत के नजदीक पहुंच गई है. आर्थिक असमानता के लगातार बढ़ते जाने के साथ-साथ हर किस्म की विषमताएं -- ग्रामीण क्षेत्र बनाम महानगर, कृषि संकट बनाम कारपोरेट लूट और समृद्धि, उन्नत इलाके बनाम पिछड़े इलाके -- खतरनाक हद तक बढ़ गई हैं. इस विशाल आर्थिक असमानता के साथ जातिगत अत्याचार और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के नये सिरे से तीखे होने की परिघटना को जोड़ दीजिये तो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की त्रिमूर्ति पूरी तरह से कल्पनालोक की कहानी लगती है.

राष्ट्र, जाति और ‘हिंदू राज’

अम्बेडकर इस चीज के बारे में बिल्कुल स्पष्ट थे कि भारत में एक राष्ट्र के बतौर निर्मित होने के लिये आवश्यक बंधुत्व का अभाव है -- “मेरी राय है कि यह यकीन करके कि हम एक राष्ट्र हैं, हम एक बड़ा भारी भ्रम पाल रहे हैं. कई हजार जातियों में बंटी जनता भला कैसे राष्ट्र कहला सकती है? जितनी जल्दी हम इस बात को महसूस कर लें कि अभी तक हम सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मायनों में एक राष्ट्र नहीं बन सके हैं, उतना अच्छा होगा. क्योंकि तभी हम एक राष्ट्र के बतौर निर्मित होने की जरूरत महसूस कर सकेंगे और गम्भीरता के साथ उस लक्ष्य को हासिल करने के लिये तरीके व रास्ते खोज सकेंगे.” अम्बेडकर की नजर में जातियों से जर्जर किसी समाज में सच्ची राष्ट्रीयता आ ही नहीं सकती. बिना किसी अस्पष्टता के वे घोषणा करते हैं कि जातियां राष्ट्र विरोधी हैं : “सर्वप्रथम इसलिये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव लाती हैं. वे इसलिये भी राष्ट्र-विरोधी हैं क्योंकि वे जातियों के बीच आपस में ईर्ष्या और वैर-भाव को जन्म देती हैं.” यह हिंदू राष्ट्र के विचार को ही खारिज कर देता है. अम्बेडकर बताते हैं कि हिंदुओं की महा-एकता केवल हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान ही प्रासंगिक हो जाती है, अन्यथा हिंदू समुदाय में, जो महज बहुतेरी जातियों का घोलमठ्ठा है, किसी अन्य मायनों में एकजुटता या सामुदायिकता नहीं मौजूद है.

अम्बेडकर ने राष्ट्रवाद और संवैधानिक लोकतंत्र के एक अन्य प्रमुख पहलू पर भी विस्तार से विचार किया है -- अल्पसंख्यकों के अधिकार. 24 मार्च 1947 को लिखित ‘राज्यों एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर स्मारपत्र’ (मेमोरेंडम ऑन द राइट्स ऑफ स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज), जिसे मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक आदि विषयों पर संविधान सभा की सलाहकार समिति द्वारा गठित मौलिक अधिकार सम्बंधी उप-कमेटी के सामने पेश किया गया था, में अम्बेडकर ने बहुसंख्यकवाद पर तीखा हमला करते हुए लिखा है, “भारत के अल्पसंख्यकों के दुर्भाग्य से भारतीय राष्ट्रवाद ने एक नया सिद्धान्त गढ़ लिया है जिसे बहुसंख्यकों की मर्जी के अनुसार अल्पसंख्यकों पर राज करने का बहुसंख्यकों का दैवी अधिकार भी कहा जा सकता है. अल्पसंख्यकों द्वारा सत्ता में भागीदारी के किसी भी दावे को साम्प्रदायिकता कहा जाता है, जबकि बहुसंख्यकों द्वारा समूची सत्ता पर एकाधिकार कायम करना राष्ट्रवाद कहलाता है.

चूंकि भारत का तानाबाना इतनी बड़ी तादाद में धार्मिक, भाषाई और आंचलिक अल्पसंख्यकों द्वारा निर्मित है, इस वजह से अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच को बहुतेरी रेखाएं एक-दूसरे को जगह-जगह पर काटती हैं और राष्ट्र निर्माण के किसी भी प्रयास के लिये भाजपा का हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान का प्रतिमान सचमुच सबसे नुकसानदेह आघात साबित हो सकता है. इसीलिये अपनी गहरी अंतर्दृष्टि से अम्बेडकर ने हमें सर्वाधिक स्पष्ट शब्दों में इस खतरे के बारे में पहले ही चेतावनी दी थी : “अगर हिंदू राज सचमुच साकार होता है तो वह निस्संदेह रूप से इस देश के लिये सबसे बड़ी विपत्ति साबित होगा. हिंदू लोग चाहे जो कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिये भयानक खतरा है. वह लोकतंत्र से कहीं भी संगतिपूर्ण नहीं है. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोकना ही होगा.”

आज भारत को हिंदू राष्ट्र अथवा राष्ट्रीय राज्य घोषित करके खुलेआम संवैधानिक तख्तापलट तो नहीं किया गया लेकिन उससे कुछ ही पीछे खड़ी मोदी सरकार भारत को उसी दिशा में ठेलने की हरचंद कोशिश कर रही है. मुसलमानों को सुनियोजित ढंग से विधायी परिक्षेत्र में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मंच से बाहर ठेला जा रहा है. राजनीतिक तौर पर इस राजनीतिक अदृश्यता के साथ सम्मिलित किया गया है जीवन के लगभग हर क्षेत्र में सर्वत्रव्यापी असुरक्षा का माहौल. भोजन और आजीविका से लेकर शिक्षा एवं संस्कृति तक, सभी जगह भारत में मुस्लिम समुदाय पर कातिल हमले सुनियोजित ढंग से बढ़ते जा रहे हैं. मगर यह आक्रामक बहुसंख्यकवादी शासन उतना ही दलित-विरोधी और गरीब-विरोधी भी है जितना कि यह मुस्लिम विरोधी है.

आज जब भारत में संवैधानिक लोकतंत्र अम्बेडकर के जमाने से लेकर अपने सबसे अंधकारपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुका है, तो हर मोर्चे पर फासीवादी आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिये सशक्त लड़ाकू गठजोड़ कायम करना बहुत महत्वपूर्ण है. यहां मुद्दा मौजूदा राज को महज चुनाव के जरिये गद्दी से बेदखल करने का नहीं है, बल्कि भारत का स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आधार पर पुनर्निमाण करने का है, जिसका सपना अम्बेडकर ने देखा था. अम्बेडकर ने संवैधानिक लोकतंत्र में अंतर्निहित जिन अंतर्विरोधों को बहुत सही तौर पर चिन्हित किया था, उनके तीखे होने ने राष्ट्र को अपने संकट की मौजूदा स्थिति में डाल दिया है. संघ-भाजपा फासीवादी शक्तियां चाहती हैं कि यह संकट और बढ़े तो उसका वे अपने कारपोरेट-साम्प्रदायिक एजेंडा को थोपने में पूरी तरह से इस्तेमाल कर सकें. इस फासीवादी चुनौती पर जीत हासिल करने का अर्थ है इस संकट का एक प्रगतिशील और जोरदार लोकतांत्रिक समाधान को हासिल करना. भारत की सच्चे लोकतांत्रिक आधार पर पुनर्कल्पना और पुनर्निर्माण के इस कार्यभार को पूरा करने में अम्बेडकर की आमूल परिवर्तनवादी अंतर्दृष्टि हमारे लिये स्पष्टता और शक्ति हासिल करने का बहुमूल्य स्रोत है.

*****

 

BOOK

मोदी राज के तीन वर्ष : अम्बेडकर का पुनर्पाठ
दीपंकर भट्टाचार्य

Modi Raj Ke Tin Varsh :
Ambedkar Ka Punarpath

प्रकाशित
पहला संस्तरण : अक्टूबर, 2017


पुस्तक केंद्र
भाकपा (माले), बिहार


रामनरेश राम-चंद्रशेखर स्मृति भवन
जगतनारायण रोड, कदमकुंआ, पटना - 800003
फोन : 0612-2660174, 8210215593, 9835632813
email : cpiml.bihar@gmail.com
www.cpiml.net


एक ही परिवार में कई सदस्य इस बीमारी से मर गए

कोविड-19 का कहर कई परिवरों पर ऐसा टूटा कि वे सकते में हैं. एक ही परिवार के दो या अधिक लोग इस बीमारी की चपेट में आए और आगे.पीछे मौत का शिकर हो गए. आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि वृद्ध मां, पिता या अन्य नजदीकी परिजन अपने प्रियजन की मौत के सदमे को झेल नहीं पाए और वे भी मर गए. लेकिन, कोविड-19 के मामले में ऐसा मानना सही नहीं लगता. सच्चाई तो यह है कि लगभग पूरा परिवार ही कोरोना संक्रमित हुआ और एक से अधिक लोग मौत की चपेट में आ गए.

लालजी चौधरी और लालमुनी कुंवर (काउप, गड़हनी, भोजपुर)

लालजी चौधरी (43 वर्ष) ताड़ छेदने का काम करते थे, विगत 2 मई 2021 को सांस फूलने की बीमारी से मर गए. उनको तीन.चार दिनों तक बुखार रहा. बहुत दिनों तक गांव.इलाके के ग्रामीण डॉक्टरों से इलाज चला. जब हालत बिगड़ने लगी तो उनकी पत्नी सुनीता देवी उन्हें गड़हनी अस्पताल में भर्ती कराने ले गई. वहां पहुंचते ही वे नहीं रहे.

उनकी मां लालमुनी कुंवर (70 वर्ष) भी हफ्रते भर के भीतर ही (8 मई 2021 को) गुजर गईं. सुनीता देवी ने बताया. बबुआ, बबुआ कह के ढर.ढर लोर (आंसू) बहाती थीं. लालजी के पिता मंगनी चौधरी पहले ही नहीं रहे.

लालजी के तीन बच्चे हैं. एक छोटी बच्ची अंशु (4) और दो बेटे . बिट्टू (16) और करण (10). लालजी के गुजरे तीन माह हो चले हैं. कोई भी सरकारी आदमी उनके परिवार की सुध लेने नहीं आया है.

कृष्णा कुमार और शिवपातो देवी (पवना, अगिआवं, भोजपुर)

कृष्णा कुमार (38) को पहले बुखार आया. कोरोना जांच हुआ तो वह निगेटिव आया. सबसे पहले जगदीशपुर (दुलौर) के रेफरल अस्पताल में दिखाये. सुधार नहीं हुआ तो सदर अस्पताल, आरा में जाकर भर्ती हुए. उनकी सांस फूल रही थी. अस्पताल में कोरोना का इलाज चला. ऑक्सीजन भी दिया गया. एक सप्ताह इलाज कराने के बाद वे घर आ गए. उसी दिन शाम को उनका देहांत हो गया. उनकी पत्नी बेबी देवी ने बताया कि उनके पति की चाय दुकान थी. 3 बेटियां और दो बेटे हैं. एक बेटी की शादी उनकी मृत्यु के बाद हुई. चाय दुकान अब बड़ा बेटा नंदू कुमार चलाता है.

उनकी मां शिवपातो देवी को भी बुखार आया था. उनकी भी सांस फूल रही थी. थोड़े ही दिनों बाद उनकी भी मृत्यु हो गई.

अर्जुन कुमार और श्यामपरी देवी (बीरमपुर, कोइलवर, भोजपुर)

death in bhojpurअर्जुन कुमार का पैर टूट गया था. पटना के राज अस्पताल में उनका इलाज हुआ. पैर में लगा स्टील रॉड निकलवाने के लिए वे अप्रैल महीने में दुबारा अस्पताल पहुंचे. वहां करीब 20 दिनों तक भर्ती रहे. वहीं रहते उन्हें बुखार आने लगा था.

अस्पताल से घर लौटने ही उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी. उनको पहले सदर अस्पताल, आरा और फिर पटना के उसी राज अस्पताल में भर्ती किया गया. उनका कोरोना जांच पॉजिटिव आया. ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा था. अस्पताल ने जब तक ऑक्सीजन जुटाया, उनकी हालत बिगड़ चुकी थी. 24 घंटे के भीतर उनकी मृत्यु हो गई.

अर्जुन कुमार की 5 बच्चियां हैं . रोशनी कुमारी (9 साल), राधिका (7 साल), बरखा (4 साल), गायत्री (2 साल) और अंजलि (3 माह). रिंकी देवी उनकी पत्नी हैं.  

अर्जुन कुमार के भाई संतोष ने बताया कि भाई की मौत के 11 दिनों बाद मां श्यामपरी देवी की भी मृत्यु हो गई. पिता चुन्नीलाल प्रसाद की मृत्यु पहले ही हो चुकी है.

मणिभूषण पाठक और जानकी देवी (बीरमपुर, कोइलवर, भोजपुर)

विद्याभूषण पाठक ने बताया . मेरे छोटे भाई व मां की मृत्यु कोरोना की वजह से हो गई. पहले मेरे भाई मणिभूषण पाठक को खांसी व बुखार हुआ. फिर उनकी सांस फूलने लगी. लोगों ने कोरोना जांच कराने की सलाह दी. हम उनको लेकर बड़हरा गये. जांच में वे कोरोना पॉजिटिव पाये गए. जब हम उनको लेकर सदर अस्पताल, आरा पहुंचे तो हमसे बोला गया कि यहां न बेड है, और न ही ऑक्सीजन. उनको थोड़ी देर ऑक्सीजन देने के बाद कहा गया कि आप इनको घर ले जाइये और वहीं आइसोलेशन में रखकर दवा खिलाइये. 9 मई को हम उनको लेकर घर ले आये तो उनकी हालत और खराब हो गई. उसी रात 10 बजे उनका निधन हो गया. मेरी वृद्धा मां के साथ भी आगे चलकर यही हुआ. भाई के निधन के एक माह भी नहीं बीते कि उनकी भी मृत्यु हो गई.

मणिभूषण पाठक की पत्नी नीलम देवी ने कहा . हमें धोखा दिया गया. जिस दिन हम उन्हें अस्पताल से घर ले आये, उसी रात वे हमें छोड़ गये. हमलोग बहुत संकट में हैं. सरकार से कोई उम्मीद नहीं कर सकते. हम तो यह भी नहीं सोच पा रहे हैं कि क्या करें? हमारे तीन बच्चे हैं . आदर्श मणि (15), आसी मणि (10) और हर्ष कुमार (7). वे अभी पढ़ ही रहे हैं. उनकी पढ़ाई का क्या होगा?

फौजदार पासवान और विट्ठल पासवान (अवगिला, सहार, भोजपुर)

कुसुम देवी ने बताया. मेरे पिता फौजदार पासवान (60) को बुखार हुआ. रस्सी बुनते हुए वे अचानक जमीन पर गिर पड़े. बजरेयां और गांव के डॉक्टर से 15 दिनों तक सुई.दवाई चला. वे ठीक नहीं हुए और मर गये. पिता की मृत्यु से पहले उनके चाचा (और मौसा भी) विट्ठल पासवान की भी अचानक मृत्यु हो गई थी.

कुसुम अपने पिता की इकलौती संतान हैं. वे मायके में ही रहती हैं.
उनकी मौसी फूलकुमारी देवी ने बताया कि उनके पति को बुखार और देह में दर्द हुआ. उसी रात वे चल बसे. दोनों परिवार एक ही घर में रहते हैं.

श्रीदेव कुमार और नारायण सिंह (भेड़रिया सियारामपुर, पालीगंज, पटना)

श्रीदेव कुमार (36) को खांसी-बुखार हुआ. सांस लेने में भी दिक्कत थी. उनको पालीगंज में डॉ. श्यामनंदन शर्मा को दिखाया गया. जब हालत बिगड़ने लगी तो अस्पताल के लिए भाग.दौड़ शुरू हो गई. कोई भी अस्पताल भर्ती नहीं ले रहा था. एम्स के सामने वे दो घंटे तक एंबुलेंस में ही रह गये. पटना के एनएमसीएच पहुंचने के रास्ते में ही उनकी मौत हो गई. उनकी मृत्यु के दस दिन भी नहीं बीते कि उनके पिता नारायण सिंह (70) की भी मृत्यु हो गई. उनको भी बुखार था और हंफनी हो रही थी. पालीगंज में डॉक्टर को दिखा कर लौट रहे थे. बीच रास्ते में ही उनका दम टूट गया. श्रीदेव कुमार वाहन चलवाते थे. परिवार में उनकी पत्नी वसंती देवी और तीन छोटे बच्चे हैं.

पिंटू राम और सुशीला देवी (भेड़रिया सियारामपुर, पालीगंज, पटना)

sushila deviकृष्णा राम के बेटे पिंटू राम को खांसी और बुखार हुआ. फिर, सांस फूलने लगी. पहले पालीगंज के सरकारी अस्पताल में दिखाया गया. कमजोरी बढ़ती गई और देह में खून की कमी हो गई. आगे चलकर बैदराबाद में डॉ. खुर्शीद से इलाज शुरू हुआ. पानी चढ़ाने के बाद उनकी हंफनी और बढ़ गई. 14 मई को उनकी मृत्यु हो गई.

कृष्णा राम के छोटे बेटे ने बताया. भाई की मृत्यु के बाद मेरी मां सुशीला देवी को भी हांफ और हल्की खांसी हुई. वे चलने.फिरने की हालत में भी नहीं रहीं. 17 मई को चापाकल के पास गिर गईं और और हांफते.हांफते गुजर गईं. पति और सास दोनों के इस तरह चले जाने से पिंटू राम की पत्नी सुनीता देवी सकते में हैं. उनके तीन छोटे.छोटे बच्चे हैं. एक अब भी मां की गोद में ही रहता है.

कृष्णा प्रसाद, सुमंती देवी, प्रकाशचंद्र भारती (चकिया, पुनपुन, पटना)

कृष्णा प्रसाद को बुखार था. फिर उनके बेटे प्रकाशचंद्र भारती को भी खांसी-बुखार होने लगा, सांस फूलने लगी. वे दोनों कोरोना पॉजिटिव हो गये थे. उनको पटना के एक प्राइवेट अस्पताल (आस्था अस्पताल) में भर्ती कराया गया. ऑक्सीजन के दो सिलेंडर (प्रति सिलेंडर 45,000 रु.) चलने के बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. पहली मई को उनको राजेन्द्रनगर के ल्यूकेश अस्पताल में शिफ्रट किया गया.  उसी दिन उनका निधन हो गया.

बेटे के इलाज के दौरान ही उनके माता.पिता की हालत भी खराब होती गई. वे दोनों उनसे पहले ही चल बसे. उनके पिता कृष्णा प्रसाद ने 25 अप्रैल और मां सुमंती देवी ने 27 अप्रैल को सदा के लिए आंखें मूंंद ली. पेशे से साफ्रटवेयर इंजीनियर प्रकाश का घर अभी सूना पड़ा है. उनके चाचा ने बताया कि बहू सीता देवी बच्चों समेत अपने मायके में हैं.

डॉ. बच्चा प्रसाद, सरस्वती देवी, पन्नालाल प्रसाद, लखी बाबू  और मुनुमुन प्रसाद (मैरवां, सिवान )

मैरवां शहर के जाने.माने चिकित्सक डॉ. बच्चा प्रसाद समेत उनके 5 परिजन कोरोना बीमारी से मर गये. पिछले साल, 17 जुलाई को 2020 को उनके बेटे लखी बाबू (48) नहीं रहे. एक सप्ताह बाद ही 25 जुलाई 2020 को उनके भाई पन्नालाल प्रसाद (46) की मृत्यु हो गई. वर्ष 2021 के अप्रैल महीने में डॉ. बच्चा प्रसाद की कोरोना से मौत हो गई. उसी दिन उनकी पत्नी सरस्वती देवी नहीं रहीं. मां.पिता के निधन के सात दिन बाद ही डॉ. बच्चा प्रसाद के तीसरे बेटे मुनमुन प्रसाद (42) की भी मौत हो गई.

लखी बाबू के बेटे रवि सोनी ने बताया. पिछले साल मेरे घर के सभी लोग कोरोना पॉजिटिव हो गये थे. दादाजी (डॉ. बच्चा प्रसाद) के अस्पताल से ही सबका इलाज हुआ. पापा की तबीयत रात में अचानक बिगड़ गई. सांस लेना मुश्किल हो गया. हम उन्हें गोरखपुर ले जा रहे थे कि देवरिया के नजदीक पहुंच कर उनका निधन हो गया. सात दिनों बाद मेरे चाचा पन्नालाल प्रसाद भी नहीं रहे.

मनोज कुमार शर्मा और संध्यावती देवी (नगवां, फुलवारी, पटना)

मनोज कुमार शर्मा (48) की खांसी और बुखार हुआ. 12 अप्रैल को वे बुरी तरह से हांफने लगे. 24 घंटे की दौड़.धूप के बाद भी न तो उनको ऑक्सीजन मिला, न अच्छा अस्पताल. अगले दिन 13 अप्रैल को 10 बजे उनकी मृत्यु हो गई.
उनकी पत्नी पूनम देवी ने बताया . मेरे पति मेरे पति की मौत के 15 दिनों बाद मेरी मां संध्यावती (58 वर्ष) की भी यही बीमारी हुई और वे चल बसीं. पूनम देवी के तीन बच्चे हैं . गौतम आर्यन (21), उत्तम कुमार और मुस्कान कुमारी (16). पति और मां की अचानक मौत से वे सकते में हैं.

कोविड के स्पष्ट लक्षणों से हुई मौत

जांच कराने का मौका ही नहीं मिला

कलामुद्दीन अंसारी (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)
सैरुन बीबी ने बताया . मेरे पति कलामुद्दीन अंसारी (65) को पहले सर्दी.खांसी हुई. फिर उनको बुखार आ गया और वे हांफने लगे. दो दिन बाद उनको लेकर सदर अस्पताल, आरा गई. वहां सुई लगाते समय ही उनका दम टूट गया. जांच कराने व इलाज कराने का तो मौका ही नहीं मिला. मेरे दो बेटे हैं. उन दोनों का परिवार है. दोनों की पत्नियां, दो बच्चे और एक बच्ची. वे पंजाब में कारखाना में काम करते हैं. पिछले लॉकडाउन में दोनों पैदल चलकर घर लौटे थे. वे अपने बीवी.बच्चों की ही देखरेख करते हैं, मेरी नहीं.

करण साह (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

arti deviआरती देवी ने कहा. मेर पति करण साह (45) को खांसी और बुखार हुआ था. उनकी सांस फूल रही थी. पहले उनको डुमरावं में डॉक्टर से दिखाया. सुधार नहीं हुआ तो आरा लेकर गई. वहां डॉक्टर ने पटना ले जाने को कहा. मेरे पास पैसा नहीं था कि आगे उनका इलाज कराती. वे लगातार हांफ रहे थे और अब तक के इलाज का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरे पति खेत मजदूर थे. उनकी कमाई से ही घर चलता था. मेरे छोटे.छोटे चार बच्चे हैं. एक बच्ची 12 साल और दूसरी 10 साल की है. एक बेटा जन्मजात दिव्यांग है. अब उनका भरण.पोषण कैसे होगा? गांव के मुखिया ने भी मेरी कोई मदद नहीं की.  

कपिलमुनि तिवारी (बिहटा,तरारी, भोजपुर)

photo_0मृत्युंजय ने बताया. मेरे पिता कपिलमुनि तिवारी को पहले हल्का बुखार हुआ. हमने उनको दवा लाकर दी. उन्होंने रात का खाना (रोटी.भुजिया) भी अच्छी तरह से खाया और सो गए. 4 बजे भोर में उन्होंने मांग कर पानी पीया. उसके बाद उनको लगातार खांसी उठने लगी. वे हांफने लगे. तत्काल उनकी मृत्यु हो गई. 5 दिनों के भीतर ही 18 अप्रैल को वे चल बसे. गांव के आंगनबाड़ी केन्द्र से उनका मृत्यु प्रमाण पत्र बना है. हार्ट अटैक को मरने की वजह बताया गया है. मेरी मां राधिका देवी लगातार रो रही हैं. मैं और मेरे भाई रामचंद्र तिवारी गांव में ही रहकर खेती करते हैं.

