गसोुा७

भारत में फासीवाद की प्रमुख विशिष्‍टतायें

आर.एस.एस. के शुरूआती वर्षों में एम.एस. गोलवलकर ने हिटलर को एक 'रोल मॉडल' के रूप में देखा, लेकिन होलोकॉस्‍ट (यहूदियों का जनसंहार) और दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद ऐसा करना सम्‍भव नहीं रह गया था. आज नरेन्‍द्र मोदी सम्‍पूर्ण संघ नेटवर्क की मदद से उसी परम्‍परा को विचारों एवं कार्यवाहियों में पुनर्जीवित और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. गुजरात के मुख्‍यमंत्री के रूप में स्‍कूल की किताबों में उन्‍होंने हिटलर को महान राष्‍ट्रवादी नेता बता प्रशंसा करते हुए एक लेख शामिल करवाया [1] और गुजरात मॉडल को भारत में फासीवाद के 'पायलट प्रोजक्‍ट' के रूप में विकसित किया. अब प्रधानमंत्री के रूप में वे अभूतपूर्व रूप से कॉरपोरेट प्रभुत्‍व वाले और ट्रम्‍प के अमेरिका से गहरी साझीदारी वाले एक निरंकुश हिन्‍दू राष्‍ट्र के बहुप्रतीक्षित लक्ष्‍य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.

हमारी विशिष्‍ट राष्‍ट्रीय परिस्थितियों में चल रहे फासीवादी अनुकूलन का एक आकलन अपने पाठकों को देने के लिए हम यहां भाकपा(माले) लिबरेशन के 10वें अखिल भारतीय महाधिवेशन में गृहीत ‘राष्‍ट्रीय परिस्थिति पर प्रस्‍ताव’ [2] से उद्धरणों को दे रहे हैं. यह महाधिवेशन ‘फासीवाद को हराओ, जनता का भारत बनाओ’ के केन्‍द्रीय नारे के साथ 23-28 मार्च 2018 को पंजाब के मानसा में सम्‍पन्‍न हुआ था.

आक्रामक फासीवादी एजेंडा

“भारत ने पिछले चार सालों में बड़े पैमाने का राजनीतिक बदलाव देखा है. भाजपा ने शासकवर्गों की वर्चस्वशाली प्रतिनिधि पार्टी के बतौर निर्णायक तौर पर कांग्रेस को पीछे धकेल दिया है ... केन्द्र एवं राज्यों में भारत के प्रमुख शासक दल के रूप में भाजपा के इस उभार के चलते यह पार्टी और पूरा संघ परिवार अभूतपूर्व तेजी एवं आक्रामकता के साथ अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में सक्षम हुआ है.

“2014 के संसदीय चुनाव के अभियान को भाजपा ने अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान की तरह संचालित किया. इस दौरान मोदी और उनके तथाकथित गुजरात माॅडल के इर्द-गिर्द एक मजबूत मिथक गढ़ा गया. मोदी द्वारा दिए गए ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ जैसे नारों और ‘भारत-विजय’ जैसी रैलियों में यह आक्रामकता साफ जाहिर थी. तबसे आज तक भाजपा 2014 की चुनावी जीत (केवल 31 फीसदी वोट के साथ) को इस तरह समझ रही है मानो उसने सच में भारत-विजय कर ली हो और संघ-भाजपा की विचारधारा और एजेंडा के अनुरूप हर चीज को बदल देने का लाइसेंस उनको हासिल हो गया हो. भाजपा ने संविधान पर खुलेआम हमला बोल दिया है और मोदी के अनंत हेगड़े जैसे मंत्रियों ने सीधे-सीधे संविधान बदलने के भाजपा के मिशन पर जोर दिया है.

“भारत में फासीवादी हमला राज्य और तमाम गैर-सरकारी ताकतों, दोनों के आपस में तालमेल और घनिष्ठ गठजोड़ द्वारा संचालित है. राज्य मशीनरी लगातार निरंकुश और हस्तक्षेप करने वाली होती गयी है, जबकि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस संघ गिरोह को संरक्षण दे रही है जो भीड़ हत्याओं, असहमति जाहिर करने वाले बुद्धिजीवियों एवं कार्यकर्ताओं की चुन-चुन कर हत्या एवं लगातार चलाये जा रहे जहरीले घृणा अभियान के जरिये सांप्रदायिक व जातिवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था थोपने की कोशिश कर रहा है. मोदी सरकार नागरिकता की शर्तों से लेकर गणतंत्र के मूल स्वरूप तक में बदलाव कर भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की असल बुनियाद को ही नष्ट करने की कोशिशें कर रही है.

संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश

“संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम-काज के कैबिनेट सिस्टम को पूरी तरह से नकारते हुए मोदी, अमरीकी राष्ट्रपति की तर्ज पर अपनी सरकार चला रहे हैं... सरकार सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण और बेशर्मी के साथ मोदी की व्यक्तिगत छवि चमकाने में लगी हुई है.

“मोदी सरकार पहले दिन से ही संसदीय संस्थाओं, प्रक्रियाओं और परम्पराओं को सुनियोजित तरीके से धता बता रही है और क्षतिग्रस्त कर रही है. योजना आयोग को खत्म करके संदिग्ध नीति आयोग बनाना, जो अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की सलाह देते समय आम लोगों के मुद्दों पर जुबानी जमाखर्च भी नहीं करता, यहां तक कि चुनाव आयोग को लोकसभा व विधान सभा के चुनाव एक साथ करवाने की सलाह देना और ‘मनी बिल’ का चोला पहनाकर धोखाधड़ी भरे ‘आधार’ समेत ढेर सारे विवादास्पद कदमों को पास करवाना इसके चंद ज्वलंत उदाहरण हैं.

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के लिए भाजपा की बढ़ती चीख-पुकार संघवाद और राजनीतिक विविधता के सिद्धांतों को कमजोर करने की कोशिश है. एक साथ चुनाव का इस्तेमाल करके वे जनता की राजनैतिक पसंद को सीमित करने और राजनीतिक विमर्श को हर स्तर पर सत्ताधारी पार्टी व बड़े मीडिया घरानों द्वारा गढ़े गए आख्यान के मातहत रखने के जरिये और बड़े पैमाने का राजनीतिक वर्चस्व लादना चाहते हैं...

“राज्यपाल के कार्यालयों, जोकि संवैधानिक रूप से इस प्रकार बनाया गया है कि राज्यों के ऊपर केन्द्र की स्थिति मजबूत बन सके, का भाजपा सत्ता हथियाने के औजार के रूप में खुल कर दुरुपयोग कर रही है. इस प्रकार वह राज्यों के अधिकारों एवं हमारे संवैधनिक ढांचे में निहित संघीय संतुलन के प्रत्येक पहलू का हनन कर भारत में पूरी तरह अपनी ही हुकूमत कायम कर लेना चाहती है.

