फासीवाद

(अगस्त 1923 के लेबर मासिक पत्रिका में प्रकाशित क्लारा ज़ेटकिन के लेख के चुनिन्दा अंश)

claraफासीवाद विश्व बुर्जुआ की सर्वहारा के खिलाफ आम आक्रामकता की संघनित अभिव्यक्ति है. इसलिये इसे उखाड़ फेंकना बेहद जरूरी है... हम लोगों के लिए फासीवाद को हराना काफी आसान हो जायेगा, अगर हम इसके चरित्र-स्वभाव का साफ़-साफ़ गहराई से अध्ययन कर सकें. फासीवाद, ... वस्तुगत दृष्टि से देखने पर, बुर्जुआ के खिलाफ सर्वहारा की आक्रामकता की प्रतिक्रिया में बदले की कार्यवाही नहीं, बल्कि रूस में शुरू हुई क्रांति को आगे बढ़ा पाने में सर्वहारा की विफलता की सज़ा है. फासिस्ट नेता कोई छोटी सी अलग-थलग जाति न हो कर आबादी के व्यापकतम तत्वों में गहराई से पैबस्त होते हैं.

हमें फासीवाद पर न सिर्फ सामरिक रूप से, बल्कि राजनीतिक और विचारधारात्मक रूप से भी विजय पानी होगी... फासीवाद, अपने हिंसक कुकृत्यों को अंजाम देने में अपने सारे आवेग के साथ, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पतन व बिखराव की अभिव्यक्ति और बुर्जुआ राज्य के अंत के लक्षण के अलावा और कुछ नहीं है. यह उसकी जड़ों में से एक है... फासीवाद की दूसरी जड़ सुधारवादी नेताओं की गद्दारी की प्रवृत्ति के चलते विश्व क्रांति को लगे धक्कों में है. पेट्टी बुर्जुआ की बड़ी संख्या ने, जिसमें यहाँ तक कि मध्यम वर्ग भी शामिल हैं, अपनी युद्ध काल की मानसिकता को सुधारवादी समाजवाद के साथ सहानुभूति में इस उम्मीद के साथ त्याग दिया है कि यह सुधारवादी समाजवाद जनतांत्रिक लाइनों पर समाज में सुधार ला सकेगा. वे अपनी उम्मीदों में निराश हुए हैं. वे अब देख सकते हैं कि सुधारवादी नेता बुर्जुआ के साथ समझौतों की गलबहियों में हैं. और सबसे खराब बात यह है कि इन समुदायों ने न सिर्फ सुधारवादी नेताओं, बल्कि समूचे समाजवाद के प्रति अपना विश्वास खो दिया है. समाजवादी सहानुभूति रखने वाले निराश-हताश समुदायों के साथ सर्वहारा – उन मजदूरों के भी बड़े हिस्से जुड़ रहे हैं, जिन्होंने न सिर्फ समाजवाद बल्कि खुद अपने वर्ग के प्रति भी विश्वास खो दिया है. सच्चाई के साथ यह भी कहा जाना चाहिये कि – रूसियों को छोड़ कर – कम्युनिस्ट भी इन तत्वों के फासीवाद की कतारों में चले जाने के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि कई बार हमारी कार्यवाहियां जन समुदायों को पर्याप्त रूप से उद्वेलित – आवेगित कर पाने में विफल रहती हैं.

फासीवाद अलग-अलग देशो में अलग-अलग चरित्र अपनाता है. इसके बावजूद इसकी दो चारित्रिक विशिष्टतायें हर देश में बनी रहती हैं - एक क्रन्तिकारी कार्यक्रम का दिखावा, जो बड़ी शातिर धूर्तता के साथ व्यापक जन समुदायों के हितों और मांगों के अनुरूप गढ़ा जाता है, और दूसरी : नितान्त नृशंस और बर्बर हिंसा...

इटली के बाद फासीवाद जर्मनी में सबसे मज़बूत है. युद्ध के नतीजे, और क्रांति की विफलता के चलते, जर्मनी की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कमजोर है. किसी भी दूसरे देश में क्रांति की वस्तुगत परिस्थितियों की परिपक्वता और मजदूर वर्ग की आत्मगत अपरिपक्वता का अंतर इतना विषम और तीखा नहीं है जितना जर्मनी में. किसी भी दूसरे देश में सुधारवादी इतनी बुरी तरह से विफल नहीं हुए थे जितना जर्मनी में (सन्दर्भ : एस.डी.पी.). पुराने इन्टरनेशनल की किसी भी अन्य पार्टी की विफलता से कही ज्यादा आपराधिक उनकी विफलता थी, क्योंकि ये वही थे जिन पर एक ऐसे देश में में बिलकुल अलग साधनों-तरीकों से सर्वहारा की मुक्ति के संघर्ष को चलाने- आगे ले चलने की जिम्मेदारी थी, जहाँ का मजदूर वर्ग किसी भी अन्य देश की अपेक्षा ज्यादा पुराना और बेहतर संगठित था.