स्वामीनाथ भगत (दमोदरा, गुठनी, सीवान)

सोघरा देवी ने बताया कि मेरे पति स्वामीनाथ भगत (56 वर्ष) को पहले खांसी हुई. फिर पेट फूल गया और सांस लेेने में दिक्कत होने लगी. देवरिया (उप्र) के डॉक्टर से इलाज चल रहा था. फिर उनको गोरखपुर के प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया. डॉक्टर ने देखते ही कह दिया. नहीं बचेंगे, घर लेकर जाइए. उसी रात कुछ घंटों बाद अस्पताल में ही वे गुजर गए. मेरे तीन बेटे हैं, बड़ा बेटा गूंगा है. उसको कोई सहायता नहीं मिलती. मेरे परिवार को सरकारी राशन नहीं मिलता.

सुभाष गुप्ता (केल्हरूआ, गुठनी, सीवान)

रिंकी गुप्ता ने बताया कि मेरे पति सुभाष गुप्ता (34 वर्ष) पलम्बर मिस्त्री का काम करते थे. वे दो माह पहले ही मुंबई से आये थे जहां वे प्राइवेट काम करते थे. पहले उनको बुखार हुआ. फिर खांसी हुई और दम फूलने लगा. उनको दमा रोग की दवा दी गई. उनको अस्पताल ले जाने का भी मौका नहीं मिला. तीन दिनों के अंदर ही 19 मई को उनकी मृत्यु हो गई. रिंकी देवी के दो बेटे हैं. अभय (5 वर्ष) और अमन (3 वर्ष). छोटा बेटा चल.फिर नहीं सकता. उसे ‘स्केल्टन डिस्प्लेसिया’ नाम की बीमारी है. सुभाष गुप्ता की मां भागमनी देवी ने बताया कि उनका छोटा बेटा भी मुंबई में है. पत्नी और बच्चों समेत उसको भी यही बीमारी हुई.

दबे पांव आई मौत, अस्पताल तक भी नहीं पहुंचे

अवधेश कुमार सिंह (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

45 वर्षीय अवधेश कुमार सिंह को पहले बुखार हुआ. फिर खांसी और हंफनी शुरू हो गई. इलाज के लिए चरपोखरी जाते हुए इनकी मृत्यु हो गई. इनकी पत्नी लीलावती देवी विद्यालय शिक्षिका हैं. दो बच्चे हैं. प्रीति कुमारी (8 वर्ष) और आशीष कुमार (6 वर्ष)

दीपनारायण यादव (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

निर्मल कुमार यादव ने बताया. मेरे भैया दीपनारायण यादव (55) को पहले खांसी-बुखार हुआ, फिर सांस फूलने लगी. गांव के डॉक्टर ने इलाज किया, लेकिन हालत बिगड़ती चली गई. तीसरे दिन, जब इलाज के लिए गाड़ी से आरा ले जाया जा रहा था, बगवां गांव (गड़हनी) के नजदीक उनका दम टूट गया. उनकी पत्नी विमला देवी को कोई बच्चा नहीं है. उनका अपना खेत नहीं था. दूसरे के खेतों में मजदूरी करते थे.

नौशाबा खातून (पेउर, सहार, भोजपुर)

शमशाद अहमद ने बताया. मई महीने में मेरी बीबी नौशाबा खातून (51) को सर्दी.खांसी और बुखार हुआ. दो-चार दिनों में ही उनकी हालत बिगड़ गई. सांस लेने में दिक्कत होने लगी. उनको आरा, सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया. ऑक्सीजन भी दिया गया. लेकिन, 24 घंटे बाद ही वे पटना के लिए रेफर कर दी गईं. 11 बजे रात में उनको पीएमसीएच में भर्ती कराया गया. ढांई घंटे बाद ही उनका इंतकाल हो गया.

शमशाद अहमद पूना की एक ज्वेलरी शोप में सेल्स मैन थे. 2020 के लॉकडाउन के बाद वे घर लौट आये.

शिवशंकर राम (अकुरी, पालीगंज, पटना)

संजू देवी ने बताया. मेरे पति शिवशंकर राम को बुखार व खांसी हुआ. स्थानीय डॉक्टर को दिखाया गया तो बोले कि कोरोना है. उनको इलाज का भी मौका नहीं मिला. जिस दिन उनकी तबीयत खराब हुई, उसी रात उनकी मृत्यु हो गई.

राजा कुंवर (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

प्रशासन राम ने बताया. मेरी मां राजा कुंवर (60 वर्ष) को पहले खांसी-बुखार हुआ. गांव में ही इलाज हो रहा था. तीन दिन बाद सांस भी फूलने लगी. पांचवे दिन वह मर गई. हम दो भाई हैं और हमारी तीन बहनें हैं. मेरे पिता पहले ही गुजर गए. अब मां भी नहीं रही.

लखपतिया देवी (अवगिला, सहार, भोजपुर)

रामप्रवेश राम ने बताया. मेरी पत्नी लखपतिया देवी (65) को सर्दी.खांसी-बुखार था. वह चलने-फिरने में असमर्थ थी. मेरी तबीयत भी खराब थी, उल्टी हुई थी. मैं सहार के सरकारी अस्पताल में दवा लाने गया था. वहां डॉक्टर ने मेरा कोरोना जांच करने के बाद बताया कि मैं कोरोना पॉजिटिव हो गया हूं. लेकिन, जब मैंने उनसे घर चल कर अपनी पत्नी का भी कोरोना जांच करने को कहा तो उन्होंने इंकार कर दिया. मुझे जगदीशपुर ले जाकर जबरन कोरोन्टाइन (क्वारंटीन) कर दिया गया. इसी बीच मेरी पत्नी गुजर गई.

चंदा खातून (मोथा, अरवल, अरवल)

नाजिया खातून ने बताया. मेरी मां चंदा खातून (41) को खांसी-बुखार हुआ और सांस फूलने लगी. उन्हें अरवल के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया. एक दिन बाद ही अस्पताल ने छुट्टी कर दी. घर लौटते समय रास्ते में ही उनका इंतकाल हो गया. मेरे अब्बा मो. शोएब गुजरात के गांधी धाम में रहते हैं. वे वहां गाड़ी चलाते हैं. हम तीन बहनें हैं, एक भाई. पूरा परिवार गुजरात में ही रहता है. पिछले लॉक डाउन में हम लोग अरवल आए थे.  

गुलाब गोंड़ (दमोदरा, गुठनी, सीवान)

सुगान्ति देवी ने बताया कि मेरे पति गुलाब गोंड (65) चलने.फिरने में असमर्थ थे. उनको खांसी-बुखार हुआ और सांस फूलने लगी. ऑक्सीजन की कमी हो गई थी. अस्पताल नहीं ले जा पाये. गुठनी से डॉक्टर को बुलाकर इलाज हुआ. चौथे दिन उनकी मृत्यु हो गई. बेटे मनोज कुमार साव ने बताया कि हम गरीब लोग हैं. चार भाई हैं. एक भाई मनिहारी का काम करते हैं. एक राज मिस्त्री हैं. दो भाई अभी पढ़ रहे हैं.

सुग्रीव मल्लाह (चिताखाल, गुठनी, सीवान)

पत्नी ने बताया कि मेरे पति सुग्रीव मल्लाह को खांसी-बुखार हुआ था. इलाज के लिये पटना ले जाते समय बीच रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई. मेरे तीन बच्चे हैं. बेटी अनिता कुमारी (18) और दो उससे छोटे बेटे.

इलाज और वाहन खर्च नहीं जुट पाया

अत्यंत ही निर्धनता में जी रहे परिवारों के लिए किसी भी तरह की बीमारी का इलाज कराना बेहद मुश्किल होता है, कोविड तो महामारी है. पहले से ही शारीरिक दुर्बलता का सामना कर रहे लोग इसका आसान चारा साबित हुए. जब हमने मृतकों के इलाज के बारे में जानना चाहा तो उनके चेहरे पर बेबसी, झुंझलाहट और गहरी पीड़ा की झलक देखने को मिली.  

सुमंती (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

radhikaराधिका देवी ने बताया. मेरी 16 वर्षीय बेटी सुमंती को सर्दी.बुखार हो गया. हमारे पास उसको पटना ले जाने का पैसा नहीं था. स्थानीय डॉक्टरों ने जो दवा बताई, हमने उसे ला कर दिया. पिछले साल के लॉकडाउन ने सबका रोजगार छीन लिया. अब तो पेट पर भी आफत है. हमलोग हर दिन सौ.दो सौ रु. ही कमाते हैं. उसमें से ही उसके लिए हर दिन 50.60 रु. की दवा लाते थे. हम उसे आरा-पटना ले जाने के बारे में तो सोच भी नहीं सकते थे. अलग से गाड़ी और अस्पताल का खर्चा भी कहां से जुटाते?

शिवमनी देवी (परसादी इंग्लिश, अरवल, अरवल)

जयप्रकाश राम बोले. मेरी पत्नी शिवमनी देवी को सर्दी.बुखार हुआ था. फिर उनको हंफनी होने लगी. वे पोलियो ग्रस्त थीं. कहीं आने.जाने में भी दिक्कत थी. मेरी और मेरी बेटी की तबीयत भी खराब थी. गांव के डॉक्टर से ही दवा लेकर उसको खिलाया. धीरे-धीरे वह कमजोर होती चली गई और अंत में मर गई.

मदन साव (बिहटा, तरारी, भोजपुर)

गुडि़या देवी ने कहा. मेरे पिता मदन साव (55 वर्ष) एक खेत मजदूर थे. उनके पास अपने खेत नहीं थे. वे दूसरे के खेतों में ही काम करते थे. उनको आठ दिनों तक खांसी और बुखार रहा. हमने उन्हें दवा तो दी लेकिन हमारे पास उनको अस्पताल ले जाने का पैसा नहीं था. मेरी शादी हो चुकी है लेकिन अपनी मां की मदद करने और उसे सांत्वना देने के लिए मैं उसके साथ रह रही हूं.

चंद्रमा साव  (बिहटा, तरारी, भोजपुर)

राधिका देवी का कहना था. मेरे पति चंद्रमा साव (70 वर्ष) गांव के मैदान में मैच देखने गए थे. उनको खांसी-बुखार हुआ और सांस फूलने लगी. पहले विशुनपुरा और फिर कछवां ले जाकर डॉक्टर से दिखाया. उनको सुई.दवाई और भाप दिया गया. डॉक्टरों ने आरा.पटना ले जाकर दिखाने को कहा. लेकिन गरीबी के कारण यह संभव नहीं था. उस दिन ढाई बजे उनकी बोलचाल बंद हो गई. तीन घंटे बाद ही वे गुजर गये. हमारे दो बेटे और दो बेटियां हैं. दोनों बेटे अप्रवासी मजदूर हैं जो दिल्ली में काम करते थे. पिछले लॉकडाउन के कारण उनका काम छूट गया. हमारे पास अपना खेत भी नहीं है.

सुदर्शन बैठा (बिहटा, तरारी, भोजपुर)

सीता देवी ने बताया. मेरे पति सुदर्शन बैठा (60 वर्ष) को दो दिनों तक बुखार रहा और उसके बाद वे गुजर गये. हमारे पास इलाज के लिए बिल्कुल ही कोई पैसा नहीं था.

अमरनाथ साह (आसावं, दरौली, सीवान)

फूलकुमारी देवी ने बताया. मेरे पति अमरनाथ साह को खांसी-बुखार और सांस फूलने की बीमारी हुई. देहाती डॉक्टर से घर पर रहकर ही इलाज हुआ. ‘ना बढि़या डॉक्टर मिलल, ना बढि़या दवाई मिलल, ना बढि़या पइसा रहे.’ दो-तीन दिन के अंदर ही उनकी मृत्यु हो गई. मेरे पति सीमेंट-बालू के काम (गृह निर्माण) में मजदूरी करते थे. अपना खेत भी नहीं हैं. राशन कार्ड भी नहीं बना है. इंदिरा आवास भी नहीं मिला है. मेरे 4 बच्चे हैं, दो बेटे (14 और 7 वर्ष) और दो बेटियां (16 और 9 वर्ष). सभी पढ़ रहे हैं. बड़ी लड़की सरकारी स्कूल में 10 वें क्लास में पढ़ती है.  मैं ठीक से खाना नहीं खा पाती. मुझे नींद भी नहीं आती.

उजागिर साह (कोहरवलिया, गुठनी, सीवान)

कलावती देवी ने कहा. मेरे पति उजागिर साह की सांस फूल रही थी. जतउर और बुंदी के डॉक्टर को बुला कर सुई-दवाई करवाया. अस्पताल नहीं ले गई क्योंकि उनको ले जाने में मदद करनेवाला कोई नहीं था. न कोई पास आता था, न कोई छूता था. घर में मेरे अलावा छोटी पतोहू और छाटी-सी पोती है. मेरे पास डॉक्टर को देने और दवा खरीदने का पैसा भी नहीं था. वे तीसरे दिन ही मर गये. छोटा बेटा गांव में ही इधर.उधर घूमता रहता है. दो बेटे दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहते हैं. वे सब अपना-अपना परिवार देखेंगे. अब मुझे कौन देखेगा?

लहेसरी देवी (अवगिला, सहार, भोजपुर)

जनी देवी ने बताया. सास लहेसरी देवी को खांसी-बुखार हुआ. स्थानीय दवा दुकान से लाकर उनको दवा दी गई. वे रात भर हांफती रहीं. अगले दिन शाम को उनके प्राण छूट गये. वे बोलीं. हम गरीब लोग हैं. हमें खाने-पीने की भी दिक्कत रहती है. मेरे ससुर 2018 में ही गुजर गए.

अस्पताल मिलने में परेशानी

परिजन बीमार को लेकर इस अस्पताल से उस अस्पताल तक दौड़ते रहे. हर जगह या तो ना मिला या उन्हें दूसरी जगह के लिए रेफर कर दिया गया. कई लोग एंबुलेंस या वाहन के अंदर ही चल बसे.

मोहर्रम बीबी (अवगिला, सहार, भोजपुर)

बेबी खातून ने बताया. मेरी मां को खांसी और बुखार हुआ. मैंने उनको दवा लाकर दी लेकिन उनकी हालत बिगड़ती चली गई. तब मैं उनको अरवल के एक प्राइवेट अस्पताल में दिखाने ले गई. वहां हमसे कहा गया कि यहां कोरोना का कोई ईलाज नहीं हो रहा है, इनको पटना के किसी सरकारी अस्पताल में ले जाइये. अरवल के सरकारी अस्पताल ने भी उनको भर्ती नहीं लिया. उल्टे वहां कोरोना मरीजों को दूर से ही भगाया जा रहा था. मजबूरन हमें उनको लौटा कर घर (सहार) लाना पड़ा. उनकी हंफनी बढ़ती ही चली गई. उसी दिन शाम के 5 बजे उनका इंतकाल हो गया.

अस्पताल ने उन्हें यह कहते हुए भर्ती नहीं किया कि उन्हें कोरोना है. लेकिन, अब वे हमें कोई मुआवजा नहीं दे रहे हैं. कह रहे हैं कि उनकी किसी भी रिपोर्ट में यह नहीं लिखा है कि उनको कोरोना था.

मेरे पति मो. आमीन जेनरेटर-शामियाना (टेंट हाउस) का काम करते थे. काम के दौरान हुए हादसे में उनके हाथ.पांव की उंगलियां टूट गई. अब वे कोई कमाई नहीं कर पाते हैं.

शमीउल्लाह खान (मोथा, अरवल, अरवल)

रौशन खातून बोलीं. मेरे पति शमीउल्लाह खान (50) को सर्दी-खांसी-बुखार हुआ था. उनको अरवल के सदर अस्पताल में दिखाने ले जाया गया. वहां डॉक्टर दूर से ही देखते थे. उनकी हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही थी. आखिर में उन्हें पटना ले जाया गया. डॉ. अरूण तिवारी और डॉ. एजाज अली के प्राइवेट क्लिनीक में उन्हें भर्ती कराने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने भर्ती नहीं लिया. इसी दौड़-भाग के बीच उनका इंतकाल हो गया.

उन्होंने कहा. मेरे पति राज मिस्त्री थे. लॉकडाउन की वजह से काम-धंधा भी बंद था. सभी बच्चों की पढ़ाई रूक गई है. पांच बेटे और दो बेटियां हैं. एक ही बेटी की शादी हुई है.

लक्षमीना देवी (केल्हरूआ, गुठनी, सीवान)

रामायण प्रजापति ने बताया. मेरी पत्नी लक्षमीना देवी (45) को खांसी-बुखार हुआ और सांस फूलने लगी. मैरवां के प्राइवेट अस्पताल ने उनको भर्ती करने से इंकार कर दिया. कहा कि इनको ऑक्सीजन चाहिए, सरकारी अस्पताल में ले जाइये. सरकारी अस्पताल ने कोरोना का रोगी बताया और भर्ती लेने मेें बहुत ना.नूकुर किया. किसी तरह 24 घंटा भर्ती रखकर ऑक्सीजन दिया, फिर वहां से निकाल दिया. हम किसी दूसरी जगह ले जाने की स्थिति में नहीं थे. घर ले आये जहां वह दूसरे दिन गुजर गईं.

मेरी पहली पत्नी 1980 में एक बेटे को जन्म देकर गुजर गईं. दूसरी पत्नी भी साथ नहीं रहीं. उनसे मुझे एक बेटा और एक बेटी है.

संजय केवट (पुरैनया, पुनपुन, पटना)

गायत्री देवी ने कहा. मेरे बेटे संजय (42) को बुखार और खांसी था. वे फुलवारी के डॉ. केपी शर्मा के अस्पताल में भर्ती होने के लिए गये थे. वे उनको भर्ती नहीं लिये. बोले कि सरकारी अस्पताल एम्स या पीएमसीएच में जाइये. गांव लौटकर देहाती डॉक्टर से इलाज करवाया जा रहा था. उन्होंने आधा घंटा ऑक्सीजन भी दिया. 4 घंटे के भीतर ही मेरे बेटे की मृत्यु हो गई. संजय राज मिस्त्री का काम करते थे. उनक पांच बच्चे हैं.

मां ने कहा . पूछने पर बोलता था कि हम ठीक हैं. उसी के भरोसे घर चलता था. हमको कुहुकेला छोड़ दिया.

अनिल यादव (अकुरी, पालीगंज, पटना)

पार्वती देवी ने बताया. मेरे बेटे अनिल यादव को खांसी-बुखार था. सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी. सरकारी अस्पताल में भर्ती व इलाज न होने की वजह से वे पटना नहीं गए. 15 दिनों तक स्थानीय डॉक्टर की दवा खाते रहे. जब हंफनी होने लगी तो पटना के श्रीराम हॉस्पीटल में भर्ती हुए और वहीं पर मृत्यु हो गई. अनिल की पत्नी का नाम है . सुनयना देवी. उनके तीन बच्चे हैं. विशाल कुमार (21), अंजलि कुमारी (17) व सोनाक्षी. उनके भाई ने बताया कि उनके ईलाज में करीब 5.6 लाख रुपये खर्च हुए.

विद्यावती देवी (डरैली मठिया, दरौली, सीवान)

सत्येन्द्र चौहान ने कहा. मेरी मां विद्यावती देवी (45) को 25 मई से बुखार.खांसी शुरू हुआ. उनके पेट में दर्द भी था. खाने-पीने में भी कठिनाई हो रही थी. मैरवां के प्राइवेट अस्पताल ने भर्ती नहीं लिया तो ठेपहां के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया. वहां दो दिन ईलाज हुआ. कोविड जांच पोजिटिव था. सुधार नहीं दिखा तो गुठनी के एक प्राइवेट अस्पताल में ले गये, जहां हालत और बिगड़ गई. एंबुलेंस से गोरखपुर ले जाते समय चौरीचौरा के पास उनका दम टूट गया.

ऑक्सीजन की घोर कमी ने बहुतों का जीवन छीना

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने दावा किया ‘कोरोना लहर के दौरान बिहार के अस्पतालों में मरीजों को दिए जाने वाले ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं थी. एक की भी मृत्यु ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई है. उनका यह दावा पूरी तरह से झूठा है  

 मो. शमशेर खान (मोथा, अरवल, अरवल)

nasiba khatunजमीउल्लाह खान ने बताया कि मेरे अब्बा मो. शमशेर खान को खांसी-बुखार हुआ और सांस लेने में दिक्कत हो लगी. अरवल के एक प्रइवेट अस्पताल (डॉ. विजय के क्लिनीक) में उन्हें भर्ती कराया गया. जब हालत ज्यादा खराब होने लगी तो उन्हें दूसरी जगह ले जाने की सोची. अरवल, और आरा में भी ऑक्सीजन की कमी थी. पटना के अस्पतालों में जगह नहीं मिल पा रही थी. गया के एक अस्पताल में भर्ती कराने की बात हुई. गाड़ी रिजर्व कर उन्हें ले जा रहे थे कि बीच रास्ते में ही उनका इंतकाल हो गया.

आरिफा परवीन (अवगिला, सहार, भोजपुर)

चुनचुन खातून ने बताया. मेरी डेढ़ साल की पोती आरिफा परवीन, जो पिछले साल 4 जनवरी को पैदा हुई थी, कोरोना से मर गई. उसे बुखर हुआ तो हम उसे सहार के सरकारी अस्पताल में ले गये. उन्होंने कहा. हम यहां इसका ईलाज नहीं कर सकते, इसे पटना ले जाइये. हम उसे सहार के एक प्राइवेट अस्पताल में भी ले गये. वहां भी उन्होंने यह कहा कि हम इतनी छोटी बच्ची का ईलाज नहीं कर सकते, पटना जाइये. इसलिए हम उसे पटना के एक प्रोईवेट अस्पताल में ले गये. वहां ऑक्सीजन नहीं था. इस वजह से 21 अप्रैल के दिन 2 बजे उसकी मौत हो गई. डॉक्टरों ने उसे छूआ तक नहीं. अगर उसे ऑैसीजन मिल जाता तो वह बच जाती. जिस दिन उसकी मौत हुई, उस दिन उस अस्पताल में पांच और लोग मरे. अखबारों में भी उसके मौत की खबर छपी. खुर्शीद मिस्त्री की पोती कोरोना से मरी. उसके मरने के बाद ही डॉक्टर ने हमें बताया कि उसे कोरोना था. लेकिन हमें उसके कोविड पोजिटिव होने का सर्टिफिकेट नहीं मिला. हमने उसकी बची हुई सारी दवाईयां और ईलाज के कागजात फेंक दिए हैं.

रामसुंदर सिंह (भेड़रिया सियारामपुर, पालीगंज, पटना)

श्रीनाथ कुमार ने बताया कि मेरे पिता रामसुंदर सिंह (70) बिल्कुल स्वस्थ थे. वे रात में दालान में सोये थे. सुबह गया तो देखा कि वे हांफ रहे थे. उनका फेफड़ा बहुत सिकुड़ गया था. नाक और गला कफ से जाम हो गया था. देह में जलन व बेचैनी थी. ऑक्सीजन की जरूरत थी लेकिन वह मिल नहीं रहा था. डॉ. सुभाष गुप्ता के यहां थोड़ा.बहुत ऑक्सीजन मिला. उनको पीएमसीएच में भर्ती कराया गया था. लेकिन, कोविड वाउर् की जगह जेनरल वार्ड मिला. वे अंततः गुजर गये. हम तीन भाई हैं, दो बहनें हैं. मां लगातार रो रही हैं.

दीना राजभर (कल्याणी, गुठनी, सीवान)

अस्मावती देवी ने कहा कि मेरे पति दीना राजभर राज मिस्त्री थे. वे ढलाई का काम करते थे. उनको बुखार और खांसी हुआ. हम उनको एक डॉक्टर से दिखाने ले गये. उसने उनको गुठनी के सरकारी अस्पताल (प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र) में रेफर कर दिया. वहां डॉक्टर ने बताया कि इनको कोरोना है. लेकिन वहां ऑक्सीजन नहीं था. उन्होंने उनको कोरोना का वैक्सीन लगा दिया. इसके तुरत बाद ही उनकी सांस उल्टी हो गई. सांस लेने की कोशिशों के दौरान ही वे पांचवें दिन चल बसे.

मेरे पति मुझे कभी मजदूरी नहीं करने दिए. हमारे तीन बच्चे हैं. बड़ी बेटी की शादी हो गई है. दूसरी बच्ची अभी 13 साल की है. 19 साल का एक बेटा है जिसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती है. वह किसी काम का नहीं है. हमको बहुत भारी दुख हो गया. शाम में परिवार के खाने के लिए नमक और रोटी भी नहीं है. अब हमारा कौन सहारा है? केवल ऑक्सीजन मिल जाता तो वे बच जाते. अस्पताल का सारा कागज हमने फेंक दिया.

मोतीलाल मांझी (जैजोर, आंदर, सीवान)

कविता देवी ने बताया. मेरे ससुर मोतीलाल मांझी को खांसी-बुखार हुआ था. सांस लेने में तकलीफ थी और वे हांफने लगे थे. उनको रघुनाथपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया. वहां ऑक्सीजन नहीं था. दो दिनों के अंदर उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि घर लाना पड़ा. 30 मई को उनकी मृत्यु हो गई.