इसके बाद इस प्रस्‍ताव में मोदी-शाह राज में जिन दो सबसे बड़ी महामारियों से देशग्रस्‍त है – “क्रोनी पूंजीवाद, भ्रष्‍टाचार व आर्थिक तबाही” तथा “गहराता कृषि संकट, बढ़ती बेरोजगारी और बढ़ती गैर-बराबरी” – पर चर्चा की गई है. उसके बाद के छह भाग संक्षेप में नीचे दिये जा रहे हैं.

अल्पसंख्यकों, दलितों एवं असहमति के सभी रूपों पर हमला

“इस आक्रामक कारपोरेटपरस्त आर्थिक एजेंडा के साथ अति-राष्ट्रवादी लफ्फाजी की जुगलबंदी चल रही है. असहमति जाहिर करने और दिक्कततलब सवाल पूछने वाली हर आवाज को राष्ट्रद्रोही बताकर खामोश कराया जा रहा है और उनको देश की सीमा पर तैनात जवानों के बलिदानों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है. यह अति-राष्ट्रवाद केवल मुस्लिम विरोधी जहरीली नफरत और हिंसा के लिये एक झीने आवरण का काम करता है. बीफ खाने व जानवरों का व्यापार करने से लेकर अंतर्धार्मिक विवाह, जिन्हें संघ परिवार ने ‘लव जिहाद’ का नाम दिया है, या ऐसी कोई अफवाह या झूठे आरोप के कारण कभी भी और कहीं भी मुसलमानों को मारा जा सकता है... यहां तक कि खुद मुस्लिम महिला संगठनों द्वारा लम्बे सामाजिक और कानूनी संघर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक बार में तीन तलाक की मनमानी प्रथा को अवैधानिक घोषित करने के निर्णय को भी अब मुसलमान पुरुषों के खिलाफ निन्दा और उत्पीड़न के हथियार में तब्दील करने की कोशिश चल रही है.

“... विभिन्न पदों और सत्ता-संस्थानों में संघ-गिरोह के लोगों के पहुंच जाने के कारण दलितों के उत्पीड़न में गुणात्मक रूप से इजाफा हुआ है. बिहार में भूपतियों की निजी सेनाओं से संघ परिवार का जुड़ाव सर्वविदित है जिनमें सबसे कुख्यात रणवीर सेना थी जिसने 1990दशक के अंतिम वर्षों और 2000 के दशक के शुरूआती वर्षों में कई जनसंहारों को अंजाम दिया. आज दलितों के खिलाफ हिंसा का एक ज्यादा व्यापक अभियान दूर-दराज के गांवों से लेकर बड़े शहरों के विश्वविद्यालयों तक चल रहा है... सांप्रदायिकता और जातिवाद, संघ की विचारधारा के एक सिक्के के ही दो पहलू हैं. हालांकि संघ परिवार धार्मिक अल्पसंख्यकों (चाहे वे मुसलमान हों या ईसाई) के खिलाफ सांप्रदायिक आक्रामक अभियान में दलितों को प्यादे की हैसियत से भरती के लिये भी बेताब है.

“इन सांप्रदायिक और जातिवादी हमलों के तीव्र होने के चलते महिलाओं पर होने वाली हिंसा, नैतिक पुलिसगीरी और जकड़बंदी बढ़ी है. अब इसे लागू करने वाली ताकतों में केवल परम्परागत खाप पंचायतें ही नहीं, नवगठित निगरानी गिरोह भी हैं, जो कानून-व्यवस्था की मशीनरी के परोक्ष समर्थन या फिर खुले संरक्षण से स्वयंभू एंटी रोमियो स्क्वाड बनकर सड़कों पर खुलेआम घूम रहे हैं... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह स्त्री-विरोधी संस्कृति मनुस्मृति के सिद्धांतों और परम्परा पर आधारित है जो जातिगत उत्पीड़न और पितृसत्तात्मक वर्चस्व की नियमावली है, जिसे संघ गिरोह भारत का सर्वाेच्च और मूल संविधान मानता है.

“संघ के विचारधारात्मक ढांचे में मुसलमानों, दलितों (और आदिवासियों के एक हिस्से के, जिन्हें माओवादी या ईसाई कहकर निशाना बनाया जाता है) एवं महिलाओं के खिलाफ नफरत और हिंसा का विस्तार कम्युनिस्टों, वाम/उदारपंथी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं तक चला जाता है. नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे बुद्धिवादियों और सामाजिक न्याय का अभियान चलाने वालों की हत्या एवं हत्या के बाद उसका उत्सव मनाने से लेकर छात्र-युवा नेताओं व कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह और रासुका के मुकदमे लादने, असुविधाजनक सवाल पूछने वाले, जवाबदेही मांगने वाले और सच उजागर करने वाले पत्रकारों की धरपकड़, सोशल मीडिया और मुख्यधारा के इलेक्ट्रांनिक व प्रिंट मीडिया में असहमति की हर आवाज के खिलाफ एक पूरी ट्रोल सेना खड़ी करने, देश के विभिन्न हिस्सों में कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्तरों, कार्यकर्ताओं और कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रतीकों पर बढ़ते हमले – नफरत भरे झूठों के व्यवस्थित प्रचार तथा राज्य उत्पीड़न और राज्य समर्थित निजी स्तर की हिंसा के सम्मिश्रण के ये उदाहरण मोदी के भारत के हर हिस्से में दिखाई पड़ रहे हैं.

“और कश्मीर जैसे राज्य में, जहां तीखे राज्य दमन का सामना करते हुए लोग आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए लम्बे समय से संघर्षरत हैं, भाजपा अभी सत्ता में हिस्सेदार है. उसने कश्मीर में संवैधानिक शासन का ढोंग भी त्याग दिया है और वह आम कश्मीरियों के साथ वस्तुतः युद्धबंदियों जैसा व्यवहार कर रही है... भाजपा की केन्द्र और जम्मू एवं कश्मीर की सरकारें दिखावे के लिए भी मुद्दे का समाधान करने की कोशिशें छोड़ चुकी हैं और पूरे भारत में अपने इस्लामोफोबिक और अति-राष्ट्रवादी एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए ईंधन के रूप में कश्मीर का इस्तेमाल कर रही हैं.