... कम्युनिस्ट पार्टियों को न सिर्फ शारीरिक श्रम के सर्वहारा का वेनगार्ड, बल्कि मानसिक श्रम करने वाले श्रमिकों के हितों का भी उत्साही-आवेगी रक्षक होना चाहिये. उन्हें बुर्जुआ विरोध में अपने-अपने हितों और भविष्य की उम्मीदों के साथ शामिल हुए समाज के तमाम हिस्सों का नेता बनना होगा... हमें यह निश्चित रूप से समझना होगा कि फासीवाद उन लोगों का आन्दोलन है जो हताश-निराश हैं और जिनका अस्तित्व बर्बाद हो चुका है. इसलिए हमें निश्चय ही उन व्यापक समुदायों को जीतने या अपने साथ जोड़ने की कोशिश करनी होगी जो अभी भी फासिस्ट खेमे में हैं. मैं हमारी उस वैचारिकी पर जोर देना चाहूंगी कि हमें इन समुदायों की आत्मा को जीतने-पाने के लिए विचारधारात्मक रूप से संघर्ष करना ही होगा. हमें यह समझना ही होगा कि वे न केवल अपनी वर्तमान त्रासदियों-संकटों से पार पाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि वे एक नए दर्शन की भी चाहना रखते हैं... हमें खुद को सिर्फ अपने राजनीतिक और आर्थिक कार्यक्रम के लिए संघर्ष तक ही सीमित नहीं रखना होगा. हमें इसी के साथ-साथ जन समुदायों को कम्युनिज्म के आदर्शों को एक दर्शन के रूप में भी आत्मसात कराना होगा...

हमें हर हाल में अपने नए कार्यभारों के अनुरूप अपने काम के तरीकों को संयोजित करना होगा. हमें जन समुदायों से उनके समझ में आने वाली भाषा-शैली में ही बात करनी होगी – अपने विचारों से कोई समझौता किये बगैर. इस तरह फासीवाद के खिलाफ संघर्ष हमारे लिए तमाम नए कार्यभार लाता है.

फासीवादी आक्रमण और कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल के कार्यभार

(ज्यार्जी दिमित्रोव, जनरल सेक्रेटरी, कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल द्वारा सातवीं विश्व कांग्रेस में 2 अगस्त 1935 को प्रस्तुत रिपोर्ट के चुनिन्दा अंश)

dimitrov“कामरेडों, अपनी छठीं कांग्रेस (1928) में ही कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने विश्व सर्वहारा को यह चेतावनी देते हुए कि एक नया फ़ासिस्ट आक्रमण तैयारी में है, इसके खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया था. कांग्रेस ने इंगित किया था : “अपने कमोबेश विकसित रूप में फासीवादी प्रवृत्तियां और कीड़े लगभग सभी जगह पाये जा सकते हैं...

“सत्ता में फासीवाद को कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल की कार्य कारिणी के तेरहवें प्लेनम ने वित्तीय पूँजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे अंधराष्ट्रवादी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की नंगी तानाशाही के रूप में बिलकुल सटीक चिन्हित किया था...

“फासीवाद और फासीवादी तानाशाही विभिन्न देशों में ऐतिहासिक, सामाजिक व आर्थिक स्थितियों, राष्ट्रीय विशिष्टताओं, और उस देश की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के अनुरूप अलग-अलग रूप ले सकती है. ऐसे देशों में, खासकर जहाँ फासीवाद का व्यापक जनाधार नहीं है, और जहाँ फासीवादी बुर्जुआ के खेमे में उसके विभिन्न गुटों-समूहों के बीच का संघर्ष काफी तीखा है, फासीवाद तुरंत संसद भंग करने का दुस्साहस नहीं करता बल्कि अन्य बुर्जुआ पार्टियों और सामाजिक जनवादी पार्टियों को भी कुछ हद तक वैधता बनाए रखने की इजाजत देता है. दूसरे देशों में, जहाँ शासक बुर्जुआ को जल्दी ही क्रांति के विस्फोट का भय होता है, फासीवाद अपना निर्बाध राजनीतिक एकाधिकार स्थापित कर लेता है – या तो तुरंत या फिर सारी प्रतिस्पर्धी पार्टियों और समूहों के खिलाफ आतंक व हत्या का राज कायम करने के जरिये. मगर यह फासीवाद के, जब वह खासे संकट में होता है, अपना आधार विस्तारित करने, और बिना अपना वर्ग चरित्र बदले, अपनी खुली आतंकी तानाशाही को संसदवाद के भोथरे छद्म के साथ जोड़ने में बाधा नहीं बनता.