शमीम अंसारी (चिताखाल, गुठनी, सीवान)

लैला खातून ने बताया. मेरे शौहर शमीम अंसारी को खांसी-बुखार हुआ. सांस उल्टी चलने लगी. गुठनी के सरकारी अस्पताल में उनका इलाज हुआ. उनका कोरोना जांच हुआ था. एक्सरे भी हुआ था. लेकिन ऑक्सीजन नहीं मिला. 20 दिन बाद अस्पताल में ही उनकी मृत्यु हो गई. वे मजदूरी करते थे. मेरी एक छोटी-सी बच्ची है. करकट का घर है. जमीन नहीं है.

अस्पतालों में बदहाली

परिजनों ने अस्पतालों, खास तौर पर सरकारी अस्पतालों की बदहाली और डॉक्टरों व अन्य स्टाफ की असंवेदशीलता के बारे में बताया. प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के नाम पर लूट भी सामने आई.

बुधराजो कुंअर (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

छठूनाथ सिंह ने बताया. मेरी मां बुधराजो कुंवर को बुखार लगा और तीसरे दिन ही मृत्यु हो गई. गांव के स्वास्थ्य उप केन्द्र ने कुछ दवायें दी थीं. उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य उप केन्द्र का अपना भवन नहीं है और ज्यादातर बंद ही रहता है.

जीउत राम (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

इंदल कुमार ने कहा. मेरे पिता जीउत राम (65 वर्ष) को बुखार हुआ. उनका इलाज हुआ तो कुछ ठीक हो गये थे. बहुत कमजोरी हो गई थी. फिर उन्हें सांस की दिक्कत होने लगी. हम उन्हें लेकर आरा सदर अस्पताल पहुंचे. वहां उन्हें तीन घंटे बाद ऑक्सीजन मिला. फ्रलोमीटर मुझे ही बाजार से 3 हजार रु. में खरीद कर लाना पड़ा. डॉक्टर ने कहा कि यहां डेक्सोना भी नहीं मिलेगा. वे पटना रेफर करने पर जोर दे रहे थे. वहां कोई डॉक्टर रोगियों का नियमित चेक.अप नहीं करते थे. कोई बेड खाली नहीं था. हफ्रते दिन बाद वे मर गये. हम दो भाई, तीन बहनें हैं. दो बहनों की शादी नहीं हुई है.

राजू ठाकुर (जैजोर, आंदर, सीवान)

राजेश ठाकुर ने बताया. मेरे भाई राजू ठाकुर (48) उड़ीसा में बड़बील के पास माइन्स में सुपरवाइजर थे. वे भतीजे की शादी में शामिल होने के लिए 25 अप्रैल को गांव आने वाले थे. इसी बीच उन्हें खांसी-बुखार और सांस लेने में तकलीफ होने लगी. डॉक्टर ने बताया कि टाइफाइड है. कोरोना जांच में वे पोजिटिव पाये गये. उन्हें रांची लाकर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया. आइसीयू में उन्हें देने के लिए ज्योंहि ऑक्सीजन का लीड खोला गया, उसमें ब्लास्ट हो गया. उसी समय उनकी मृत्यु हो गई. वे अस्पताल की भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट चढ़ गये. उनके परिवार में पत्नी अंजू देवी और दो बच्चे. मंजीत ((9) और रंजन (7) हैं.

मनोज कुमार शर्मा (नगवां, फुलवारी, पटना)

motherसावन कुमार शर्मा ने बताया. मैं अपने भाई मनोज कुमार शर्मा को सुबह 10 बजे से पटना के किसी अस्पताल में भर्ती कराने में लगा रहा. उनको ऑक्सीजन की जरूरत थी, लेकिन ऑक्सीजन कहीं भी नहीं था. ‘लाइफ लाइन’ नाम के प्राइवेट अस्पताल ने 20 हजार रु. लेकर उनको भर्ती किया. वहां जब कोरोना जांच पोजिटिव आया तो ऑक्सीजन खत्म होने के बहाने उसने भी रखने से इंकार कर दिया. अनिसाबाद के एक अस्पताल ने हमसे भर्ती करने के लिए 60 हजार रुपये मांगे. हम अगली रात के 3 बजे तक दौड़.धूप कर थक गए. घर लौटना पड़ा. 10 बजे तक उनकी मृत्यु हो गई.

इलाज में हुए खर्च से कर्ज का भारी बोझ

आशिक इमाम खान (मोथा, अरवल, अरवल)

आशिक इमाम खान (70) औरंगाबाद के शमशेर नगर में टीचर थे. पिछले साल, 2020 के 24 अक्टूबर को उनका इंतकाल हो गया. बेटे सफदर इमाम खान ने बताया कि वे बीमार पड़े तो उन्हें अरवल में डॉ. सुनील कुमार के पास ले जाया गया. वहां ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं थी. अरवल के सदर अस्पताल में उनके ईलाज की कोशिश नाकाम रही. अस्पताल ने उन्हें भर्ती नहीं लिया और तुरत पटना रेफर कर दिया. एंबुलेंस से पटना एम्स पहुंचे तो डॉक्टरों ने जांच करने के बाद बताया कि उनकी मृत्यु हो चुकी है. इस बीच उनके इलाज पर एक लाख रु. खर्च हो चुके थे.

उनकी बीबी जमीला खातून बीमार रहती हैं. सुगर व ब्लड प्रेशर बढ़ा रहता है. उन्होंने कहा. मेरे पति बहुत ही सीधा.सादा थे. उन्हें 34 हजार रु. पेंशन मिलते थे. सब लाकर मुझे ही दे देते थे. दो बेटे और दो बेटियां हैं. 5-10 कट्ठा जमीन ही घर की संपत्ति है.

नजाम खान (घुसियां कला, विक्रमगंज, रोहतास)

उस्मान खान ने बताया. भाई नजाम खान (44 वर्ष) मुंबई के भिवंडी में काम करते थे. अभी लॉकडाउन की वजह से वे घर में ही थे. उनको डायरिया हुआ और सांस की कमी हो गई. दरअसल उस समय पूरा गांव ही इससे जूझ रहा था. हम उनको बनारस के एक निजी अस्पताल में ले गए. और 1 जून को उसमें भर्ती करा दिया. 12 जून को उनका इंतकाल हो गया. हमारे कुल 8 लाख रुपये खर्च हो गये. हम गहरे कर्ज में डूब चुके हैं. हमारा पूरा परिवार नोटबंदी, जीएसटी और उसके बाद लॉकडाउन के कारण पिछले चार सालों से आर्थिक तंगी से जूझ रहा है. उसकी पत्नी नाजरीन और छोटा बेटा और बेटी अब हमारे साथ रहते हैं. उनकी मेडिकल रिपोर्ट में कोविड .19 का जिक्र तक नहीं है. उसके मृत्यु प्रमाण पत्र में कार्डियो रेस्पिरेटरी अरेस्ट(सीआरएफ) को उसकी मौत की वजह बताया गया है.

उर्मिला देवी (बिहटा, तरारी, भोजपुर)

सिद्धनाथ सिंह ने कहा . मेरी पत्नी उर्मिला देवी को बुखार लगा और पेट में दर्द हुआ. मैं उसे तरारी ले गया जहां से उसे पटना रेफर कर दिया गया. वहां मैंने उसे एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया. उसका कोविड-19 का जांच पोजिटिव निकला. 8 दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई. इसमें हमें 2.5 लाख रुपये खर्च करने पड़े. मैंने इसके लिए कर्ज लिया. मेरा एक बेटा है जो बीए करने के बाद गांव पर ही रहता है. अभी तक तो मैंने मुआवजे के लिए आवेदन भी नहीं दिया है.

शमी अहमद खान (माथा, अरवल, अरवल)

फिरोज खान ने बताया. मेरे ससुर शमी अहमद खान (46) को सुगर और किडनी की बीमारी थी. पिछले साल, 2020 के अगस्त महीने में परेशानी बढ़ने लगी. उनको पटना के ऑक्सीजोन अस्पताल में भर्ती कराया कराया गया. उन्हें सांस लेने में भारी दिक्कत हो रही थी. वे कोरोना पोजिटिव निकले. 20 सितंबर 2020 को उनका इंतकाल हो गया. अस्पताल ने जो सर्टिफिकेट दिया उसमें कोविड-19 बीमारी का जिक्र है. लेकिन, नगर परिषद  के मृत्यु प्रमाण पत्र में इसे गायब कर दिया गया है.

उनकी दो बच्चियां हैं. ताज कंवर (25) और शाइस्ता परवीन (19). इलाज में करीब 10 लाख से ज्यादा रुपये खर्च हुआ. रिश्तेदारों व जान.पहचान के लोगों से कर्ज लेना पड़ा. उनके इंतकाल के बाद घर की जमीन बेच कर कर्ज चुकाना पड़ा. अब भी करीब 6 लाख रु. की देनदारी है. सरकार की तरफ से हमसे कोई मिलने भी नहीं आया.

मनोज साव (डरैली मठिया, आंदर, सीवान)

राधिका देवी ने बताया. मेरे पति मनोज साव दिल्ली में हेल्पर का काम करते थे. अप्रैल में लॉकडाउन हुआ तो वे घर आ गये. उनको दिल्ली से ही बुखार था. उनके ईलाज के लिए भारी सूद पर कर्ज लेना पड़ा. मैरवां के प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उसने तुरत रेफर कर दिया. उनको गोरखपुर ले जाया गया. वहीं प्राइवेट अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई. उनके ईलाज में बहुत पैसा खर्च हुआ. मृत्यु के बाद अस्पताल ने ही उनका सारा कागज यह कह कर फेंकवा दिया कि घर ले जाने पर इससे बीमारी फैलने का डर है.

राधिका-मनोज के दो बच्चे हैं. एक बेटा, एक बेटी. बेटा मिथिलेश आइएससी करने के बाद नौकरी ढूंढ रहा है. उसे पिता के ईलाज का कर्ज उतारना है.

बैजू केवट (चकिया, पुनपुन, पटना)

चंदन कुमार ने कहा. मेरे ससुर बैजू केवट को बुखार हुआ और सांस की कमी होने लगी. पहले डॉक्टरों से ऑनलाइन संपर्क कर इलाज हुआ. इस बीच कोरोना जांच भी कराया गया. उसकी पोजिटिव रिपोर्ट आ गई. उन्हें मीठापुर (पटना) के सहारा संजय अस्पताल में भर्ती कराया. यह एक पा्रइवेट अस्पताल है जहां हमसे पहले ही 1.5 लाख रुपये जमा करवा लिये गये. इस अस्पताल में उनके इलाज का कुल खर्च 5 लाख रुपये से भी अधिक आया जबकि एक दिन बाद ही 5 मई को 12 बजे उनकी मृत्यु हो गई.

बेसहारा महिलायें और बच्चे

पूनम देवी (पवना, अगिआवं, भोजपुर)

मेरे पति कृष्णा कुमार केशरी (38 वर्ष) को सर्दी.बुखार और खांसी हुआ. फिर उन्हें सांस लेने में कठिनाई होने लगी. आरा में उनका ईलाज हुआ. जब कोई सुधार नहीं हुआ तो पीएदमसीएच पटना में भर्ती कराया गया. मैं 6 दिनों तक अस्पताल में उनके साथ रही. वहीं पर उनकी मृत्यु हो गई. एक पैर कटा होने की वजह से वे कोई काम नहीं कर पाते थे. घर पर ही रहते थे. मेरी 11 साल की दो जुड़वां बच्चियां हैं . वर्षा और जीतू. वे मेरे मायके भभुआ में रहकर एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ती है. अब मेरी मदद करने वाला कोई नहीं है. मुझे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है. मेरे पास अपने को खड़ा करने और बच्चों को पढ़ाने का कोई साधन नहीं है. मुझे सरकार से मदद का आसरा है. मैंने इंटर तक की पढ़ाई की है.

पन्ना देवी (काउप, गड़हनी, भोजपुर)

मेरे पति सुदामा सिंह (48) उचित इलाज के अभाव में मर गये. उनको बुखार हुआ था. पहले गड़हनी में डॉक्टर से दिखाया गया. फिर आरा और पटना ले जाया गया. हमने सोचा कि जो कुछ भी मेरे पास है, बेच.बाच कर लगा दूंगी, बस जीवन लौट जाना चाहिए. करीब तीन लाख रुपये लग गए, देह पर देनदारी भी हो गई, लेकिन उनका जीवन नहीं लौटा.

उनका कोरोना जांच पोजिटिव निकला. वे पहले पटना के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हुए, जहां दो दिनों में 30 हजार रुपये लग गये और कोई सुधार भी नहीं हुआ. मृत्यु के समय वे पीएमसीएच में भर्ती थे.

पत्नी मन्ना देवी रो-रोकर कहती हैं. हमारे बच्चों के लिए कोई राह.रास्ता नहीं हुआ. एक बेटा और दो बेटियां हैं. बेटा बड़ा है. मैट्रिक के बाद उसकी पढ़ाई बंद हो गई. मेरे पास उसको आगे पढ़ाने का पैसा नहीं था. अब वह घर पर रहकर ही खेती.बाड़ी करता है. बेटी सरकारी स्कूल में पढ़ती है. प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की औकात हमको नहीं है. हमारे रहने के लिए घर.दुआर भी करके नहीं गए कि हम कहें कि सुखी.संपन्न हैं.

सुदामा यादव के इलाज के कागजात घर वालों ने इसलिए नदी में फेंक दिए कि मृतक से संबंधित कोई चीज घर में नहीं रखी जाती. उनकी पत्नी कहती हैं. कोई कागज अब मेरे पास नहीं बचा है. ऐसे में मैं सरकार से क्या उम्मीद करूं?

ज्ञान्ती देवी (काउप, गड़हनी, भोजपुर)

मेरे पति डॉ. किशुन कुमार राम (45) को खांसी-बुखार हुआ. सदर अस्पताल आरा में उनका इलाज हुआ. डॉक्टर ने बताया कि इनको बुखार है और सुगर बढ़ा हुआ है. इलाज होने के बाद बुखार उतर गया. हम लोग घर लौट आये. अगले दिन वे अचानक हांफने लगे. दुबारा सदर अस्पताल, आरा ले जाया गया. डॉक्टर ने फिर कहा कि इनको कोरोना नहीं है, लेकिन ऑक्सीजन चाहिये. यहां नहीं मिलेगा, पटना ले जाइये. इसी बीच वे चल बसे.

डॉ. किशुन कुमार राम मजदूर थे. वे ग्रामीण उॉक्टर भी थे. उनके चार बच्चे हैं. प्रिया कुमारी, रूबी कुमारी, मुकेश और युवराज. सभी बच्चे अभी पढ़ रहे हैं. प्रिया गड़हनी में इंटर की पढ़ाई कर रही है. ज्ञान्ती कहती हैं. अब इनकी पढ़ाई का क्या होगा? इनका भरण-पोषण कैसे होगा?

कांति देवी (सलेमपुर पोखरा, विक्रमगंज, रोहतास)

मेरे पति मनोज राम (35) को पहले हल्की खांसी हुई. उन्होंने गांव के ही डॉक्टर से दवा ली और खांसी कम हो गई. उस दिन के पहले उनको कोई बीमारी नहीं थी. उनको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी लेकिन उन्होंने अच्छी तरह से खाना खाया और मुझे जरा भी चिंता नहीं हुई. लेकिन रात में मैं बुरी तरह से डर गई थी . मैंने कभी भी किसी को एक.एक सांस के लिए उनकी तरह से तड़पते नहीं देखा. और उसके बाद वे मर गये. मेरे तीन छोटे.छोटे बच्चे हैं. कृष्ण और सुदामा दो बेटे और बेटी रानी. वे स्कूल जाते हैं. लेकिन, अब मैं उन्हें कैसे पढ़ाउंगी? हमारी झोपड़ी देखिये, आप देख सकती हैं कि बारिश का पानी चू रहा है. यह रात भर टपकती रहती है.

कोशिल्या देवी (दमोदरा, गुठनी, सीवान)

koushalyadeviमेरे पति हरिहर भगत (35 वर्ष) को एक रात अचानक सांस लेने में तकलीफ होने लगी. उनके सीने में दर्द भी हो रहा था. मैं उनकी कोई सहायता नहीं कर सकी. उनके लिए कुछ भी नहीं कर पाई. गांव वालों ने कहा कि उन्हें ऑक्सीजन की जरूरत है, तुम्हे ऑक्सीजन खरीदना पड़ेगा. लेकिन मेरे पास पैसा नहीं था. मैंने किसी तरह से गाड़ी भाड़े भर पैसा जुटाया और उनको लेकर अस्पताल के लिए निकली. घर से निकलते.निकलते, रास्ते में ही मैंने उनको दम तोड़ते हुए देखा. मैं वापस उन्हें घर ले आई और अकेले ही उनके अंतिम क्रिया का इंतजाम की. हर कोई इतना डरा हुआ था कि किसी ने भी आ कर मदद नहीं की. मुझे 12 साल का एक बेटा और 5 साल की एक बेटी है. मेरे पति अपने चार भाईयों में तीसरे थे, लेकिन सबने उन्हें अलग कर दिया है. वे अब हमारे लिए कुछ नहीं करते. मेरे साथ ऐसा होगा, यह मैंने कभी नहीं सोचा था. आप मुझे हिम्मत रखने को कह रही हैं लेकिन मैं हिम्मत कहां से जुटाऊं?

कमला देवी (शेखपुरा, पुनपुन, पटना)

मेरे पति शत्रुघ्न पासवान को सर्दी-खांसी-बुखार था. चामूचक के एक देहाती डॉक्टर से वे इलाज करवा रहे थे. वे ठेला चालक थे और जानीपुर बाजार से पड़ोस के गांवों में सामान ढोते थे. उस दिन बीमारी की हालत में ही वे जानीपुर गये और वहां से गांव के एक आदमी का पलंग और अन्य सामान लाये. सामान उतारने के दौरान ही उनको सीने में जोर से दर्द उठा. वे जमीन पर गिर पड़े और तुरत ही गुजर गये.

शत्रुघ्न पासवान के परिवार की माली हालत उनके निधन के बाद खराब है. उनके 6 बच्चे हैं. सोनी कुमारी और जूली कुमारी . दो बेटियां विवाहित हैं. सुलेखा (13), रागिनी (11), राधिका (8) और पांचू कुमार (6 ) के पालन.पोषण का जिम्मा अब पूरी तरह से मां के कधों पर है. पत्नी कमला देवी ने बताया कि उनके पास पति के शवदाह का खर्चा तक नहीं था. घर में नून.तेल भी नहीं है कि बच्चों को खिलायें. गांव के लोगों के सहयोग से ही घर चल रहा है. लेकिन कब तक?

कोरोना बना टाइफाइड: न सही जांच, न सही इलाज

अधिकांश डॉक्टरों ने कोरोना पीडि़तों को टाइफाइड का रोगी बताकर उनका इलाज किया. देहाती क्षेत्रें में काम करनेवाले मेडिकल प्रैक्टिशनर्स (देहाती डॉक्टरों) ने इससे बचाव व सुरक्षा की मानक दवाओं व इलाज के तरीकों का इस्तेमाल करने की जगह मरीज को पानी चढ़ा देने जैसे तरीके आजमाये. ‘लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का’. मृतकों के परिजनों ने बताया कि फेफड़े में इंफेक्शन व सांस लेने में परेशानी के बीच उनका यह तरीका अंततः जानलेवा साबित हुआ.  

दिनेश शर्मा (घुसियां कला, विक्रमगंज, रोहतास)

कामेश्वर शर्मा ने बताया कि मेरा बेटा दिनेश शर्मा (39) गुजरात के एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था. उनको खांसी-बुखार हुआ. डॉक्टर ने बताया कि टाइफाइड हुआ है. उन्होंने साधारण दवायें लीं. जब बीमारी ज्यादा बढ़ गई तो घर चले आये. पहले डिहरी और फिर आरा में इलाज हुआ. उनका सुगर लेबल बहुत बढ़ा हुआ था. आरा सदर अस्पताल में ही उनकी मृत्यु हो गई.

उनकी पत्नी दुख से कमजोर हो गई हैं. उनको एक बेटा और दो बेटियां हैं. एक बेटी की शादी उनकी मृत्यु के बाद हुई. बेटा गोविंदा 11 वीं और बेटी नेहा कुमारी 9वीं क्लास में पढ़ती है. बीमारी पर करीब 70 हजार रु. खर्च हो गये. हम लोग बहुत गरीब हैं. वह बहुत सीघा-सादा था.

अब्दुल माजिद (पेउर, सहार, भोजपुर)

बीबी सईदा बानो ने बताया कि 1 मई से मेरे पति अब्दुल माजिद की तबीयत खराब हुई गांव के ही डॉ. मुख्तार ने उन्हें दवा दी, पानी चढ़ा दिया. दो दिन बाद उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी. जब हालत ज्यादा खराब हुई तो बोले कि हमारी तबियत ज्यादा खराब लग रही है. लगता है कि अब हम नहीं बचेंगे. मुझे अरवल ले चल कर दिखाओ. जहानाबाद से मेरे मायके वाले बुला रहे थे. तब बोले थे कि घर अकेला है और अम्मी बीमार. मैं घर छोड़कर कहां जाऊंगा?

उनको अरवल में डॉं. विजय से दिखाया गया. उन्होंने बताया कि टाइफाइड है, लेकिन जांच नहीं करवाया, केवल दवा और इंजेक्शन दिये. जब हालत बिगड़ती गई. तब बोले कि हमें कहीं और ले चलो. मेरे बहनोई गाड़ी लेकर आये. हम उन्हें जहानाबाद ले गये. केवल सरकारी अस्पताल खुला था, जिसमें उनको भर्ती कराया गया. ऑक्सीजन लेवल नीचे गिर रहा था. वे अस्पताल में 13 दिन रहे. सारी दवाईयां हमें बाहर से मंगानी पड़ी. कोई जांच भी नहीं हुआ. डॉक्टर बोलते रहे कि ये ठीक हो जायेंगे.

संतोष उर्फ राजकुमार (सकरी, अरवल, अरवल)

पत्नी आशा कुमारी ने बताया कि उनको दो-तीन दिन बुखार लगा था. अरवल में डॉ. सुनील राय देखने के बाद बोले कि टाइफाइड हुआ है. खून-पेशाब का जांच हुआ, लेकिन कोरोना का नहीं. सुबह उन्होंने खाना खाया और दूध भी पीया. जब शौच के लिए गए तो पसीना-पसीना हो गये और जोर.जोर से हांफने लगे. उसी दिन उनकी मत्यु हो गई. वे पिछले 8 साल से  शिक्षक की नौकरी कर रहे थे. हमारे दो बेटे हैं. बबलू (18 ) और शुभम् (16). एक बेटी है. रूबी कुमारी (14 साल).

डिप्रेशन से जूझते लोग

अपने प्रियजनों, खास तौर जीवन साथी और इकलौती संतान के अचानक गुजर जासे हजारों लोग गहरे अवसाद से गुजर रहे हैं और अब जीना नहीं चाहते.

आरती (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

पथराया-सा चेहरा हो गया है उसका. उसके पड़ोसी ने हमें बताया कि वह न खा रही है और न सो रही है. ‘‘वह अपने बच्चों को देखती और रोती रहती है.’’ आरती ने हमसे कहा, ‘‘मेरे माता-पिता बहुत दूर रहते हैं और मेरे पास फोन भी नहीं है. मैं उनसे हर रोज बात भी नहीं कर पाती. मेरे रिश्तेदार मुझे नहीं चाहते. मेरा पति मुझसे प्यार करता था, लेकिन वह जा चुका है. प्यार अब नहीं रहा. मैं अब जीना नहीं चाहती.’’

बुरहान अहमद (पेउर, सहार, भोजपुर)

ahamadतहसीन अहमद की मां शकीला बानो कोविड-19 से मर गईं. उनकी अम्मी और अब्बा दोनों को खांसी-बुखार हुआ. 13 अप्रैल को अम्मी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई. वे सांस नहीं ले पा रही थीं. ऑक्सीजन लेबल 44 प्रतिशत था. उनको एम्स, पटना में भरती कराने की कोशिश नाकाम रही. आखिर में पीएमसीएच में जगह मिली. रैपिड टेस्ट निगेटिव आया और आरटीपीसीआर पोजिटिव. 26 अप्रैल की रात वे चल बसीं.