मोदी राज के मूल तत्वः फासीवाद का असंदिग्ध उभार

“बढ़ी हुई कारपोरेट लूट, बेरोकटोक बढ़ती सांप्रदायिक आक्रामकता और जातिगत उत्पीड़न, असहमति का सुनियोजित दमन और कम्युनिस्टों की लानत-मलामत, मोदी सरकार के निर्धारक केंद्रीय तत्व हैं. मुख्यधारा के अधिकांश भारतीय मीडिया ने कड़ी मेहनत के जरिए मोदी को एक ऊर्जस्वी नेता, विकास पुरुष और कोई बकवास न बर्दाश्त करने वाले प्रशासक के रूप में इस तरह पेश किया कि गुजरात 2002 की स्मृतियां लोगों की याददाश्त से मिट जाएं. इस मीडिया का एक हिस्सा तो संघ-भाजपा के प्रचार दस्ते या मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में काम कर रहा है. 2014 की चुनावी जीत को मोदी के विकास पुरुष के नए अवतार की स्वीकृति के रूप में पेश किया गया. लेकिन शुरूआती दिनों में ‘अच्छे दिन’, काले धन की वापसी और स्वच्छ भारत जैसी लफ्फाजी में देश को उलझाए रखने के बाद मोदी सरकार ने अब अपना असली रंग दुनिया के सामने जाहिर कर दिया है.

“… बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों में स्वयं मोदी द्वारा संचालित प्रचार अभियानों ने बारम्बार स्पष्ट कर दिया है कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की राजनीति ही मोदी ब्राण्ड का केंद्रीय तत्व है. जहां खुद मोदी और भाजपा व आरएसएस के उनके वरिष्ठ सहयोगी संघ गिरोह द्वारा किए गए जघन्य अपराधों पर शर्मनाक चुप्पी साध लेते हैं, वहीं दूसरे नेता खुलकर इन अपराधों को सही ठहराते हैं और यहां तक कि उनका जश्न मनाते हैं, जैसा कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद या बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं बरसी के दिन राजस्थान के राजसमंद में मोहम्मद अफराजुल की हत्या करके उसका वीडियो बनाने की घटना में देखा गया.

गसोुा८

“स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के दुश्मन भारत के संविधान को तहस-नहस करके भारत को हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान के अपने खाके में बिठाना चाहत हैं. भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन से गद्दारी करने वाले अंगरेजी उपनिवेशवाद के पिट्ठू अब भगत सिंह के ऊपर सावरकर, अम्बेडकर के ऊपर गोलवरकर और गांधी के ऊपर गोडसे को रखने के लिए इतिहास पर कब्जा करना चाहत हैं और उसका पुनर्लेखन करना चाहते हैं.”

– दीपंकर भट्टाचार्य
भाकपा(माले) के 10वें पार्टी महाधिवेशन में उद्घाटन भाषण से


“मौजूदा सरकार की इन प्रमुख विशेषताओं के साथ संघ की विचारधारा और इतिहास को मिलाकर देखें तो हम आज असंदिग्ध रूप से भारत में फासीवाद के उत्थान के सामने खड़े हैं... जहां आपातकाल प्राथमिक तौर पर दमनकारी राज्य के इर्द-गिर्द घूमता है, वहीं मौजूदा मोदी राज, राज्य के नेतृत्व में कारपोरेट हमले और हिंदू वर्चस्व में बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के अभियान के संगम के रूप में दिखाई पड़ता है. संघ गिरोह को प्रायः उन्मादी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के जरिए अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की खुली छूट मिली हुई है. यही आपातकाल के दौर की निरंकुशता के हमारे अनुभव को मोदी माॅडल के निरंकुश शासन से अलग करता है.

राज्य मशीनरी का साम्प्रदायीकरण, शिक्षा एवं विचारों पर कसता शिकंजा

“... फासीवाद को निरंकुशता से अलग करने वाला एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि फासीवाद राज्य दमन को वैधता प्रदान करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के लिए समाज के एक हिस्से को गोलबंद करने में सक्षम होता है. हाल ही में मोहन भागवत द्वारा कुख्यात रूप से की गई आरएसएस और भारतीय सेना की तुलना हिंदू समाज के सैन्यीकरण और भारतीय सेना के सांप्रदायीकरण/ राजनीतिकरण के आरएसएस के एजेंडा को प्रकट कर देती है. इस एजेंडे पर लम्बे समय से काम किया जा रहा है. इटली के फासीवादी नेता मुसोलिनी से मिलने और उनसे प्रभावित होने वाले हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे द्वारा 1937 में नागपुर में स्थापित की गयी भोंसला मिलिटरी अकादमी इस एजेंडे के दोनों पक्षों को पूरा करती है. 2012 में खुद भागवत ने कहा था कि भोंसला अकादमी, सेना में अधिकारियों की कमी को पूरा करने वाला पूरक संस्थान है. मालेगांव धमाकों में आरोपित एक सेवारत सैन्य अधिकारी ने इसी अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त किया था. सेवानिवृत्त और सेवारत सैन्य अधिकारियों और सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईबी अधिकारियों ने अकादमी में प्रशिक्षकों की भूमिका निभाई है. अकादमी बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को हथियारों का प्रशिक्षण भी देती है जो मुसलमानों के खिलाफ संगठित सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम देते हैं. हिंदू युवाओं का सैन्यीकरण करने की आरएसएस की परियोजना मुसलमानों को ‘पाकिस्तानी’ के रूप में चिन्हित करती है और इस तरह सांप्रदायिक हिंसा को ‘आंतरिक शत्राु’ के खिलाफ ‘राष्ट्रवाद’ का जामा पहना देती है.

“भाजपा-शासित राज्यों में शासन का एक और फासीवादी लक्षण है प्रायोजित ‘मुठभेड़ों’ एवं युद्ध-अपराधों को राज्य की नीति घोषित करना. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चैहान द्वारा भोपाल में फर्जी मुठभेड़ में आठ मुसलमान नौजवानों की हत्या का जश्न मनाना, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा सिलसिलेवार फर्जी मुठभेड़ों का खुलेआम पक्ष लेना, कश्मीरी युवक को जीप के आगे बांधकर घुमाने वाले सेना के मेजर का सरकार द्वारा पक्ष लेना, जम्मू में आठ साल की गुज्जर मुस्लिम लड़की से बलात्कार और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए स्पेशल पुलिस ऑपरेशंस के जवान के पक्ष में हिंदू एकता मंच द्वारा रैली निकालना ऐसे कुछ प्रमुख उदाहरण हैं.

“वर्दीधारियों के ऐसे अपराध गैर-भाजपा सरकारों के राज में भी हुए हैं, लेकिन तब आधिकारिक नीति ऐसे मामलों का खुलेआम जश्न मनाने की नहीं, बल्कि उनसे इंकार करने की रही है.