“फासीवाद का सत्तारोहण एक बुर्जुआ सरकार से दूसरी में सामान्य संक्रमण नहीं, बल्कि बुर्जुआ वर्ग वर्चस्व के एक राज्य रूप- बुर्जुआ जनतंत्र – से नंगी आतंकी तानाशाही में संक्रमण है. इस विभेद को नज़रन्दाज करना भारी भूल होगी, एक ऐसी भूल जो क्रांन्तिकारी सर्वहारा को फ़ासिस्टों द्वारा सत्ता पर कब्जे के आतंक के खिलाफ लड़ने के लिए शहरों और गाँवों की श्रमशील जनता के व्यापकतम हिस्सों को गोलबंद करने और खुद बुर्जुआ खेमे के अन्दर के अंतर्विरोधों का फायदा उठाने से रोक देगी... आमतौर पर फासीवाद पुरानी बुर्जुआ पार्टियों के परस्पर और कई बार बेहद तीखे संघर्षो के क्रम में, अथवा इन पार्टियों के हिस्सों, यहाँ तक कि खुद फासिस्ट खेमे के अन्दर के संघर्षो के क्रम में सत्ता में आता है...

“फासिस्ट तानाशाही के स्थापित होने से पहले, बुर्जुआ सरकारें आम तौर पर कई प्रारंभिक दौरों से गुजरती हुई, ऐसे प्रतिक्रियावादी उपाय अपनाती हैं, जो फासीवाद के सत्ता तक पहुँचने में सीधे सहायक होते हैं. वे लोग जो इन प्रारंभिक /तैयारी के दौर के बुर्जुआ के प्रतिक्रियावादी उपायों और फासीवाद के उभार के खिलाफ संघर्ष नहीं करते, वे फासीवाद की विजय को रोक पाने की स्थिति में नहीं होते, बल्कि इसके उलट, उस विजय को आसन बना देते हैं...

“जन समुदायों पर फासीवाद के प्रभाव के स्रोत क्या हैं? फासीवाद जन समुदायों को आकर्षित कर लेने में इसलिये सफल हो जाता है कि यह अपने वक्तृत्व कौशल की धूर्तता के जरिये उनकी सबसे जरूरी और आपात मांगों-जरूरतों को अपील करता है. फासीवाद न सिर्फ जन समुदायों के अन्दर गहरे जड़ जमाये हुए पूर्वाग्रहों को हवा देता है, बल्कि उनकी श्रेष्ठतर भावनाओं के साथ भी खेलता है – उनकी न्याय की भावनाओं के साथ, और कभी-कभी उनकी क्रन्तिकारी परम्पराओं के साथ भी. आखिर क्यों जर्मन फासिस्ट, बड़े बुर्जुआ के वे दलाल और समाजवाद के मरणान्तक दुश्मन, जनता के बीच खुद को “सोशलिस्टों” के रूप में पेश करते थे, और अपने सत्तारोहण के अभियान को “क्रांति” का नाम देते थे ? क्योंकि वे क्रांति के प्रति जनता की उस आस्था और समाजवाद के प्रति उस चाहना का शोषण करने की कोशिश कर रहे थे जो जर्मनी के श्रमशील जन समुदायों के दिलों में बसती थी...

“फासीवाद उनके बीच एक ईमानदार और भ्रष्ट न हो सकने वाली सरकार की मांग के साथ आता है. जनता के बुर्जुआ सरकारों के प्रति गहनतम मोहभंग पर दांव खेलते हुए फासीवाद निहायत दोगलेपन के साथ भ्रष्टाचार का विरोध करता है...

“यह बुर्जुआ के सबसे प्रतिक्रियावादी हिस्सों के हित में है कि फासीवाद जन समुदायों के उन हिस्सों में अपने पैठ बनाये जो पुराने बुर्जुआ को छोड़ चुके होते हैं. यह काम फासीवाद इन समुदायों को बुर्जुआ सरकारों के खिलाफ अपने हमलों के तीखेपन और पुरानी बुर्जुआ पार्टियों के प्रति अपने समझौताविहीन दृष्टिकोण के जरिये आकृष्ट कर के करता है.

बुर्जुआ प्रतिक्रिया की अन्य तमाम किस्मों को अपनी उन्मादी सनक और दोगलेपन में कहीं पीछे छोड़ते हुए फासीवाद अपनी लफ्फाजी की वक्तृता को हर देश की राष्ट्रीय विशिष्टताओं की संगति में और यहाँ तक कि एक राष्ट्र के अन्दर भी विभिन्न सामाजिक समूहों-संस्तरों की विशिष्टताओं के अनुरूप ढाल लेता है. और पेट्टी बुर्जुआ, और यहाँ तक कि मजदूर वर्ग का एक हिस्सा भी, जो अभाव, बेरोजगारी, और अपने अस्तित्व की असुरक्षा का गहनतम संकट झेल रहा होता है, फासीवाद की सामाजिक व अंधराष्ट्रवादी लफ्फाज वक्तृता का शिकार बन जाता है...”