उनकी मौत से उसके अब्बा बुरहान अहमद को गहरा धक्का लगा है. वे 20 दिनों तक ‘कोमा’ की अवस्था में रहे. हम जितनी देर तक वहां रहे, वे अपनी बीबी के लिए रोते रहे. तहसीन ने बताया कि उनका अच्छी तरह से खाना.सोना नहीं हो पा रहा है. तहसीन एक ओर जहां अपने अब्बा के लिए डरा हुआ है, वहीं खुद के शोक से भी जूझ रहा है . एक ही साथ दोनों मोर्चे संभाल रहा है.

पूनम देवी (चकिया, पुनपुन, पटना)

वे कहती हैं ‘मेरे पति बैजू केवट बहुत बढि़या आदमी थे. वही अब बुझा रहा है. हमको बेसहारा कर दिए. मैं सो नहीं पा रही हूं. रात भर रोती रहती हूं. बड़ी खराब लग रहा है. दो महीना हो गया घर से निकले. चुपचाप बैठे रहते हैं. सोचते रहते हैं कि क्या कर लें?’

राधेश्याम (जयजोर, आंदर, सीवान)

राधेश्याम ने कहा. मेरे छोटे भाई की पत्नी बिंदा देवी को कोरोना हो गया था. हम उसे अस्पताल ले गए. हम पहले एक निजी अस्पताल में और फिर हमने एक सरकारी अस्पताल में एक बेड हासिल किया. हमने उसके इलाज के लिए कर्ज लिये, फिर भी वह मर गई. जब उसका मृत शरीर घर पर लाया गया गया, मेरी पत्नी श्रीमती उसे देखते ही ढह गईं. तब उनको भी वे ही लक्षण थे. बुखार, खांसी, सांस की कमी. लेकिन मेरे पास पैसा नहीं था. इसलिए मैंने उनके इलाज का कोई प्रयास नहीं किया. तीन दिनों के अंदर वे भी चल बसीं. मेरे 3 बच्चे हैं, भाई के भी बच्चे हैं. उसने अपने घर में ताला लगा दिया और बाहर कमाने चला गया. कहता है. अब यहां रह के क्या होगा. मैं बिल्कुल नर्वस हो गया हूं. अब धर का संचालक ही नहीं रही. सब कुछ तहस.नहस हो गया है. एक ही घर में दो.दो आदमी मर गया, सरकार ने कोई मदद नहीं किया. जलाने-फूंकने का भी खर्च नहीं. मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता. अब काम करने का क्या मतलब है जब वह नहीं रही? कुछ भी करने का क्या मतलब है? मैं न सो रहा हूं, न खा रहा रहा हूं. मैं जहर खाकर मर जाना चाहता हूं.

कोविड के बाद (पोस्ट कोविड) मृत्यु

धुरान ठाकुर उर्फ कुंदन कुमार (भेड़रिया सियारामपुर, पालीगंज, पटना)

पिता रवीन्द्र ठाकुर व अन्य परिजनों ने बताया. धुरान ठाकुर (25) सूरत के एक सैलून में काम करते थे. अप्रैल.मई में जब वहां कोविड महामारी अपने चरम मुकाम पर थी, वे वहीं थे. जून महीने में वे अपने घर लौटे थे. वे एक दिन खेत में घास काटने गए. जब लौटे तो पहले एक पैर में दर्द शुरू हुआ जो धीरे.धीरे पूरे शरीर में फैलता चला गया. परिजन उनको पटना ले गये. पीएमसीएच ने उनको भर्ती करने से इंकार कर दिया. वे जेबीएन हर्ट क्लिनिक पहुंचे तो वहां भी वहीं जवाब मिला. सत्यम् अस्पताल में इलाज का अवसर ही नहीं मिला. कुछ ही देर बाद उनकी मृत्यु हो गई. अस्पताल ने उनकी मृत्यु का कारण ‘कार्डियक भैस्कुलर अरेस्ट’ बताया है. जाहिर है कि वे ‘ब्लड क्लॉटिंग’ की वजह से मरे. बहुतेरे कोरोना मरीजों में महीनों बाद यह जानलेवा बीमारी पैदा हो जाती है.

धुरान ठाकुर अपने चार भाइयों में सबसे बड़े थे. हम उनकी मृत्यु के दो दिनों बाद ही पहुंचे थे. उनकी पत्नी है सीमा और उनके दोनों बच्चों के नाम हैं मुनमुन (डेढ़ वर्ष) और गुनगुन (7 माह).

सामाजिक बहिष्करण का दंश भी झेला

साधुशरण गोंड़ (बीरमपुर, कोईलवर, भोजपुर)

मुन्नी देवी ने बताया. मेरे पति साधुशारण गोंड़ को तीन-चार दिनों तक खांसी-बुखार रहा. घर में मेरे अलावा कोई नहीं था. कोरोना के भय से अगल-बगल को कोई पूछने भी नहीं आया. मेरी तबीयत भी बहुत खराब हो गई. गांव ही के डॉक्टर राजू भईया को बुला कर सुई.दवाई करवाई. फिर वे पूरा हांफने लगे. उनको ऑक्सीजन की कमी थी. हम आरा ले जाना चाहते थे. शाम का समय था. लोग बोले कि कहां ले जाइयेगा, ऑक्सीजन आरा में नहीं है, घर पर ही रखिये. साथ चलने वाला कोई आदमी नहीं मिला. सुबह पांच बजे ही वे मर गये.

राम एकबाल केवट (पुरैनिया, पुनपुन, पटना)

मेरे गांव के कोरोना मृतक संजय केवट की अंतिम क्रिया में डर के मारे कोई शामिल नहीं हुआ. गाड़ी वाले ने भी श्मशान घट तक पहुंचाने के लिए पांच हजार रु. लिये.

रवि सोनी (मैरवां, सीवान)

कोरोना की दूसरी लहर बहुत प्रचंड थी. मेरे दादा, दादी और एक चाचा नहीं रहे. मेरे पिता लखी बाबू और एक चाचा पन्नालाल प्रसाद कोरोना की पहली लहर में गुजर गए. मेरी दूकान करीब डेढ़ महीने बंद रही. हमलोग बहुत शर्मिंदगी महसूस करते थे और घर से बाहर नहीं निकलते थे. बाद में, जब स्थिति सामान्य हुई तो दूकान खुली. लोगों से मिलना-जुलना शुरू हुआ. लखी बाबू के सभी भाई ब्यवसाय करते थे.

हम कागज नहीं बनायेंगे

उमेश ठाकुर (कुलहडि़या, कोइलवर, भोजपुर)

गामा ठाकुर ने बताया – मरे बेटे उमेश ठाकुर (45 वर्ष) को पहले खांसी-बुखार हुआ. इलाज के लिए हम लोग कोईलवर ले गये. वहां डॉक्टर ने आरा सदर अस्पताल के लिए रेफर कर दिया. सदर अस्पताल में एक दिन रखने के बाद डॉक्टर बोला पटना ले जाइये. पटना ले जाते समय वे लगातार हांफ रहे थे. पटना में एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया था. कुछ देर तक आइसीयू में रहे. फिर उनकी मृत्यु हो गई.

अस्पताल ने मृत्यु का कारण ‘हार्ट अटैक’ बताया है. मृतक के दो बेटे और एक बेटी है. इनकी उम्र क्रमशः 18 साल, 10 साल और 16 साल है.

उदय मिश्रा (भेड़रिया सियारामपुर, पालीगंज, पटना)

उज्जवल मिश्रा ने बताया. मेरे पिता उदय मिश्रा (55) को पहले खांसी-बुखार हुआ था. पालीगंज में डॉ. श्यामनंदन शर्मा ने उनका इलाज किया और 7.8 इंजेक्शन लगाये. उनका बुखार उतरता था और फिर लौट आता था. उनका ऑक्सीजन लेबल 95.96 रहता था, लेकिन स्वाद और सूंघने की शक्ति चली गई थी. वे दो-तीन कोरोन्टाइन रहे. अचानक सुबह 4 बजे सीने में दर्द हुआ और वे चल बसे. कोरोना जांच नहीं हुआ था, लेकिन कोरोना का ही इलाज हुआ. डॉक्टर ने पुर्जे पर यह नहीं लिखा.

संतोष कुमार सिंह (पसौर, चरपोखरी, भोजपुर)

बड़े भाई हरेंद्र कुमार सिंह ने बताया. मेरे छोटे भाई हरेन्द्र कुमार (48) पहले खांसी-बुखार हुआ. आगे चलकर सांस लेने में तकलीफ होने लगी. कोरोना जांच और इलाज के लिए वे डिहरी ऑन सोन (रोहतास जिला) के अनुमंडल अस्पताल में गये. लेकिन इलाज से कोई लाभ नहीं हुआ. उनकी मृत्यु से एक दिन पहले जो जांच रिपोर्ट मिली उसमें उनको कोरोना निगेटिव बताया गया. उनकी पत्नी का नाम अनिता देवी है. दो बच्चे हैं. श्वेता कुमारी (19 वर्ष) और विभु कुमार (17 वर्ष).

मुआवजा अब तक नहीं मिला

अहमद हुसैन खान (घुसियां कला, विक्रमगंज, रोहतास)

अंजुम आरा ने बताया. मेरे पति अहमद हुसैन खान (40 वर्ष) बक्सर जिले के सरैंया में मदरसा टीचर थे. उनको बुखार और खांसी हुआ. सांस फूलने लगी. सबसे पहले हम उन्हें जमुआर के नारायण अस्पताल में ले गये. उसने उनको अपने यहां भर्ती नहीं लिया. तब हम  सासाराम के सदर अस्पताल ले गये. वहां उनका कोरोना जांच हुआ जो पोजिटिव निकला. सदर अस्पाल में इलाज की अच्छी व्यवस्था नहीं थी. उनकी हालत बिगड़ती ही जा रही थी. उनको हर्ष अस्पताल (प्राइवेट) में भर्ती कराया गया. उसने एचटीसीटी जांच कराने को कहा और 10 हजार रुपये जमा कराये. जांच के दौरान ही उन्होंने दम तोड़ दिया. आवेदन करने के बाद भी हमें अब तब मुआवजा नहीं मिला.

शिवदयाल पंडित (शेखपुरा, पुनपुन, पटना)

सतीश कुमार ने बताया कि मेरे पिता शिवदयाल पंडित (44) को खांसी-बुखार था. सबसे पहले वे महावीर अस्पताल गये. फिर एनएमसीएच में भरती हुए. वहां कोरोना जांच हुआ तो रिपोर्ट निगेटिव आयी. अस्पताल ने उनको पीएमसीएच में रेफर कर दिया. लेकिन वे घर चले आये. 30 अप्रैल को जब वे एम्स, पटना में दिखाने गये. वहां उनका आरटी-पीसीआर हुआ. वे कोरोना पोजिटिव निकले. इस बीच उनकी सांस फूलने लगी. उनका ऑक्सीजन लेवल कम था. 3 मई को वे एम्स में भरती हुये. पहले उन्हें जेनरल वार्ड में रखा गया, बाद में आइसीयू में लाया गया. वहां उन्हें ऑक्सीजन दिया जाने लगा. उनकी हालत संभलने लगी और अस्पताल ने दो दिनों बाद डिस्चार्ज करने को कहा. 20 मई को अचानक उनकी हालत फिर से बिगड़ गई. उन्हें दोबारा आइसीयू में ले जाया गया जहां उनका निधन हो गया. कारोना पोजिटिव रिपोर्ट और आवेदन जमा करने के बाद भी हमें दो महीने से टहलाया जा रहा है.

अनंत विश्वकर्मा (परसादी इंग्लिश, अरवल)

अनंत विश्वकर्मा (60) बिजली मिस्त्री थे. वे घर-घर जाकर वायरिंग का काम करते थे. उनको खांसी-बुखार होने के बाद सांस लेने मे तकलीफ होने लगी. उनकी पत्नी चिंता देवी ने रोते हुए बताया ‘अरवल के डाक्टर की सलाह पर उनको एम्स, पटना में भर्ती कराया गया. वहां हुए कोरोना जांच में वे पोजिटिव पाये गये. लगभग 25 दिन वहां रहने के बाद वे चल बसे. इलाज के दौरान डॉक्टरों ने मुझे उनसे मिलने भी नहीं दिया. मुझे केवल उनका शव देखने को मिला. चिंता देवी की 4 लड़कियां हैं और तीन लड़के. उनकी छोटी बहू उनके साथ रहती है. बेटा भी बिजली मिस्त्री है. मुझे भी अभी तक मुआवजा नहीं मिला.

लॉकडाउन के कारण कई मौतें

कोरोना महामारी के कारण अस्पतालों में गैरकोविड मरीजों का इलाज बंद होने और लॉकडाउन के कारण आवागमन कठिन होने के कारण भी कई लोगों को जान गंवानी पड़ी.

रूबी देवी (काउप, गड़हनी, भोजुपर)

रूबी देवी (28 वर्ष), पति – मुकेश राम, ग्राम – काउप, गड़हनी, जिला. भोजपुर की मौत इसका उदाहरण है. गर्भवती यबी देवी को 25 अप्रैल को ब्लिडिंग शुरू हो गई, लेकिन न तो गड़हनी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में और न ही आरा सदर अस्पताल में गैरकाविड मरीज इलाज की कोई व्यवस्था थी. सदर असपताल का प्रसूति विभाग बंद था. प्राइवेट डॉक्टर ने भी शीला को भर्ती नहीं किया. भागते-दौड़ते अततः प्राइवेट साईं अस्पताल में रूबी देवी भर्ती हुई. तबतक शरीर से काफी खून निकल चुका था और रूबी देवी ने दम तोड़ दिया.

श्रीराम (सलेमपुर पोखरा, विक्रमगंज, रोहतास)

पत्नी सोनपातो देवी ने बताया कि मेरे पति की आंख के आपरेशन के बाद उनकी आंख में घाव हो गया. उनका इलाज कोलकाता के एक अस्पताल से चल रहा था. लॉकडाउन की वजह से वे कोलकाता नहीं जा पाये. मई महीने में उनकी मृत्यु हो गई. उनके दो बेटे व एक बेटी है. बड़े बेटे राजकुमार की उम्र महज 14 साल है. घर में अब कोई कमाने वाला नहीं है.

अब तो बस यादें ही सहारा हैं

रकीबा खातून (पेउर, सहार, भोजपुर)

rakiba khatunनौशाबा खातून (पेउर, सहार) की चार बच्चियां हैं. अफ्रशां निगार, नकीबा निगार और रकीबा खातून बीए कर चुकी हैं, नसीबा खातून इंटर में पढ़ रही हैं. बेटी रकीबा कहती है. ‘‘हमारी अम्मी अभी एकदम जवान थीं. वह घर का सारा काम खुद करती थीं. हमें कुछ नहीं करने देती थीं. वे अचानक बीमार पड़ गईं और हमें छोड़ गईं. देखिये, हमलोग अभी कितने छोटे-छोटे है.’’

आफताब आलम (पेउर, सहार, भोजपुर)

हम चार भाई हैं, सभी अलग-अलग रहते हैं लेकिन मेरी अम्मी आशिया खातून (60) मेरे साथ रहती थीं. मेरे अब्बा 10 साल पहले ही नहीं रहे. मेरी बीबी का भी 3 साल पहले इंतकाल हो गया. मेरे बच्चों का देखभाल अम्मी ही करती थीं. मुझे इस बात का फख्र था कि अम्मी मेरे पास थीं. उनकी तबीयत 15 मार्च के आसपास खराब हो गई. उन्हें बुखार था और देह-हाथ में दर्द हो रहा था. वे बहुत कमजोरी महसूस कर रही थीं. उनका इलाज चला, कई इंजेक्शन पड़े, वे कुछ ठीक हो रही थीं कि अचानक गुजर गयीं.

सोनी खातून (मोथा, अरवल, अरवल)

सोनी खातून ने अपने शौहर शफीकुल्लाह खान को याद करते हुए कहा. वे छह फीट लंबे, खूबसूरत व मजबूत आदमी थे. वे अब इस दुनिया में नहीं हैं. दो छोटे बच्चों अफरीदी (11) और असगर (8) के साथ मुझे अकेला छोड़ गये हैं. वे दोनों प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं. उनके पिता उन्हें अच्छी तालीम देना चाहते थे. अभी दूकान भी बंद है. अब मैं उन्हें कैसे तालीम दे पाऊंगी?

अंजुम आरा (घुसियां कला, विक्रमगंज, रोहतास)

मेरे शोहर अहमद हुसैन खान बहुत ही अच्छे इंसान थे. खुद भी पढ़े-लिखे थे और अपने बच्चों को भी अच्छी तालीम देना चाहते थे. बताया कि हमारे चार बच्चे हैं. सना खातून (16), जेबा खातून (13), अर्सलान (10) और जैनब (7). सभी बच्चे स्कूल में हैं. उनके अब्बा अरशद हुर्सन खान और अम्मी जमाला खातून समेत उनके तीन भाइयों का परिवार इस हादसे से उबर नहीं पा रहा है.

सुनयना देवी (पवना, अगिआवं, भोजपुर)

sunayana deviमेरा बेटा रोहित कुमार (24) वापी जिले (गुजरात) के सारीगांव में एक कैंटीन में खाना बनाता था. वहां उसे खांसी और बुखार हुआ. सांस फूलने लगी. प्राईवेट हो या सरकारी, किसी भी अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं मिला. एक प्राईवेट अस्पताल में जगह मिली. वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई.

वह मेरा सबसे छोटा, सबसे अच्छा बेटा था. उसे मरते समय भी मेरी ही चिंता थी. 15 तारीख को घर आने को भी बोला था.   अगले साल उसकी शादी होने वाली थी. मैं और मेरे पति अब वृद्ध हो चुके हैं. मेरे दोनों बड़े बच्चों को हमसे बहुत मतलब नहीं रहता. जिससे आसरा था वह तो मुझे बेसहारा छोड़ गया?

महामारी के दौरान सभी मृतकों के आश्रितों को मुआवजा देना होगा

कोविड के दूसरे चरण की भयावहता को हम सबने महसूस किया है. शायद ही हममें से कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके किसी प्रियजन की मौत नहीं हुई हो. हम सबने ऑक्सीजन के अभाव में लोगों को मर ते देखा है. लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण हमारी आंखों के सामने लोग मरते रहे और हम चाहकर भी उनकी जिंदगी नहीं बचा सके. दूसरे चरण के तांडव से हम शायद ही कभी उबर पायें और तीसरा चरण दस्तक भी देने लगा है. मौत की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भोजपुर जिले के कोइलवर प्रखंड स्थित कुल्हडि़या गांव में 69 और बड़हरा के कोल्हारामपुर में 45 मौतें हुईं. कुल्हडि़या में तो जनवरी महीने में ही 13 मौतें हो चुकी थीं.

लेकिन आजादी के बाद की इस सबसे बड़ी महामारी के प्रति सरकार का रवैया बेहद ही चिंताजनक है. स्वास्थ्य मंत्री बहुत ही निर्लज्जता से झूठ बोलते हैं कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत हुई ही नहीं. मोटे तौर पर अनुमान लगाया जा रहा था कि अप्रैल-मई के महीने में पूरे राज्य में 2 लाख के करीब मौतें हुई हैं, जो हमारी जांच से भी सही साबित हो रहा है. एक दावे के अनुसार यह संख्या 4 लाख से कम नहीं है. इसके बरक्स कोविड से मौत का सरकारी आंकड़ा महज 9646 है, जिसमें कोविड के प्रथम चरण के दौरान हुई 1500 मौतें भी शामिल हैं. अर्थात सरकार मौत का 20 गुना आंकड़ा छुपा रही है. यह एक ऐसा अपराध है जिसके लिए सरकार को कभी माफ नहीं किया जा सकता है. सरकार सच्चाई पर पर्दा डालने के लिए जानबूझकर यह आंकड़ा छुपा रही है.

हमारी पार्टी ने बिहार के 13 जिले के 79 प्रखंडों के 607 पंचायतों के 1904 गांवों में 1 अप्रैल 2021 से लेकर 31 मई 2021 तक अर्थात महामारी के दूसरे चरण के दौरान मारे गए लोगों का आंकड़ा निकाला है. (देखें, परिशिष्ट-1, पेज नंबर- 39). इसके मुताबिक उपर्युक्त जांचे गए 1904 गांवों में 7200 कोविड लक्षणों व 784 लोगों की अन्य कारणों से मौतें हुई हैं. अर्थात कुल 7984 मौतें हुईं. इनमें हमें 1114 व्यक्ति के कोविड पॉजिटिव होने व 320 लोगों के कोविड निगेटिव होने का आंकड़ा मिला है. यह कुल 1434 होता है, जबकि 6550 मृतकों की कोई जांच ही नहीं हुई. अन्य कारणों से मृत 784 लोगों में एक छोटा सा हिस्सा स्वाभाविक या पहले से गंभीर रूप से बीमार लोगों का है. इसका बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का है जो महामारी के कारण अस्पतालों में गैरकोविड मरीजों का इलाज बंद होने व लॉकडाउन के कारण आवागमन बाधित होने से मारे गए. सरकार का फर्ज बनता है कि वह इन्हें भी मुआवजा दे.

हमारे द्वारा जांचे गए गांव बिहार के कुल गांवों के 4 प्रतिशत होते हैं. इनमें ही 7200 कोविड से हुई मौतों का आंकड़ा है,  जबकि बिहार में तकरीबन 50 हजार छोटे.बड़े गांव हैं. इसलिए मौत का वास्तविक आंकड़ा सरकारी आंकड़े के लगभग 20 गुना से अधिक 2 लाख तक पहुंचता है. हमारी टीम शहरों अथवा कस्बों की जांच न के बराबर कर सकी है. यदि हम ऐसा कर पाते तो जाहिर है कि यह आंकड़ा और अधिक हो जाएगा.

कोविड लक्षणों से मृतकों में 15.47 प्रतिशत लोगों की कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई. महज 19.91 प्रतिशत ही कोविड जांच हो पाई. 80.81 प्रतिशत मृतकों की कोई जांच ही नहीं हो पाई, जो कोविड लक्षणों से पीडि़त थे.

कुल मृतकों के आंकड़े में 3957 लोगों ने देहाती, 2767 लोगों ने प्राइवेट व महज 1260 लोगों ने सरकारी अस्पताल में इलाज कराया. यह आंकड़ा साबित करता है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था किस कदर नकारा साबित हुई है और लोगों का विश्वास खो चुकी है. इन मृतकों में महज 25 लोगों को मुआवजा मिल सका है. हाल के दिनों में मुआवजा की संख्या में कुछ वृद्धि हुई होगी.

ये आंकड़े कोविड पर सरकार द्वारा लगातार बोले जा रहे झूठ को बेनकाब करते हैं. यदि इसके प्रति सरकार और हम सब गंभीर नहीं होते हैं, तो आखिर किस प्रकार संभावित तीसरे चरण की चुनौतियाें से निबट पायेंगे?

हर मौत को गिनें, हर गम को बांटें

कोविड-19 की दूसरी लहर अप्रैल.मई के महीनों में अपने चरम पर थी. बिहार में इस महामारी से मरने वालों की सही संख्या को लेकर जारी विवाद अभी तक थमा नहीं है. इस बीच न जाने कितने मृतकों के शव ‘शववाहिनी’ गंगा में बहाये, श्मशान घाटों पर जलाये और कब्रिस्तानों में दफनाये गए होंगे.

भाकपा(माले) की राज्य कमेटी ने बिहार के हर गांव.टोले में कोरोना मृतकों को श्रद्धांजलि देने और साथ ही, उनकी गिनती करने के लिए ‘अपनों की याद कार्यक्रम आयोजित करने की कोशिशें की. इसी दौरान कई जिलों के सैकड़ों गांवों में मृतकों की संख्या और उनके इलाज, कोविड-19 बीमारी की जांच और सरकार की ओर से मृतकों के आश्रितों को दिये जानेवाले मुआवजे की स्थिति और साथ ही, गांव स्तर से लेकर जिला स्तर तक के सरकारी अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था के बारे में भी तथ्य संग्रह किए गए.

भाकपा (माले) पोलित ब्यूरो सदस्य कॉ. कविता कृष्णन, केन्द्रीय कमेटी सदस्य संतोष सहर और केन्द्रीय मुख्यालय के सदस्य अरूण कुमार ने इस अभियान में शामिल होते हुए राज्य के कई जिलों का दौरा किया, कई गांवों में गए और मृतकों के आश्रितों व परिजनों से बातचीत की और उसका ऑडियो-वीडियो डाक्यूमेंटेशन किया.