“शिक्षा को विकृत करना और उसका भगवाकरण करना भी संघ की फासीवादी परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें भाजपा सरकारें मददगार हो रही हैं. भाजपा-शासित राज्यों में स्कूलों के पाठ्यक्रमों का भगवाकरण किया जा रहा है. इतिहास की पाठ्य पुस्तकें फिर से लिखी जा रही हैं और यहां तक कि स्कूली बच्चों के लिए संघ के प्रशिक्षण शिविर अनिवार्य किए जा रहे हैं ताकि कच्ची उम्र में ही उनके दिमागों में जहर भरा जा सके. साथ ही उच्च शिक्षा के संस्थानों पर भी लगातार हमला हो रहा है. भाजपा द्वारा नियुक्त उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रमुख बोलने की आजादी, कैंपस लोकतंत्र, सामाजिक न्याय व शोधकार्य को पूरी तरह तबाह करने में लगे हुए हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, असहमति रखने वाली तमाम प्रगतिशील आवाजों पर हमला करने में संघ के आक्रामक जत्थे की भूमिका अदा कर रहा है.

फासीवादी विचारधरा और आर.एस.एस. का उभार

“... यह भी काबिलेगौर है कि 1920 के दशक में अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस ऐतिहासिक रूप से अपने आपको सैन्य-पौरुषवादी अतिराष्ट्रवाद की विचारधारा पर खड़ा करना चाहता था, जिसके प्रतीक-पुरुष मुसोलिनी और हिटलर थे. भीतरी दुश्मन (नाजी जर्मनी में यहूदी, अन्य अल्पसंख्यक एवं कम्युनिस्ट और मोदी के भारत में मुसलमान, दलित एवं हर किस्म के वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों) के खिलाफ घृणा और हिंसा की केन्द्रीयता, एक सर्वाच्च नेता की व्यक्ति पूजा को बढ़ावा देने के लिए जन-भावनाओं का सनकभरा दोहन, झूठ और अफवाहों का सतत प्रचार, नाजी जर्मनी के साथ आज के भाजपा शासित भारत की अद्भुत और वास्तविक समानताएं हैं.

“... 20वीं सदी के यूरोप के फासीवाद की तुलना में 21वीं शताब्दी के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर अपनी अलग विशिष्टताओं वाला होगा लेकिन इससे न तो फासीवाद का खतरा कम वास्तविक होता है और न ही उसकी विध्वंसक क्षमता कम घातक हो जाती है. मौजूदा दौर का अन्तराष्ट्रीय अर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक माहौल एक बार फिर फासीवादी प्रवृत्तियों के उभार के अनुकूल है, जैसा हम दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में देख रहे हैं. लगातार कायम आर्थिक मंदी, बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा, इस्लामोफोबिया और आप्रवासी विरोधी उन्माद, ये तमाम चीजें अमेरिका और बहुतेरे यूरोपीय देशों में फासीवादी और नस्लीय राजनीति के उभार के लिए उर्वर जमीन मुहैय्या कर रहे हैं. संकट में फंसी वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था से नजदीकी और खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइल के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारियों ने भारत में फासीवादी प्रवृत्ति को और भी मजबूत बनाया है.

“... भारत में फासीवाद के उत्थान और विकास का केंद्रीय कारक सांप्रदायिकता है. इस संदर्भ में हमें याद रखना होगा कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सांप्रदायिक राजनीति के उभार, जिसने अंततः भारत को भयावह खून-खराबे और विराट मानवीय विस्थापन वाले बंटवारे की ओर धकेला, को बरतानवी उपनिवेशवाद से पूरी शह मिली थी. आज भारत की विविधतापूर्ण और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पहचान को हिंदू बहुसंख्यवादी वर्चस्वशाली एकरूपी बना देने की कोशिश अमेरिकी साम्राज्यवाद के ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ के सिद्धांत के अनुकूल है. इसके मुताबिक इस्लामी अरब दुनिया और कन्फ्यूशियाई चीन के खिलाफ अमेरिका की अगुवाई में चल रहे पश्चिम के युद्ध में हिंदू भारत मुख्य सहयोगी के रूप में देखा जाता है.

“...भारत में फासीवादी परियोजना में ऊंच-नीच अनुक्रम पर आधारित सामाजिक गैर-बराबरी के चिन्ह और बहिष्करण एवं उत्पीड़न के औजार के रूप में जाति भी केंद्रीय तत्व है. अक्सर इस जातिवादी व्यवस्था का सबसे गहरा आघात महिलाओं पर होता है... भारत में फासीवाद भारतीय समाज में गहरे पैठे अन्याय और हिंसा से शक्ति पाता है और उसको मजबूत एवं प्रसारित करता है, और आरएसएस आज भारतीय इतिहास व परम्परा में जो कुछ भी लोकतंत्र-विरोधी है, उसका प्रतीक बन गया है.

“आरएसएस की स्थापना के बाद शुरूआती पचास वर्षों में उसकी फासीवादी विचारधारा को स्वीकार करने वाले बहुत लोग न थे. इसने खुद को न सिर्फ स्वाधीनता आंदोलन से दूर रखा बल्कि आधुनिक भारत में मौजूद एक प्रमुख समुदाय के रूप में मुसलमानों की स्थिति को कमजोर करने के लिए अंग्रेजी उपनिवेशवाद से कई मोर्चों पर हाथ मिला लिया. गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर न सिर्फ कानूनी प्रतिबंध लगा बल्कि आम लोगों की निगाह में इसकी साख भी गिरी. मगर सांप्रदायिकता के सवाल पर कांग्रेस के विचलन और स्वाधीनता आंदोलन की आकांक्षाओं से गद्दारी ने आरएसएस को फिर से संगठित होने, ताकतवर बनने और वैधता हासिल करने का मौका दिया. 1960 के दशक के शुरूआती वर्षों में आरएसएस ने खोई साख उल्लेखनीय रूप से हासिल कर ली, क्योंकि पहले 1962 के चीन युद्ध, फिर1965 और 71 के पाकिस्तान के साथ सिलसिलेवार युद्धों के दशक में युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद बढ़ता गया. आपातकाल थोपने की घटना ने आरएसएस को मौका दिया कि लोकतंत्र बहाली के लिए चलने वाले लोकप्रिय आंदोलन के माध्यम से वह अपने संगठन व प्रभाव का विस्तार करे. उदारीकरण की आर्थिक नीतियों और अमेरिकापरस्त विदेश नीति को अपनाने के साथ ही कांग्रेस निर्णायक रूप से स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से अलग हट गयी. अब भाजपा और कांग्रेस के बीच विचारधारात्मक और नीति सम्बंधी अंतर धुंधले पड़ गए . ऐसे में भाजपा को विभिन्न अंचलों और सामाजिक समूहों में अपने नये मित्र हासिल करने के लिये बस थोड़ा बहुत व्यावहारिक समायोजन करके अपना प्रभाव बढ़ाने में कोई खास दिक्कत नहीं हुई.

“उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को आक्रामक रूप में लागू करने से पैदा हुआ संकट उसी समय आया है जब कांग्रेस और व्यापक दायरे के विभिन्न क्षेत्रीय दल अपनी साख खो चुके हैं और भारत में एक बड़ा राजनीतिक शून्य बना हुआ है, आरएसएस इस मौके का इस्तेमाल करके भारत की ऐतिहासिक व राजनीतिक संकल्पना को बदल उसकी जगह अपनी खुद की ऐतिहासिक-राजनीतिक संकल्पना कायम करना चाहता है... इस प्रक्रिया में वे नेहरू को खलनायक बनाने; गांधी को अपने लिए सुपाच्य बनाने, अम्बेडकर व भगतसिंह को विकृत करने; अकबर से लेकर ताजमहल तक मुसलमान हस्तियों को बदनाम करने और ऐतिहासिक इमारतों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताने में जुटे हुए हैं. वे जातिगत व लैंगिक ऊँच-नीच, दकियानूस और घृणित सामाजिक प्रथाओं और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को ‘भारतीय संस्कृति की आत्मा’ के रूप में प्रचारित करते हैं!

“इतिहास के पुनर्लेखन औ र उसको हड़प लेने की इस प्रक्रिया का प्रतिरोध फासीवाद-विरोधी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए. ऐतिहासिक रूप से भारतीय जनता के उपनिवेशवाद-विरोधी जागरण तथा अंग्रेजी राज के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष से अलग-थलग रहने वाला और यहां तक कि उसका विरोध करने वाला आरएसएस हमेशा ही साभ्यतिक या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपना एक काल्पनिक आख्यान गढ़ता रहा है. हमेशा मिथकों का हवाला देना, यहां तक कि उन्हें इतिहास बताना, जालसाजी व हड़पने के रास्ते वास्तविक इतिहास को विकृत करना संघ के सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के झूठे आख्यान में फिट बैठता है. इसलिए भारत को परिभाषित और विकसित करने के अनवरत संघर्ष में इतिहास एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है.

“इतिहास को विकृत करने, झुठलाने और हड़पने के आरएसएस के प्रयासों की मुखालफत करते हुए हमें भारत की जनता के इतिहास की और लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और मनुष्य की मुक्ति के लिए चले ऐतिहासिक संघर्षों की विरासत का झंडा बुलंद रखना चाहिए. हमारे मुल्क के महान लोकतांत्रिक और समाजवादी भविष्य के लिए जारी संघर्ष को ऊर्जस्वित करने एवं सशक्त बनाने के लिए हमारी ऐतिहासिक परम्पराओं में जो भी प्रगतिशील और मुक्तिकामी है, उसे बुलंद करना होगा, विकसित करना होगा और लक्ष्यपूर्ति में लगाना होगा.

आर्थिक व विदेश नीति के पहलू

“मोदी सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों की दिशा कमोबेश वही है जिसकी शुरूआत 1990 के दशक की शुरूआत में कांग्रेस ने की थी. लेकिन जिस बढ़ी हुई रफ्तार, आक्रामकता और मनमाने तरीके से मौजूदा सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है, वह इसे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार समेत सभी पूर्ववर्ती सरकारों से अलग करती है. विदेशी निवेश, वित्तीय एकीकरण, डिजिटलीकरण, निजीकरण और श्रम कानूनों पर हमला पहले की सरकारों में कभी भी इतना तीखा और मजबूत न था. योजना आयोग को समाप्त करने, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार गारंटी कानूनों का सुनियोजित उल्लंघन, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की जगह बीमा आधारित निजी स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के एजेंडा को तुच्छ करने के लिये स्व-रोजगार को केंद्र में लाना व अब पकौड़ा बेचने, जो कठिन अनिश्चित जीविका का प्रतीक है, को लाभकारी रोजगार का उदाहरण बताने के जरिए मौजूदा सरकार ने सामाजिक कल्याण की जिम्मेदारी का जिस कदर बेशर्मी से पूर्णतः परित्याग किया है, वैसा पहले किसी सरकार में सम्भव नहीं हुआ था.

“विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी सरकार अमेरिका की रणनीतिक मातहती की नीति को नई ऊंचाइयों पर ले गयी है... कि वह अमेरिका में भारतीय आप्रवासियों पर बढ़ते हमलों पर भी खामोश है. अमेरिका स्थित हिंदुत्ववादी संगठन गोरे लोगों के वर्चस्व के टंम्प के एजेंडे का खुला समर्थन कर रहे हैं... लेकिन मोदी के चौधराहट भरे रुख के चलते भारत अपने पड़ोसी देशों से अलगाव में पड़ गया है.

“नागरिकता संशोध्न बिल के माध्यम से मोदी सरकार भारत की नागरिकता की परिभाषा भी बदल देना चाहती है. इस बिल में बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रस्ताव है. इजरायल के ‘यहूदी होमलैण्ड’ के माॅडल की तरह ही यह प्रस्ताव पड़ोसी देशों में सताये जा रहे अल्पसंख्यकों के बीच धार्मिक आधार पर भेदभाव करके और नागरिकता आवेदन करने वाले गैर-मुस्लिमों को विशेष लाभ देकर भारत को छुपे रूप में हिन्दू राष्ट्र के रूप में बताने की एक कोशिश है. इस कदम से असम में भी अशांति और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं, जहां पूर्वानुमान है कि भाजपा इस संशोधन  के माध्यम से असम समझौते को निष्प्रभावी बना देगी क्योंकि इससे उक्त समझौते में लागू 24 मार्च 1971 की कट ऑफ तारीख बेमानी हो जायेगी.

“इस बीच, असम में सर्वोच्च न्यायालय के निरीक्षण में चल रही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) को तैयार करने की प्रक्रिया के प्रति भी चिन्तायें व्यक्त की जा रही हैं. असम सरकार के नेताओं के बयान इस बात के संकेत दे रहे हैं कि लाखों लोग जिनके नाम एन.आर.सी. में शामिल नहीं किये गये हैं, उन्हें सामूहिक रूप से देश से बाहर भेज दिया जायेगा. यदि इसे लागू कर दिया तो एक विकराल मानवीय संकट खड़ा हो जायेगा. इस संकट से बचने के लिए केन्द्र सरकार को बंग्लादेश की सरकार के साथ एक समझौता करने और जिनके नाम एन.आर.सी. से बाहर कर दिये गये हैं उन्हें वर्क परमिट देने की संभावनाओं को अवश्य तलाशना चाहिए .

