(लिबरेशन, अप्रैल 1991)

मैंने अपने लेख ‘युद्ध की राजनीति’ में यह उल्लेख किया है कि मौजूदा युद्ध आज के विश्व के अंतरविरोधों और संश्रयों का प्रतिबिंब है और साथ ही साथ यह शक्तियों के परस्पर संबंधों में परिवर्तनों को अंजाम देने का एक माध्यम भी है.

पिछले कुछ वर्षों से सोवियत संघ एक महाशक्ति की हैसियत से संयुक्त राज्य अमेरिका का मुकाबला करने में साफ तौर पर पीछे हटता रहा है, इस पीछे हटने को मीठी शब्दावली में ‘शांति आक्रमण’ कहा जाता है. इसके अतिरिक्त, साम्राज्यवाद के बारे में सोवियत संघ के सिद्धांत और पश्चिम के साथ उसके विकसित हो रहे घनिष्ठ संबंध ने स्पष्ट रूप से इसे तीसरी दुनिया के हितों के खिलाफ खड़ा कर दिया है. व्यावहारिक दृष्टि से, एकदम शुरूआत से ही सोवियत संघ ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी षड्यंत्र में जान बूझकर मातहती की भूमिका निभाई. सैद्धांतिक तौर पर हम यह सब जानते हैं और इसे दो टुक भाषा में रखते भी आ रहे हैं. आखिरी दौर में सोवियत ने जो एक शांति योजना पेश करने का प्रयास किया वह इसकी आत्मसमर्पण को संगठित करने की योजना के सिवा और कुछ नहीं था. वह युद्ध के बाद पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका को बरकरार रखने का उसका एक दब्बू प्रयास था. अमेरिका सोवियत संघ की बुनियादी नपुंसकता को भलीभांति समझता था. सोवियत संघ की शांति योजना को नामंजूर कर दिया.

सोवियत संघ ने उसके जवाब में काटछांट करके एक संक्षिप्त रूपांतरित योजना पेश की और उसे भी पुनः ठुकरा दिए जाने पर उन्होंने अमरीकियों के साथ सुर में सुर मिला दिया. मैंने अपना लेख उसी दिन लिखा था जिस दिन सोवियत प्रस्ताव आया था. मैं समझ गया था कि यह सद्दाम के प्रतिरोध का अंत है. लिहाजा मैंने इराक के दूसरा वियतनाम बन जाने के अपने पहले के मूल्यांकन के बदले सद्दाम की संभावित हार का जिक्र किया और युद्ध के बाद शक्तियों के नए संभावित पुनर्संश्रय की चर्चा करते हुए उसे समाप्त कर दिया. सोवियत संघ की भूमिका के बारे में मेरे मन में रत्ती भर भी भ्रम कभी नहीं रहा. सोवियत संघ पहले ही उस स्थिति तक उतर चुका था जो उसने तार्किक तौर पर अपनाया था. हमारे कामरेडों ने सोवियत संघ की बदली हुई भूमिका को समझने लायक स्थिति में मानसिक तौर पर खुद को नहीं ढाला, बावजूद इसके कि उसका बहुत पहले ही विश्लेषण किया जा चुका था. युद्ध ने तो केवल सोवियत संघ के असली चेहरे को सामने ला दिया है. दूसरी ओर, युद्ध के बाद सोवियत संघ में नई चिंता नजर आ रही है और जैसा कि मैंने अपने लेख में लिखा था, अमेरिका के साथ शांति धीरे-धीरे उष्ण संबंधों की ओर मुड़ सकती है. सीपीआई और सीपीआई(एम) के लिए सोवियत संघ पर लाल-पीला होना शोभता है क्योंकि उससे वे बड़ी-बड़ी उम्मीदें बांधे बैठे थे. हमारे लिए तो बेहतर यह होगा कि हम अमेरिका के साथ उसके संबंधों में अगर कोई नया मोड़ आता है तो उस पर नजर रखें.

जहां तक चीन का संबंध है तो उससे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक समाजवादी देश के तौर पर किसी विशेष भूमिका की आशा करना बड़े ऊंचे सपने देखना है. काफी अरसा पहले ही उसने यह प्रदर्शित कर दिया है कि उसे सोवियत संघ की जगह लेकर वैसी किसी भूमिका में आने की दिलचस्पी नहीं है. जो हो, तीसरी दुनिया का एक देश होने के नाते उसने सोवियत संघ के साथ विभाजन रेखा तो खींच ही ली और वोटिंग प्रक्रिया से अपने को दूर रखा तथा तीसरी दुनिया के देशों के साथ सुर में सुर मिलाने की कोशिश की. उसने आर्थिक निर्माण की अपनी कोशिश में पश्चिम के साथ बहुआयामी संबंध विकसित किए हैं तथा थ्येन आनमन की घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पश्चिम के सम्मुख उसके आक्रमण की धार कुंद हो चुकी है. और उसका जोर तनावपूर्ण संबंधों को सामान्य बनाने पर है. पिछले वर्षों के दौरान उसने जिस तरह के हालात में अपने को फंसा दिया है, उसमें उसके लिए यह संभव नहीं है कि वह सहसा कोई बहुत आमूलगामी स्थिति अख्तियार करे. इसी वजह से मैंने कहा था कि युद्ध ने विभिन्न देशों के बीच मौजूद संबंधों को केवल खुला कर दिया है. हम सैद्धांतिक तौर पर सारी चीजें जानते हैं, लेकिन पुराने भ्रम जल्दी दम नहीं तोड़ते और जब जीवन के तथ्य उन्हीं चीजों को पुष्ट करते हैं तो हम अचम्भित हो जाते हैं और अपनी भावनाओं का विस्फोट करके मन को संतोष देने की कोशिश करते हैं. मेरे ख्याल से मूल बात है बदलते सम्बंधों की बनावट पर नजर रखाना, क्योंकि मुझे यकीन है कि चीनी लोग और उसी कारण से बहुत सारे देश, अमेरिका की नई विश्व व्यवस्था की धमकी से गहरे तौर पर चिंतित है और युद्ध ने हर जगह पुनर्विचार की एक लहर पैदा कर दी है. नए संबंधों को आकार ग्रहण करने में कुछ समय लगेगा.

कोई रूस अथवा चीन की जितनी उसकी मर्जी हो उतनी आलोचना करने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि इससे हमारी पार्टी लाइन के साथ कोई अंतर्विरोधनहीं खड़ा होता है. यहां तक कि, अगर कुछ कामरेड चीनी दूतावास के सामने इस सवाल पर कोई विरोध प्रदर्शन भी करें तो भी कोई आपत्ति नहीं है. किंतु मैं तो केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों के भावावेश-रहित विश्लेषण भर से संतुष्ट रहूंगा क्योंकि विश्व के मामलों का निर्णय मात्र दस वर्षों के अंदर नहीं, कई दशकों में होता है.