मोदी-नीतीश की केन्द्र-राज्य सरकारें कोरोना महामारी से निपटने में न केवल पूरी तरह से नाकाम रहीं हैं बल्कि इस सच्चाई से लगातार आंख चुराने की कोशिशों में लगी हुई हैं. प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं कि महामारी मानवता का सवाल है, इसे राजनीति का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए. उनकी यह बात इसकी स्वीकारोक्ति नहीं है कि उनकी राजनीति मानवता के सवालों से संपूर्ण संबंध विच्छेद कर चुकी है?

 उनके ही सुर में सुर मिलाते हुए संघ.भाजपा नेता एक से बढ़कर एक झूठ गढ़ने में लगे हुए हैं. बिहार के भाजपाई स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने तो यहां तक कह दिया कि कोरोना लहर के दौरान बिहार के अस्पतालों में मरीजों को दिए जाने वाले ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं थी. एक की भी मृत्यु ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई है.

मृतकों के परिजनों और बिहार के ग्रामीण क्षेत्रें में रहने वाले लोगों से हुई यह बातचीत एक ओर जहां कोविड-19 की दूसरी लहर की भयावहता, प्राणवायु के अभाव में दम तोड़ते लोगों की बेचारगी और अपने प्रियजनों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देखने वाले परिजनों – माताओं, पत्नियों, भाई-बहनों  की पीड़ा को दर्ज करने की कोशिश है, वहीं यह दूसरी ओर बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और असंवेदशीलता की एक तस्वीर खींचने का भी प्रयास है.

केंद्र.राज्य की भाजपा शासित सरकारें इस महामारी व इसके इलाज से जुड़ी असहमतियों को भी देशद्रोह ठहराने और उसे कुचलने पर अमादा है. ऐसे में असहमति के स्वरों को और भी जोरदार बनाना होगा. ‘तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर, मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता.’

लोगों को अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सुविधायें मिलनी चाहिए. यह उनका अधिकार है.आइये, हम सब मिलकार इसे हासिल करने के लिए मिल-जुल कर संघर्ष करें.

 

स्वस्थ बिहार — हमारा अधिकार आन्दोलन
कोविड की दूसरी लहर का सच

भाकपा (माले) बिहार राज्य कमेटी द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2021

रामनरेश राम-चंद्रशेखर स्मृति भवन

जगतनारायण रोड, कदमकुआं, पटना - 800003

Ph. No. - 0612-2660174

email : cpiml.bihar@gmail.com

www.cpiml.net

Whatsapp No. - 9308541057

 

संविधान बचाओ, नागरिकता बचाओ, लोकतंत्र बचाओ !
सीएए, एनपीआर और एनआरसी का विरोध करो !

भाजपा सरकार ने दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून पास कर दिया. पूरे देश में इसका विरोध हो रहा है.

लोगों ने सही समझा है कि नागरिकता कानून संविधान के खिलाफ है और सांप्रदायिक है. इसके साथ जब एनआरसी भी मिल जायेगा तो यह मुसलमान नागरिकों को ''घुसपैठिया'' और बाकी नागरिकों को ''शरणार्थी'' में तब्दील कर देगा.

बहुत सी जगहों पर इंटरनेट बंद कर दिया गया है, सड़क और रेल यातायात पर भी रोक लगायी जा रही है, भाजपा शासित राज्यों में में धारा 144 लगा दी गई है. इस कानून का विरोध करने वाले छात्रों व अन्य नागरिकों को पीटा जा रहा है, उन पर गोलियां चलायी जा रही हैं. कुछ प्रदर्शनकारियों की आंखें चली गई हैं तो कुछ की हत्यायें की गई हैं.

नागरिकता संशोधन कानून और देश भर में एनआरसी के खिलाफ जनता का आंदोलन भारत के संविधान, लोकतंत्र और एकता को बचाने का आंदोलन है.

भारत ही नहीं पूरी दुनिया भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से मोदी-शाह की जोड़ी दबाव में है. वे नागरिकता कानून और एनआरसी के बारे में झूठ बोल रहे हैं. वे विरोध प्रदर्शनों के बारे में भी झूठ फैला रहे हैं.

सरकार आपसे झूठ बोल रही है.
ज्यादातर मीडिया आपसे झूठ बोल रहा है.
आपको सच जानने का हक है.

सरकार के झूठ के बारे में जानिए. हकीकत को पहचानिए.

हम भारत के लोग सरकार चुनते हैं
सरकार कौन होती है कि वो लोगों को चुने ?

हमारे संविधान में इस बात की गारंटी की गई है कि भारत के लोग वोट देकर अपनी सरकार चुनें और उसे अपने हिसाब से चलायें. संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता कि सरकार तय करे कि देश में किन्हें वोट का हकदार माना जायेगा और किन्हें नहीं. हमारे संविधान की सर्वप्रथम लाइन है ‘हम भारत के लोग’ – न कि ‘हम भारत के लोग जिनके पास ऐसे दस्तावेज़ हैं जिनसे साबित होता है कि हम भारत के हैं’ या कि ‘हम भारत की सरकारें जोकि यह तय करती हैं कि कौन लोग भारत के हैं’!

डा. अम्बेडकर द्वारा 1950 में बनाया गया भारत का संविधान भारतीय नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता है. संविधान के अनुसार भारत की नागरिकता को ‘हिन्दू’ या ‘मुसलमान’ के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता है. भारत में कोई चाहे पश्चिमी पाकिस्तान से प्रवेश करे, या पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंगलादेश) से, संविधान किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता. हमारा संविधान, अथवा देश का 1955 में बना मूल नागरिकता कानून, किसी को भी ‘गैरकानूनी आप्रवासी’ नहीं कहता.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कभी भी भारत का संविधान और उसकी धर्मनिपेक्ष भावना का समर्थन नहीं किया. वे तो ‘मनुस्मृति’ को भारत का संविधान बना देना चाहते थे. आजादी के आंदोलन के दौरान, और आजादी मिलने के बाद भी, वे केवल धर्म के आधार पर लोगों और देश को बांटने की कोशिशें लगातार करते रहे हैं.

चुनी हुई सरकारों को संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है. लेकिन भाजपा-राजग सरकारें हमेशा इसी में लगी रहती हैं कि कैसे संविधान के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक स्वरुप को खत्म कर दिया जाय!

2003 में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में बनी राजग सरकार ने संविधान को कमजोर करने के उद्देश्य से नागरिकता कानून 1955 में संशोधन कर उसमें ‘गैरकानूनी प्रवासी’ तथा ऐसे लोगों जिनके माता-पिता में से कोई एक ‘गैरकानूनी प्रवासी’ हो को नागरिकता से वंचित करने का प्रावधान डलवा दिया. इसमें ‘गैरकानूनी प्रवासी’ की परिभाषा को जानबूझ कर अस्पष्ट रखा गया है, जिससे सरकार के पास मनमाने तरीके से किसी को भी ‘गैरकानूनी प्रवासी’ घोषित करने का अधिकार आ गया है. 2003 के उसी संशोधन के जरिये वाजपेयी सरकार ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) बनवाने का प्रावधान भी करवा दिया, इसी रजिस्टर में से ‘संदिग्ध’ नागरिकों को अलग छांटा जायेगा और फिर उनसे कहा जायेगा कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) में अपना नाम शामिल करवाने के लिए कागजात दिखायें. कागजात/दस्तावेज़ न दिखा पाने की स्थिति में उन्हें ‘गैरकानूनी प्रवासी’ (या घुसपैठिया) घोषित किया जा सकता है. वाजपेयी काल में कानून में हुये इस बदलाव से एक ‘स्थानीय रजिस्ट्रार’ अब किसी भी नागरिक को ‘संदिग्ध’ घोषित कर सकता है, जिसके बाद सरकार के पास यह अधिकार है कि कागजात दिखाने में असमर्थ होने पर ऐसे ‘संदिग्ध’ नागरिकों को वह परेशान कर सकती है, यहां तक कि उन्हें ‘गैरकानूनी प्रवासी’ घोषित कर सकती है. नागरिकता कानून में तब हुए इस संशोधन के कारण स्थानीय प्रशासन और राष्ट्रीय सरकार (भ्रष्ट, गरीब-विरोधी या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों के कारण) संविधान के मौलिक सिद्धांतों के विरुद्ध मनमाने नियम बना कर किन्ही व्यक्तियों या समुदायों को ‘संदिग्ध’ नागरिक अथवा ‘गैरकानूनी प्रवासी’ घोषित कर सकती हैं.

वाजपेयी सरकार ने तब जो क्षति पहुंचायी थी, उसे नागरिकता संशोधन कानून 2019 ने कई गुना गहरा कर संविधान की मूल भावना को पूरी तरह नष्ट कर दिया है. इसमें आवेदक की धार्मिक पहचान के आधार पर भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान लाया गया है. मोदी-शाह सरकार का सीएए-एनपीआर-एनआरसी प्रोजेक्ट उसी संविधान विरोधी एजेंडा को आगे बढ़ा रहा है जिसकी नींव वाजपेयी सरकार ने रखी थी. इससे भारतीयों की नागरिकता और वोट देने का अधिकार भ्रष्ट, गरीब-विरोधी या साम्प्रदायिक सरकार व उसके अधिकारियों की दया पर निर्भर हो गया है.

नागरिकता संशोधन कानून क्या है?

यह 1955 के नागरिकता कानून में किया गया संशोधन है. यह संशोधन पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसम्बर 2014 के पहले आ चुके गैरमुसलमान - यानी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई – शरणार्थियों को जल्दी से नागरिक बनाने का प्रावधान करता है. पहले नागरिक बनने के लिए भारत में बारह साल रहना अनिवार्य था. यह संशोधन इन शरणार्थियों के लिए भारत में निवास की अवधि घटा कर 6 साल कर देता है.

फिलहाल भारत में ऐसे शरणार्थी कितने है?
अभी उनकी नागरिकता की क्या स्थिति है?

2016 में नागरिकता संशोधन विधेयक पर सुनवाई कर रही संसदीय समिति को इन्टेलिजेन्स ब्यूरो (आई.बी.) ने बताया था कि दिसम्बर 2014 के पहले पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से भारत आये गैर-मुसलमान शरणार्थियों की संख्या 31,313 थी.

2011 में यूपीए सरकार ने शरणार्थियों को लम्बे समय तक का वीजा हासिल करने के सिलसिले में एक प्रक्रिया (स्टैण्डर्ड ऑपरेशन प्रॉसीजर) बतायी थी. लम्बी अवधि का वीजा प्राप्त करने के बाद शरणार्थी न केवल पैन कार्ड, आधार कार्ड, और ड्राइविंग लाइसेन्स आदि बनवा सकते थे बल्कि सम्पत्ति भी खरीद सकते थे.

2011 से 2014 के बीच यूपीए सरकार ने पड़ोसी देशों से आये 14,726 शरणार्थियों को लम्बी अवधि का वीजा दिया. इनमें से ज्यादातर हिन्दू थे. 2011 से 2018 के बीच 30,000 लोगों को लम्बी अवधि का वीजा दिया गयादेखें ‘India relaxes rules for long-term visa holders, to grant Pakistani minorities more rights’, India Today, 17 July, 2018.

इस तरह देखा जाये तो नागरिकता संशोधन कानून के जरिये जिन लोगों को लाभ पहुंचाने की बात की जा रही है उनमें से ज्यादातर लोगों को पहले ही लम्बी अवधि का वीजा मिल चुका है. वे भारत में अपनी जीविका कमा सकते हैं, पैन कार्ड, आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेन्स आदि बनवा सकते हैं, साथ ही अपने परिवार के लिए घर भी खरीद सकते हैं.

क्या नागरिकता कानून 1955 पड़ोसी देशों से भारत आये लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान नहीं करता था ?

हॉं. नागरिकता कानून 1955 के तहत कोई भी विदेशी व्यक्ति भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है. नागरिकता कानून की धारा 5 के तहत पंजीकरण के जरिये और धारा 6 के तहत नेचुरलाइजेशन (देशीकरण) के जरिये नागरिकता हासिल की जा सकती है.

जब शरणार्थी लम्बी अवधि के वीजा के जरिये तमाम सुरक्षायें हासिल कर सकते हैं और नागरिकता के लिए आवेदन भी कर सकते हैं तो सरकार नागरिकता संशोधन कानून पर ही जोर क्यों दे रही है ?

नागरिकता संशोधन कानून की एकमात्र उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह धर्म के आधार पर शरणार्थियों के साथ भेदभाव करता है और गैरमुसलमान शरणार्थियों को बारह साल भारत में रहने की जगह 6 साल में ही नागरिकता दे कर उन्हें मतदाता बनाता है.

नागरिकता संशोधन कानून की तैयारी में मोदी-शाह सरकार ने लम्बी अवधि के वीजा के नियमों में पहले ही बदलाव कर दिया था. सितम्बर 2015 के गजट में बदले हुए नियम ‘बंगलादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों - यानी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई - के 31 दिसम्बर 2014 से पहले भारत आये शरणार्थियों’ के लिए लम्बी अवधि के वीजा का प्रावधान करता है. ऐसे शरणार्थी वैध कागजात के साथ आये, अवैध कागजात के साथ आये या पुराने पड़ चुके कागजात के साथ आये, इससे फर्क नहीं पड़ता. दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी-शाह सरकार ने लम्बी अवधि के वीजा नियमों को पहले ही नागरिकता संशोधन कानून के अनुरूप बना लिया थादेखें - https://mha.gov.in/PDF_Other/AnnexVI_01022018.pdf.

ध्यान रखने की बात है कि 2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश से भारत आ चुके गैरमुसलमान शरणार्थियों के पास पहले ही पैन कार्ड, आधान कार्ड, ड्राइविंग लाइसेन्स और संम्पत्ति खरीदने के अधिकार हैं. तो नागरिकता संशोधन कानून उन्हें ‘अतिरिक्त’ क्या देता है?  यह संशोधन उन्हें वोट का अधिकार देता है. पहले भारत आने के बारह साल के बाद वोट का अधिकार दिया जा सकता था, अब छह साल बाद. लेकिन म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों, श्रीलंका के तमिल शरणार्थियों, या पाकिस्तान/अफगानिस्तान के अहमदिया और हजारा शरणार्थियों और बंगलादेश से आयी तस्लीमा नसरीन जैसी शरणार्थियों के लिए यह कानून छह साल में वोट देने के अधिकार नहीं देता है.

तो नागरिकता संशोधन कानून की एकमात्र खासियत है उसका साम्प्रदायिक होना.

भाजपा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगलादेश से आये गैरमुसलमान शरणार्थियों को तुरत-फुरत नागरिक बना कर वोट देने का अधिकार क्यों देना चाहती है और रोहिंग्या, तमिल, अहमदिया, हजारा और मुसलमान राजनीतिक शरणार्थियों को यही अधिकार क्यों नहीं देता चाहती ?

भाजपा तीन कारणों से नागरिकता संशोधन कानून पर जोर दे रही है.

1.    भाजपा बंगलादेश से आये हुए हिन्दुओं को असम और पश्चिम बंगाल में अपने वोट बैंक की तरह देख रही है. भाजपा नेता और असम के वित्त मंत्री हिमन्ता विश्वसर्मा ने असम के टीवी चैनल ‘जीप्लस’ को जनवरी 2019 में दिये गये इण्टरव्यू में बताया था कि ‘नागरिकता संशोधन बिल हमें असम की 17 सीटों को अगले दस साल तक जीतने में मदद करेगा. इन जगहों पर अगर आप दस हजार बंगाली हिन्दुओं के वोट घटा दीजिये तो ये सीटें यूएमएफ या यूडीएफ के पास चली जायेंगी. हम कई सीटें हारने की कगार पर हैं. अगर हम नागरिकता संशोधन बिल तुरन्त नहीं लाते तो हम 17 सीटें हार जायेंगे. जो लोग 31 दिसम्बर 2014 के पहले असम में आ चुके हैं उन्हें आप बाहर नहीं कर सकते, तो आप उन्हें क्या सहूलियत देने जा रहे हैं ? हम उन्हें वोट देने का अधिकार देंगे. इस सहूलियत के जरिये फिलहाल हमारी 17 सीटें बची रहेंगी.

2.    भाजपा – आरएसएस का नागरिकता संशोधन कानून से इसलिए भी लगाव है कि यह भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को तोड़ता है और धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान करता है. इससे पहले के कानूनों के तहत कोई भी शरणार्थी या प्रवासी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता था. सरकार हर व्यक्ति के आवेदन पर विचार करने के बाद उसे नागरिकता देने या न देने का निर्णय ले सकती थी. नागरिकता संशोधन कानून के माध्यम से पहली बार भारतीय नागरिकता को धर्म से जोड़ दिया गया है.

3.    तीसरा कारण है कि नागरिकता संशोधन कानून के साथ एनआरसी लाकर मोदी-शाह सरकार मुसलमानों की नागरिकता छीनना चाहती है. अप्रैल 2019 में अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिला के कालिम्पोंग में एक चुनावी रैली को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ‘हमने हमारे घोषणापत्र में वादा किया है कि दुबारा नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद देशभर के अन्दर एनआरसी बनाया जायेगा और एक एक घुसपैठिये को चुन चुन कर निकालने का काम ये बीजेपी सरकार करेगी. और जितने भी हिन्दू, बौद्ध शरणार्थी आये हैं सारे को ढूंढ़ ढूंढ़ कर भारत की नागरिकता देने का काम भी बीजेपी सरकार करने वाली है Indian Express, April 12, 2019. उत्तरी दीनाजपुर के रायगंज में एक दूसरी रैली को सम्बोधित करते हुए शाह ने कहा कि अवैध घुसपैठिये दीमक की तरह हैं हम पश्चिम बंगाल के भीतर एक एक बंगलादेशी घुसपैठिये की पहचान करेंगे और उन्हें बाहर खदेड़ देंगे. हम हिन्दू, बोद्ध, सिख और जैन शरणार्थियों को भारत की नागरिकत देंगेIndian Express, April 12, 2019.

4.     पश्चिम बंगाल के बनगांव में शाह ने साफ कर दिया कि नागरिकता संशोधन कानून उन गैरमुसलमानों को सुरक्षा देगा जो पूरे देश की एनआरसी लिस्ट से बाहर रह जायेंगे ‘पहले नागरिकता संशोधन कानून पास करेंगे ताकि पड़ोसी देशों से आये शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जा सके, उसके बाद एनआरसी आयेगा और हम एक एक घुसपैठिये की पहचान करके उसे अपने देश से बाहर खदेड़ देंगे.’

क्या हमें शरणार्थियों की मदद नहीं करनी चाहिए?

मैंने सुना है कि पाकिस्तान में गैरमुसलमानों की जनसंख्या 23 प्रतिशत से घट कर 3 प्रतिशत रह गई है – कितना सच है?

संसद में नागरिकता कानून पर बहस के दौरान अमित शाह ने दावा किया कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की जनसंख्या 1947 में 23 प्रतिशत थी जोकि 2011 में सिर्फ 3.7 प्रतिशत रह गई. ये पूरी तरह झूठ है. अमित शाह ने कहा ‘1947 में पाकिस्तान के अन्दर अल्पसंख्यकों की आबादी 23 प्रतिशत थी और 2011 में वो घट कर 3.7 प्रतिशत हो गई. बंगलादेश में 1947 में अल्पसंख्यकों की आबादी 22 प्रतिशत थी और 2011 में वो कम हो कर 7.8 प्रतिशत हो गई. कहां गये ये लोग ? या तो उनका धर्म परिवर्तन हुआ, या वे मार दिये गये, या भगा दिये गये, या भारत आ गये.’

तथ्यों की पड़ताल करने पर पता चला कि

‘1. पाकिस्तान में गैरमुसलमान जनसंख्या कभी भी 23 प्रतिशत नहीं थी.

2. अविभाजित पाकिस्तान में भी (बंगलादेश बनने के पहले) गैरमुसलमान जनसंख्या कभी 15 प्रतिशत भी नहीं थी (1951 में यह 14.2 प्रतिशत थी)

3. अगर हम आज के पाकिस्तान (जिसे पहले पश्चिमी पाकिस्तान करते थे) में गैरमुसलमानों की आबादी की बात करें तो यह 1951 में 3.44 प्रतिशत थी.

4. जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि पाकिस्तान में गैरमुसलमानों की जनसंख्या 3.5 प्रतिशत के आसपास घूमती रही है No, Pakistan's non-Muslim population didn't decline from 23% to 3.7% as BJP claims’, India Today, 12 December 2019.’

5. पूर्वी पाकिस्तान में 1951 में आबादी 23 प्रतिशत थी. शाह ने गुमराह करने के लिए दो अलग अलग आंकड़ों को एक साथ मिला कर बता दिया है - पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंगलादेश) का 1951 को आंकड़ा और आज के पाकिस्तान (तब जो पश्चिमी पाकिस्तान था) का आज का आंकड़ा. इसे झूठ बोलना कहते हैं.

6. यह सच है कि गैरमुसलमानों का प्रतिशत बंगलादेश में 23 प्रतिशत से घट कर आज 10 प्रतिशत से नीचे आ गया है. इसका प्रमुख कारण बंगलादेश के मुक्ति संग्राम के समय व अन्य मौकों पर भारी संख्‍या में हुआ लोगों का पलायन है. वहां आबादी के अनुपात में आया बड़ा अंतर किसी अन्य कारण से नहीं है. भाजपा एक ओर कहती है कि बंगलादेश में मुसलमानों का अनुपात बढ़ा है, और दूसरी ओर कहती है कि भारत में बंगलादेशी मुसलमान घुसपैठिये बन कर आ गये हैं - अब दोनों बातें एक साथ कैसे सच हो सकती हैं? हॉं, वहां से हिन्दू आबादी बड़ी संख्या में आयी थी, यह निर्विवाद है. भाजपा गलत प्रचार करके देश को गुमराह कर रही है.

क्या भारत को शरणार्थियों की मदद करनी चाहिए? जरूर. लेकिन हमें धर्म के आधार पर शरणार्थियों से भेदभाव नहीं करना चाहिए.

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अहमदिया और हजारा समुदाय के लोगों का उत्पीड़न होता है लेकिन हम उन्हें ‘मुसलमान’ मात्र समझते हैं. म्यांमार के रोहिंग्या, चीन के उइगर मुसलमान और श्रीलंका के तमिल हमारे पड़ोस के उत्पीडि़त समुदाय हैं.

‘घुसपैठियों’ के बारे में क्या राय है?

‘घुसपैठिया’ शब्द ही पूर्वाग्रह और नफ़रत से भरा हुआ है. बिना दस्तावेज़ों के प्रवासी ‘घुसपैठिए’ नहीं होते हैं. ग़रीब रोजी की खोज में आते हैं, तो शरणार्थी उत्पीड़न से बचने के लिए. हमें शरणार्थियों और प्रवासियों, दोनों के बारे में मानवीय दृष्टिकोण रखना होगा. दस्तावेज़ों के बिना आए प्रवासी ''गैर-क़ानूनी'' नहीं हैं. कोई भी मनुष्य गैर-क़ानूनी नहीं होता.

नागरिकता संशोधन कानून का भारत की विदेश नीति पर क्या असर होगा?

बांग्लादेश के गठन के समय से ही भारत और बांग्लादेश में गहरी दोस्ती रही है. आज घरेलू स्तर पर भाजपा की साम्प्रदायिक नीतियों का पक्ष लेकर मोदी सरकार विदेश नीति में ज़हर घोल रही है और अब तक की गर्मजोशी भरी दोस्तियों को शत्रुतापूर्ण सम्बन्धों में बदल रही है. इस साम्प्रदायिक भेदभाव का बड़ा उदाहरण है कि भारत सरकार वीज़ा की अवधि समाप्त होने के बावजूद भारत में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों के साथ भेदभाव कर रही है. गैर-मुसलमान बांग्लादेशी नागरिक के लिए दो साल से ज़्यादा समय के लिए पाँच सौ रूपए, 91 दिन से दो साल तक की अवधि के लिए दो सौ रूपए और 90 दिन तक की अवधि के लिए सौ रूपए का जुर्माना लगा रही है. लेकिन बांग्लादेश के मुसलमान नागरिकों के लिए इसी अवधि के लिए जुर्माने की रक़म डॉलर में है. यह क्रमशः 500 डॉलर [35 हज़ार रूपए], 400 डॉलर [28 हज़ार रूपए] और 300 डॉलर [21 हज़ार रूपए] है.‘India's new visa penalty discriminates on religious lines, say Bangladesh officials’, The Hindu, December 10, 2019

लेकिन जब देश का बंटवारा हुआ तो क्या मुसलमानों ने अपने लिए एक अलग देश पकिस्तान नहीं बनाया?
कांग्रेस ने उस समय बंटवारे को स्वीकार कर लिया था?
अगर पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र है तो क्या भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं होना चाहिए?
क्या मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं चले जाना चाहिए?