संघ-भाजपा की आक्रामकता को तेज करने वाले प्रमुख कारक

“संघ-भाजपा गिरोह के सत्ता पर काबिज होने और व्यवस्थित रूप से अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में कौन सी चीजें मददगार रही हैं?

“मौजूदा समय में जो चार कारक स्पष्टतः भाजपा के पक्ष में गए हैं, उन पर गहराई से ध्यान देने की जरूरत है. 2014 में भाजपा सिर्फ चुनाव ही नहीं जीती, बल्कि उसने मौजूदा राजनीतिक खालीपन का अधिकतम उपयोग किया. जहां कांग्रेस अपनी साख और नेतृत्व के सबसे बुरे संकट से जूझ रही थी, वहीं लगभग सारी गैर-भाजपा राजनीतिक धाराएं – क्षेत्रीय पार्टियां, तथाकथित ‘सामाजिक न्याय’ के खेमे की पार्टियां और वामपंथ – भी चुनावी ताकत के लिहाज से अपने सबसे बुरे दौर में थे. 2014 में मोदी की असरदार जीत से राजनीतिक संतुलन भाजपा के पक्ष में लगातार झुकता गया...

“दूसरे, पिछले तीन दशकों में हमने सत्ताधारी वर्ग की लगभग सभी पार्टियों के बीच विदेश नीति, आर्थिक नीतियों व आंतरिक शासन के सवाल पर एक वास्तविक सर्वानुमति उभरते हुए देखी है. जब नीतियों में अन्तर नहीं रहा तो भाजपा ने खुद को इन नीतियों के सर्वाधिक आक्रामक और संकल्पबद्ध पैरवीकार के बतौर पेश करने में सफलता पा ली है.

“तीसरे, इस नीतिगत सर्वानुमति के दौर में हम यह भी देख रहे हैं कि रोजाना मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया की मदद से एक सामान्य बोध गढ़ा जा रहा है, जिसके मुताबिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर बेदखली अनिवार्य है, उसी तरह राष्ट्रीय एकता की अविलम्ब जरूरत के लिये मानवाधिकारों को छोड़ा जा सकता है, अत्याचारी कानून लागू करने ही होंगे, और आर्थिक दक्षता की सर्वरोगहर दवा के बतौर निजीकरण लाना ही होगा, आदि, आदि.

“अंततः इस हद तक नीतिगत सर्वानुमति और गढ़े गए सामान्य बोध के इन हथियारों के साथ भाजपा के पास गोपनीय रूप से काम करने वाला आरएसएस का संगठन है, जिसके पास नफरत, झूठ, अफवाह और गैर-सरकारी आतंक के नेटवर्क के रूप में अपने खुद के औजार हैं.

अंत में तीन शीर्षक ‘फासीवादी हमले के विरुद्ध जन प्रतिरोध’, ‘वाम एकता और सभी संघर्षशील शक्तियों में परस्‍पर सहयोेग’ और ‘फासीवाद को हराओ, जनता का भारत बनाओ’ में फासीवाद के विरुद्ध प्रतिरोध संघर्ष के विभिन्‍न पहलुओं एवं कार्यभारों का वर्णन किया गया हैं. हम यहां अंतिम दो भागों को लगभग पूरा ही प्रस्‍तुत कर रहे हैं.

वाम एकता और सभी संघर्षशील शक्तियों में परस्पर सहयोग

“गुजरात से उत्तर प्रदेश तक, महाराष्ट्र से बिहार तक हम दलित प्रतिरोध की प्रेरक घटनाओं के गवाह हैं जिनमें जमीन, शिक्षा, रोजगार और सम्मान के बुनियादी सवालों पर क्रांतिकारी राजनीतिक गोलबंदी की नई सम्भावना निहित है. दलितों के खिलाफ तेज होती आरएसएस-समर्थित हिंसा के मुकाबले एक नई पीढ़ी का दलित आंदोलन उभरा है जिसकी अगुवाई युवा दलित नेता कर रहे हैं. इन दलित आंदोलनों का यह पक्ष सर्वाधिक स्वागतयोग्य है कि वे असुरक्षित मुसलमान समुदाय के पक्ष में मजबूती से खड़े हुए हैं और साथ ही सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम देने के लिए दलितों का इस्तेमाल करने की आरएसएस की कोशिश का प्रतिरोध कर रहे हैं. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या और ऊना में हुए अत्याचार के प्रतिरोधस्वरूप उभरे दलित आंदोलन ने आर्थिक/वस्तुगत अधिकारों के लिये संघर्ष और सम्मान के लिए संघर्ष के बीच खड़ी की गई तथाकथित ‘चीन की दीवार’ को तोड़ा है. ऊना आंदोलन ने न सिर्फ ‘गौ-माता’ के संघी प्रतीक के खिलाफ सशक्त दलित चुनौती पेश की है बल्कि श्रम के उत्पीड़नकारी-असम्मानजनक रूपों के खिलाफ और सम्माजनक रोजगार की गारंटी के लिए भूमि-आवंटन के सवालों पर दलितों के संघर्ष को बुलंद किया है. ऐसे संघर्षों ने जाति उन्मूलन और समाज परिवर्तन के मूल एजेण्डा के इर्द-गिर्द अम्बेडकरवादियों के नेतृत्व वाले आंदोलनों और वामपंथियों के नेतृत्व वाले [खासकर भाकपा(माले) के नेतृत्व वाले] दलित एवं अन्य दबे-कुचले तबकों के अधिकार व सम्मान के आंदोलनों के बीच स्वागतयोग्य एकता की राहें खोली हैं. ऐसे प्रत्येक बुनियादी संघर्ष को मजबूत करना, प्रतिरोध के इन विविधतापूर्ण मुद्दों के बीच एकता, आपसी सहयोग और एकजुटता कायम करना ही वह कुंजी है जिसके जरिए फासीवाद-विरोधी लोकप्रिय प्रतिरोध को जीवंत रूप से खड़ा किया जा सकता है...

“जाहिर है कि फासीवादी ताकतों का प्रतिरोध करने और उन्हें पराजित करने के लिए लोगों के हाथ में संविधान और वोट, दो कारगर हथियार हैं. इसलिए इन दोनों हथियारों को कुंद करने के प्रयास लगातार जारी हैं. वाजपेयी के जमाने में ही भाजपा ने संविधान की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया था. आज भी भाजपा के मंत्री जब-तब संविधान बदलने की बात कहते रहते हैं. सरकार ऐसे बहुत से कानूनी प्रावधान करने की कोशिश कर रही है जिससे संविधान बुनियादी रूप से पूरी तरह बदल जायेगा. नागरिकता कानून में प्रस्तावित संशोधन भारत की नागरिकता को निर्धारित करने में भेदभावमूलक कसौटी के बतौर धर्म को भी शामिल करता है. इसी आधार पर शरणार्थियों के बारे में भारत का आधिकारिक रवैया तय किया जायेगा. कानूनों को तार्किक बनाने के नाम पर सभी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक अधिकारों की बड़े पैमाने पर काट-छांट की जा रही है. यह काट-छांट विशेष रूप से ट्रेड यूनियन अधिकारों, सामूहिक समझौता वार्तायें और कार्यस्थल पर लोकतंत्र के क्षेत्रों में हो रही है. बहुलतावाद और विविधता, जो भारत की एकता के लिये केन्द्रीय तत्व है, को संघ के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की अवधारणा के मातहत लाने के लिए बड़े सुनियोजित ढंग से देश के संघीय ढांचे को नकारा जा रहा है और उसमें तोड़-फोड़ की जा रही है.

“चुनाव के क्षेत्र में भी नियमों को बदलने की लगातार कोशिशें देखी जा रही हैं. काॅरपोरेट कम्पनियों द्वारा बड़ी पार्टियों की गुमनाम तरीके से फंडिंग को बढ़ावा देने के लिए चुनावी चंदे के नियमों में बदलाव करने से लेकर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की भाजपा की चीख-पुकार जारी है. इससे विकेन्द्रीकृत क्षेत्रीय व सामाजिक प्राथमिकताएं और परिप्रेक्ष्य तत्कालीन केन्द्रीय वर्चस्वशाली राजनीतिक विमर्श के मातहत आ जायेंगे, और विविधतापूर्ण बहुदलीय लोकतंत्र को समेटकर क्रमशः दो-पार्टी लोकतंत्रा में बदल दिया जायेगा.

“ईवीएम के गलत काम करने की बढ़ती शिकायतों, बूथ स्तर पर वोटों की गिनती में अनियमितताओं आदि की वजह से चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और साख पर ही सवालिया निशान लग गया है...

“गुजरात चुनाव ने सचमुच मोदी के गढ़ में ही मोदी शासन की कमजोरी को उजागर कर दिया है. राज्य में सशक्त विपक्ष की उपस्थिति के बिना ही जनता के विभिन्न सामाजिक तबकों के एक के बाद एक होने वाले आंदोलनों ने ऐसा माहौल बनाया कि भाजपा लगभग सरकार से बाहर ही हो गई थी... क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को वाम एवं अन्य संघर्षशील शक्तियों की एकता एवं दावेदारी को मजबूत करते हुए चुनाव के अखाड़े में प्रभावी हस्तक्षेप की रणनीति बनानी चाहिए. कम्युनिस्ट आन्दोलन की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ कोई भी समझौता किये बगैर जरूरत पड़ने पर फासीवादी भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ गैर-वाम विपक्ष की ताकतों के साथ हाथ मिलाने के विचार के प्रति भी हमें खुला रहना होगा.

फासीवाद को हराओ! जनता का भारत बनाओ!

“फासीवाद को पराजित करने की चुनौती को न तो केवल चुनावी चुनौती तक सीमित किया जा सकता है और न ही ऐसा करना चाहिए .

“बिहार का अनुभव बताता है कि ऐसा तथाकथित महागठबंधन कितना कमजोर और खोखला हो सकता है, जिसने बिहार में भाजपा को निर्णायक शिकस्त तो दी, लेकिन बाद में वह ढह गया और भाजपा को पिछले दरवाजे से सत्ता में ले आया. गुजरात में कमजोर कांग्रेस विभिन्न आंदोलनों से व्यापक सामाजिक व राजनीतिक समर्थन हासिल करते हुए भाजपा को हराने के काफी करीब पहुंच गई, लेकिन साथ-ही-साथ वह भाजपा द्वारा निर्धारित धार्मिक-सांस्कृतिक एजेंडे पर उससे मुकाबला करने की कोशिश करती भी दिखाई पड़ी. भारत के हाल के इतिहास को देखें तो ऐसी घटनाएं भरी पड़ी हैं जब कांग्रेस ने भाजपा के नारों और प्रतीकों को अपना कर उसके साथ प्रतियोगिता में भाजपा के हिंदुत्व को पछाड़ने की कोशिश की है. ऐसे में वह सिर्फ भाजपा के हाथों खेली है और उसने भाजपा के आक्रामक बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को अधिक शक्ति एवं वैधता प्रदान की है. एक और उदाहरण पश्चिम बंगाल का है, जहां ऊपर से तो लगता है कि भाजपा के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में है, लेकिन उसका आतंक का राज, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र पर सीधा हमला वास्तव में उस राज्य में भाजपा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. इसलिए हमें हर हाल में फासीवाद के खिलाफ मजबूत विचारधारात्मक और राजनीतिक विकल्प पेश करने के असली कार्यभार को आंखों से ओझल नहीं करना चाहिए.

“जनता के मूलभूत सवालों को संबोधित करने के साथ-साथ हमें फासीवादियों के जुड़वा हथियारों – घृणा प्रचार और घृणा अपराधों के खिलाफ भी संघर्ष तेज करना होगा.

“अनुभव बताते हैं कि यदि जनता के स्थानीय संगठन सचेत रहें और सांप्रदायिक ताकतों का साहसपूर्वक मुकाबला करें तो संभावित सांप्रदायिक हिंसा को अक्सर बेअसर किया जा सकता है.

“संघर्षशील जनता के बीच मुहल्ला-आधारित जुझारू एकजुटता के जरिये फासीवादी षड्यंत्र को शुरूआत में ही कुचला जा सकता है. सांप्रदायिक व जातीय हिंसा को रोकने में सतर्कता और तैयारी तथा अगर ऐसी कोई हिंसा भड़क उठे तो स्थानीय कार्यकर्ताओं व समुदाय के वरिष्ठ नागरिकों द्वारा त्वरित और साहसिक प्रतिरोध बहुत मूल्यवान होता है. सांप्रदायिक फासीवादियों के घृणा-प्रचार को उजागर करते हुए और उसे चुनौती देते हुए जनता को वास्तविक तथ्यों और तार्किक विश्लेषण से लैस करना भी उतना ही जरूरी है...