अमित शाह ने नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में बोलते हुए संसद में यही सब कहा. लेकिन ये सरासर झूठ है. सबसे पहले 1923 में सावरकर ने हिन्दू महासभा के घोषणापत्र ‘हिन्दुत्व’ में दो राष्ट्रों का सिद्धांत दिया था. इसके सोलह साल बाद जिन्ना और मुस्लिम लीग ने भी दो राष्ट्रों के सिद्धांत की वकालत की. दो राष्ट्रों के सिद्धांत का मतलब है कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग अलग राष्ट्र हैं और वे एक साथ नहीं रह सकते.

जिन्ना द्वारा दो राष्ट्र के सिद्धांत की हिमायत के तीन साल पहले 1937 में हिन्दू महासभा के उन्नीसवें सत्र के दौरान सावरकर ने एक बार फिर कहा कि - ‘भारत में दो परस्पर शत्रुतापूर्ण राष्ट्र रह रहे हैं ... भारत को एकीकृत राष्ट्र नहीं माना जा सकता क्योंकि आज भारत में हिन्दू और मुसलमान दो परस्पर विरोधी राष्ट्र मौजूद हैं.विनायक दामोदर सावरकर, समग्र सावरकर वांग्मय : हिन्दू राष्ट्र दर्शन, वोल्यूम 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिन्दू सभा, पूना, 1963, पृष्ठ 296.

कांग्रेस ने दो राष्ट्र का सिद्धांत स्वीकार नहीं किया लेकिन उन्हें पाकिस्तान के गठन की मांग के आगे झुकना पड़ा. इस तरह भारत एक धमर्निरपेक्ष राष्ट्र बना और इसका संविधान धर्मनिरपेक्ष है. यह संविधान मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों व अन्य सभी धर्मों को उतना ही महत्व देता है जितना कि हिन्दू धर्म को. आज भारत में रहने वाले मुसलमानों ने उस समय पाकिस्तान न जाने का चुनाव किया और भारत को अपनी मातृभूमि के रूप में स्वीकार किया.

सावरकर ने अपने दो राष्ट्र के सिद्धांत में मुसलमानों को हिंदू राष्ट्र में स्वीकार न करने की बात कही और साथ ही साथ मुसलमानों के लिए अलग देश की माँग का विरोध भी किया. तब सवाल यह उठता है कि भारत के हिंदू राष्ट्र बन जाने की हालात में मुसलमानों का क्या होता? आरएसएस के गोलवलकर ने मुसलमानों के बारे में कहा कि “…भारत में रहने के लिए उन्हें इस हिंदू राष्ट्र में अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी और हिंदू नस्ल में घुल जाना होगा, या फिर उन्हें हिंदू राष्ट्र में दोयम दर्जे के नागरिक की तरह रहना होगा. जहाँ उन्हें न तो नागरिकता के अधिकार होंगे, न ही किसी अन्य तरह की सहूलियत प्राप्त होगी.M. S. Golwalkar, We or Our Nationhood Defined, 1938, p. 47-48 साफ है कि जो लोग एनआरसी में अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएँगे और नागरिकता संशोधन कानून के जरिये जिन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी, उनका यही भविष्य होने जा रहा है.

आरएसएस ने आजादी की लड़ाई में भागीदारी नहीं की लेकिन उसने देश के विभाजन के दौरान साम्प्रदायिक हिंसा में बड़े पैमाने पर भागीदारी की. (बॉक्स में देखें)

यदि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इस्लामी देश हैं तो भारत को हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं होना चाहिए?

पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य है. इस्लाम वहाँ का राज्य-धर्म है. इसी तरह बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी इस्लामी राज्य हैं. लेकिन डॉक्टर अम्बेडकर द्वारा बनाया गया भारतीय संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष देश के बतौर परिभाषित करता है जिसका कोई आधिकारिक राज्य-धर्म नहीं है. इसका मक़सद भारत की अनेकता में एकता और विलक्षण बहुलतावाद की रक्षा करना था. भारत के कानून और संविधान, धर्म के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देते.

किसी एक संस्कृति को सब पर थोपने की कोशिशों से देश एकजुट नहीं होता बल्कि बँट जाता है. पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. पाकिस्तान की स्थापना इस्लामी देश के बतौर हुई थी लेकिन बांग्लादेश उससे टूट कर अलग हो गया क्योंकि बांग्लादेश के मुसलमानों को महसूस हुआ कि उन्हें भाषा के आधार पर उत्पीड़ित किया जा रहा है. पाकिस्तान विविधता का सम्मान नहीं कर सका जिसके चलते बांग्लादेश बना.

भारत विभाजन के समय मुस्लिमों के कत्लेआम में आरएसएस की भूमिका

हिन्दू महासभा के नारायण भास्कर खरे को 18 अप्रैल 1947 को अलवर का प्रधानमंत्री और साथ ही साथ भरतपुर रियासत का सलाहकार बनाया गया था. खरे की देखरेख में मेव मुसलमानों का बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ था. मेव मुसलमान एक अलग राजपूत मुसलमान समुदाय है जिनके बहुत से रीतिरिवाज हिन्दुओं व राजपूतों के रिवाजों जैसे ही हैं. एक इतिहासकार ने लिखा ‘जुलाई 1947 में अलवर में हिन्दू महासभा का सम्मेलन हुआ. कुछ ही दिनों बाद खरे द्वारा अलवर और भरतपुर में हथियारों की छोटी फैक्ट्रियां लगाई गईं.

18 जून 1947 को भरतपुर से लेकर अलवर तक और अलवर से लेकर दूसरी अन्य तहसीलों तक मेव मुसलमानों के साथ बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ. इतिहासकार शैल मायाराम ने अलवर राज्य की सेना के एक कप्तान का ‘सफाये’ के बारे में बयान दर्ज किया है. उन दिनों बड़े पैमाने पर हत्याओं को 'सफाया' और जबरन धर्मान्तरणों को ‘शुद्धि’ कहा जाता था –

‘मैं महामहिम तेज सिंह का एडीसी था. हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में थे. पूरे राज्य से मुसलमानों का सफाया करने का आदेश मिला था. मुझे खास काम के लिए तिजारा भेजा गया था ... मैंने वहां जा कर अपनी फौज को एक पहाड़ी पर तैनात कर दिया’ नीचे की घाटी में दस हजार मेव मुसलमान थे. ‘हमने एक-एक को मार डाला. सभी मारे गये.’

इसके बाद गांव गांव में सेना पहुंची, उनके साथ 'शुद्धि दल' के लोग भी थे. उन्होंने मेव मुसलमानों को मजबूर किया कि यदि वे जिन्दा रहना चाहते हैं तो सूअर का मांस खायें और इस्लाम छोड़ दें. आखिरी लड़ाई नवगांमा में हुई ‘ये मेव मुसलमानों का गढ़ था, हमने सबको काट डाला.’ मेव भाग कर जहां भी गये मारे गये ‘हमें पूरे इलाके को साफ करने में जुलाई और अगस्त के दो महीने लग गये.’

खरे गर्व से बताते हैं ‘इसके चलते आज पूरे अलवर राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा है ... इस तरह से कई शताब्दियों से राज्य में चली आ रही मेव समस्या  का समाधान कर दिया गया.’

इसी तरह की भाषा में हिटलर यहूदियों के जनसंहार को ‘आखिरी समाधान’  कहता था. अल्पसंख्यकों को 'समस्या' मानना और उनके जनसंहार को 'समाधान' मानने को ही तो दुनिया हिटलरशाही कहती है और इसे इंसानियत पर कलंक मानती है.

नेहरू स्मृति संग्रहालय व पुस्तकालय की मौखिक इतिहास परियोजना के लिए दिये गये इण्टरव्यू में खरे बहुत खुशी खुशी बताते हैं कि आरएसएस नेता बी.एस. मुंजे इस हत्याकाण्ड से बहुत खुश थे –

‘मैंने अलवर में मुसलमानों के साथ जो किया उससे मुंजे बहुत खुश थे ... उन्होंने मुझे नासिक बुलाया और गले लगा लिया ... मैंने अलवर में जो कुछ भी किया और जिस तरह मुसलमानों की कमर तोड़ दी उससे डॉक्टर मुंजे को सबसे ज्यादा खुशी मिली.’

गांधी 19 दिसंबर 1947 को मेवात गये और उन्होंने 100,000 विस्थापित मेव लोगों को मनाया कि वे अलवर और भरतपुर वापस लौट जायें. हालांकि इस पहल के बाद भी सांप्रदायिक तत्वों के हमले नहीं रुके. 1941 की जनगणना में अलवर में मुसलमानों की जनसंख्या 26.2 प्रतिशत और भरतपुर में 19.2 प्रतिशत थी. इन हत्याकाण्डों, धर्मपरिवर्तनों और विस्थापन के बाद दोनों ही राज्यों में यह जनसंख्या घट कर 6 प्रतिशत रह गई. ‘उनकी लगभग दो-तिहाई जमीनें छीन ली गई.’देखें : ‘Alwar's Long History of Hindutva Casts a Shadow Even Today’, Kannan Srinivasan, The Wire, 29 January 2018. This piece quotes extensively from work by the historian Shail Mayaram

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा भारत का एक और खूनी विभाजन चाहते हैं, और अधिक साम्प्रदायिक हिंसा चाहते हैं. अंग्रेजी राज की तरह ही आज भाजपा और संघ हमें बांट कर राज करना चाहते हैं.

 

यदि आज भाजपा पूरे देश पर ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक धर्म’ थोपने की कोशिश करती है तो भारत के बिखरने का खतरा मौजूद हो जाएगा. विविधता का सम्मान करने से एकजुटता में मदद मिलती है.

uttarpradesh

 

एनआरसी क्या है ?

प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह कई मौकों पर साफ कर चुके हैं कि एनआरसी ‘अवैध घुसपैठियों’ की पहचान करने और उन्हें बाहर निकालने का औजार है. प्रधानमंत्री मोदी ने अप्रैल 2019 में टाइम्स नाउ को दिये इंण्टरव्यू में खुद ही यह बात कहीhttps://www.youtube.com/watch?v=ffGW_keVL9A. अमित शाह ये बार बार कहते आये हैं जैसा कि हम पहले बता चुके हैं.

विरोध प्रदर्शनों के बाद अब भाजपा कह रही है कि ‘नागरिकता संशोधन कानून भारत के मौजूदा नागरिकों को प्रभावित नहीं करेगा’. लेकिन देश भर में होने वाली एनआरसी देश के हर नागरिक की नागरिकता को संदेह के घेरे में डाल देगी. एनआरसी के मुताबिक ‘नागरिक’ कौन है और ‘अवैध घुसपैठिया’ कौन है? सरकार ने इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण दिया है. असम में एनआससी पहले ही हो चुका है इससे हमें अंदाजा मिल जायेगा कि पूरे देश में होने वाला एनआरसी कैसा होगा.

असम में एनआरसी का अनुभव कैसा रहा ?

असम में एनआरसी के अनुसार केवल उन्हें ही नागरिक माना जायेगा जो निम्न दस्तावेज दिखा सकें :

1.    उनकी पहले की पीढ़ी के लोग 1971 के पहले भारत आ चुके थे.
2.    मौजूदा पीढ़ी उन्हीं लोगों की वंशज है.

जाहिर है कि ऐसे दस्तावेज दिखा सकना बहुत मुश्किल था. गरीबों, महिलाओं, ट्रांसजेण्डर लोगों, दलितों, आदिवासियों, प्रवासी मजदूरों और समाज के सबसे कमजोर तबकों के लोगों के लिए यह और भी ज्यादा मुश्किल था.

इसके चलते 19 लाख से ज्यादा लोग असम की एनआरसी लिस्ट से बाहर हो गये. ये 19 लाख लोग ‘गैरकानूनी घुसपैठिये’ नहीं हैं. ये ऐसे भारतीय हैं जिनके पास अपने पूर्वजों से रिश्ता साबित करने वाले दस्तावेज नहीं हैं. इस तरह असम की एनआरसी एक बड़े मानवीय संकट और त्रासदी में बदल गई है. असम की एनआरसी से कोई भी खुश नहीं है. यहां तक कि भाजपा भी खुश नहीं है.

इतनी तकलीफदेह प्रक्रिया के बावजूद एनआरसी ‘दूध और पानी को अलग’ नहीं कर सका. यह अंतिम तौर पर तय नहीं हो पाया कि कौन भारतीय है और कौन ‘अवैध घुसपैठिया’. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने के बावजूद यदि एनआरसी इतनी बड़ी तबाही लेकर आया है तो फिर इसे पूरे देश में लागू करने का क्या मतलब है?

पूरे देश में एनआरसी के लिए कट-ऑफ की तारीख क्या होगी ?

असम में एनआरसी के लिए 24 मार्च 1971 कट-ऑफ तारीख तय की गई थी. इसका कारण था असम समझौते का विशेष प्रावधान जिसमें कहा गया था कि 1971 में बंगलादेश बनने के पहले जो भी लोग असम में प्रवेश कर चुके थे उन्हें नागरिक माना जाये. पूरे देश के लिए इससे मिलती जुलती तारीख 19 जुलाई 1948 हो सकती है.

तो क्या पूरे देश में एनआरसी के लिए कट-आफ तारीख 19 जुलाई 1948 होगी?

यह साफ नहीं है. मोदी-शाह सरकार तारीख और दूसरी जानकारियों के मामले में साफ साफ नहीं बोल रही है.

असम एनआरसी की अंतिम लिस्ट को खारिज करते हुए केन्द्र सरकार और असम के भाजपा नेताओं ने कहा था कि पूरे देश में एनआरसी का मतलब है असम में भी एनआरसी की प्रक्रिया फिर से होगी. उन्होंने यह भी कहा कि ‘एक राष्ट्र - एक कट-ऑफ तारीख’. इसका मतलब है कि पूरे देश के लिए कट-ऑफ तारीख या तो 1971 होगी, या उससे पहले का कोई साल जैसे कि 1966, 1961 या 1951.

एक खबर में बताया गया कि ‘गृह मंत्रालय में सूत्रों ने बताया है कि असम में एनआरसी की तारीख मौजूदा कट-ऑफ 1971 से पहले की तय की जा सकती है. एक अधिकारी ने बताया ‘एक देश में दो अलग अलग तरीके नहीं हो सकते. अगर पूरे देश में एनआरसी होती है तो वही कट-ऑफ तारीख और वही प्रक्रिया असम में भी लागू की जायेगी.’‘Will 1971 Remain Cut-off for Assam? Centre Mulls Advancing Year Before Rolling Out Pan-India NRC’, CNN News18, 21 November 201

एक अन्य खबर में कहा गया कि असम की भाजपा सरकार चाहती है कि 31 अगस्त 2019 को जारी एनआरसी की अंतिम सूची को केन्द्र सरकार खारिज कर दे और नया नागरिकता रजिस्टर बनाने के लिए ‘1971 की जगह 1951 की कट-आॅफ तारीख लागू करे जोकि पूरे देश पर भी लागू हो.‘Assam final NRC boomerangs’, The Telegraph, 21 November 2019

लेकिन क्या केन्द्र सरकार ने स्पष्ट नहीं कर दिया है कि पूरे देश में होने वाली एनआरसी के लिए वैसे कागजात की जरूरत नहीं होगी जैसे असम की एनआरसी के लिए जरूरी थे?

देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के चलते केन्द्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के बारे में बिना अपने हस्ताक्षर के सवाल-जवाब की शैली में स्पष्टीकरण जारी कियाhttps://pibindia.wordpress.com/2019/12/20/q-a-on-nrc-national-register-of-citizens/.

इस स्पष्टीकरण में कहा गया है कि एनआरसी में ‘माता-पिता के द्वारा या माता-पिता के बारे में कोई भी कागज जमा करने की कतई अनिवार्यता नहीं है.’ अपने जन्म का प्रमाणपत्र ही दिखाना काफी होगा. लेकिन उन्होंने एक चोर दरवाजा भी खोल रखा है और कहा है कि ‘कौन से दस्तावेज स्वीकार किये जायेंगे इस पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है’.

सरकार का ‘स्पष्टीकरण’ झूठ का पुलिन्दा है. तथ्यों की पड़ताल करते हुए एक पत्रकार ने लिखा है कि ‘भारत का मौजूदा नागरिकता कानून जन्म पर कम और रक्त-सम्बंधों पर ज्यादा आधारित है. यदि कोई किसी व्यक्ति का जन्म 3 दिसम्बर 2004 के बाद भारत में हुआ है तो भी उसे तभी भारतीय नागरिक माना जायेगा जबकि उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा गैरकानूनी प्रवासी न हो. 1 जुलाई 1987 और 3 दिसम्बर 2004 के बीच भारत में पैदा हुए व्यक्ति को तभी भारतीय नागरिक माना जायेगा जब उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारत का नागरिक हो. केवल 1 जुलाई 1987 के पहले भारत में पैदा हुए हर व्यक्ति को भारत का नागरिक माना जायेगा भले ही उसके माता-पिता की कोई भी नागरिकता रही हो. इस तरह 1 जुलाई 1987 के बाद पैदा हुए हर व्यक्ति को अपने माता-पिता में से कम से कम एक की नागरिकता को भी कानूनी तौर पर साबित करना होगा. इसलिए सरकार के स्पष्टीकरण का कोई मतलब नहीं है. असम में एनआरसी के दौरान लोगों को ऐसे कागजात दिखाना जरूरी था जिनके जरिए उनका पिता, या पिता के पिता से रिश्ता साबित हो सके’.‘Will NRC only target Muslims? A government clarification directly contradicts Amit Shah’, Shoaib Daniyal, Scroll, 21 December 2019

इतना ही नहीं राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का एक फॉर्म सामने आया है जिसमें माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान का एक अतिरिक्त कॉलम मौजूद है. यह इसीलिए है ताकि एनपीआर के दौरान ‘संदेहास्पद नागरिकों’ की पहचान की जा सके और एनआरसी के दौरान उनसे दस्तावेज मांगे जा सकें. (इस बारे में विस्तार से आगे दिया गया है.)

क्या एनआरसी के लिए वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड जैसे दस्तावेज पर्याप्त होंगे?

सरकार द्वारा जारी “स्पष्टीकरण” में कहा गया है कि “वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बीमा के कागजात, जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल के प्रमाणपत्र, जमीन या घर सम्बंधी कागजात या सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी किया गया कोई अन्य कागज” एनआरसी के लिए स्वीकार किए जाने पर विचार चल रहा है.

लेकिन 17 दिसम्बर 2019 को एक न्यूज़ चैनल को दिए गए इंटरव्यू में गृहमंत्री अमित शाह ने ख़ुद ही कहा कि “वोटर कार्ड और दूसरे सरकारी दस्तावेज नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं. आधार तो नागरिकता का एकदम ही प्रमाण नहीं है.”https://www.youtube.com/watch?v=eNd792HSl_A&t=6s

साफ है कि सरकार अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग बात कह रही है.

यदि वोटर कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस वगैरह नागरिकता के पर्याप्त सबूत हैं तो इन्हें सरकार के पास जमा करने की क्या जरूरत है? आखिर सरकार ने ही तो ये सारे कागजात जारी किए हैं.

दूसरे शब्दों में कहें तो लोगों को परेशान करने के अलावा एनआरसी करने की भला और क्या जरूरत है?

no illigal

 

जब भाजपा कहती है कि हम हर “घुसपैठिए” को बाहर करेंगे तो क्या इसका मतलब ऐसे हरेक भारतीय से है नहीं है जिसके पास कुछ खास दस्तावेज नहीं हैं? इनमें मैं या मेरे परिवार का कोई भी हो सकता है?

हाँ. हो सकता है.

भारत में गरीबों के पास ऐसे दस्तावेज भी नहीं होते कि वे साबित कर सकें कि वे ‘गरीबी रेखा के नीचे’ हैं. इसके चलते बहुत से लोगों के राशन कार्ड नहीं बन पाते. बहुत से गरीबों को को आधार से वंचित कर दिया गया था जिसके चलते उन्हें राशन और पेंशन मिलनी बंद हो गयी. इसके चलते कई लोगों की जानें भी गयीं.

अब सरकार गरीबों से भारत में रहने का उनका अधिकार भी छीनना चाहती है.   

असम में 19 लाख से ज्यादा लोग एनआरसी लिस्ट से बाहर कर दिए गए. इसलिए नहीं कि वे  “अवैध घुसपैठिए” हैं बल्कि इसलिए कि वे गरीब हैं और उनके पास कागज नहीं था. बहुत से मामलों में पति एनआरसी लिस्ट में हैं तो पत्नी का नाम उसमें नहीं है, माता-पिता का नाम है तो बच्चे का नाम नहीं है. जो लोग एनआरसी लिस्ट से बाहर हैं, उनका भविष्य अभी भी अनिश्चित है. जो लोग एनआरसी लिस्ट से बाहर किए गए हैं उनमें बड़ी तादात हिंदुओं, मुसलमानों, आदिवासियों, महिलाओं और दूसरे राज्यों से आए मजदूरों की है.

यदि आपका नाम एनआरसी लिस्ट में नहीं है तो क्या आपको डिटेंशन कैम्प में रखा जा सकता है?

हाँ.

असम में यदि आपको विदेशी पहचान ट्रिब्यूनल ‘संदिग्ध वोटर’ मानता है तो आपको अनिश्चित समय के लिए डिटेंशन कैम्प में रखा जा सकता है. ये डिटेंशन कैम्प जेलों से भी बदतर हैं.

असम में एनआरसी लिस्ट से बाहर 19 लाख लोगों पर डिटेंशन कैम्प भेजे जाने की तलवार लटक रही है. अब विदेशी पहचान ट्रिब्यूनल के सामने यह साबित करना उन लोगों की ज़िम्मेदारी है कि वे अवैध घुसपैठिए नहीं हैं.

नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी एक दूसरे से कैसे जुड़े हैं?

हम पहले चर्चा कर आए हैं कि नागरिकता संशोधन कानून इस तरह बनाया गया है कि वह मुसलमान और गैर-मुसलमान प्रवासियों को अलग कर सके. मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’ और गैर-मुसलमानों को शरणार्थी माने, इस तरह गैर-मुसलमानों को नागरिकता प्रदान करे.

अमित शाह ने नागरिकता संशोधन कानून के बारे में बार-बार अपने भाषणों में कहा है कि इस कानून का मकसद एनआरसी से बाहर रह गए हिंदुओं और मुसलमानों को अलग करना है.

यदि आप मुसलमान हैं और एनआरसी लिस्ट में शामिल होने के लिए आप दस्तावेज नहीं पेश कर पाए तो आपका वोट करने का अधिकार छीन लिया जाएगा और जेलों से भी बदतर डिटेंशन कैम्प में आपको बंद कर दिया जाएगा.

अगर आप गैर-मुसलमान हैं और एनआरसी लिस्ट में शामिल होने के लिए आप दस्तावेज नहीं पेश कर पाए तो आपका भी वोट का अधिकार छीन कर आपको डिटेशन कैम्प में बंद किया जा सकता है लेकिन मोदी-शाह सरकार ये कह रही है कि यदि आप गैर-मुसलमान हैं तो नागरिकता संशोधन कानून आपको यह मौक़ा देगा कि आप पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आए हुए ‘शरणार्थी’ होने का दावा करें और भारतीय नागरिकता के लिए दरखास्त दें. ऐसे में छः साल बाद आपको भारतीय नागरिकता दी जा सकती है.

अगर मैं बिहार, तमिलनाडु या कर्नाटक का मजदूर हूँ तो मैं कैसे साबित करूँगा कि मैं पाकिस्तान से आया शरणार्थी हूँ? एक भारतीय होने के बावजूद मुझसे ऐसा दावा करने के लिए क्यों कहा जा रहा है?

एनआरसी से बाहर रह गए गैर-मुसलमानों के लिए ‘सुरक्षा’ या ‘एक और मौका देने’ का यह दावा झूठ है.

बिहार का प्रवासी मजदूर, छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिला या गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश के किसान अपना यह दावा कैसे साबित करेंगे कि वे बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान के सताए हुए शरणार्थी है?

यह भारतीयों के लिए अपमानजनक है कि सरकार उनके कहे कि वे साबित करें कि वे भारतीय हैं या ये साबित करें कि वे वे बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान के सताए हुए शरणार्थी हैं.

साफ है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का मकसद मुसलमानों को निशाना बनाना है लेकिन यदि पड़ोसी के घर में आग लगाएँगे तो अपना घर भी जलेगा ही. इसीलिए गैर-मुसलमानों के लिए नागरिकता संशोधन कानून के जरिये दी गयी सुरक्षा का दावा भी खोखला है.

नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी मिलकर हम सब के लिए खतरा पैदा करते हैं. इससे निपटने का एक ही तरीका है कि सभी धर्मों और समुदायों के लोग मिलकर अपने आपको और संविधान को बचाने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करें.

सरकार दावा कर रही है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का आपस में कोई रिश्ता नहीं है और एनआरसी का किसी भी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. सच्चाई क्या है?

खुद अमित शाह ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के जुड़े होने की बात बार-बार कही है.

23 अप्रैल 2019 को भाजपा के आधिकारिक यू-ट्यूब चैनल पर चढ़ाए गए वीडियो में अमित शाह ने कहा कि “पहले नागरिकता संशोधन कानून आएगा. सभी शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी. तब एनआरसी आएगा. इसीलिए शरणार्थियों को चिंता करने की जरूरत नहीं है. आप क्रोनोलॉजी (क्रम) समझिए.”https://www.youtube.com/watch?v=Z__6E5hPbHg&feature=emb_title

1 मई 2019 को उन्होंने ट्वीट किया कि “पहले हम नागरिकता संशोधन कानून पास करेंगे और गारंटी करेंगे कि पड़ोसी देशों से आए सभी शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाए. इसके बाद एनआरसी बनाया जाएगा और हर एक घुसपैठिए को खोजकर देश से बाहर किया जाएगा.”

अमित शाह के रायगंज [पश्चिम बंगाल] के भाषण के बारे में भाजपा के आधिकारिक हैंडिल से ट्वीट किया गया कि “हम पूरे देश में एनआरसी लागू करेंगे. हम बौद्ध, हिंदू और सिखों को छोड़कर हर घुसपैठिए को देश से बाहर करेंगे.” ये ट्वीट यह साफ कर देते हैं कि एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून एक दूसरे से जुड़े हैं और इनका मकसद भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाना है. भाजपा ने अब यह ट्वीट हटा दिया है.

दिल्ली में अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनकी सरकार का देश भर में एनआरसी का कोई इरादा नहीं है. भारत में कोई डिटेंशन कैम्प नहीं है. यह केवल अर्बन नक्सलियों द्वारा फैलायी गयी बात है?

22 दिसम्बर 2019 को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकता संशोधन कानून, देश भर में एनआरसी और इसके खिलाफ चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बारे में बात की. लेकिन उन्होंने अपने भाषण में जो भी दावा किया वह उनके अपने पुराने बयानों और अमित शाह के बयानों से अलग है. इस भाषण में मोदी ने कहा कि -

“मैं अपने 130 करोड़ देशवासियों को बताना चाहता हूँ कि 2014 में मेरी सरकार आने के बाद से लेकर आज तक एनआरसी शब्द पर भी कोई चर्चा नहीं हुई है. हमें इसे असम में लागू करना पड़ा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का ऐसा निर्देश था.”

यह सरासर झूठ है. 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने ख़ुद ही कई जगह एनआरसी की बात की और भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में भी पूरे देश में एनआरसी कराने का वादा किया गया था.

19 अप्रैल 2019 को टाइम्स नाऊ को दिए गए इंटरव्यू में जब मोदी से देश भर में एनआरसी के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था “कांग्रेस ने असम समझौता किया और एनआरसी का वादा किया था. उन्होंने अपना वादा पूरा नहीं किया. उन्होंने असम के लोगों को मूर्ख बनाया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी के लिए आदेश दिया और हमने ईमानदारी से उस आदेश को लागू किया. एनआरसी का अनुभव बड़ी चिंताजनक तस्वीर पेश करता है. हमें एनआरसी पर चर्चा करनी चाहिए. क्या एक देश धर्मशाला हो सकता है? एनआरसी होना चाहिए या नहीं होना चाहिए? यह सवाल उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने सत्तर साल के बाद भी एनआरसी नहीं किया. उनके मन में पाप है.47वें मिनट के आगे देखें. https://www.youtube.com/watch?v=ffGW_keVL9A&t=2994s

24 अप्रैल 2019 को पश्चिम बंगाल के रानाघाट में चुनावी रैली को सम्बोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून को एक-दूसरे से जोड़ा “हम एक और बड़ा क़दम उठाने जा रहे हैं. हम नागरिकता कानून पास करने जा रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और कम्यूनिस्टों ने संसद में नागरिकता संशोधन कानून को रोक दिया था. इस बार वे हारेंगे. इस बार जीतने के बाद हम ये कानून लाएँगे. इसके साथ ही एनआरसी के जरिये हम घुसपैठियों की पहचान करेंगे ताकि उन्हें उनकी अपनी असली जगह भेजा जा सके.”देखें 16.53 मिनट के आगे https://www.youtube.com/watch?v=vgG2n3vZcXg

मोदी ने दावा किया कि कांग्रेस और अर्बन नक्सली देश में डिटेंशन कैम्प के बारे में झूठ फैला रहे हैं. जबकि सच्चाई यह है कि “भारत में कोई डिटेंशन कैम्प नहीं है.”

यह भी सफेद झूठ है.

मोदी-शाह सरकार के गृह मंत्रालय ने ‘आदर्श डिटेंशन सेंटर/होल्डिंग सेंटर/कैम्प मैनुअल’ तैयार किया है.  इस मैनुअल को 09 जनवरी 2019 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजा गया था. 02 जुलाई 2018 को गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में बताया कि राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया है कि वे डिटेंशन सेंटर बनाएँ.'Detention centre manual’, Telegraph, 24 December 2019

राय ने एक प्रश्न के जवाब में लिखित रूप से राज्य सभा में स्वीकार किया कि असम के छः डिटेंशन कैम्पों में कुल 988 लोग बंद हैं. इनमें से 28 लोगों की डिटेंशन कैम्प के भीतर ही मौत हो चुकी है.‘28 deaths in Assam's detention camps, minister tells Rajya Sabha’, Telegraph, 27 November 2019

असम सरकार ने अपनी वेबसाइट पर घोषणा की कि देश का सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर असम के ग्वालपाड़ा में लगभग बन कर तैयार है. इसमें 3,000 लोगों को रखा जा सकता है. इसके अलावा नेरुल [नवी मुम्बई महाराष्ट्र], कर्नाटक में बंगलुरु के पास और पश्चिम बंगाल के न्यू टाउन व बनगाँव में डिटेंशन कैम्प बन रहे हैं.

रामलीला मैदान में 25 दिसंबर को झूठ बोलकर मोदी किसे मूर्ख बना रहे थे?

मैंने टीवी पर सुना है कि नागरिकता कानून और एनआरसी का विरोध केवल मुसलमान दंगाई कर रहे हैं. वे हिंसा फैला रहे हैं, बसें जला रहे हैं और पत्थरबाजी कर रहे हैं? सच्चाई क्या है?

झारखंड की चुनावी रैली में मोदी ने कहा कि हिंसा फैलाने वाले प्रदर्शनकारियों को “उनके कपड़ों से पहचाना” जा सकता है. इसका साफ़ मतलब है कि दाढ़ी और टोपी वाले मुसलमान ही प्रदर्शन कर रहे हैं और हिंसा फैला रहे हैं.

जबकि हकीकत यह है कि भाजपा शासित राज्यों की पुलिस और भाजपा के अपने गुंडे हिंसा फैला रहे हैं. कई बार तो वे मुसलमानों का हुलिया बना कर हिंसा कर रहे हैं ताकि मुसलमानों को बदनाम किया जा सके.

1: पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में पुलिस ने एक गाड़ी के इंजन पर पथराव करते पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया. ये पाँचों गोल टोपी और लुंगी पहने हुए थे. इनमें से एक ने ख़ुद को भाजपा का कार्यकर्ता बताया. [‘Stone gang in fake skullcap held by Murshidabad police’, Telegraph, 20 December 2019]

2: गोरखपुर में आरएसएस सदस्य विकास जालान और सत्य प्रकाश उस भीड़ में शामिल देखे गए जो दुकानों को तहस-नहस कर रही थी और पुलिस पर पथराव कर रही थी. [‘Blood stains Uttar Pradesh streets’, Telegraph, 21 December 2019]

3: दिल्ली के मायापुरी में पुलिस लोगों पर पथराव करती देखी जा सकती है. [https://twitter.com/i/web/status/1116999443226578944]

4: दिल्ली के दरियागंज में पुलिस वाले एक इमारत की ईंटें तोड़ते हुए कैमरे में क़ैद हुए. वे ऊपर से पथराव करना चाहते थे ताकि प्रदर्शनकारियों पर इल्ज़ाम लगाया जा सके. [https://video.twimg.com/ext_tw_video/1208033108156567552/pu/vid/352x640/tfGuWAKq9UGeNcVr.mp4?tag=10]

लेकिन भारत की जनता ने प्रधानमंत्री द्वारा मुसलमानों को अलगाव में डालने और उन्हें बलि का बकरा बनाने की कोशिशों को नाकाम कर दिया है. भाजपा ‘बाँटो और राज करो’ के रास्ते पर चल रही है. देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के विद्यार्थी, जामिया मिलिया इसलामिया व अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के समर्थन में सड़क पर उतरे. उन्होंने नागरिकता कानून और एनआरसी का विरोध कर रहे विद्यार्थियों के बर्बर पुलिसिया दमन के खिलाफ आवाज उठायी. उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के खिलाफ जारी पुलिसिया बर्बरता का पूरे देश में विरोध हो रहा है.

यह किताब छापने तक पुलिस की हिंसा में 24 प्रदर्शनकारियों की जानें गयी हैं. बहुत से लोग गम्भीर रूप से घायल हैं.

फासीवाद के खिलाफ दक्षिण एशियायी छात्र संगठन ने ऐसे सबूत जुटाए हैं, जिनसे पता चलता है कि “बड़े पैमाने पर हिंसा पुलिस और संगठित राजनीतिक गिरोहों के द्वारा अंजाम दी गयी है.” हम यहाँ उनकी लिस्ट में ही कुछ लिंक और जोड़ रहे हैं:-

1: “देश के ग़द्दारों को, गोली मारो सालों को” नारे के साथ भाजपा नेता कपिल मिश्रा के नेतृत्व में दिल्ली में जुलूस (https://video.twimg.com/ext_tw_video/1208031600564490242/pu/vid/720x720/2N1UsKMZgeGvGMMa.mp4?tag=10)

2: मंगलुरु में निहत्थे लोगों पर पुलिस फ़ायरिंग और दो लोगों की हत्या (https://video.twimg.com/ext_tw_video/1208049855609757696/pu/vid/1280x720/HOvsVG8YHUxYrv3W.mp4?tag=10) बाद में जब लोग उस अस्पताल में इकट्ठा हुए जहाँ मारे गए लोगों के शव रहे गए थे तो पुलिस ने अस्पताल पर ही हमला बोल दिया. उन्होंने अस्पताल के अंदर आँसू गैस के गोले छोड़े और आईसीयू का दरवाज़ा तोड़ दिया. अस्पताल के एक डॉक्टर ने कहा कि “पुलिस ने अस्पताल के भीतर मरीज़ों के रिश्तेदारों पर लाठी चार्ज किया ताकि मरीजों, डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को डराया जा सके. (‘Mangalore police used teargas inside hospital, damaged ICU doors’, The Week, 20 December, 2019)

3: एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक प्रदर्शन में तब्दील कर देना- https://video.twimg.com/amplify_video/1208104071996952576/vid/480x848/P1axKpTK64LEAQkl.mp4?tag=13

4: उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर में कार तोड़ती हुई पुलिस- https://video.twimg.com/ext_tw_video/1208032669851881472/pu/vid/352x640/Jeus4AC0oqJhvs5D.mp4?tag=10

5: बिहार के औरंगाबाद में वाहनों को तोड़ती पुलिस- [पुलिस द्वारा आजकल यह आम बात है. पहले वे सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाते हैं, उसके बाद इसका इल्ज़ाम प्रदर्शनकारियों के मत्थे मढ़ देते हैं लेकिन दुर्भाग्य से प्रदर्शनकारियों के पास भी कैमरे वाले फोन हैं.] https://twitter.com/alishakhan102/status/1208461878646542336?s=20

6: कर्नाटक भाजपा नेता सी टी रवि ने प्रदर्शनकारियों को एक और गोधरा करने की धमकी दी. (‘Godhra-like situation if majority lose patience over CAA: Karnataka minister CT Ravi stirs controversy’, PTI, 21 December 2019)

7: हरियाणा के कैथल के भाजपा नेता लीलाराम गुर्जर ने अपने भाषण में मुसलमानों का ‘सफाया करने’ की धमकी दी. “जो लोग झूठ फैला रहे हैं, मैं इन लोगों को बताना चाहता हूँ कि मियाँ जी, ये जो आज का हिंदुस्तान है, वो गांधी और नेहरू का नहीं, नरेंद्र मोदी और अमित शाह जी का हिंदुस्तान है. अगर इशारा हो गया तो एक घंटे में सफाया कर देंगे और आप की गलतफहमी दूर हो जाएगी.” (‘On citizenship law protesters, BJP MLA says can finish them off in one hour’, Hindustan Times, 24 December 2019)

8: द हिंदू के एक पत्रकार को उत्तर प्रदेश में सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया कि वह कश्मीरी था- (‘A first-person account by ‘The Hindu’ correspondent Omar Rashid of how he was picked up, threatened and released by cops’, 20 December, 2019)

9: महिला अध्यापक, अभिनेत्री और कार्यकर्ता सदफ ज़फ़र को गिरफ्तार करके बुरी तरह पीटा गया- (Indian Express, 23 December 2019)

10: पुलिस प्रदर्शनकारियों के सर पर डंडे मार रही है [जबकि आमतौर पर कमर के नीचे मारा जाता हैं]- (https://twitter.com/CNNnews18/status/1208046028479352832)

11: गोरखपुर [अजय सिंह बिष्ट की सीट] में निहत्थे प्रदर्शनकारियों को पीटती हुई पुलिस- (https://twitter.com/azaadindiacol/status/1208488755473993728?s=20)

12: दिल्ली के दरियागंज में लोगों को पीटती और वाहन तोड़ती पुलिस का वीडियो-(https://video.twimg.com/ext_tw_video/1208029889346957312/pu/vid/480x848/XqE5vsYyjn1rXGdW.mp4?tag=10)

13: मुसलमान जैसे दिखने वाले किसी को भी उठा लेने वाली दिल्ली पुलिस प्रधानमंत्री की बात दोहरा रही है कि ‘हमें पता है कि वे कैसे दिखते हैं’-(https://twitter.com/saahilmenghani/status/1208062858669350912?s=20)

14: जामिया कैंपस के भीतर गैर-क़ानूनी ढंग से छात्रों पर गोली चलाती पुलिस- (‘New Videos Suggest Delhi Police May Have Fired At Jamia Protesters’, NDTV, 18 December, 2019)

15: जामिया की लाइब्रेरी से घसीट कर दिल्ली पुलिस द्वारा अंधा कर दिए गए जामिया के छात्र मोहम्मद मिनहाजुद्दीन, अपने साथ हुई घटना बताते हुए- (https://www.indiatoday.in/india/video/watch-jamia-student-who-lost-an-eye-in-police-action-narrates-his-ordeal-1630220-2019-12-20)

16: पुलिस द्वारा चलाए गए ग्रेनेड के चलते अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी का हाथ काटना पड़ा- (‘Security forces committed ‘unbridled rights violations’ in AMU: fact-finding team’, The Hindu, 24 December 2019)

17: विद्यार्थियों पर पुलिस बर्बरता की तस्वीरें-  (https://twitter.com/MaskoorUsmani/status/1206258211679948800)

18: पुलिस द्वारा बच्चों को पकड़ने और उन्हें बेल्ट से पीटने की तस्वीरें- (https://twitter.com/thewire_in/status/1208099148148264960?s=20)

19: उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा पीटे जा रहे बच्चे- (https://twitter.com/imMAK02/status/1208428070425649157?s=20)

20: उत्तर प्रदेश में पुलिस की हिंसा के चलते मची भगदड़ में मारा गया आठ साल का बच्चा- (https://twitter.com/MirrorNow/status/1208315524486254592?s=20)

21: उत्तर प्रदेश में पुलिस फ़ायरिंग में अब तक 18 लोग मारे गए हैं. पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों ने पहले फ़ायरिंग की, मजबूरन पुलिस को भी आत्मरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी. लेकिन सबूत बताते हैं कि पुलिस के दावे झूठे हैं- (‘Video Suggests UP Cop Opened Fire In Kanpur, Contrary To "No Police Firing" Claim’, NDTV 22 December, 2019)

भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों को पुलिस की भयानक बर्बरता का सामना करना पड़ रहा है. लगता है जैसे पूरे मुसलमान समुदाय के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया हैं. चाहे मुसलमान प्रदर्शन में शामिल हों या नहीं. वहीं दूसरी तरफ गैर-भाजपा शासित राज्यों में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें लाखों लोग शामिल हुए. इससे साफ है कि भाजपा की सरकारें और उनकी पुलिस हिंसा फैलाने वालों में शामिल हैं, न कि प्रदर्शनकारी हिंसा फैला रहे हैं.

शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के कुछ सबूत नीचे दिए गए हैं-

1. नागपुर, महाराष्ट्र:
https://twitter.com/shraddhs/staus/1208215489157054464

2. पुणे, महाराष्ट्र:
https://twitter.com/CPPuneCity/status/1208057982929391616

3. मुम्बई, महाराष्ट्र:
https://twitter.com/AzmiShabana/status/1207698719115808768

4. वनियमबाड़ी, तमिलनाडु:
https://twitter.com/itssinghswati/status/1207995229455839233?s=20

5. कोयम्बतूर, तमिलनाडु:
https://twitter.com/Akshayanath/status/1208084321480761345?s=20

6. हैदराबाद, तेलंगाना:
https://twitter.com/bemusedlawyer/staus/1208439278541295618?s=20

7. धारावी, मुम्बई:
https://twitter.com/advsanwar/status/1208728309623873538?s=20   

8. असम में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन करती हजारों महिलाएँ-
https://timesofindia.indiatimes.com/india/thousands-of-assam-women-hit-the-streets-to-voice-opposition-to-caa/articleshow/72921123.cms

ghuspario

 

अगर प्रदर्शनकारी हिंसक भी हों तो क्या पुलिस की हिंसा जायज है?

कुछ लोग प्रदर्शनकारियों की हिंसा दिखा कर पुलिस की हिंसा को जायज ठहराना चाहते हैं. वे कहते हैं कि “प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी की तो हमने भी पत्थरबाजी की [या गोली भी चलायी]”, “प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए इसलिए हमने उन्हें पाकिस्तान जाने के लिए कहा.”

पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने कहा कि “कानून न मानने वाली भीड़ और कानून न मानने वाले पुलिस के जवानों की तुलना करना न केवल साधारण समझदारी के खिलाफ है बल्कि पुलिस के अपने नियमों के भी खिलाफ है.” पुलिस संविधान और नियमों से बँधी होती है. वे “बदला” नहीं ले सकते और उन्हें हरगिज नहीं लेना चाहिए. यही पुलिस संघ परिवार के संगठनों द्वारा की जाने वाली हिंसा के खिलाफ न तो बदले की कार्यवाही करती है और न गोली चलाती है. हमें याद रखना चाहिए कि 2018 में उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर में पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की तथाकथित ‘गौ-रक्षकों’ और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हत्या कर दी थी. उसी भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों में आग भी लगायी थी. लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने गौ-रक्षकों और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर तो गोली नहीं चलायी और न ही कोई हिंदू मारा गया. उन्होंने पूरे हिंदू समुदाय को नुक़सान की ‘भरपाई’ करने के लिए भी मजबूर नहीं किया. उन्होंने आरोपित को ‘मुठभेड़’ में नहीं मारा. तो फिर मुसलमान या लोकतंत्र-समर्थक प्रदर्शनकारियों के साथ ये सब करने का अधिकार वे कहाँ से पाते हैं?

पुलिस ने मेरठ और मुजफ़्फरनगर में जो कुछ किया, वह उनके अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता. मेरठ के एसपी अखिलेश नारायण सिंह मुसलमानों को ‘पाकिस्तान जाओ’ कहते हुए वीडियो में क़ैद हुए.‘On Camera, UP Cop's Communal Rant; His Senior Says He "Showed Restraint"’, NDTV, 28 December 2019  मुजफ़्फरनगर में पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों ने उन मुसलमानों के घर तबाह कर दिए और उन्हें पाकिस्तान जाने के लिए कहा जो प्रदर्शनों में शामिल भी नहीं थे.‘Cops Barged Into Our Homes at Night, Smashed Everything, Snatched Cash and Jewellery, Say Muzaffarnagar’s Muslim Families’, CNN News18, 25 December 2019पुलिस के ये कारनामे मनुष्यता के खिलाफ अपराध हैं और भारत के संविधान के विरुद्ध हैं. इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए फंड स्वीकृत किया है. अमित शाह का कहना है कि एनपीआर और एनआरसी एक-दूसरे से नहीं जुड़े हैं. क्या यह सच है?

अमित शाह और मोदी झूठ बोल रहे हैं कि एनआरसी अभी शुरू नहीं हुआ है और एनपीआर का एनआरसी से कोई रिश्ता नहीं है. जबकि सच्चाई यह है कि अमित शाह के गृह मंत्रालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि एनपीआर, एनआरसी की दिशा में उठाया गया पहला क़दम है.

18 जून 2014 को मोदी सरकार के प्रेस इंफारमेशन ब्यूरो के  आधिकारिक ट्विटर से उस समय के गृह मंत्री के बयान के बारे में बताया कि “श्री राजनाथ सिंह ने एनपीआर को उसके तार्किक अंजाम तक पहुँचाने का निर्देश दिया है. एनपीआर भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर [एनआरआईसी- NRIC] है.”

26 नवम्बर 2014 के गृह मंत्रालय के प्रेस वक्तव्य में साफ कहा गया कि “एनपीआर भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की दिशा में बढ़ाया गया पहला क़दम है. इसमें हर भारतीय नागरिक की जाँच की जाएगी.”

21 अप्रैल 2015 को गृह राज्य मंत्री हरिभाई परातीभाई चौधरी ने राज्यसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि “यह तय किया गया है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRIC) को पूरा करके उसे उसके अंजाम तक पहुँचाया जाय.  यह भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर का निर्माण है.”

साल 2018-19 की गृह मंत्रालय की वार्षिक रपट में पृष्ठ संख्या 262 पर कहा गया है कि “एनपीआर भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की दिशा में बढ़ाया गया पहला क़दम है.”

जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि वाजपेयी सरकार 2003 में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का प्रावधान लायी जिसके आधार पर कुछ नागरिकों को ‘संदिग्ध’ घोषित किया जा सकता है, और उन्हें राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) में अपना नाम शामिल कराने के लिए कागजात दिखा कर अपनी नागरिकता साबित करनी होगी. ऐसा न कर पाने की स्थिति में उन्हें ‘गैरकानूनी प्रवासी’ घोषित किया जा सकता है. वर्ष 2003 के संशोधन में माता-पिता में किसी एक के ‘गैरकानूनी प्रवासी’ होने के बाद नागरिकता छीन लेने का प्रावधान भी है. यानी कि वाजपेयी सरकार द्वारा 2003 में लाये जाने के समय से ही एनपीआर और एनआरसी आपस में जुड़े हुए हैं.

अब सरकार झूठ क्यों बोल रही है? अब सरकार के एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून के साम्प्रदायिक मंसूबों का भंडाफोड़ हो चुका है. हिंदू-मुसलमान और अन्य सभी एनआरसी द्वारा उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े किए जाने से डरे हुए हैं. इसलिए मोदी-शाह सरकार एनआरसी को पीछे छुपाकर नागरिकता संशोधन कानून का बचाव करना चाहती है. साथ ही साथ वे एनपीआर शुरू करके एनआरसी बाद में करने की योजना बना रहे हैं.

पत्रकार शिवम् विज ने कहा कि “मोदी और शाह नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर, एनआरसी/एनआरआईसी के बारे में लगातार झूठ बोल रहे हैं ताकि इनके बारे में उठी आपत्तियों और आशंकाओं को दबाया जा सके. लेकिन इनकी योजना चालू है. ये उसी तरह है जैसे डॉक्टर बच्चे को फुसलाता है कि इंजेक्शन से दर्द नहीं होगा.”