“हमें सभी कमजोर तबकों – मजदूरों, किसानों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, छात्र-युवाओं, एलजीबीटीक्यू समुदाय, अंतर्धार्मिक-अंतर्जातीय व समलैंगिक जोड़ों, कश्मीरियों – द्वारा जन-विरोधी आर्थिक व पर्यावरण नीतियों के साथ-साथ अपने संवैधानिक अधिकारों, सम्मान व जीवन पर हमले के खिलाफ संचालित जनांदोलनों का सक्रिय समर्थन व नेतृत्व करना चाहिए. सांप्रदायिक दादागिरी और हिंसा को ‘राष्ट्रवादी’ नारों और प्रतीकों की आड़ में ढंकने की कोशिशों के बारे में हमें खास तौर से सचेत रहना चाहिए. हमें हर सम्भव कोशिश करनी चाहिए कि लोग संवैधानिक, जनवादी और प्रगतिशील मूल्यों को समझें तथा उनकी रक्षा के लिए गोलबंद हों ताकि एक बेहतर, समतामूलक और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के संघर्ष को तेज किया जा सके.

“जिस राजनीतिक शून्य का फायदा उठा कर फासीवादी शक्तियां अस्तव्यस्त और संकटग्रस्त वर्तमान में स्वयं को ‘रक्षक’ के रूप में पेश करने का अवसर पा रही हैं, उस शून्य को बेहतर कल की भविष्य-दृष्टि और उसे हासिल करने के लिये संघर्षों से भरा जाना चाहिए. यह भविष्य-दृष्टि एक समृद्ध, बहुलतावादी और समतावादी भारत की है, जो हर भारतीय के लिए बेहतर जीवन और व्यापक अधिकारों की गारंटी कर सके. यदि स्वाधीनता संघर्ष और आजादी के बाद के आरंभिक वर्षों के दौरान राष्ट्रनिर्माण को मिली गति समाप्त हो चुकी है, तो हमें दूसरे स्वाधीनता संघर्ष की ऊर्जा की जरूरत है, जो हर नागरिक के लिए पूर्ण सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता की गारंटी करते हुए हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत करे. यदि बढ़ती सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ की राजनीतिक समानता का मजाक उड़ा रही है, तो इस गैर-बराबरी के ढांचे से बाहर निकलने के लिए हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है. यदि अलोकतांत्रिक भारतीय समाज की जमीन, सतह पर चढ़ी लोकतंत्र की परत को लगातार क्षतिग्रस्त कर रही है और फासीवाद हमारे संवैधानिक लोकतंत्र को पूरी तरह से अलोकतांत्रिक जमीन के मातहत लाने की धमकी दे रहा है, तो हमें इस समाज का लोकतंत्रीकरण करना होगा, ताकि लोगों के हाथों में वास्तविक सत्ता आ सके. फासीवाद को जनता को दरकिनार करने और कुचलने की इजाजत नहीं दी जा सकती. एकताबद्ध जनता फासीवाद के हमले को परास्त करेगी और अपने लिए अधिक मजबूत और गहरा लोकतंत्र हासिल करेगी.”

फुट नोट :

1. Harit Mehta, In Modi’s Gujarat, Hitler is a Textbook Hero, Times of India, 30 September, 2004.

2. इस प्रस्‍ताव को पूर्ण रूप में http://www. cpiml. net/documents/10th-party-congress/resolution-on-thenational- situation पर पढ़ा जा सकता है.

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“हमें पता है कि वामपंथ ने कुछ महत्वपूर्ण चुनावी युद्धों में पराजय का मुंह देखा है लेकिन ये चुनावी धक्के फासीवाद और लोकतंत्र के बीच चल रहे इस युद्ध का परिणाम निर्धारित नहीं करेंगे. कम्युनिस्टों ने हमेशा ही जनता के साहस और दृढ निश्चय से अपनी शक्ति अर्जित की है जिसने ऐतिहासिक रूप से अपने स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए संघर्ष किया है. आज जब भारत एक बार फिर से मजदूरों, किसानों, दलितों, आदिवासियों, छात्रों, युवाओं और महिलाओं के नेतृत्त्व में जुझारू जन संघर्षों का गवाह है तो ये संघर्ष निश्चित ही फासीवाद के हमले के खिलाफ वामपंथ के संघर्ष को मजबूत करेंगे. विभिन्न वाम ताकतों में आन्दोलनकारी एकता और प्रतिरोध की व्यापक धाराओं के बीच आपसी सहयोग निश्चित रूप से फासीवादी ताकतों की हत्यारी अग्रगति को रोकने में कामयाब होगा. आजीविका, सम्मान और लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाली जनता की एकता ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक घृणा वाली राजनीति को पराजित करेगी.”

- दीपंकर भट्टाचार्य
भाकपा(माले) के 10वें पार्टी महाधिवेशन में दिये गये उद्घाटन भाषण से



रोका जा सकता था आर्तुरो युई को ***

सीखो कै से परखते हैं, सिर्फ निरखते नहीं
और कैसे काम करते हैं, बजाय सारे दिन गाल बजाने के
दुनिया हो ही चली थी शासित, ऐसे उन्मादी धुर्त  से
लोगों ने जिस पर काबू तो पा लिया
मगर गलत होगे तुम , अगर थपथपाओगे अपनी पीठें,
और समझ लोगे खुद को अति चतुर
वही बजबजाती मवाद जिसने जना था उसे, अभी भी वैसे ही बजबजा रही है.

– बर्तोल्त ब्रेश्‍त

*** 1941 में ब्रेश्‍त ने यह व्यंग नाटिका हिटलर के जीवन के समानांतर एक काल्पनिक शिकागो गैंगस्टर आर्तुरो युई के उत्कर्ष और अवसान के रूपक के रूप में लिखी थी. आर्तुरो युई की भूमिका निभाने वाला पात्र नाटक के अन्त में अपने उपसंहार कथन में दर्शकों से जो कुछ भी हो रहा है उस पर नजर रखने, बातें करने के बजाय सक्रिय होने,और आत्म मुग्ध होने के  बजाय सतर्क रहने का आह्वान करता है क्यों कि सड़ते-गलते पूंजीवाद से बजबजाता गन्दा “मवाद” अभी भी मूल पिशाच के रक्तबीजों को पैदा करने में सक्षम है.



फिर वे यहूदियों के लिए आए

– मार्टिन नीमोलर

पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था
फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
फिर वे यहूदियों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता


पहले वे मुसलमानों के लिए आए

– माइकल आर बर्च

पहले वे मुसलमानों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं मुसलमान नहीं था
फिर वे समलैंगिकों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं समलैंगिक नहीं था
फ़िर वे नारीवादियों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं नारीवादी नहीं था
अब वे मेरे लिए कब आएंगे
क्योंकि मैं इतना व्यस्त और संवेदनहीन था
कि मैं अपने बहनों-भाइयों के बचाव में खड़ा नहीं हुआ?