लेकिन एनपीआर तो पहले की सरकारों द्वारा भी किया गया है. इस बार यह अलग कैसे है?

वाजपेयी सरकार द्वारा पारित 2003 के कानून के हिसाब से यूपीए सरकार ने एनपीआर बनवायी थी. यह उसकी गलती थी. लेकिन उसके बाद उसने न तो एनआरसी बनवाया, और न ही साम्प्रदायिक मंसूबों से भरा कोई नागरिकता संशोधन कानून पास कराया.

इस बार एनपीआर के फ़ॉर्म में एक कॉलम अलग से जोड़ा गया है जिसमें माता-पिता के जन्म की तारीख़ और जगह भरनी होगी. इससे साफ है कि एनपीआर के जरिये ‘संदिग्ध नागरिकों’ की पहचान की जाएगी और एनआरसी के दौरान उनसे दस्तावेज माँगे जाएँगे. हम पहले बात कर चुके हैं कि सरकार द्वारा जारी किया गया स्पष्टीकरण माता-पिता के जन्म सम्बंधी दस्तावेज माँगने के बारे में झूठ बोल रहा है. यदि माता-पिता का जन्म स्थान और जन्मतिथि ज़रूरी नहीं है तो फिर एनपीआर के जरिये यह डेटा क्यों इकट्ठा किया जा रहा है?

यूपीए की सरकार ने संविधान विरोधी एनपीआर को लागू करने की गलती की, लेकिन इसका मतलब यह तो बिल्‍कुल नहीं हो सकता कि मोदी-शाह सरकार भी उस गलती को जरूर करे. उस समय यूपीए सरकार ने एनआरसी या सीएए के बारे में कोई चर्चा नहीं की, इसीलिए हम भारत के लोगों को एनपीआर के खतरों का अहसास नहीं हो पाया. आज केवल कांग्रेस या यूपीए नहीं, बल्कि हम भारत के लोग वर्तमान सरकार की सीएए-एनपीआर-एनआरसी योजना का विरोध कर रहे हैं. क्योंकि हम अब जान चुके हैं कि यह योजना हमारे खिलाफ एक खतरनाक साजिश है – और हम किसी भी सरकार को इसे लागू नहीं करने देंगे.

किस आधार पर मुझे ‘संदिग्ध नागरिक’ घोषित किया जा सकता है?

इसकी प्रक्रिया मनमानी है. किसी को ‘संदिग्ध नागरिक’ घोषित करने के बारे में दिशा-निर्देश स्पष्ट नहीं हैं.

इसका मतलब हुआ कि इसमें भ्रष्टाचार की बड़ी गुंजाइश है. कोई स्थानीय अधिकारी आपको ‘संदिग्ध’ घोषित कर सकता है और ‘संदिग्ध’ न घोषित करने के लिए घूस माँग सकता है. [हम पहले ही देख चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर में न मारने के लिए पुलिस वाले पैसा माँग रहे हैं.] ऐसे ही भ्रष्ट पुलिस अधिकारी या अन्य अधिकारी आपको ‘संदिग्ध’ घोषित करने की धमकी देकर घूस की माँग कर सकते हैं. यदि आपके पड़ोसी, आपकी जाति, जेंडर, लैंगिकता और राजनीतिक विचारधारा के चलते आपको पसंद नहीं करते तो वे आपको ‘संदिग्ध’ बताते हुए रिपोर्ट कर सकते हैं. कोई साम्प्रदायिक संगठन किसी पूरे धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को ‘संदिग्ध’ कहकर रिपोर्ट कर सकता है.

याद रखिए एनआरसी लिस्ट में नाम आने के बाद भी आप पर ‘संदिग्ध’ होने का आरोप लग सकता है. असम में ऐसा ही हुआ. नियमों के मुताबिक़ स्थानीय नागरिकता रजिस्टर में किसी भी व्यक्ति को शामिल किए जाने के खिलाफ कोई भी व्यक्ति आपत्ति दर्ज कर सकता है. इस नियम का दुरुपयोग किए जाने की भारी सम्भावना है. ख़ासकर तब जबकि भारतीय जनता का एक बड़ा हिस्सा अशिक्षित, ग़रीब और कमजोर है.

image

यदि मुझे ‘संदिग्ध’ घोषित कर दिया गया तो क्या होगा?

ज़िलाधिकारी ‘संदिग्ध’ नागरिकों को विदेशी पहचान ट्रिब्यूनल के पास भेज देगा. इन ट्रिब्यूनलों के मुखिया ऐसे लोग होते हैं जिनके पास कोई न्यायिक अनुभव नहीं होता. असम में विदेशी पहचान ट्रिब्यूनल आपस में प्रतियोगिता कर रहे थे कि कौन “ज़्यादा विकेट गिराता है” यानी कौन ज्यादा लोगों को विदेशी घोषित करता है?‘‘The highest wicket-taker’: Assam’s tribunals are competing to declare people foreigners’, Arunabh Saikia, Scroll.in, 19 June, 2019

एक बार आपको ‘संदिग्ध’ या ‘विदेशी’ घोषित कर दिया गया तो आपको जेलों से भी बदतर डिटेंशन कैम्पों में भेजा जा सकता है.

वकीलों की एक रिसर्च टीम ने लिखा, “मौजूदा कानून के अनुसार नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी हर व्यक्ति की होगी. इसलिए एनआरसी अधिकारियों द्वारा अपनी ताक़त के ग़लत इस्तेमाल के परिणाम बहुत ही भयावह होंगे जिसमें किसी भी व्यक्ति को अवैध घोषित कर दिए जाने का खतरा होगा. जो भी भारतीय सत्ता, कागजात बनवाने और सामाजिक हैसियत में जितना कम होगा, उसके प्रभावित होने की संभावना उतनी ही अधिक है.”

एनपीआर का डेटा कितना सुरक्षित रहेगा?

एनपीआर 2020 के फ़ॉर्म में आपको अपने सभी पहचान पत्रों, जैसे कि आधार, पैन, वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि का नम्बर देना होगा. आपको अपना मोबाइल नम्बर भी देना होगा. आपके दरवाज़े पर आए हुए सरकारी कर्मचारी को एक बार जब आप ये सारी सूचनाएँ दे देंगे और वह उन्हें एक फ़ॉर्म में नोट कर लेगा, उसके बाद इन महत्वपूर्ण सूचनाओं की गोपनीयता की सुरक्षा का कोई उपाय आपके हाथ में नहीं होगा. हम पहले भी देख चुके हैं कि कई बार आधार का डेटा लीक हो गया. भले ही ये दावा किया जाता रहे कि आधार डेटा की सुरक्षा दीवार को भेदना असंभव है.

एनपीआर में तो इन सूचनाओं की सुरक्षा के लिए किसी ‘पासवर्ड’ का दिखावा भी नहीं किया गया है. आपको ये सभी सूचनाएँ घर आए कर्मचारी को देनी होंगी. आपको नहीं पता कि ये सारी सूचनाएँ किस मकसद से और कौन इस्तेमाल करेगा. किसी व्यक्ति या समूह के बारे में सारी सूचनाएँ फ़ोटोकॉपी करके ऐसे लोगों को भी दी जा सकती हैं जो इनका इस्तेमाल अपने मुनाफ़े के लिए करें. सम्भव है कि आप की निजी और महत्वपूर्ण जानकारी मोहल्ले की किसी दुकान पर फ़ोटोकॉपी के लिए मौजूद हो. सत्ता में बैठी पार्टी की पहुँच इन सारी सूचनाओं तक होगी. यह भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए बड़ा खतरा है. हमें अपनी निजी सूचनाएँ किसी सरकारी कर्मचारी को देने के लिए मजबूर क्यों होना चाहिए?

सरकार का यह बहाना कि ये सभी सूचनाएँ देना अनिवार्य नहीं है, सच्चाई से परे है:

1: इन सूचनाओं के लिए बने कॉलम में लिखा है कि ‘यदि मौजूद है’. वहाँ यह नहीं लिखा है कि यह वैकल्पिक है. इसका क्या मतलब है? क्या कोई व्यक्ति सच्चाई से कह सकता है कि उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस या पैन कार्ड या वोटर कार्ड है लेकिन इनके नम्बर मौजूद नहीं हैं? ऐसा करने पर उसपर झूठ बोलने का मुक़दमा चलाया जा सकेगा!

2: दूसरे आम नागरिकों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अनिवार्य और ऐच्छिक सूचना के बारे में बारीक अंतर समझ सकें. वे आमतौर पर सभी पर भरोसा करते हैं और जब कोई सरकारी कर्मचारी उनके पास आएगा तो वे ईमानदारी से अपनी सारी सूचनाएँ उसे दे देंगे. वे इन महत्वपूर्ण सूचनाओं के इस्तेमाल की खतरनाक सम्भावनाओं के बारे में नहीं समझ सकेंगे. सरकार हमारे नागरिकों के इसी भरोसे पर दाँव लगा रही है और ‘यदि मौजूद है’ जैसा कॉलम जोड़ रही है.

3: तीसरे हमें कैसे यक़ीन हो कि इस सर्वेक्षण में लगे हुए सरकारी कर्मचारी ऐसी सूचनाएँ देने से इंकार करने वालों के खिलाफ टिप्पणियाँ नहीं करेंगे? हम जानते हैं कि एनपीआर के मैनुअल में उन लोगों से पूछताछ का प्रावधान किया गया है जिनके फ़ॉर्म अधूरे पाए जाएँगे या जिनके खिलाफ टिप्पणियाँ की गयी होंगी. इस तरह लोगों को और भी परेशान किया जाएगा और उन्हें ‘संदिग्ध नागरिक’ की श्रेणी में डॉल दिया जाएगा. सच है कि परेशान करने का डर दिखा कर सरकारी कर्मचारी कोई भी सूचना निकाल लेंगे.

अख़बारों में ऐसी बहुत सी परस्पर विरोधी ख़बरें हैं कि लोगों को बैंक खातों के केवाईसी दस्तावेज में अपना धर्म बताना होगा. सरकार ने इससे इंकार किया है. सच्चाई क्या है?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ख़बर छपी कि “नागरिकता संशोधन कानून की तरह ही भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा 2018 में जारी फ़ॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट रेगुलेशंस केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान से आए लम्बी अवधि के वीजाधारक अल्पसंख्यक समुदायों यानी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई तक सीमित हैं. ये लम्बी अवधि के वीजाधारक भारत में बैंक खाते खोल सकते हैं और रिहायशी सम्पत्ति ख़रीद सकते हैं. इस कानून में नास्तिकों, मुसलमान प्रवासियों और म्यांमार, श्रीलंका व तिब्बत से आए लोगों को शामिल नहीं किया गया है.”‘Bank KYC forms may seek details of clients’ religion’, 21 December 2019

सरकार ने इससे इंकार करते हुए तत्काल स्पष्टीकरण जारी किया कि “किसी भी भारतीय नागरिक को बैंक में खाता खोलने के लिए अपना धर्म बताने की ज़रूरत नहीं है.”‘No Need To Mention Religion For Bank A/C, KYC: Finance Secretary’, NDTV, 22 December 2019

ये सरकार हमें आधा सच बोलकर उसी तरह मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है जैसे महाभारत में युधिष्ठिर ने ‘अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो वा’ कहा था.

‘नागरिक’ कौन है? एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून लोगों से नागरिकता छीनने की कोशिशें हैं. जिनकी नागरिकता छीनी जाएगी, उनमें से जो गैर-मुसलमान होंगे, वे नागरिकता संशोधन कानून के जरिये नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे. जब तक उन्हें फिर से नागरिकता हासिल नहीं होती, तब तक पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान से आए हुए केवल गैर-मुसलमान शरणार्थी ही लम्बी अवधि का वीज़ा हासिल कर पाएँगे और इसके जरिये ही उन्हें बैंक खाता खोलने जैसे तमाम अधिकार मिलेंगे.

हम पहले चर्चा कर आए हैं कि 29 दिसम्बर 2011 की अधिसूचना के जरिये यूपीए सरकार ने शरणार्थियों को लम्बी अवधि के वीज़ा के लिए आवेदन करने का स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर जारी किया था. जिन्हें लम्बी अवधि का वीज़ा मिल जाएगा, वे बैंकों में खाते खोल सकेंगे, पैन कार्ड. आधार कार्ड व ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकेंगे और यहाँ तक कि घर खरीद सकेंगे. मोदी-शाह सरकार ने 2015 में पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान से आए गैर-मुसलमान शरणार्थियों के लिए लम्बी अवधि के वीज़ा की नयी कोटि शुरू की. इसीलिए केवाईसी में धर्म का कॉलम शुरू किया गया.

यदि मैं भारतीय हूँ तो सरकार के सामने अपनी नागरिकता साबित करने से क्यों घबराऊँ? सरकार को यह हक़ है कि वह हमसे कभी भी दस्तावेज माँग सकती है.

लोकतंत्र का मतलब है कि हम भारत के लोग सरकार को चुनते हैं – सरकार का काम जनता को चुनना नहीं है. हमारी नागरिकता दस्तावेजों के आधार पर नहीं – बल्कि इससे तय होती है कि भारत के संविधान को हम ‍पूर्णता में ग्रहण करके उस पर पूरी तरह अमल करते हैं या नहीं.

सरकार और संसद हमारे वोटों से चुनी गई हैं. यदि सांसदों और सरकार को चुनने वाले मतदाताओं की नागरिकता ‘संदिग्ध’ है, तब तो सरकार और संसद भी संदिग्ध हो गये – ऐसे में सरकार और सांसदों को पहले इस्तीफ़ा दे देना चाहिए! हमने जिस सरकार और जिन सांसदों को चुना है उन्‍हें कागजातों के आधार पर हमारी नागरिकता- और अपने देश से हमारे रिश्ते – पर सवाल खड़ा करने का कोई अधिकार नहीं है.

भारत का संविधान ‘हम भारत के लोग’ से शुरू होता है. सभी शक्तियाँ भारत के लोगों में निहित हैं और वे ही भारतीय संप्रभुता की बुनियाद हैं. लोग संविधान के अनुरूप सरकार का चुनाव करते हैं और सरकार संविधान की रक्षा करने के लिए बाध्य है.

मौजूदा सरकार इस सम्बंध को पूरी तरह उलट देने पर आमादा है. अब जनता, सरकार को जवाबदेह ठहराए, इसकी जगह अब सरकार लगातार जनता से जवाबदेही की माँग कर रही है. नोटबंदी के दौरान जनता पर जवाबदेही डाल दी गयी कि वह साबित करे कि उसका पैसा क़ानूनी तरीके से कमाया गया है. यूएपीए (UAPA) के तहत नागरिकों पर यह जिम्मेदारी डाली गयी कि वे साबित करें कि वे आतंकवादी नहीं हैं या किसी गैर-क़ानूनी गतिविधि में लिप्त नहीं हैं. अब नागरिकता कानून और एनआरसी के जरिये हमें ही साबित करना है कि हम भारत के वैध नागरिक हैं.

एडवोकेट गौतम भाटिया ने इसे समझाते हुए कहा कि “एक अपराध की घटना को हल करने के लिए आप यह नहीं करते कि इलाक़े के हर व्यक्ति को थाने में ले आएँ और उनसे साबित करने के लिए कहें कि उन्होंने ये अपराध नहीं किया है. कुछ बिना दस्तावेज के प्रवासियों को खोजने के लिए आप 130 करोड़ भारतीयों को स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के सामने पेश नहीं कर सकते और उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.”

भारत के नागरिक के बतौर हमें यह अधिकार है कि हम सरकार से दस्तावेज़ों और सूचनाओं की माँग करें और सरकार उन्हें हमें दे. लेकिन मोदी सरकार ने हमेशा इससे इंकार किया है.

मोदी की डिग्री?
सरकार: कागज नहीं दिखाएँगे.
 

चुनावी बॉन्ड से मिले पैसे की जानकारी?
सरकार: कागज नहीं दिखाएँगे.
जीडीपी?
सरकार: कागज नहीं दिखाएँगे.
रफाएल सौदे के कागज?
सरकार: कागज नहीं दिखाएँगे.
बेरोजगारी का आँकड़ा?
सरकार: कागज नहीं दिखाएँगे.

तब सरकार की इतनी हिम्मत कैसे हो रही है कि वह हमें परेशान करे और अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करे?

एनआरआईसी पर कितना ख़र्चा होगा?

असम में एनआरसी करने में 10 साल का समय और 52 हज़ार कर्मचारी लगे. इसमें कुल ख़र्च आया: 1,600 करोड़ रूपए. निर्दोष और ग़रीब लोगों को हुई परेशानी और तकलीफ़ों का तो कोई हिसाब ही नहीं है. पूरे देश में होने वाले एनआरसी पर कम से कम 50 हज़ार करोड़ रूपए ख़र्च होंगे. साथ ही पूरे देश के लोगों को अगले दस साल तक अपनी नागरिकता साबित करने की गैर-ज़रूरी और क्रूर क़वायद के लिए दस्तावेज जुटाने में बिताने होंगे.

नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर पैसा क्यों बर्बाद किया जाए? इसकी जगह सरकार बेरोज़गार लोगों का आँकड़ा क्यों नहीं जुटाती? सरकार बेरोज़गारों को बेरोजगारी भत्ता या नौकरियाँ देने की बात क्यों नहीं करती?

साफ है मोदी सरकार ने नागरिकता को ख़तरे में डालने और मुसलमानों के साथ भेदभाव करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसे रोकने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

डॉक्टर अम्बेडकर द्वारा बनाया गया भारत का संविधान मुसलमान-हिंदू-सिख-ईसाई-जैन-बौद्ध-यहूदी, सब को बराबर मानता है. आरएसएस को हमेशा ही इस संविधान से नफ़रत रही है. भाजपा हमारे मन में ज़हर घोलना चाहती है और भारत को हिंदू-मुसलमान में बाँटना चाहती है. ऐसा बँटवारा देश को कमजोर कर देगा जिससे सब को नुक़सान पहुँचेगा. पड़ोसी के घर में आग लगाने से अपना घर भी जलेगा. हमें एकजुट होना होगा, और अपना देश बचाना होगा.

नोटबंदी ने नौकरियाँ खा लीं और अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेल दिया. हमें सरकार को नयी तबाही लाने से रोकना होगा. इस नयी तबाही से हमारे संविधान को खतरा है और देश के बँटने की आशंका है.

आज मुसलमान-हिंदू-सिख-ईसाई, हर भारतीय, हर भाषा और धर्म को मानने वाला विरोध प्रदर्शनों में मौजूद है. वे भारत के लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए एकजुट हैं.

क्या मोदी हिटलर के नागरिकता कानून की नक़ल कर रहे हैं?

हिटलर की नाज़ी पार्टी ने सत्ता में आने के दो साल बाद ही जर्मनी की नागरिकता को तय करने के लिए नए कानून बनाए थे. न्यूरेमबर्ग क़ानूनों की शुरुआत यहूदियों और गैर-यहूदियों को अलग-अलग करने से हुई थी. बाद में इसमें बहुत सारी और धाराएँ जोड़कर उन सबको शामिल कर लिया गया जिन्हें सरकार ‘अवांछनीय’ समझती थी. इससे सिर्फ़ यहूदियों के ही जनसंहार का रास्ता साफ नहीं हुआ बल्कि मूलनिवासियों, समलैंगिकों, विकलांगों, नाज़ी सरकार के आलोचकों, कम्यूनिस्टों और जो भी जर्मन सरकार की आँखों में देश के दुश्मन थे, उन सब के जनसंहार का रास्ता साफ हुआ. अख़बारों और रेडियो के जरिये नाज़ी प्रचार ने पहले ही वह पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी जिसके चलते घेट्टो और यातना-शिविर बनाए गए.

हमें याद रखना चाहिए कि आरएसएस हमेशा ही भारत के संविधान से नफ़रत करता रहा है और हिटलर की विभाजनकारी नीतियों का मुरीद रहा है. गोलवलकर ने जर्मनी में यहूदियों के जनसंहार (जिसके कारण आज जर्मनी और पूरी दुनियां का सर शर्म से झुक जाता है) को “जर्मन नस्ल का गौरव” और “हिंदुस्थान के लोगों को उससे शिक्षा ग्रहण करने और लाभ उठाने लायक” कहा था. उसने यह भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, सिख एवं अन्य अल्पसंख्यकों को “…या तो हिंदू संस्कृति और भाषा स्वीकार करनी होगी, हिंदू धर्म का सम्मान करना सीखना होगा, उन्हें हिंदू नस्ल और संस्कृति का यशोगान करने के अलावा कोई और विचार नहीं लाना होगा, उन्हें इस हिंदू राष्ट्र में अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी और हिंदू नस्ल में घुल जाना होगा, या फिर उन्हें हिंदू राष्ट्र में दोयम दर्जे के नागरिक की तरह रहना होगा. जहाँ उन्हें न तो नागरिकता के अधिकार होंगे, न ही किसी अन्य तरह की सहूलियत प्राप्त होगी.”M. S. Golwalkar, We or Our Nationhood Defined, 1938, p. 35 & p. 47-48

आज मोदी-शाह सरकार गोलवलकर के विभाजनकारी विचारों को साकार करना चाहती है. इस प्रक्रिया में वे उस दु:स्वप्न को भी साकार रूप दे रहे हैं जिसकी चेतावनी अम्बेडकर ने 1940 में दी थी:

“यदि हिंदू राज हकीकत बन गया तो यह देश के लिए भारी तबाही लाएगा.”

आज यह तबाही हकीकत बनाने वाली है. याद रखना चाहिए कि हिंदू राज केवल मुसलमानों के लिए तबाही नहीं लाएगा, यह दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, ग़रीब मजदूरों, किसानों, सबके लिए तबाही लाएगा. यह तानाशाही होगी.

हमारे पास अब भी इस तानाशाही को, हिटलरशाही को, हकीकत बनने से रोकने का मौक़ा है. हम अश्फ़ाकउल्ला खान और रामप्रसाद बिस्मिल की साझी शहादत की विरासत को बुलंद करते हुए अपनी साझी नागरिकता की रक्षा कर सकते हैं.

nrc roko

 

इस तबाही को रोकने और देश व संविधान को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

तथ्य जानिए, तैयार रहिए, अपने दोस्तों और परिवार के लोगों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में शामिल कराइए.

हर सड़क, गली, गाँव, मोहल्ले, चौराहे, नगर, शहर में लोगों को संगठित करिए कि:

1: नागरिकता संशोधन कानून को ख़त्म करने की माँग करें.

2: अपनी राज्य सरकार से माँग करें कि वह एनपीआर की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाए और एनआरसी लागू करने से इंकार कर दे. अपने स्थानीय विधायक से सम्पर्क करिए और गारंटी करिए कि राज्य विधानसभा इस सिलसिले में प्रस्ताव पारित करे. याद रखिए, एनआरसी के खिलाफ बयान देना काफ़ी नहीं है. राज्य सरकारों को एनपीआर की चल रही प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगानी होगी.

3: माँग करिए कि केंद्र व राज्य सरकारें बन रहे डिटेंशन कैम्पों का काम तुरंत रोक दें.

4: ‘दरवाज़ा बंद’ अभियान चलाइए. यह एक सामूहिक सत्याग्रह है. जब कर्मचारी एनपीआर के लिए सूचना इकट्ठी करने आएँ तो अपने घर का दरवाजा बंद कर लें. याद रखिए कि वे आपको नौकरी, घर या कोई सुविधा देने के लिए जानकारी इकट्ठी नहीं कर रहे हैं बल्कि वे आपकी नागरिकता छीनने और देश को धर्म के आधार पर बाँटने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं. आज़ादी की लड़ाई के दौरान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया था, उसी तरह आज हम भारतवासियों को अपना देश और संविधान बचाने के लिए सत्याग्रह करना होगा. एनपीआर के लिए अपना दरवाज़ा बंद करके हम फ़ासीवाद और तानाशाही के लिए दरवाज़ा बंद कर रहे हैं.

5: अगर आप मुसलमान नहीं हैं, तो साम्प्रदायिक गुंडों और पुलिस की हिंसा झेल रहे अपने पड़ोसी मुसलमान भाइयों की मदद कीजिए. सार्वजनिक जगहों पर मुसलमान पड़ोसियों के साथ जाइए. हिंसा और उत्पीड़न का सामना करने की हालत में आपातकालीन सम्पर्क के लिए उन्हें अपना फ़ोन नम्बर दीजिए. घृणा फैलाने की हर घटना के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज़ उठाइए. चुप मत बैठिए. हिंसक मत होईए. प्यार और सच्चाई के पक्ष में खड़े होईए.

constiturion